हमास से इतनी नफ़रत क्यों करता है इस्लामिक स्टेट ग्रुप?

    • Author, स्टीवन हम्फ़्रीज़
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग

बीती सात अक्टूबर को हमास की ओर से इसराइल पर किए गए अभूतपूर्व हमले के बाद इसकी तुलना इस्लामिक स्टेट से की गई है.

हालांकि, इस तरह का दावा करते वक़्त दोनों संगठनों के बीच गहरे वैचारिक मतभेदों और आपसी रंजिश के लंबे इतिहास को नज़रअंदाज़ किया गया है.

इस्लामिक स्टेट के समर्थकों की ओर से इस तुलना पर नाराज़गी जताई गई है. क्योंकि इस्लामिक स्टेट हमास को एक 'काफ़िर संगठन' के रूप में देखता है. काफ़िर अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब ईश्वर में यकीन न रखने वाला शख़्स होता है.

इस्लामिक स्टेट इस तुलना पर पहले ही नाराज़गी जता चुका है. क्योंकि वह हमास को एक काफ़िर संगठन के रूप में देखने के साथ-साथ उस पर ईरानी सत्ता के प्रॉक्सी संगठन के रूप में काम करने का आरोप भी लगाता है.

इस्लामिक स्टेट कहता है कि हमास राजनीतिक एवं राष्ट्रवादी उद्देश्यों को पूरा करने के साथ-साथ चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेता है.

इसके साथ ही आईएस हमास पर शरिया के मुताबिक़ नहीं चलने के साथ-साथ जिहादियों को प्रताड़ित करने का आरोप भी लगाता है.

इस्लामिक स्टेट ने हमास के हमले और उसके बाद पैदा हुए हालात पर शुरुआत में चुप्पी साधी हुई थी.

लेकिन इस हमले के 15 दिन बाद इस्लामिक स्टेट ने पश्चिमी देशों में यहूदी ठिकानों पर हमले करने का आह्वान किया है.

हालांकि, इस्लामिक स्टेट और उसके समर्थकों ने जोर देकर कहा है कि हमास पर उनके रुख में कमी नहीं आई है.

और उसने अपने समर्थकों को आगाह करते हुए कहा है कि वे हमास के काफ़िराना झंडे के तले किसी भी चरमपंथी गतिविधि को अंजाम न दें.

हमास की इस्लामिक स्टेट से तुलना क्यों?

हमास की ओर से 7 अक्टूबर को किए गए हमले के बाद कई इसराइली अधिकारियों के साथ-साथ सोशल मीडिया यूज़र्स ने दावा किया है कि हमास विचारधारा और व्यवहार में इस्लामिक स्टेट से अलग नहीं है, ऐसे में हमास से उसी तरह निपटा जाना चाहिए जैसे इस्लामिक स्टेट के साथ निपटा गया था.

इसराइली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतान्याहू ने कहा है कि "हमास आईएसआईएस है और जिस तरह आईएसआईएस कुचल दिया गया था, उसी तरह हमास भी कुचल दिया जाएगा."

ऐसा माना जा रहा है कि इस तुलना की वजह हमास के हमले में इसराइली नागरिकों की बड़ी संख्या में मारा जाना है.

इस हमले में अब तक 1400 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है. और सौ से ज़्यादा लोगों को अग़वा करके रखा गया है.

इस तरह की तुलना के लिए हमास की ओर से हमले के दौरान आम लोगों पर किए गए अत्याचारों से जुड़ी ख़बरें भी ज़िम्मेदार हो सकती हैं.

हालांकि, हमास ने कहा है कि उसने इस हमले में आम लोगों को निशाना नहीं बनाया है.

उसने इस ऑपरेशन को ऑपरेशन अल-अक़्सा फ़्लड नाम दिया है. और इसराइली बयानों को झूठ करार दिया है.

हमले में शामिल थे आईएस लड़ाके

कुछ ख़बरों के मुताबिक़, इस्लामिक स्टेट के कुछ समर्थकों ने अल-अक़्सा फ़्लड ऑपरेशन में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था.

इसराइली सेना ने इस्लामिक स्टेट के एक झंडे की तस्वीर भी जारी की है.

इसराइल का दावा है कि उसे ये झंडा इसराइली सीमा के पास किबुत्ज़ सूफ़ा में हमले के दौरान मारे गए हमास लड़ाके के सामान से मिला है.

इसराइली विदेश मंत्रालय ने हमास को इस्लामिक स्टेट के रूप में देखे जाने की बात पर समर्थन जुटाने के लिए #हमासइज़आईएसआईएस को एक्स (ट्विटर) पर प्रमोट किया है.

इसी तरह अरबी भाषा में दाएश हमास हैशटैग बनाया गया. दाएश शब्द को इस्लामिक स्टेट के लिए अपमानजनक शब्द के रूप में किया जाता है.

आईएस का समर्थन करने वाले प्रभावशाली टेलीग्राम अकाउंट सा’अत अल-ज़रक़ावी ने अपने समर्थकों से कहा है कि वे अरबी हैशटैग को निशाने पर लें ताकि प्रोपेगेंडा सामग्री फैलाकर इस्लामिक स्टेट और काफ़िर संगठनों के बीच अंतर स्रष्ट किया जा सके.

हमास के हमले में इस्लामिक स्टेट के समर्थकों के शामिल होने की बात पर कुख़्यात ऑनलाइन जिहादी तत्व अबु इमाद अल-नेराबी ने स्वीकार किया है कि हमें इस संघर्ष में कुछ मुवाहिद्दीनों के अपने स्तर पर शामिल होने की सूचना मिली है.

लेकिन उन्होंने राष्ट्रवादी हमास के साथ लड़ने पर कड़ी चेतावनी दी है. यहां मुवाहिद्दीनों से आशय इस्लामिक स्टेट का समर्थन करने वालों से है.

हमास के बारे में इस्लामिक स्टेट क्या सोचता है?

कई जिहादी और कुछ कट्टरपंथी इस्लामिक तत्व एक लंबे समय से हमास को संदेह की दृष्टि से देखते रहे हैं. इसकी एक वजह उसके ईरान के साथ क़रीबी रिश्ते होना रहा है. लेकिन इस्लामिक स्टेट स्पष्ट रूप से इस संगठन से घृणा करता है.

ये बात साल 2018 की जनवरी में खुलकर सामने आई जब इस्लामिक स्टेट की उत्तर-पूर्वी मिस्र केंद्रित सिनाई शाखा ने एक वीडियो जारी करके हमास के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने का आह्वान किया था.

इस वीडियो में हमास पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धर्म का सहारा लेने का आरोप लगाया गया था.

यही नहीं, हमास पर ग़ज़ा में जिहादियों को दबाने के साथ ही ईरान का सहयोग करने का आरोप लगाया है. इस संगठन को काफ़िर का दर्जा दिया गया जिसके साथ संघर्ष किया जाना चाहिए.

इस वीडियो में आईएस की ओर से एक हमास से जुड़े शख़्स को मारते हुए भी दिखाया गया है.

इस वीडियो में साल 2009 के दिनों का एक वीडियो भी शामिल था जिसमें हमास के चरमपंथियों का राफ़ा की एक मस्जिद में घुसना दिखाया गया है.

इस वीडियो में एक कट्टरपंथी जिहादी उलेमा की हत्या भी दिखाई गई है जिसने इस्लामिक अमीरात के ख़िलाफ़ युद्ध का आह्वान किया था.

उस दौर में हमास को अपनी इस कार्रवाई की वजह से ऑनलाइन जिहादी समुदाय में आलोचना का सामना करना पड़ा था.

लेकिन इस तरह की पुरानी तस्वीरों को शामिल किया जाना इस्लामिक स्टेट की हमास के साथ पुरानी रंजिश की ओर संकेत देता है.

फ़लस्तीनी मुद्दे पर आईएस का रुख अस्पष्ट

ये वीडियो जारी होने के कुछ दिन बाद इस्लामिक स्टेट ने एक इन्फ़ोग्राफ़िक जारी करके हमास के ख़िलाफ़ अपने रुख को समझाने की कोशिश की थी.

इस इन्फ़ोग्राफ़िक में सात बिंदुओं के ज़रिए ये समझाने की कोशिश की गयी है कि हमास ने अपना धर्म को त्याग कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लिया है. और उसके राजनीतिक सहयोगियों को तानाशाह और काफ़िर करार दिया गया.

इस्लामिक स्टेट के लिए हमास के शिया बहुल ईरान के साथ क़रीबी संबंध परेशान करने वाले हैं.

इस्लामिक स्टेट ने अपने संदेशों में हमास को ईरान का एजेंट करार देते हुए कथित रूप से पवित्र भूमि पर शिया प्रभाव को फैलाने में सहयोग करने का आरोप लगाया है.

इस्लामिक स्टेट की शत्रुता की वजह से हमास का फ़लस्तीन केंद्रित होना है जिसे इस्लामिक स्टेट राष्ट्रवादी मानता है.

इस्लामिक स्टेट के मुताबिक़, किसी भी तरह का राष्ट्रवाद ग़ैर-इस्लामिक बहु-ईश्वरवाद का बड़ा उदाहरण है.

ये बेहद आश्चर्य की बात है कि इस्लामिक स्टेट ने फ़लस्तीन के मुद्दे पर ऐतिहासिक रूप से अपने रुख को स्पष्ट नहीं किया है.

इस रुख के ज़रिए वह उन लोगों की आलोचना करता है जो फ़लस्तीन के मुद्दे को उठाए हुए हैं.

आईएस का तर्क है कि इस मुद्दे को एक जातीय, राष्ट्रवादी और राजनीतिक संघर्ष की जगह धार्मिक संघर्ष के रूप में देखा जाना चाहिए.

इसके साथ ही वह इस संघर्ष को दुनिया भर में मुसलमानों और काफ़िरों के बीच जारी संघर्ष के एक हिस्से के रूप में ही देखता है.

अल-अक़्सा फ़्लड ऑपरेशन के बाद बदला आईएस का रुख?

एक शब्द में कहें तो - न.

दुनिया की बाक़ी जिहादी संस्थाओं की तर्ज पर इस्लामिक स्टेट के समर्थकों ने भी ग़ज़ा पर इसराइली बमबारी के प्रति रोष ज़ाहिर किया है.

जिहादी इसराइली हमले का इस्तेमाल अपने संदेश को फैलाने और नए रंगरूट तैयार करने के लिए कर रहे हैं.

हालांकि, इस्लामिक स्टेट और उसके समर्थकों ने सात अक्तूबर को हमास के इसराइल पर हमले के बारे में कोई उत्साही बयान नहीं दिए हैं.

इसके बरअक्स अल-क़ायदा ने हमास के हमलावरों को हीरो बताया था जिन्होंने अमेरिका पर हुए 9/11 हमलों को भी पीछा छोड़ दिया है.

इसके विपरीत इस्लामिक स्टेट ने हमास के इसराइल पर हमले पर अधिक टीका टिप्पणी नहीं की है. संभव है कि इस्लामिक स्टेट ग्रुप को हमास की ख्याति से गुरेज़ हो.

अपने साप्ताहिक समाचार पत्र अल-नाबा ने 20 अक्तूबर के अंकल में इस्लामिक स्टेट ने मुसलमानों का यहूदियों पर हमला करने का आह्वान किया है.

नर्म नहीं हुआ आईएस का रवैया

इस ग्रुप ने विशेषकर अमेरिका और यूरोप में यहूदी इलाक़ों को निशाना बनाने का आग्रह किया है.

ग्रुप ने कहा है कि इसराइल की ग़ज़ा पर हो रही बमबारी के ख़िलाफ़ मुसलमानों को पश्चिमी देशों के दूतावासों और यहूदी ठिकानों पर हमले करने चाहिए.

इस्लामिक ग्रुप ने ये भी लिखा है कि अगर इसराइली सेना ग़ज़ा में दाखिल होती है तो मुसलमानों को इसके लिए तैयार रहना चाहिए. लेकिन ग्रुप चाहता है कि लोग किसी राष्ट्रवादी बैनर तले इसराइल का विरोध न करें.

इस्लामिक स्टेट का इशारा सीधे हमास की ओर था. इससे पहले अल-नाबा में इसराइल-ग़ज़ा संघर्ष के जवाब मे जिहाद छेड़ने की मांग की गई थी.

सात अक्तूबर के हमास के हमले और इसराइली की जवाबी कार्रवाई के बाद से ही इस्लामिक स्टेट के समर्थक हिंसा को उकसावे वाली ख़बरों को शेयर करते रहे हैं.

लेकिन इस्लामिक स्टेट ग्रुप के लोग साफ़ कह रहे हैं कि ये जिहाद अल्लाह के नाम पर लड़ा जाए न कि हमास जैसे संगठनों के नाम पर.

सात अक्तूबर के बाद भी हमास के प्रति इस्लामिक स्टेट का रवैया बिल्कुल नर्म नहीं पड़ा है.

उन्होंने कहा है कि हमास एक राष्ट्रवादी आंदोलन चला रहा है न कि शरिया का शासन कायम करने के लिए.

इस्लामिक स्टेट के हिमायती अबु इमाद अल-नेराबी ने चेतावनी दी है कि हमास के ‘काफ़िर परचम’ तले जिहाद लड़ना इस्लाम के मुताबिक ग़लत है.

ऐसा लगता है कि इस्लामिक स्टेट को हमास को मिलने वाली तवज्जो से भी नाराज़गी-सी है. आईएस हिमायती टेलिग्राम चैनल सा’अत अल-ज़रकावी ने अपने समर्थकों से कहा है कि वो हमास की मज़बूती और लोकप्रियता की बातों को नज़रअंदाज़ करें और उनकी इमेज को न चमकाएं.

ग्रुप में लिखा है, “हमास की इमेज को पॉलिश करने की ज़रुरत नहीं है. उनकी काफ़िर मान्यताओं या यहूदियों से लड़ने पर तारीफ़ करने की आवश्यकता नहीं है.”

सोशल मीडिया पर आईएस के समर्थक इसराइल के साथ युद्ध में हमास द्वारा राजनीतिक एजेंडा चलाने की आलोचना कर रहे हैं. ये लोग इस बात पर भी ख़ुश नहीं है कि हमास दुश्मनों से बातचीत के लिए तैयार है.

साथ ही ये लोग अग़वा किए गए इसराइलियों के साथ नर्म बर्ताव का भी मखौल उड़ा रहे हैं.

ये लोग कह रहे हैं कि गज़ा में जो कुछ हो रहा है वो इस्लामिक स्टेट के कब्ज़े वाले मोसुल, बग़ूज़ और रक़्क़ा पर हुई बमबारी के सामने कुछ भी नहीं है.

आईएस समर्थित सोशल मीडिया अकाउंट्स साल 2019 में पूर्वी सीरिया के बग़ूज़ पर हवाई बमबारी की याद दिला रहे हैं. ये शहर इस्लामिक स्टेट का अंतिम गढ़ था.

समर्थकों का कहना है कि ये मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक बड़ा संघर्ष है और इसका मुकाबला सिर्फ़ जिहाद के ज़रिए ही किया जा सकता है.

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