बिलकिस बानो गैंग रेप केस के दोषियों को सरेंडर करने का समय बढ़ाने की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई

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सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो गैंग रेप केस में 11 दोषियों के सरेंडर करने की डेडलाइन बढ़ाने की अपील ख़ारिज कर दी है.
सर्वोच्च अदालत ने इन दोषियों को 22 जनवरी तक सरेंडर करने का आदेश दिया था.
इसके बाद इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सरेंडर के लिए और समय मांगा था. लेकिन जस्टिस बीवी रत्ना ने याचिकाओं को ख़ारिज करते हुए कहा कि सरेंडर के लिए और वक़्त देने का कोई तुक नहीं बनता.
बिलकिस बानो के गैंग रेप और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के 11 दोषियों की सज़ा में छूट को सुप्रीम कोर्ट ने आठ जनवरी को रद्द कर दिया था. इन लोगों को उम्र क़ैद की सजा मिली थी.
कोर्ट ने उन्हें दो हफ़्ते के भीतर इन्हें सरेंडर करने का आदेश दिया था. कोर्ट के आदेश के मुताबिक़ 22 जनवरी तक इन्हें सरेंडर करना है.
जिन लोगों को 22 जनवरी तक सरेंडर करने का आदेश दिया गया है, उनमें से सभी ने अलग-अलग वजहों का हवाला देकर और समय बढ़ाने की मांग की थी. लेकिन अब उनकी याचिका ख़ारिज होने की वजह से उन्हें 21 जनवरी तक गुजरात के जेल अधिकारियों को रिपोर्ट करनी होगी.
दोषियों ने क्या-क्या वजह बताई थी?

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इनमें से एक दोषी मितेश चिमनलाल भट्ट ने समर्पण करने के लिए छह हफ़्ते का समय मांगा था.
उनका कहना था कि वो खेती से जीविका चलाते हैं और उन्हें अपनी खरीफ की फसल काटने के लिए और समय चाहिए.
गोविंद भाई ने चार हफ़्ते का समय मांगा था. उन्होंने स्वास्थ्य और पारिवारिक वजहों का हवाला देते हुए कहा है कि अपने बीमार पिता की देखभाल करने वाले वो परिवार में अकेले शख्स हैं.
वो पूरी तरह उन पर आश्रित हैं. उन्होंने कहा कि उनके बच्चे भी वित्तीय तौर उन्हीं पर आश्रित हैं.
नाई ने कहा है वह खुद बूढ़े हैं और कई बीमारियों से घिरे हुए हैं.
तीसरे दोषी रमेश रमेश रूपा भाई चांदना ने भी समर्पण के लिए छह हफ़्ते का समय मांगा है.
उनका कहना है कि अभी समर्पण करना उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर डालेगा.
उनकी एंजियोग्राफी हुई है. इसके साथ ही उनके बेटे की शादी होनी है. इसकी तैयारी में समय लगेगा. उन्होंने भी अपनी फसल काटने में समय लगने की बात कही है.
प्रदीप रमनलाल मोढ़डिया ने सरेंडर के लिए चार हफ्ते का समय मांगा है. उन्होंने कहा है कि उनकी हाल में फेफड़ों की सर्जरी हुई है. उन्हें लगातार डॉक्टरों की सलाह की जरूरत है.
विपिनचंद कनियालाल जोशी ने छह हफ़्ते का समय मांगा है. उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी को कैंसर है. इसके अलावा उनके 75 वर्षीय भाई अविवाहित है और उन्हें उनकी जरूरत है.
किस आधार पर दोषियों को दी गई थी माफ़ी

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बिलकिस बानो मामले में जेल की 14 साल की सजा काटने के बाद सभी 11 दोषियों को गुजरात सरकार ने अगस्त 2022 को छोड़ दिया था.
ये रिहाई गुजरात सरकार की 1992 की माफ़ी योजना के तहत हुई थी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट की बीवी नागरत्ना और उज्जल भुयन की बेंच ने उन्हें सरेंडर करने के आदेश देते हुए कहा था कि गुजरात सरकार को उन्हें माफी देना का अधिकार नहीं है क्योंकि मुक़दमा महाराष्ट्र में चला था.
गुजरात में 2002 में हुए दंगों के दौरान बिलकिस बानो से गैंगरेप और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या में सज़ा काट रहे सभी 11 अभियुक्त 2022 में रिहा कर दिए गए थे.
गुजरात सरकार की माफ़ी नीति के तहत 15 अगस्त 2022 को जसवंत नाई, गोविंद नाई, शैलेश भट्ट, राधेश्याम शाह, विपिन चंद्र जोशी, केशरभाई वोहानिया, प्रदीप मोढ़डिया, बाकाभाई वोहानिया, राजूभाई सोनी, मितेश भट्ट और रमेश चांदना को गोधरा उप कारागर से छोड़ दिया गया था.
मुंबई में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने 2008 में बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के आरोप में 11 अभियुक्तों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी.
बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस सज़ा पर अपनी सहमति की मुहर लगाई थी.
सभी दोषी 15 साल से अधिक वक़्त तक सज़ा काट चुके थे. इस आधार पर इनमें से एक अभियुक्त राधेश्याम शाह ने सज़ा में रियायत की गुहार लगाई थी.
उम्र क़ैद की सज़ा कितने साल की ?

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दरअसल, उम्रक़ैद की सज़ा पाए क़ैदी को कम से कम चौदह साल जेल में बिताने ही होते हैं. चौदह साल के बाद उसकी फ़ाइल को एक बार फिर रिव्यू में डाला जाता है.
उम्र, अपराध की प्रकृति, जेल में व्यवहार वगैरह के आधार पर उनकी सज़ा घटाई जा सकती है. अगर सरकार को ऐसा लगता है कि क़ैदी ने अपने अपराध के मुताबिक़ सज़ा पा ली है, तो उसे रिहा भी किया जा सकता है. कई बार क़ैदी को गंभीर रूप से बीमार होने के आधार पर छोड़ दिया जाता है. लेकिन ये ज़रूरी नहीं है.
कई बार अपराधी की सज़ा को उम्र भर के लिए बरक़रार रखा जाता है. लेकिन इस प्रावधान के तहत हल्के जुर्म के आरोप में बंद क़ैदियों को छोड़ा जाता है. संगीन मामलों में ऐसा नहीं होता है.
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को माफ़ी के मामले पर विचार करने को कहा था. इसके बाद पंचमहल के कलेक्टर सुजल मायात्रा के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई गई थी.
मायात्रा ने ही बताया कि क़ैदियों को माफ़ी देने की मांग पर विचार करने के लिए बनी कमेटी ने सर्वसम्मति से उन्हें रिहा करने का फ़ैसला किया.
राज्य सरकार को सिफ़ारिश भेजी गई थी और फिर दोषियों की रिहाई के आदेश मिले. हालांकि गुजरात सरकार के इस फ़ैसले की आलोचना भी हो रही है.
बिलकिस बानो के साथ क्या हुआ था?

27 फ़रवरी 2002 को 'कारसेवकों' से भरी साबरमती एक्सप्रेस के कुछ डिब्बों में गोधरा के पास आग लगाए जाने से 59 लोगों की मौत के बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे थे.
दंगाइयों के हमले से बचने के लिए बिलकिस बानो गोद की बेटी और 15 दूसरे लोगों के साथ गांव से भाग गई थीं. उस वक्त वह पांच महीने की गर्भवती थीं.
गुजरात के दाहोद ज़िले के रंधिकपुर गांव की रहने वाली बिलकिस अपनी साढ़े तीन साल की बेटी सालेहा और परिवार के 15 अन्य सदस्यों के साथ अपने घर से भाग निकली थीं.
बकरीद के दिन दंगाइयों ने दाहोद और आसपास के इलाकों में क़हर बरपाया था. दंगाइयों ने कई घरों को जला डाला था. वे कथित तौर पर मुसलमान लोगों का सामान लूट रहे थे.
तीन मार्च, 2002 को बिलकिस का परिवार छप्परवाड़ गांव पहुंचा और खेतों मे छिप गया. इस मामले में जो चार्जशीट दायर की गई उसमें कहा गया है कि 12 लोगों समेत 20-30 लोगों ने लाठियों और जंजीरों से बिलकिस और उसके परिवार के लोगों पर हमला कर दिया.
बिलकिस और चार महिलाओं को पहले मारा गया और फिर उनके साथ रेप किया गया. इनमें बिलकिस की मां भी शामिल थीं. इस हमले में रंधिकपुर के 17 मुसलमानों में से सात मारे गए.
ये सभी बिलकिस के परिवार के सदस्य थे. इनमें बिलकिस की भी बेटी भी शामिल थी.
इस घटना के कम से कम तीन घंटे के बाद तक बिलकिस बानो बेहोश रहीं. होश आने पर उन्होंने एक आदिवासी महिला से कपड़ा मांगा. इसके बाद वह एक होमगार्ड से मिलीं जो उन्हें शिकायत दर्ज कराने के लिए लिमखेड़ा थाने ले गया.
वहां कांस्टेबल सोमाभाई गोरी ने उनकी शिकायत दर्ज की. बाद में गोरी को अपराधियों को बचाने के आरोप में तीन साल की सज़ा मिली.
बिलकिस को गोधरा रिलीफ़ कैंप पहुंचाया गया और वहां से मेडिकल जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया. उनका मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग पहुंचा. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया.












