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इसराइल हमास संघर्षः मिस्र के राष्ट्रपति को पीएम मोदी का फ़ोन, क्या संतुलन साधना चाहता है भारत?
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
संयुक्त राष्ट्र में मानवीय आधार पर 'इसराइल-हमास के बीच संघर्ष विराम' के प्रस्ताव पर मतदान से भारत अनुपस्थित रहा लेकिन अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फ़तह अल सीसी से फ़ोन पर बात की.
मिस्र की सरकार के बयान के मुताबिक़ दोनों नेताओं ने इसराइल के ग़ज़ा में सैन्य अभियान और उससे जुड़े ताज़ा घटनाक्रम पर चर्चा की.
दोनों नेताओं ने ग़ज़ा के मानवीय संकट पर भी चर्चा की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया पर बातचीत की जानकारी दी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “राष्ट्रपति अल सीसी के साथ पश्चिमी एशिया में ख़राब हो रहे सुरक्षा और मानवीय हालात पर चर्चा की. हमने आतंकवाद, हिंसा और आम लोगों की जानों के नुक़सान को लेकर चर्चा की."
"हम शांति और स्थिरता की शीघ्र बहाली और मानवीय सहायता की सुविधा की ज़रूरत पर सहमत हुए.”
संतुलन बनाने की कोशिश
हमास ने 7 अक्तूबर को इसराइल पर हमला किया था जिसमें 1400 से अधिक लोग मारे गए थे. इसराइल 'हमास को समाप्त करने' के उद्देश्य से लगातार ग़ज़ा पर हमले कर रहा है. इसराइल ने ज़मीनी अभियान भी शुरू किया है. अब तक ग़ज़ा में आठ हज़ार से अधिक लोग मारे गए हैं.
दोनों नेताओं ने मौजूदा संघर्ष की गंभीरता और इसके क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी चर्चा की है.
भारत शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र में हुए मतदान से दूर रहा था. भारत इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच संघर्ष में अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाने के प्रयास कर रहा है.
हमले के तुरंत बाद जहां भारत ने कहा था कि वो पूरी तरह से 'इसराइल के साथ खड़ा है.' वहीं भारत ने ये भी कहा है कि वो 'स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र के निर्माण को इस संकट के समाधान के रूप में देखता है.'
सुरक्षा परिषद में मतदान से दूर रहने के बाद मिस्र के राष्ट्रपति से पीएम मोदी के फ़ोन कॉल को संतुलन बनाने के इसी प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है.
दिल्ली की जामिया यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार प्रोफ़ेसर सुजाता ऐश्वर्या कहती हैं, “भारत भले ही संघर्ष विराम पर मतदान से दूर रहा लेकिन भारत पर दबाव है कि वो फ़लस्तीनी मुद्दे पर अपने पारंपरिक स्टैंड पर बना रहे. भले ही भारत इसराइल के साथ खड़ा रहे लेकिन फ़लस्तीनियों का भी समर्थन करता हुआ भी दिखे.”
क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अल सीसी से बात करने से युद्ध के हालात पर कोई असर पड़ सकता है? इस सवाल पर प्रोफ़ेसर सुजाता कहती हैं, “भारत के प्रधानमंत्री ने सीसी से बात की है, इसका कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा. ये सिर्फ़ बातचीत ही है, इसे एक तरह से औपचारिकता कहा जा सकता है.”
ग्लोबल साउथ (विकासशील देश) के अधिकतर देशों ने संघर्ष विराम का समर्थन किया है. हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि ये देश संघर्ष विराम लागू कराने की स्थिति में नहीं है
प्रोफ़ेसर सुजाता कहती हैं, “अरब देश मानवाधिकार संघर्ष विराम लागू कराने का प्रयास तो कर रहे हैं लेकिन जो खुला समर्थन इसराइल को पश्चिमी देशों की तरफ़ से मिल रहा है, उसके सामने उनकी आवाज़ बेअसर है. ग्लोबल साउथ अभी कमज़ोर है और उसका इतना प्रभाव नहीं है कि वो संघर्ष विराम लागू करा सके.”
ग़ज़ा के लिए एकमात्र रास्ता मिस्र से
मिस्र इसराइल का पड़ोसी है. उसकी सीमा ग़ज़ा से भी लगती है. मिस्र के सिनाई क्षेत्र और ग़ज़ा के बीच रफ़ाह चौकी एकमात्र ऐसा रास्ता है जो पूरी तरह से इसराइल के नियंत्रण में नहीं है.
रफ़ाह क्रॉसिंग के अलावा ग़ज़ा को जाने वाले हर मार्ग पर इसराइल का सख़्त नियंत्रण है. हालांकि रफ़ाह को भी इसराइल नियंत्रित करता है और इसराइल की मंज़ूरी के बाद ही सामान ग़ज़ा में जा पाता है. पिछले कुछ दिनों में इसराइल ने बेहद सीमित मात्रा में राहत सामग्री को ग़ज़ा में जाने दिया है.
भारत ने भी मदद भेजी है लेकिन इसके ग़ज़ा पहुंचने के लिए इसराइल की मंज़ूरी अनिवार्य है.
इसराइल के लिए युद्ध के हालात में ये भी मुश्किल है कि वो हर सामान की गहनता से जांच कर पाए.
प्रोफ़ेसर सुजाता कहती हैं, “जब भी कोई सामान रफ़ाह सीमा के ज़रिए जाता है इसराइल उसकी गहनता से जांच करता है."
"अब युद्ध और मुश्किल हालात की वजह से इसराइल हर चीज़ की जांच नहीं कर पाएगा. इसराइल के लिए ये मुश्किल है कि वो बिना जांच परख के सामान को ग़ज़ा जाने दे.”
बढ़ रहा है मानवीय संकट
इसी बीच ग़ज़ा में काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी यूएनडब्लयूआरए ने कहा है कि ग़ज़ा में उसके भंडार पर हज़ारों लोगों ने हमला किया है और आटे जैसे ज़रूरी सामान लूट लिए हैं.
एजेंसी ने कहा है कि ये इस बात का चिंताजनक संकेत है कि ग़ज़ा में हालात नियंत्रण से बाहर हो रहे हैं और नागरिक प्रशासन समाप्त हो रहा है.
इससे पहले इंटरनेशनल रेड क्रॉस ने चेताया था कि ग़ज़ा में मानवीय मदद मुहैया करा पाना इस समय संभव नहीं हो पा रहा है. आईसीआरसी ने इसे ‘विनाशकारी विफलता’ कहा है.
आईसीआरसी ने कहा है कि ग़ज़ा में 'मानवीय त्रासदी बर्दाश्त से बाहर हो रही है और इसे तुरंत रोका जाना चाहिए.'
वहीं एक वीडियो बयान में इसराइल के सैन्य प्रवक्ता डेनियल हगारी ने कहा है कि मिस्र और संयुक्त राष्ट्र ग़ज़ा के लिए राहत को बढ़ाएंगे. हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया है कि कितनी राहत सामग्री को ग़ज़ा में जाने दिया जाएगा. इसराइल ने उत्तरी ग़ज़ा में रह रहे सभी आम नागरिकों से इलाक़ा छोड़ने के लिए भी कहा है.
ग़ज़ा में अब तक आठ हज़ार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं. गंभीर रूप से घायल लोगों को चिकित्सीय सहायता की ज़रूरत है लेकिन ग़ज़ा की स्वास्थ्य सेवाएं ढह रही हैं.
मिस्र का इसराइल पर कितना दबाव?
ग़ज़ा के लिए मदद भेजने का एकमात्र रास्ता मिस्र के पास है. आईसीआरसी और विश्व स्वास्थ्य संगठन के राहत सामन से भरे दर्जनों विमान मिस्र के सिनाई में स्थित अल अरीश एयरपोर्ट पहुंचे हैं. ये एयरपोर्ट रफ़ाह क्रॉसिंग से क़रीब 28 मील दूर है.
अभी तक ग़ज़ा में जो भी सीमित मदद पहुंची है वह रफ़ाह के रास्ते ही आई है.
मिस्र चाहता है कि रफ़ाह के रास्ते राहत सामग्री ग़ज़ा जाती रहे.
प्रोफ़ेसर सुजाता कहती हैं, “मिस्र इसराइल के ऊपर ये दबाव बनाकर रख सकता है कि हमें इस मानवीय त्रासदी को रोकना ही है, राहत सामग्री, दवाइयां, खाद्य सामग्री भेजनी ही है.”
हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में मिस्र इस हालत में नहीं है कि वह इसराइल को अपनी बात मानने के लिए मजबूर कर सके.
प्रोफ़ेसर सुजाता कहती हैं, “मिस्र सिनाई में ग़ज़ा के साथ बड़ा बॉर्डर साझा करता है. लेकिन ये भी सच है कि मिस्र अभी एक मज़बूत राष्ट्र नहीं है. अभी वहां के संस्थान इतने मज़बूत नहीं हैं, वहां लोकतंत्र नहीं है, सैन्य शासन है."
इसराइल चाहता है कि मिस्र सिनाई क्षेत्र को ग़ज़ा के लोगों के लिए खोले और यहां लोगों के रहने के लिए टैंट लगाए जा सकें. मिस्र ने अभी तक ये स्टैंड लिया है कि वह ग़ज़ा के शरणार्थियों के लिए अपनी सीमाएं नहीं खोलगा.
इसकी वजह बताते हुए प्रोफ़ेसर सुजाता कहती हैं, “अरब लोगों को नकबा याद है, उन्होंने पहले भी पलायन किया है लेकिन फिर वो वापस नहीं लौट सकें हैं, ऐसे मे मिस्र नहीं चाहता है कि ग़ज़ा के लोग उसकी ज़मीन पर बसें."
"हालांकि ऐसा हो सकता है कि अगले कुछ दिनों में मिस्र दबाव में आ जाए और कुछ लोगों को दाख़िल होने दे. वो कम से कम दोहरी नागरिकता रखने वाले लोगों को आने दे.”
हमास के साथ मिस्र के जटिल संबंध
ग़ज़ा पर चरमपंथी समूह हमास का शासन है और उसके साथ मिस्र के रिश्ते जटिल रहे हैं. हमास ईरान को अपना सबसे क़रीबी सहयोगी मानता है. हमास ने मिस्र के साथ भी ‘बैक चैनल’ खुले रखे हैं और मिस्र और हमास के बीच अनाधिकारिक संपर्क संभव रहा है.
मिस्र भले ही हमास का खुला समर्थक ना हो लेकिन मिस्र के हमास के साध अनाधिकारिक संपर्क रहे हैं, ऐसे में मिस्र हमास के साथ वार्ता में अहम भूमिका निभा सकता है.
मिस्र की मौजूदा सत्ता के हमास विरोधी होने की एक मुख्य वजह ये है कि हमास ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की फ़लस्तीनी शाखा है. मिस्र के राष्ट्रवादी, इस्लामी विद्वान और शिक्षक हसन अली बन्ना ने ही 1928 में मुस्लिम ब्रदरहुड की शुरुआत मिस्र से की थी.
धार्मिक और शैक्षणिक संगठन के रूप में शुरू हुए मुस्लिम ब्रदरहुड ने 1930-40 के दशक में अरब देशों में तेज़ी से अपना प्रभाव बढ़ाया था. इसी समय इसने राजनीतिक और हिंसक स्वरूप भी अख़्तियार करना शुरू किया था.
1954 में इस समूह ने मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर की हत्या का नाकाम प्रयास किया था जिसके बाद मिस्र ने इस पर क्रैकडाउन शुरू किया और 60 और 70 के दशक में ये भूमिगत ही रहा.
उस दौर में ग़ज़ा में हालात अलग थे. 1967 में इसराइल के क़ब्ज़े से पहले ग़ज़ा पर मिस्र का ही नियंत्रण था. इस समय मुस्लिम ब्रदरहुड ग़ज़ा में सक्रिय रह सकता था.
मध्य पूर्व के मामलों के विश्लेषक और सेंटर फॉर इंटरनेशल स्टडीज से जुड़े डेनियल बेमन ने एक साक्षात्कार में कहा है कि हमास मुस्लिम ब्रदरहुड से निकली कोई अलग शाखा नहीं है बल्कि ये मुस्लिम ब्रदरहुड से ही पैदा हुआ संगठन है.
हालांकि अगले चार दशकों तक ग़ज़ा में मुस्लिम ब्रदरहुड या हमास के पास इतनी शक्ति नहीं थी कि वह मिस्र के लिए कोई ख़तरा हो सके. लेकिन जब 2007 में ग़ज़ा पर हमास का नियंत्रण हुआ तो यह संगठन ताक़तवर हो गया.
उस समय मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने ग़ज़ा पर हमास के नियंत्रण को अवैध कहा था और इसराइल की सख़्त नाकेबंदी का समर्थन किया था.
आगे चलकर होस्नी मुबारक को मिस्र में हुई क्रांति के बाद पद से हटा दिया गया. मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े मोहम्मद मुर्सी मिस्र के राष्ट्रपति बनें और ग़ज़ा के साथ मिस्र के संबंध मज़बूत होने की संभावना पैदा हुई.
लेकिन मुर्सी को सत्ता में अभी एक साल चार दिन ही हुए थे कि अब्दुल फ़तह अल सीसी ने सैन्य विद्रोह किया और उन्हें पद से हटा दिया. अल सीसी ने मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड का दमन किया और हमास के ख़िलाफ़ बयान दिए लेकिन सिनाई में इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ लड़ाई में हमास का सहयोग भी लिया.
अल सीसी ने इससे पिछले संघर्षों के दौरान इसराइल और हमास के बीच वार्ता भी करवाई. मिस्र की इसराइल और हमास के बीच मध्यस्थ की भूमिका ने अमेरिका के साथ भी उसके संबंध मज़बूत किए.
हमास ने मिस्र के लिए सुरक्षा चिंताएं भी पैदा की हैं. हमास ने मिस्र और ग़ज़ा के बीच कई गुप्त सुरंगें बनाई जिनका इस्तेमाल ग़ज़ा में सामान लाने के लिए किया गया.
दुविधा में फंसा है मिस्र
मिस्र इस समय दुविधा में है. एक तरफ़ उसके अपने सुरक्षा हित हैं और दूसरी तरफ़ फ़लस्तीनियों को नज़रअंदाज़ न करने का मानवीय दबाव भी है.
मिस्र में लोग फ़लस्तीनियों के समर्थन में उतरे हैं. मिस्र के आम लोग नहीं चाहते कि ग़ज़ा के लोग मारे जाएं. ऐसे में मिस्र की सरकार पर ये दबाव भी होगा कि वो अपने देश के लोगों की सुने.
लेकिन हमास के साथ उसके रिश्ते जटिल रहे हैं. अगर वो फ़लस्तीनियों के लिए अपने बॉर्डर खोलता है तो ये आशंका है कि ये लोग वापस ना जा पाएं. इसके अलावा हमास से जुड़े लोगों के दाख़िल हो जाने का ख़तरा भी है.
मिस्र अगर बहुत खुलकर फ़लस्तीनियों के समर्थन में आता है तो युद्ध के उसके क्षेत्र में फैल जाने का ख़तरा भी है. मिस्र इसराइल के साथ पहले हुए युद्धों में चोट खा चुका है.
प्रोफ़ेसर सुजाता कहती हैं, “युद्ध से सभी को डर लगता है, मिस्र और दूसरे अरब देश जानते हैं कि अगर वो दख़ल देंगे तो युद्ध उनकी अपनी चौखट तक आ जाएगा. कोई अरब देश इतना मज़बूत नहीं है कि वो पश्चिमी देशों के सामने इस युद्ध में शामिल हो सके."
"अरब देशों, मुसलिम देशों में सड़कों पर ग़ज़ा के लिए भारी समर्थन दिख रहा है, लेकिन ये समर्थन राजनीतिक फ़ैसलों में बदलेगा, ऐसा नज़र नहीं आता. ये बस आक्रोश है जो सड़कों पर प्रकट हो रहा है.”
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