इसराइल-हमास संघर्ष रोकने में क्या मिस्र निभा पाएगा अहम भूमिका?

    • Author, स्नेहा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सात अक्टूबर को चरमपंथी संगठन हमास ने इसराइल पर हमला कर दिया, इस हमले में 1,400 से ज़्यादा इसराइली मारे गए थे.

इसके बाद ग़ज़ा पर इसराइल के हवाई हमले में अब तक 5,000 से ज़्यादा फ़लस्तीनियों की मौत हो चुकी है और लाखों लोग शरण की तलाश में भटक रहे हैं.

इसराइल ने ग़ज़ा के उत्तरी हिस्से में रह रहे लोगों से सुरक्षा के लिए दक्षिणी ग़ज़ा की तरफ़ जाने के लिए कहा है. इसबीच दक्षिणी ग़ज़ा में भी हवाई हमले जारी हैं.

इस बीच इसराइल के ग़ज़ा में ज़मीनी हमले की आशंकाओं के बीच फ़लस्तीनी ग़ज़ा और मिस्र की सीमा पर स्थित रफ़ाह क्रॉसिंग पर पहुंच रहे हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के इसराइल दौरे पर मिस्र से बनी सहमति के बाद इस क्रॉसिंग के जरिए ग़ज़ा में राहत सामग्री पहुंच रही है.

मिस्र हमास के कब्जे से इसराइली बंधकों को छुड़ाने पर भी बातचीत कर रहा है.

'मिस्र को नुक़सान पहुंचाकर समाधान नहीं'

मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फ़तह अल-सिसी ने बुधवार को कहा कि उनका देश संघर्ष को रोकने में सकरात्मक भूमिका निभा रहा है और कूटनीतिक समाधान निकालने की दिशा में काम कर रहा है.

वहीं, पिछले हफ़्ते काहिरा समिट में अल-सिसी ने ग़ज़ा के लोगों को मिस्र के सिनाई में धकेलने के इसराइल के किसी भी कदम के प्रति आगाह करते हुए कहा, "फ़लस्तीन की समस्या के सही हल के बिना समाधान नहीं होगा. और ये मिस्र को नुकसान पहुँचा कर तो बिल्कुल नहीं होगा."

ऐसे में सवाल उठता है कि मिस्र इस संघर्ष को रोकने में किस तरह की भूमिका निभा सकता है.

इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफ़ेयर के फ़ेलो और अरब मामलों के जानकार फ़ज़्ज़ुर रहमान कहते हैं, ''अगर फ़लस्तीन मुद्दे पर कोई भी बात होती है तो ऐतिहासिक तौर पर मिस्र इसको लेकर हमेशा आगे रहा है. वो फ़लस्तीन के मुद्दे पर इसराइल के गठन के समय से ही फ्रंट पर रहा है. इसराइल के ख़िलाफ़ जो पहला युद्ध लड़ा गया उसका भी नेतृत्व मिस्र ने किया था."

उन्होंने कहा, "1948 के युद्ध में वो फ्रंट पर रहा. 1967 में फ्रंट पर रहा, 1973 के युद्ध में फ्रंट पर रहा. लेकिन इस युद्ध के बाद 1979 में कैंप डेविड समझौते पर हस्ताक्षर के बाद उसने इसराइल से अपने संबंध स्थापित कर लिए. इसकी वजह से मिस्र को अरब लीग से बाहर का निकाल दिया गया था, कई साल बाद जाकर ही वो इसमें शामिल हो सका."

मिस्र की ऐतिहासिक भूमिका

साल 1977 में मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात इसराइल के ऐतिहासिक दौर पर जाते हैं. ऐसा करने वाले वो पहले अरब नेता थे. उनकी इस यात्रा का दुनिया भर में कई जगहों पर विरोध भी हुआ और आलम ये था कि इसराइल ने इस यात्रा के दौरान करीब 10 हजार सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की थी.

उनके इस दौरे के बाद मिस्र और इसराइल के बीच शांति वार्ता की शुरुआत हुई और फिर मार्च 1979 में देशों के बीच समझौता हुआ जिसे कैंप डेविड समझौते के नाम से जाना जाता है.

इसराइल के ख़िलाफ़ कई युद्ध लड़ने के बाद मिस्र इसराइल के साथ शांति बहाल करने वाला पहला अरब देश बना और तब से वो इसराइल-फ़लस्तीन के मुद्दे पर अहम भूमिका निभाता रहा है.

मध्य-पूर्व मामलों के जानकार फज़्ज़ुर रहमान ने कहा, "मिस्र ये कभी नहीं चाहता कि इस पूरे मुद्दे को कोई और हाइजैक करे इसलिए फ़लस्तीन के मुद्दे पर मिस्र हमेशा आगे दिखता है. मिस्र ने इसराइल-ग़ज़ा के बीच 2008, 2012, 2014 और 2021 में युद्ध विराम की कोशिश की है."

काहिरा समिट में क्या हुआ?

शनिवार को काहिरा समिट में अरब नेताओं ने जहां ग़ज़ा पर इसराइली हवाई हमले की निंदा की. वहीं, यूरोपीय नेताओं ने नागरिकों की सुरक्षा पर जोर दिया.

मिस्र ने ये बैठक बुलाई थी. इसमें इसराइल और अमेरिका के अधिकारियों ने हिस्सा नहीं लिया जिसकी वजह से संघर्ष रोकने पर कोई सहमति नहीं बनी. मिस्र ने कहा कि उसे उम्मीद थी कि इससे शांति के रास्ते निकलेंगे और फ़लस्तीन के मुद्दे का हल हो सकेगा लेकिन इस बैठक के बाद कोई भी संयुक्त बयान जारी नहीं हो पाया.

इसराइल और हमास के संघर्ष के बीच मिस्र की ये चिंता बढ़ रही है कि इससे बेघर हुए ग़ज़ा के लोग मिस्र में शरण की उम्मीद करेंगे. मिस्र की अर्थव्यवस्था पहले से ही चरमराई हुई है और ऐसे में शरणार्थी संकट एक बड़ी मुसीबत लेकर आएगा.

फज़्ज़ुर रहमान कहते हैं, "इसराइल दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है जिसकी कोई तय सीमा नहीं है. फ़लस्तीन पर इसराइल का एक दीर्घकालीन एजेंडा ये भी है कि फ़लस्तीनियों को धीरे-धीरे जॉर्डन और मिस्र भेजा जाए."

मिस्र ने अगर रफ़ाह क्रॉसिंग खोली तो वहाँ शरणार्थियों की संख्या बढ़ जाएगी.

रहमान का कहना है कि ऐसे में मिस्र हर हाल में चाहेगा कि संघर्ष थम जाए. उसके पास संघर्ष विराम कराने के अनुभव भी हैं. लेकिन इस बार परिस्थितियां कठिन हैं.

हमास के हमले में 1,400 से ज़्यादा इसराइली लोगों की मौत हुई है. इसराइल, संघर्ष रोकने के बारे में बातचीत करने के लिए अभी कोई संकेत देता प्रतीत नहीं होता है. इसराइल के पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू सुरक्षा के मुद्दे पर अपने ही देश में भी घिरे हुए हैं.

इसराइल-हमास संघर्ष को लेकर मिस्र की चिंताएं

इसराइल-फ़लस्तीन मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा इसराइल में ही रहते हैं.

उनका कहना है कि इस संघर्ष में मिस्र का एक डर तो शरणार्थियों का है, वहीं उनका एक दूसरा डर भी है, जिसके बारे में वो सार्वजनिक तौर पर बहुत बातें नहीं करते हैं.

हरेंद्र मिश्रा कहते हैं, "हक़ीकत ये है कि मिस्र खुद ग़ज़ा पर बड़ी सख्ती से पेश आता है. मिस्र को हमेशा बड़ा डर लगता है कि ग़ज़ा से लोग निकलकर मिस्र में बस जाएंगे. मिस्र की दूसरी चिंता है मुस्लिम ब्रदरहुड की हमास या इस्लामिक जिहाद से वैचारिक समानता."

हरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि मिस्र का जो मौजूदा राजनैतिक नेतृ्त्व है वो धर्मनिरपेक्ष या कहें तो लिबरल नेतृत्व है.

मिस्र में उदारवादी लोग भी हैं और कट्टर धार्मिक झुकाव वाले भी. वहां के नेतृत्व को डर रहता है कि अगर हमास के साथ ज़्यादा संपर्क रहा तो धार्मिक झुकाव रखने वाले लोग और कट्टर हो जाएंगे."

दक्षिणी इसराइल पर सात अक्टूबर को हमास के चरमपंथियों ने सैंकड़ों लोगों की हत्या के बाद क़रीब 200 लोगों को बंधक बना लिया था.

इन लोगों को ग़ज़ा में गुप्त स्थानों पर रखा गया है. इन बंधकों में महिलाएं, बच्चे और बुज़ुर्ग शामिल हैं.

अब तक चार बंधकों को छोड़ा गया है. ऐसा माना जा रहा है कि क़तर, मिस्र और कुछ और देश पर्दे के पीछे से इनमें से कुछ बंधकों की रिहाई की कोशिशें कर रहे हैं

पिछले कुछ वर्षों में कतर एक ऐसा देश बनकर उभरा है जो कूटनीतिक और राजनीतिक क्षेत्र में बड़े समझौते करा पाया है.

मिस्र के लिए फ़लस्तीन-इसराइल का मुद्दा दशकों पुराना है और वो भी इसमें बड़ी भूमिका निभाना चाहेगा.

पत्रकार हरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि मिस्र हमेशा अमेरिका और उसके सहयोगियों को साधकर चला है. पिछले कुछ समय में मिस्र की अंदरूनी, राजनीतिक और आर्थिक वजहों से उसकी साख गिरी है लेकिन इस तरह की परिस्थितियों में उसकी भूमिका बढ़ जाती है.

मिस्र लगातार सक्रियता भी दिखा रहा है कि चीजें पटरी पर लौटे. इस्लामिक दुनिया में भले ही मिस्र की भूमिका कम हो गई हो लेकिन इस इसराइल-फ़लस्तीन के मामले में तो है ही.

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