वडोदरा में मुस्लिम महिला को मकान आवंटन का विरोध क्यों: ग्राउंड रिपोर्ट

वडोदरा के मोटनाथ रेजिडेंसी में एक मुस्लिम महिला को मकान आवंटित करने का विरोध हुआ
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    • Author, तेजस वैद्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वडोदरा से

"संस्कारनगरी में आपका स्वागत है."

अहमदाबाद से करीब 110 किमी दूर वडोदरा शहर की सीमा में पहुंचते ही ऐसे साइन बोर्ड जगह-जगह दिखाई देते हैं.

वडोदरा शहर के हरानी इलाक़े की एक कॉलोनी मोटनाथ रेजिडेंसी पिछले कुछ दिनों से अलग तरह के संस्कार के कारण सुर्खियों में है.

मोटनाथ रेजिडेंसी वही कॉलोनी है, जहाँ मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत सोसायटी के 642 फ्लैटों में से एक फ़्लैट मुस्लिम महिला को आवंटित करने के ख़िलाफ़ कुछ दिन पहले लगभग 32 निवासियों ने विरोध प्रदर्शन किया था.

मुस्लिम महिला को मिले फ्लैट का आवंटन रद्द करने का प्रस्ताव देने वाली एक याचिका से वडोदरा शहर की ये सोसायटी चर्चा में है. बीबीसी गुजराती के पास इस याचिका की एक प्रति है.

पिछले पांच जून को इन निवासियों ने एक आवेदन दाख़िल कर कम आय वाले लोगों (एलआईजी) के लिए सरकारी योजना के तहत 2018 में एक मुस्लिम महिला को आवंटित आवास को रद्द कर उन्हें कहीं दूसरी जगह आवास आवंटित करने की मांग की है.

घटना के बारे में अधिक जानकारी लेने के लिए बीबीसी गुजराती की टीम मोटनाथ रेजिडेंसी पहुंची.

शहर की छवि पर असर?

मोटनाथ सोसायटी

मोटनाथ सोसायटी के प्रवेश द्वार के पास राम की एक बड़ी तस्वीर लगी हुई है. लोगों के घरों के दरवाज़ों और खिड़कियों पर हर जगह नारंगी झंडे नज़र आते हैं.

सोसायटी में प्रवेश करते ही गेट पर हमारी मुलाक़ात सोसायटी के अध्यक्ष भवनभाई जोशी से होती है. उन्होंने इस मसले पर कहा, "अगर पूरा समाज हिंदुओं का है तो एक भी घर मुस्लिम को क्यों आवंटित किया गया, इसकी जांच होनी चाहिए."

उनका कहना है कि पूरे मामले में वडोदरा नगर निगम (वीएमसी) की ग़लती है.

हालांकि इस मामले में निगम ने स्पष्ट किया है कि महिलाओं को नीतियों के आधार पर उचित तरीके से मकान आवंटित किए गए हैं और किसी भी सरकारी योजना में धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है.

पूरी घटना के केंद्र में रही मुस्लिम महिला से बीबीसी गुजराती ने संपर्क किया.

हालांकि उन्होंने यह कहते हुए कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि वह 'पिछले छह सालों से मुश्किलों का सामना कर रही हैं और अपना घर होते हुए भी पिता के घर पर रहने के लिए मजबूर हैं.'

सामाजिक कार्यकर्ता इस पूरे मामले को 'शहर की छवि ख़राब करने वाला' और 'सामाजिक एकजुटता की भावना के ख़िलाफ़' बता रहे हैं.

धर्म के आधार पर कॉलोनी?

भवनभाई जोशी, मोटनाथ रेजीडेंसी के अध्यक्ष
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वहीं बीबीसी गुजराती से बात करते हुए सोसायटी के अध्यक्ष भवनभाई जोशी ने दावा किया कि मुस्लिम महिला को मकान आवंटित किए जाने का विरोध सोसायटी के 33 सदस्यों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि 'अधिकांश लोग सर्वसम्मति से इसका विरोध कर रहे थे.'

हालांकि उनके इस दावे की बीबीसी गुजराती स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका.

सोसायटी के अध्यक्ष वीएमसी अधिकारियों और आवास आवंटन के ड्रॉ से संबंधित पूरे मामले की जांच की भी मांग कर रहे हैं.

इस मामले में प्रदर्शनकारी निवासियों ने अपनी आपत्ति याचिका में लिखा है, "हरणी क्षेत्र हिंदू आबादी वाला एक शांत क्षेत्र है. यहां आसपास के चार किलोमीटर तक कोई मुस्लिम आबादी नहीं है. ऐसे क्षेत्र में सरकार के मानदंडों को ध्यान में रखे बिना या भविष्य के बारे में सोचे बिना हमारे रेजिडेंसी में एक मुस्लिम परिवार को घर आवंटित किया गया है."

"यहां 461 घर हिंदू परिवारों को आवंटित हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि इस मामले में कोई बड़ी ग़लती हुई है."

सोसायटी के निवासी हरणी क्षेत्र को 'डिस्टर्ब्ड एरिया' में शामिल होने का तर्क देकर भी अपनी मांग को जायज ठहरा रहे हैं.

हालांकि वीएमसी के कार्यकारी अभियंता नीलेश परमार पूरी घटना और कॉलोनी निवासियों के विरोध के बारे में बात करते हुए कहते हैं, "इस कॉलोनी आवंटन के लिए ड्रॉ वर्ष 2017 में निकाला गया था और साल 2018 में आवास का आवंटन किया गया था. उस समय यह क्षेत्र अशान्त अधिनियम के अंतर्गत नहीं था, इसलिए मकानों के आवंटन में कोई बाधा नहीं थी."

सरकारी आवास का कोई भी आवंटन धर्म पर आधारित नहीं होता. यह बताते हुए नीलेश परमार कहते हैं, "सरकार की कोई भी योजना धर्म पर आधारित नहीं है. आवंटन नियमानुसार किया गया है. हालांकि अब यह क्षेत्र डिस्टर्ब्ड एरिया क़ानून के अधीन है, इसलिए अब हमें वहां आवंटन में सावधानी बरतनी होगी.”

वीएमसी अधिकारी के तर्क के ख़िलाफ़ तर्क देते हुए सोसायटी के अध्यक्ष जोशी कहते हैं, "यह मानते हुए कि उस समय अशांत अधिनियम क़ानून यहां लागू नहीं था, आवंटन को सही ठहराना उचित नहीं है. क्या उसके बाद इस क्षेत्र को अशांत क्षेत्र अधिनियम में शामिल करने का कोई कारण रहा होगा? कुछ परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई होंगी? इसे देखते हुए समझना चाहिए कि हमारी मांग सामाजिक वैमनस्यता पैदा करने की नहीं है."

मोटनाथ रेजिडेंसी के कुछ अन्य निवासियों ने भी मांग की है कि मुस्लिम महिला को कहीं और घर दिया जाए. सोसायटी के एक शख्स ने अपनी पहचान ज़ाहिर ना करने की शर्त के साथ कहा कि इस अकेले उदाहरण से इलाके में 'मुसलमानों की संख्या और उनका दखल' बढ़ जाएगा.

वहीं एक अन्य शख़्स ने कहा, “मुस्लिम महिला की खान-पान की आदतें अलग होती हैं. इस वजह से उनको यहां मकान नहीं देना चाहिए.”

'हमारा विरोध निगम के ख़िलाफ़ है, घर बहन का है'

बीबीसी विजिट के दौरान महिला को आवंटित फ्लैट पर ताला
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वडोदरा के नवनिर्वाचित सांसद डॉक्टर हेमांग जोशी ने भी सोसायटी की ओर से मिली आपत्ति याचिका पर प्रतिक्रिया देते हुए इसका समाधान निकालने की बात कही ताकि मुस्लिम महिला को कोई परेशानी न हो और समाज की मांग भी मान ली जाए.

उन्होंने कहा, "जहां डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट लागू है, वहां ऐसा नहीं होता है. लेकिन इस प्रक्रिया में खामी नज़र आ रही है. लेकिन अब जो भी होगा वह यह ध्यान में रखकर किया जाएगा कि जिन्हें फ्लैट आवंटित किया गया है, उनके घर का सपना न टूटे और समाज के लोगों की मांग भी पूरी हो. जो भी होगा सुखद होगा."

मुस्लिम महिला के पिता ने पूरी घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए दुख जताया है.

उन्होंने कहा, "इस तरह की घटना दुखद है. हमारा परिवार शिक्षित है. हम समाज के साथ रहना चाहते हैं, लेकिन दुख की बात है कि समाज को यह मंज़ूर नहीं है."

वहीं सोसायटी के अध्यक्ष भवनभाई जोशी ये भी कहते हैं कि मुस्लिम महिला अपने घर में रहने आ सकती हैं.

वे कहते हैं, "हमारा विरोध निगम के ख़िलाफ़ है. घर बहन का है. वे रहने आ सकती हैं. हमने उन्हें कभी नहीं रोका."

हालांकि वे यह भी बताते हैं कि भले ही घर की रजिस्टरी 2018 से हो चुकी है लेकिन मुस्लिम महिला अपने परिवार के साथ यहां रहने कभी नहीं आई है.

भवनभाई का कहना है कि महिला ने निगम में 50 हज़ार रुपए के टैक्स भी चुकाए थे और यह मकान उनके नाम पर दर्ज भी हो चुका है.

हालांकि जब बीबीसी गुजराती टीम ने घर का दौरा किया तो वहां ताला लगा हुआ था.

वडोदरा स्थित प्रोफेसर भरत मेहता
इमेज कैप्शन, वडोदरा के प्रोफेसर भरत मेहता

डिस्टर्ब्ड एरिया के क़ानून और अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर 2018 में गुजरात उच्च न्यायालय में शिकायत दायर करने वाले अहमदाबाद स्थित वकील दानिश कुर्शी ने बीबीसी से कहा, "जब राज्य सरकार किसी को घर आवंटित करती है तो उस पर कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं होना चाहिए. सरकार का कोई धर्म नहीं होता. फिर भी, अगर कोई विवाद करता है तो यह संविधान का उल्लंघन है."

वडोदरा के प्रोफेसर भरत मेहता इस घटना को 'एक सुसंस्कृत शहर के रूप में वडोदरा की छवि ख़राब करने' के रूप में देखते हैं.

सामाजिक भेदभाव को दूर करने का उपाय सुझाते हुए भरत मेहता कहते हैं, "मेरी राय में उस कॉलोनी में एक नहीं बल्कि दस मुस्लिम परिवारों को मकान आवंटित किया जाना चाहिए. क्योंकि ऐसा करने से ही एक भारत बनेगा और ऐसे छोटे-छोटे भारत बनेंगे तभी मतभेद मिटेंगे."

सोसायटी में रहने वाली नम्रता परमार इस बात से खुश हैं कि उनके बच्चे इसी सोसायटी में बड़े हो रहे हैं.

बीबीसी गुजराती से बात करते हुए उन्होंने कहा, "संस्कृति तभी फलती-फूलती है, जब अंतरधार्मिक लोग यानी हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी एक साथ हों. यही तो हम पाठ्यपुस्तकों में बच्चों को पढ़ाते हैं. सच तो यह है कि पाठ्यपुस्तक में जो लिखा है, वही हम अपने समाज में जीते हैं."

हाथीखाना वडोदरा का एक ऐसा क्षेत्र है, जहां बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी है. यहां रहने वाले इस्माइल पटेल भी इसकी पुष्टि करते हैं.

उन्होंने बीबीसी गुजराती से कहा, "हमारे इलाक़े में भी कुछ जगहों पर हिंदू रहते हैं और कारोबार करते हैं. हम एक-दूसरे के साथ बहुत प्यार से पेश आते हैं. यहां हिंदू व्यापारी भी हैं, जिनकी दुकान के मालिक मुस्लिम हैं. सभी प्यार से रहते हैं और एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करते हैं, इसी से देश बनता है."

मोटनाथ रेजिडेंसी सोसायटी की घटना पर टिप्पणी करते हुए वे कहते हैं, "मुस्लिम महिला को हिंदू बस्ती में घर मिला है. समाज को इसे समझना चाहिए और स्वीकार करना चाहिए. लोगों को एक-दूसरे का खुलकर स्वागत करना चाहिए. मुस्लिम समाज को भी इस तरह के रवैये से बचना चाहिए."

मोटनाथ रेजिडेंसी पर विवाद के केंद्र में डिस्टर्ब्ड एरिया क़ानून है. राज्य में लागू होने के बाद से ही यह क़ानून लगातार बहस और विवाद में बना हुआ है.

साथ भी और ख़िलाफ़ भी?

वडोदरा के विवेकानंद हाइट्स में विभिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे के साथ सद्भाव से रहते हैं।
इमेज कैप्शन, वडोदरा के विवेकानंद हाइट्स में विभिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे के साथ सद्भाव से रहते हैं।

इस क़ानून के कारण मुसलमानों को निशाना बनाने और उन्हें हाशिए पर धकेलने का आरोप लगता रहा है.

वकील दानिश क़ुरैशी इसे 'साजिश' बताते हैं. जबकि भरत मेहता के मुताबिक, 'यह क़ानून मुसलमानों को एक खास इलाके में रहने के लिए मजबूर करने के अलावा सामाजिक भेदभाव को बढ़ाने का काम कर रहा है.'

यह भी देखने को मिल रहा है कि इस क़ानून की वजह से मुसलमानों के लिए संपत्ति ख़रीदना और बेचना मुश्किल हो रहा है. इस नियम से वडोदरा में रहने वाले अमर राणा को परेशानी हुई.

शहर के फतेहगंज इलाके में रहने वाले अमर राणा कहते हैं, "लोग मेरे नाम की वजह से मुझे गैर-मुस्लिम समझ लेते हैं. ऐसा ही कुछ हुआ एक बिल्डिंग को देखने के दौरान.मुझे घर पसंद आया. ब्रोकर मुझे हिंदू बताकर घर दिखा रहा था. जब मैंने उनसे पूछा कि यहां डिस्टर्ब्ड एरिया क़ानून लागू है तो आप मुस्लिम के नाम पर बिल्डिंग का दस्तावेज़ बनायेंगे न? तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया.”

एक तरफ जहां शहर में मोटनाथ रेजिडेंसी जैसी सोसायटी हैं, वहीं वडोदरा के गोरवा इलाके में स्वामी विवेकानंद हाइट्स जैसी संपत्तियां भी हैं, जो सर्वधर्म समभाव की मिसाल कायम कर रही हैं.

यह कॉलोनी सरकारी आवास योजना के तहत अस्तित्व में आई थी. जिसमें 1,560 फ्लैट हैं. यहां हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम, और ईसाई समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में रहे हैं.

डिस्टर्ब्ड एरिया क़ानून क्या है?

अमर राणा को अशांत कानून के कारण संपत्ति खरीदने और बेचने में कठिनाई होती थी
इमेज कैप्शन, अमर राणा को अशांत कानून के कारण संपत्ति खरीदने और बेचने में कठिनाई होती थी

गुजरात में अशांत क्षेत्र अधिनियम का विधेयक वर्ष 1986 में पेश किया गया था. 1991 में इसे क़ानून बनाया गया.

अशांत क्षेत्र अधिनियम के मुताबिक अशांत घोषित क्षेत्रों में संपत्ति बेचने से पहले कलेक्टर की अनुमति लेना अनिवार्य है. इस अधिनियम के तहत हर पांच साल में एक नई अधिसूचना जारी की जाती है और आवश्यकता के अनुसार इसमें नए क्षेत्र जोड़े जाते हैं.

इस क़ानून के बारे में बात करते हुए वकील शमशाद पठान कहते हैं कि 1986-87 में अहमदाबाद में हुए दंगों के बाद लागू इस क़ानून को लागू करने का मक़सद हिंदुओं को इलाका छोड़ने से रोकना था.

वे कहते हैं, "कलेक्टर सेल डीड के सत्यापन और पुलिस की राय के आधार पर मंजूरी देते हैं, ताकि कोई भी संपत्ति अचानक न ख़रीदी जाए."

इस अधिनियम के तहत कलेक्टर को संपत्ति जब्त करने का भी अधिकार है. यह कानून अशांत घोषित क्षेत्रों के आसपास 500 मीटर तक लागू होता है.

गौरतलब है कि गुजरात सरकार ने साल 2019 में क़ानून में बदलाव करते हुए इसके उल्लंघन पर तीन से पांच साल की सजा और एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान शामिल किया था.

2020 में अशांत क्षेत्र क़ानून पर चर्चा करते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने कहा था, "किसी हिंदू के लिए किसी मुस्लिम को संपत्ति बेचना ठीक नहीं है.किसी मुसलमान के लिए किसी हिंदू को संपत्ति बेचना भी उचित नहीं है.हमने इस क़ानून को उन इलाकों में लागू किया है जहां दंगे हुए हैं. ताकि उन्हें (मुसलमानों को) दिखाया जा सके कि उन्हें अपने इलाके में ही संपत्ति ख़रीदनी चाहिए."

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