सुखविंदर सिंह सुक्खू क्या हिमाचल के सियासी भंवर से कांग्रेस की सरकार को बचा ले जाएंगे?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हिमाचल प्रदेश में एक राज्यसभा सीट के लिए हुए चुनाव में क्रॉस वोटिंग से उठा सियासी तूफ़ान कांग्रेस की सरकार पर संकट बनकर मंडरा रहा है.
6 कांग्रेसी विधायकों की क्रॉस वोटिंग की वजह से कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी लगभग तय मानी जा रही जीत हासिल नहीं कर सके और बीजेपी उम्मीदवार हर्ष महाजन जीत गए.
68 विधानसभा सीटों वाले हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने 40 सीटें जीतीं थीं, बीजेपी 25 पर कामयाब हुई थी जबकि तीन सीटें अन्य उम्मीदवारों ने जीती थीं.
कांग्रेस के पास सदन में स्पष्ट बहुमत था. लेकिन 6 विधायकों के बाग़ी होने के बाद अब कांग्रेस के सामने राज्य में सरकार बचाने की चुनौती है.
हालांकि अपने इस्तीफ़े की ख़बरों को अफ़वाह बताते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा है, “साज़िश से सत्ता हथियाने की कोशिश हुई जो आज नाकाम हो गई है. सरकार गिराने की साज़िश में जो लोग शामिल हैं, हम आने वाले समय में उनका भी भंडाफोड़ करेंगे. निश्चित तौर पर ये सरकार पांच साल चलेगी. ”
सुक्खू ने कहा है कि जिन विधायकों ने पाला बदला है उनके ख़िलाफ़ अयोग्य क़रार दिए जाने की कार्रवाई की जाएगी.
सुक्खू ने कहा, “हमें भरोसा है कि हमारी सरकार पूरे पांच साल चलेगी.”
अंदरूनी सियासत में फंस गए सुक्खू?

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इसी बीच, कांग्रेस के सभी विधायकों से बात करने और उनकी शिकायतें सुनने के लिए पर्यवेक्षक डीके शिवकुमार और भूपेंद्र सिंह हुड्डा शिमला पहुंच गए हैं.
वहीं, शिमला पहुंचे कांग्रेस के छह बाग़ी विधायकों ने मीडिया से बात करते हुए कहा है कि वो बीजेपी के साथ हैं.
राज्य में आगे राजनीति क्या मोड़ लेती है और कांग्रेस की सरकार बच पाती है या नहीं इसमें समीकरणों के अलावा दल-बदल क़ानून और कई अन्य पहलू भी हैं.
एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस से होते हुए हिमाचल कांग्रेस अध्यक्ष और फिर मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे सुखविंदर सिंह सुक्खू को हिमाचल की राजनीति में राज्य के छह बार मुख्यमंत्री रहे कद्दावर कांग्रेसी नेता वीरभद्र सिंह के विरोधी के रूप में देखा जाता रहा है.
एक बस ड्राइवर के बेटे सुक्खू जब सीएम के पद तक पहुंचे तो राज्य में कई कांग्रेसी नेता इससे असहज हो गए.
विश्लेषक मान रहे हैं कि पहाड़ पर फैला ये सियासी रायता कांग्रेस की अंदरूनी सियासत का ही नतीजा है.
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार कहते हैं, “नाराज़गी और अनदेखी की इबारत पिछले कुछ महीने से पहाड़ पर सरेआम पढ़ी जा सकती थी. ये अलग बात है कांग्रेस आलाकमान ने उसे हल्के में लिया. ये हल्कापन ही सत्तासीन कांग्रेस को भारी पड़ गया. नतीजा यह कि सामने सामने ही 40 में से छह विधायक बग़ावत कर गए और अब तक साथ रहे तीन निर्दलीय भी छोड़ गए. भाजपा के हर्ष महाजन 25 विधायक होने के बावजूद भी राज्यसभा में चले गए.”
नज़रअंदाज़ किये जाने से नाराज़ हैं विधायक?

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राज्यसभा सीट के लिए हुए चुनाव में किस्मत भी कांग्रेस के साथ खेल कर गई. कांग्रेस-भाजपा दोनों प्रत्याशियों को 34-34 वोट पड़े. टॉस हुआ और किस्मत ने भाजपा का साथ दिया.
राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर आशीष नड्डा मानते हैं कि सुक्खू की एक सख़्त प्रशासक की कार्यशैली भी मौजूदा राजनीतिक संकट की एक वजह हो सकती है.
आशीष नड्डा कहते हैं, “सुक्खू सख़्त प्रशासक थे, जिस तरह केंद्र में नरेंद्र मोदी सत्ता का केंद्रीकरण करके सरकार चलाते हैं, वैसा ही मॉडल सुक्खू राज्य में लागू कर रहे थे. सरकार से जुड़ा हर छोटा बड़ा फ़ैसला वो स्वयं ले रहे थे. ऐसे में मंत्रियों और विधायकों को लग रहा था कि सरकार में उनकी सुनी नहीं जा रही है.”
वहीं वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार मौजूदा हालात के लिए पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के परिवार और कांग्रेस के केंद्रीय हाईकमान के बीच खींचतान को पार्टी में बिखराव की अहम वजह मानते हैं.
हेमंत कुमार कहते हैं, “असल में ये हिमाचल में दशकों से चल आ रहा शह-मात का खेल है. कांग्रेस में वीरभद्र सिंह यहां के एकछत्र नेता रहे हैं. पार्टी के भीतर उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सका. तब बरास्ता पार्टी हाईकमान सुखविंदर सिंह सुक्खू को संगठन की ज़िम्मेदारी दी गई थी. उस समय भी माहौल बहुत अच्छा नहीं था."
"राजा वीरभद्र सिंह दुनिया में नहीं रहे तो कमान एक तरह से मुकेश अग्निहोत्री के हाथ थी. वे कांग्रेस विधायक दल के नेता थे. 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बहुमत में आ गई और हाईकमान ने सीधे सुक्खू को सीएम बनाने का फ़रमान जारी कर दिया. सब उल्टा हो गया. पार्टी की कमान राजा वीरभद्र सिंह की धर्मपत्नी रानी प्रतिभा सिंह को दे दी गई. हाईकमान के आशीर्वाद के चलते सुक्खू ने अपने हिसाब से सियासी मोहरे फिट किए.”

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राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सरकार बनने के बाद से ही पार्टी के कई नेता ये महसूस करने लगे थे कि उनकी अनदेखी हो रही है. सुखविंदर सिंह सुक्खू दिसंबर 2022 में मुख्यमंत्री बने थें.
डॉ. आशीष नड्डा कहते हैं, “कांग्रेस को भले बहुमत मिला था लेकिन सरकार के गठन के साथ ही कुछ नेताओं की राजनीति के संकेत मिलने लगे थे. सुखविंदर सिंह सुक्खू की कार्यशैली की वजह से अब ये सतह पर आ गया है और कई विधायकों ने खुलकर बग़ावत कर दी है.”
हेमंत कुमार भी मानते हैं कि पार्टी नेताओं में ये नाराज़गी सुखविंदर सुक्खू के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही दिखने लगी थी.
हेमंत शर्मा कहते हैं, “पहले दिन से ही कुछ नेता दरकिनार जैसा महसूस करने लगे. जिसमें पूर्व कैबिनेट मंत्री सुधीर शर्मा जैसे नाम भी थे. पूर्व सीएम प्रेमकुमार धूमल को हराने वाले राजेंद्र राणा दूसरा बड़ा नाम था. कुछेक दूसरे कांग्रेस विधायक भी अपनी अनदेखी की बात विभिन्न मंचों पर उठाते रहे. सुधीर और राणा ने तो सरेआम अपने इरादे ज़ाहिर कर दिए थे."
"प्रदेशाध्यक्ष रानी प्रतिभा सिंह ने भी ऐसी नाराज़गी पर कई बार अपनी बात कही. ज़्यादातर को यही मलाल था कि उनकी बात नहीं सुनी जाती. कई मंचों पर आवाज़ें उठने के बावजूद भी उसे गंभीरता से नहीं लिया गया. सरकार तो चलती रही लेकिन रास्ते के गड्ढों, तीखे मोड़ों और चढ़ाई-उतराई आदि के तमाम सिग्नलों को देख कर भी अनदेखा कर दिया. लिहाज़ा दुर्घटना घट गई. अब गाड़ी रिपेयर के लायक है या नहीं ये देखने की बात है.”
विक्रमादित्य ने कहा- अब बर्दाश्त नहीं करेंगे

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वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह ने भी बुधवार को मंत्रीपद से इस्तीफ़ा दे दिया. इस्तीफ़ा देने के बाद उन्होंने अपनी नाराज़गी खुलकर ज़ाहिर की और नज़रअंदाज़ करने और ख़ुद को सियासी तौर पर क़मज़ोर करने के आरोप लगाये.
विक्रमादित्य सिंह ने कहा, “आने वाले समय में जो परिस्थिति होगी उस हिसाब से हम कार्रवाई करेंगे. जो वास्तविक परिस्थितियां हैं और जो भावनाएं प्रदेश में लोगों की हैं उसके बारे में मैंने पार्टी हाईकमान को जानकारी दी है. वीरभद्र सिंह जी ने हमेशा अपनी शर्तों पर राजनीति की है, हम सही का समर्थन और ग़लत का विरोध करते हुए आगे चलेंगे. अगर हमारी आवाज़ को या हमारे अस्तित्व को कोई दबाने या मिटाने की कोशिश करेगा, उसे मैं बर्दाश्त करने वाला नहीं हूं, ये मैं स्पष्ट करना चाहता हूं. जो भी घटनाक्रम पिछले दो दिनों में हुआ है उसके बारे में मैंने पार्टी हाईकमान को जानकारी दी है. फ़ैसला पार्टी हाईकमान को करना है.”
कांग्रेस पिछले पांच सालों में कई राज्यों में सरकारें गंवा चुकी हैं. मध्य प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में बीजेपी ने कांग्रेस की सरकारें गिराकर सत्ता हासिल की है.
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस चुनावों में स्पष्ट बहुमत हासिल करने के बाद भी संकट में फंसी दिखाई दे रही है.
कांग्रेस के छह विधायक बाग़ी हो चुके हैं. दल बदल क़ानून के तहत दूसरी पार्टी में शामिल होने के लिए कम से कम एक तिहाई सदस्यों का अलग होना अनिवार्य है. ऐसे में हिमाचल में कांग्रेस को तोड़ने के लिए कम से कम 14 विधायकों की ज़रूरत होगी.
हालांकि, दल बदल क़ानून के बावजूद विधायकों ने पाला बदला है और सरकारें गिरी हैं.
कांग्रेस की क्या रहेगी कोशिश

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डॉ. आशीष नड्डा मानते हैं कि मौजूदा परिस्थिति में कांग्रेस चुनाव कराने की रणनीति पर काम कर रही होगी.
डॉ. नड्डा कहते हैं, “कांग्रेस ये बिलकुल नहीं चाहेगी कि उसकी सरकार गिरने पर राज्य में बीजेपी की सरकार बन जाए. ऐसी स्थिति में कांग्रेस चुनावों में जाना अधिक पसंद करेगी.”
लेकिन हेमंत कुमार को ऐसा नहीं लगता. शर्मा कहते हैं, “कांग्रेस आलाकमान की कोशिश यह है कि किसी तरह से सबको मना लिया जाए और बात आगे न बढ़ने पाए. दूसरा ये कि किसी अन्य विकल्प पर बात हो. कांग्रेस और कांग्रेसी विधायक किसी भी हालत में चुनाव में नहीं जाना चाहेंगे.”
कांग्रेस ने बीजेपी पर ‘जनमत चुराने’ के आरोप लगाये हैं. लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि इसमें भी कमी कांग्रेस की ही नज़र आती है.
हेमंत कुमार कहते हैं, “भाजपा को बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं पड़ी. उन्होंने किया भी होगा लेकिन इसके पीछे वजह कांग्रेस के भीतर की है. उन्होंने तो सामने से लपका बस. अब चूंकि इस खेल में भाजपा आलाकमान शामिल हो चुकी है सो आसानी से वे भी चुप नहीं बैठेंगे. कुछ न कुछ खेल होगा. भाजपा के पास 25 विधायक हैं. उन्हें दस विधायकों की ज़रूरत है. हिमाचल की राजनीति अगले एक दो दिनों में किसी भी दिशा में मुड़ सकती है.”
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