गाय के नाम पर हत्या और इंसाफ़ के लिए मुस्लिम परिवारों की लड़ाई- ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, अंशुल सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, हापुड़ से लौटकर
शाम होते ही रोज़ा खोलने के लिए जैसे ही मस्जिद से आवाज़ आती है नग़मा अपने परिवार संग इफ़्तार करने लग जाती हैं.
इस परिवार में सब हैं, लेकिन नगमा के पिता नहीं हैं.
जैसे-जैसे ईद क़रीब आएगी, नग़मा के लिए अपने पिता क़ासिम की यादें और ताज़ा हो जाएँगी.
नग़मा कहती हैं, "हम किसी को बता भी नहीं सकते कि हमें कैसा महसूस होता है, जब हमें अपने पापा की याद आती है. ईद के बाद हमारे पापा को मारा था. जब भी ईद आती है तो हमें उनकी बहुत याद आती है. त्योहार पर सब होते हैं लेकिन पापा नहीं होते."
साल 2018 में नग़मा ने आख़िरी बार अपने पिता क़ासिम के साथ ईद मनाई थी और उसके ठीक दो दिन बाद गाय के नाम पर उनकी मॉब लिंचिंग कर दी गई.
उत्तर प्रदेश के हापुड़ में हुई इस घटना के मामले में अब ज़िला कोर्ट ने 10 अभियुक्तों को दोषी ठहराया है.
लेकिन इस फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे लोगों की आँखों में अब भी दुख और ख़ौफ़ के साथ कई सवाल हैं.
फिर चाहे नग़मा हों, क़ासिम के भाई सलीम हों या उस रोज़ भीड़ की पिटाई का शिकार बने समयदीन.

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क्या है पूरा मामला
तारीख़: 18 जून 2018.
जगह: उत्तर प्रदेश के हापुड़ ज़िले का बझैड़ा खुर्द गाँव.
तब यहाँ हिंसक भीड़ ने 45 साल के क़ासिम की गोहत्या के आरोप में जानलेवा पिटाई की थी.
क़ासिम मवेशियों की ख़रीद-बिक्री का धंधा करते थे.
घटना वाले दिन हर रोज़ की तरह क़ासिम मवेशियों को ख़रीदने के लिए निकले थे.
इस दौरान बझैड़ा गाँव के पास हिंसक भीड़ ने उनका पीछा किया और पिटाई की.

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घटना के इक़लौते चश्मदीद गवाह और पीड़ित समयदीन बताते हैं कि जब वे बीच-बचाव करने गए, तो उन्हें भी पीट-पीटकर अधमरा कर दिया गया था.
पिटाई के बाद क़ासिम और समयदीन को अस्पताल ले जाया गया.
यहाँ डॉक्टरों ने क़ासिम को मृत घोषित कर दिया और कई दिनों तक चले इलाज के बाद समयदीन की जान बच गई.
लगभग छह साल की लंबी सुनवाई के बाद 12 मार्च 2024 को अदालत का फ़ैसला आया.
हापुड़ के जिला एवं सत्र न्यायालय ने मामले में 10 अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई और 58-58 हज़ार रुपए का जुर्माना भी लगाया.
ये 10 दोषी हैं- युधिष्ठिर, राकेश, कानू, सोनू, मांगेराम, रिंकू, हरिओम, मनीष, ललित और करनपाल.

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'बदला नहीं लेकिन इंसाफ़ चाहते थे'
फ़ैसले के बाद बीबीसी हापुड़ के पिलखुवा कस्बे में पहुँचा.
यहाँ सद्दीक़पुरा मोहल्ले की एक गली में दो कमरों वाला छोटा सा घर है.
इस घर में क़ासिम का परिवार उनके छोटे भाई सलीम के साथ रहता है.
सलीम बताते हैं कि जिस दिन कोर्ट का फ़ैसला आया, उस दिन उनका फ़ोन दिन भर बजता रहा.
उन्होंने कहा कि वे लोग फ़ैसले से ख़ुश हैं.
सलीम कहते हैं, ''हम चाहते तो फाँसी की सज़ा की भी मांग कर सकते थे, लेकिन हमने आजीवन कारावास की सज़ा को चुना. अगर हम फाँसी की सज़ा मांगते तो फिर उनमें (हिंसक भीड़) और हममें क्या फ़र्क़ रह जाता. हम बदला नहीं लेकिन इंसाफ़ चाहते थे.''
हालाँकि न्याय में हुई देरी के सवाल पर सलीम के माथे पर शिकन पड़ जाती है.
उनका कहना है कि अमूमन ऐसे मामलों में देरी हो जाती है और बहुत से मामलों में तो अभी भी लोगों को न्याय नहीं मिला है.
कोर्ट के फ़ैसले से सलीम को राहत तो मिली लेकिन एक डर भी है. आम दिनों में वो स्थानीय बाज़ार में फल बेचते हैं लेकिन जब से अदालत से फ़ैसला आया है, तब से दुकान बंद है और वो इलाक़े से बाहर जाने से भी बच रहे हैं.

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'क़ासिम जितनी बार पानी मांगता उतना वो उसे पीटते'
पिलखुवा से कुछ दूरी पर है बझैड़ा खुर्द गाँव, जहां मॉब लिंचिंग की घटना हुई थी.
मुख्य सड़क पर बझैड़ा खुर्द गाँव का एक बोर्ड है, जो इस बात की तस्दीक़ करता है कि बझैड़ा खुर्द एक राजपूत बहुल गाँव है.
इस गाँव के ठीक बगल में है मदापुर मुस्तफ़ाबाद गाँव, जो मुस्लिम बहुल आबादी वाला गाँव है.
बझैड़ा जाने वाली सड़क मदापुर गाँव से होकर गुज़रती है. इसी गाँव के रहने वाले हैं समयदीन, जिनकी घटना के वक़्त पिटाई की गई थी.
पेशे से किसान समयदीन मॉब लिंचिंग की घटना के पीड़ित और इकलौते चश्मदीद गवाह हैं.

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बातचीत में घटना वाले दिन को याद कर समयदीन बताते हैं, "मैं रोज़ की तरह अपने जानवरों का चारा लेने के लिए अपने खेत पर गया था. तभी मैंने देखा कि मेरे खेत के पास खाली पड़े रजवाहा (बड़ी नहर) में क़ासिम बचाओ-बचाओ चिल्लाते हुए आगे दौड़ रहा है और पीछे वो लोग."
"फिर मेरे खेत के वो लोग क़ासिम को पकड़कर पीटने लगे. मैंने बीच-बचाव करते हुए पूछा कि इसे क्यों मार रहे हो? उन्होंने मुझे कोई जवाब नहीं दिया और मेरे साथ भी मारपीट शुरू कर दी."
उन्होंने आगे बताया, ''मैंने कहा पहले तो इसे क्यों मार रहे हो और फिर मुझे क्यों मारने लगे? क्या कसूर है मेरा? उन्होंने कहा कि तुम दोनों गाय काटते हो. उन्होंने हमारी एक न सुनी और हमें पहले से भी ज़्यादा मारने लगे.
समयदीन बताते हैं, "उन्होंने हमें लाठी-डंडों से, ईंट-पत्थर से और बैट से पीटा. मेरे दोनों हाथ टूट गए, दोनों पैर टूट गए थे और सिर में भी गंभीर चोटें आई थीं.''

समयदीन अपनी बात पूरी करते, उससे पहले ही उनका गला भर आया और आँखों में आँसू आ गए.
रुंआसे गले से वो बोले, "सब कुछ सहना पड़ता है. बड़ी-बड़ी तकलीफ़ें झेली हैं. ऊपर वाला जो चाहता है वो होता है. उन्होंने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी. बल्कि ये कहा था कि इसे (समयदीन) तो हमने मार दिया. लेकिन मैं बच गया और उस बेचारे (क़ासिम) का इंतक़ाल हो गया."
"उसने हाथ जोड़कर बहुत बार पानी मांगा लेकिन उसकी एक न सुनी. जितनी बार क़ासिम पानी मांगता उतना वो उसे पीटते."
छह साल बाद अदालत का फ़ैसला आया और समयदीन का वो वादा भी पूरा हुआ, जो अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में उन्होंने ख़ुद से किया था.
समयदीन बताते हैं, "जब मैं अस्पताल में था, तो अपने भाई यासीन से मेरी बात होती थी. वो मुझे मामले की कार्रवाई के बारे में जानकारी देते थे."
"मैं तब सोचता था कि मैंने सब कुछ अपनी आँखों से देखा है और ख़ुदा ने मुझे ज़िंदा रखा है, इसलिए सच को मुझे अदालत तक ज़रूर पहुँचाना है."
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद उनके छोटे भाई यासीन ने उनकी मुलाक़ात सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर से कराई और यहाँ से अदालत में इंसाफ़ की लड़ाई का सिलसिला शुरू हुआ.
क्या कहते हैं दोषियों के परिजन
दोषियों के परिजनों का आरोप है कि उनके परिवार के लोगों को फँसाया गया है.
दस दोषियों में से एक दोषी हैं ललित. बीबीसी ने फ़ैसले पर ललित की पत्नी संगीता से बात की.
संगीता कहती हैं, ''घटना वाले दिन मेरे पति घर पर थे और अपना मकान निर्माण से संबंधित काम करवा रहे थे. मेरे पति लड़ाई वगैरह नहीं करते, चाहे इन्हें कोई कुछ भी कहकर चला जाता था. आप पूरे गाँव में इनके बारे में पूछ सकते हो. मेरे पति को फँसाया गया है.''
एक और दोषी हरिओम के बड़े भाई सतेंद्र का कहना है कि फ़ैसला हमारे ख़िलाफ़ आया है और अब हम ऊपरी अदालत में जाने की तैयारी कर रहे हैं.

‘मॉब लिंचिंग के मामलों में ये फ़ैसला मिसाल बनेगा’
हापुड़ के दोनों परिवारों के साथ इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने भी एक लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़ी है.
वृंदा उन चुनिंदा वकीलों में हैं, जिन्होंने हापुड़ की ज़िला अदालत से लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में क़ासिम के परिवार और समयदीन का पक्ष रखा.
बीबीसी से बातचीत में वृंदा ग्रोवर कहती हैं, "बहुत महत्वपूर्ण फ़ैसला है. ये फ़ैसला सिर्फ़ समयदीन और क़ासिम को इंसाफ़ नहीं दिलवाता बल्कि समाज में एक बड़ा मैसेज देता है.
वे कहती हैं, "वो मैसेज ये है कि अगर कुछ लोगों को ये लगता है कि वो भीड़ बनाकर बेकसूर मुसलमानों को गाय के नाम पर मारेंगे, तो वो बच नहीं पाएँगे. आज मॉब लिंचिंग करने वाले उम्र क़ैद की सज़ा काट रहे हैं."
"ये संदेश पूरे देश में ऐसी भीड़ को जाना चाहिए, जिन्हें लगता है हत्या करके आप किसी नेता के संरक्षण से बच जाएँगे, तो क़ानून इसकी इज़ाज़त नहीं देगा."
वृंदा ग्रोवर का कहना है कि इस पूरे मामले में क़ासिम के परिवार और समयदीन ने बहुत हिम्मत दिखाई और आगे ऐसे मामलों ये फ़ैसला एक मिसाल बनेगा.

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पुलिस की भूमिका पर उठे सवाल
घटना के कुछ दिन बाद एक तस्वीर सामने आई थी जिसमें भीड़ क़ासिम को घसीटते हुए ले जा रही थी और ये सब तीन पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में हो रहा था.
तब लोगों ने इसकी आलोचना की थी और फिर यूपी पुलिस ने माफ़ी मांगते हुए तीनों पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ जाँच के आदेश दिए थे.
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मामले की शुरुआती एफ़आईआर में हापुड़ पुलिस ने 'रोड रेज' का मामला दर्ज़ किया था.
घटना के चश्मदीद गवाह समयदीन कहते हैं कि उनके भाई यासीन को पुलिस ने धमका कर रोड रेज की एफ़आईआर लिखवाई थी, जबकि असल में मामला भीड़ द्वारा हत्या का था.
एफ़आईआर वाली बात पर वकील वृंदा ग्रोवर कहती हैं, "जब हमने एफ़आईआर की कॉपी देखी तो उसमें रोड रेज जैसा झूठा मामला लिखा था."
वे कहती हैं, "समयदीन अस्पताल से बाहर आए तो उन्होंने मुझे बताया कि असल में क्या हुआ था. फिर जल्दी ही हमने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश पर पुलिस ने समयदीन का बयान दर्ज़ किया और पूरी तहक़ीक़ात आईजी मेरठ को सौंपी गई. सुप्रीम कोर्ट की वजह से ये जाँच पटरी पर आ पाई थी."

अदालत ने भी अपने फ़ैसले में विवेचक और अन्य पुलिसकर्मियों की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाए हैं. अदालत ने कहा:
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अभियुक्तों की शिनाख्त परेड नहीं कराई गई
- अभियुक्त राकेश की स्टिंग वाली सीडी टूटी पाई गई जो काफ़ी आपत्तिजनक है
- अभियुक्त से बरामद हुए डंडे को जाँच के लिए लैब नहीं भेजा गया
- वादी, चश्मदीद का कहना है कि प्रथम रिपोर्ट ग़लत तथ्यों के आधार पर दबाव बनाकर लिखवाई गई. यह भी एक जाँच का विषय है.
'ओह! ये तो एक ख़्वाब था'
छह साल गुज़रे और क़ासिम, समयदीन के परिवारों ने बहुत कुछ खोया.
क़ासिम के पीछे उनकी पत्नी और छह बच्चे रह गए हैं.
समयदीन का कहना है कि दो बच्चों को कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी.
सलीम ने अपने भाई को खोया लेकिन उन्हें उम्मीद है कि अदालत के फ़ैसले के बाद नफ़रत का माहौल बदलेगा.
वो कहते हैं, "हमारे वालिद साहब पहले से नहीं थे तो वो हमारे घर में सबसे बड़े थे. जो केस सच्चे हैं उनमें जल्दी से जल्दी न्याय मिलना चाहिए. हमें इसे मामले में हिंदू-मुस्लिम दोनों का साथ मिला. मुझे पूरी उम्मीद है कि माहौल बदलेगा और माहौल बदल भी रहा है."

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समयदीन का दावा है कि न्याय के लिए उन्हें अपनी 300 गज ज़मीन बेचनी पड़ी और मॉब लिंचिंग की उस घटना की याद क़रीब छह साल बाद भी एक बुरे सपने की तरह आती है और उनकी नींद उड़ा देती है.
समयदीन बताते हैं, ''सब कुछ सहना पड़ता है. क्या किया जा सकता है. मन घायल है. उस हादसे को याद कर आज भी डर लगता है. बहुत ग़लत महसूस होता है."
वे कहते हैं, "कभी-कभी रातों को सोने में भी वो चीज़ नज़र आती है तो ऐसा लगता है कि हम आज बिल्कुल मर जाएँगे. हम आज नहीं बचेंगे और जब हम उठते हैं, देखते हैं तो ओह! ये तो एक ख़्वाब था."

यूपी में धर्म के आधार पर हिंसा के मामले
देश में फ़िलहाल हेट क्राइम के सरकारी आँकड़े उपलब्ध नहीं है, इसलिए बीबीसी ने कुछ साल पहले 2016 से 2021 के बीच यूपी में धर्म के आधार पर भीड़ की गंभीर हिंसा के आँकड़ों की पड़ताल की थी.
बीबीसी ने पाया कि 2016 में जनवरी से लेकर अगस्त तक मुसलमानों के साथ हेट क्राइम के 11 गंभीर मामले सामने आए.
जबकि साल 2021 में जनवरी से लेकर अगस्त के बीच मुसलमानों के खिलाफ़ संगीन हिंसक वारदातों की संख्या 24 थी.
2016 के पहले आठ महीनों का आँकड़ा तब के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दौर का है, जबकि 2021 के पहले आठ महीनों का आँकड़ा मौजूदा योगी सरकार के कार्यकाल का है.
अपनी पड़ताल में बीबीसी ने उत्तर प्रदेश के केवल संगीन मामलों को शामिल किया था.
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