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'इस्लामिक जिहाद' क्या है, जिसे ग़ज़ा के अस्पताल पर हमले का ज़िम्मेदार मानता है इसराइल
- ग़ज़ा शहर के एक अस्पताल में मंगलवार को हुए भीषण धमाके का आरोप फ़लस्तीनी स्वास्थ्य अधिकारियों ने इसराइल पर लगाया लेकिन इसराइल का कहना है कि ये धमाका फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद संगठन ने किया.
- ये हमास के बाद ग़ज़ा का दूसरा सबसे बड़ा चरमपंथी संगठन है.
- ये संगठन किसी भी तरह की शांति वार्ता की कोशिश को ख़ारिज करता है.
- 1981 में फ़तही-अल शिक्काकी ने इसका गठन किया था.
- वैसे तो ये संगठन हमास का प्रतिद्वंद्वी है लेकिन इसने अतीत में हमास के साथ मिलकर भी इसराइल पर कई हमले किए हैं.
मंगलवार को देर शाम ग़ज़ा के अल-अहली अरब अस्पताल में धमाका हुआ और इसमें कम से कम 500 लोगों की मौत हुई.
इस धमाके के लिए इसराइल ने जहाँ चरमपंथी संगठन फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद (पीआईजे) पर आरोप लगाया है, वहीं हमास के अलावा कई देशों ने इसके लिए इसराइल को ज़िम्मेदार ठहराया है.
इसराइली सेना का तर्क है कि पीआईजे का रॉकेट मिसफ़ायर हो कर अस्पताल पर जा गिरा था.
अमेरिका ने इसराइली दावे को समर्थन दिया है.
ये कहानी उस संगठन के बारे में है जिसका नाम बुधवार से दुनियाभर में ख़बरों में चर्चा में छाया हुआ है- फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद यानी पीआईजे.
क्या है फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद?
फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद ग़ज़ा में हमास के बाद दूसरा बड़ा चरमपंथी गुट है.
ये चरमपंथी गुट अपने बेहद कट्टरपंथी रुख़ के लिए जाना जाता है. ग़ज़ा के साथ-साथ फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद की उपस्थिति वेस्ट बैंक में भी है.
फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद वो संगठन है जो किसी भी तरह की राजनीतिक शांति वार्ता पर यक़ीन ही नहीं करता और इसराइल पर सैन्य जीत को ही अपना उद्देश्य मानता है,
संगठन का मानना है कि "इसराइल पर जीत के बाद इसराइल, ग़ज़ा पट्टी और वेस्ट बैंक को मिलाकर एक इस्लामिक देश बनाया जाएगा."
इस्लामिक जिहाद के गठन की धारणा मिस्र के चरमपंथी समूह मुस्लिम ब्रदरहुड से प्रेरित है.
वर्ष 1981 में फ़तही-अल शिक्काकी और अब्द अज़ीज़ अवदा ने पीआईजे बनाया.
शिक्काकी का जन्म ग़ज़ा के रफ़ाह में हुआ था. रफ़ाह ग़ज़ा पट्टी का वो हिस्सा है जो मिस्र से लगता है.
शिक्काकी का जन्म एक रिफ़्यूजी कैंप में हुआ था, उनके परिवार को पहले अरब- इसराइल युद्ध (1948) में निकाल दिया गया था.
दोनों ने ही मिस्र से पढ़ाई की और वहीं दोनों की मुलाक़ात हुई.
द इकॉनमिस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक़, 1980 के दशक के दौरान पीआईजे छोटी-छोटी बिखरी हुई सैन्य टुकड़ियों का एक नेटवर्क था, जिसमें कुल मिलाकर केवल कुछ सौ सदस्य थे.
लेकिन 1988 में इसरायली अधिकारियों ने शिक्काकी को लेबनान निर्वासित कर दिया, जहाँ बाद में पीआईजे के अन्य लोग भी निर्वासित किए गए.
ये सभी निर्वासित लोग इस दौरान ईरान के लड़ाकों और लेबनान में ईरान समर्थित मिलिशिया हिज़बुल्लाह के संपर्क में आए.
पीआईजे के सदस्यों ने हिज़बुल्लाह से ट्रेनिंग लेना शुरू कर दिया और फिर एक मज़बूत आर्मी समूह अल-कुद्स ब्रिगेड की स्थापना की.
वर्ष 1990 में हमास ने पहली बार आम लोगों पर हमला किया था. उससे पहले 80 के दशक में ही फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद ने कुछ हमले इसराइल पर किए और इसकी ज़िम्मेदारी भी ली.
पीआईजे ने इसराइल पर कई बार हमले किए और इसकी ज़िम्मेदारी ली लेकिन इसका सबसे बड़ा हमला रहा 1995 का, जब इसके हमले में 21 इसराइली सैनिक और एक नागरिक की मौत हुई.
पीआईजे के शुरू के नेता मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड के विचारकों-एक्टिविस्टों और 1960 और 1970 के दशक में समूह की हिंसक सक्रियता से काफ़ी प्रभावित थे.
पीआईजे के लोग ईरान के नेता आयतुल्लाह रोहुल्ला ख़ामेनेई से भी काफ़ी प्रभावित थे.
हमास और इस्लामिक जिहाद में क्या है कनेक्शन?
फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद और हमास दोनों को अमेरिका, इसराइल, यूरोपीय देश आतंकवादी संगठन मानते हैं.
विचारधारा के स्तर पर ये दोनों संगठन एक-दूसरे से अलग हैं लेकिन दोनों ही इसराइल को अपना दुश्मन मानते है. यही बात इन्हें एक साथ कर देती है. कई ऐसे हमले हैं जिसमें हमास और इस्लामिक जिहाद एक साथ आए हैं.
जेएनयू में मध्य-पूर्व स्टडीज़ के डायरेक्टर रह चुके एके पाशा कहते हैं कि हमास को समझे बिना फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद को नहीं समझा जा सकता.
वर्ष 1988 में हमास नेता मोहम्मद अल-ज़ाहर ने शांतिपूर्ण निष्कर्ष का प्रस्ताव रखा था. 1988 में ही हमास के संस्थापक शेख यासिन ने भी ऐसे ही विचार ज़ाहिर किए थे.
पाशा कहते हैं, "जब ये हो रहा था तभी हमास का एक तबका इसके पक्ष में नहीं था और वो सिर्फ़ सैन्य उपाय पर ही फ़ोकस करना चाहते थे. इसमें कई लोग जो हमास के साथ थे, उन लोगों ने हमास से अलग होने का फ़ैसला किया और तभी इस्लामिक जिहाद थोड़ा मज़बूत हुआ."
2017 में हमास ने अपने मूल चार्टर में संशोधन किया और इसराइल के ख़िलाफ़ थोड़ा नरम रवैया अपनाया.
अमेरिका के नेशनल काउंटरटेरेरिज़्म सेंटर यानी एनसीटी का कहना है 2019 और 2020 में इस्लामिक जिहाद ने इसराइल पर बिना हमास की मदद के रॉकेट दागे थे.
एनसीटी के अनुसार, साल 2022 में इस्लामिक जिहाद ने "अपने नेता की मौत के जवाब में इसराइल पर लगभग 1100 रॉकेट लॉन्च किए थे."
हमास की तरह फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद की कोई राजनीति से जुड़ी शाखा नहीं है. ये सिर्फ़ और सिर्फ़ हथियारों के इस्तेमाल वाला संगठन है.
वहीं हमास राजनीति में सक्रिय है और चुनाव भी लड़ चुका है.
साल 2006 में हमास ने कब्ज़े वाले फ़लस्तीनी इलाक़ों में चुनाव जीता था.
हमास को कई देश एक पॉलिटिकल फ़ोर्स मानते हैं, और ये भी माना जाता है कि फ़लस्तीनियों के एक तबके का प्रतिनिधित्व हमास के पास है.
साल 2007 से गज़ा में हमास का शासन है. वहाँ सभी विभाग हमास ही चलाता है.
वहीं हाल के सालों में पीआईजे वेस्ट बैंक में और मज़बूत हुआ है.
हालाँकि 90 के दशक में इस समूह को बड़ा झटका उस वक्त लगा, जब 1995 में इसके सेक्रेटरी जनरल फ़तही शिक्कानी को इसराइल की सीक्रेट सर्विस ने मार दिया.
इसके बाद ये समूह थोड़ा कमज़ोर हुआ लेकिन दूसरे इंतिफ़ादा यानी अरब-इसराइल युद्ध (2000 से 2005) के दौरान पीआईजे फिर मज़बूत हुआ. इसी दौरान हमास भी मज़बूत हुआ और उसने ग़ज़ा को अपने अधिकार में ले लिया.
द गार्डियन की रिपोर्ट कहती है कि इस समूह में पहले वे लोग आए जो सेकूलर वामपंथी समूहों से असंतुष्ट सदस्य थे और जो फ़लस्तीनी राष्ट्रवादी "सशस्त्र संघर्ष" का समर्थन करते थे.
साथ ही इसमें मुस्लिम ब्रदरहुड के पूर्व सदस्य भी, जो ये मानते थे कि इसराइल के ख़िलाफ़ लड़ाई को प्राथमिकता मिलनी चाहिए वो भी इसमें शामिल हुए.
पीआईजे ने आत्मघाती बमबारी की नई रणनीति अपनाई और इसराइली सेना और आम नागरिकों पर कई हमले किए.
फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद को फ़ंड कौन करता है?
अमेरिका के नेशनल काउंटरटेररिज़्म सेंटर के मुताबिक़ इस्लामिक जिहाद को "ईरान और लेबनान का चरमपंथी संगठन हिज़बुल्लाह मदद देता है."
हालांकि प्रोफ़ेसर एके पाशा ये नहीं मानते.
वो कहते हैं, "हमास को ईरान का समर्थन है तो आख़िर वह उसके प्रतिद्वंद्वी को मदद क्यों देगा और अगर उन्हें ईरान से मदद मिलती तो वो हमास की तरह मज़बूत होता."
"पीआईजे आम लोगों के बीच से समर्थन लेता है, जैसे वक्फ़ को फंड मिला, किसी इस्लामिक संस्था को फ़ंड मिला तो वह उनसे मदद लेने की कोशिश करता है. थोड़ी बहुत मदद मिस्र से मिलती है लेकिन वो मदद कम है."
पीआईजे का मुख्यालय सीरिया के दमिश्क में है, जहाँ इसके वर्तमान नेता ज़ियाद अल-नख़लाह रहते हैं. इसका एक दफ़्तर तेहरान में भी है.
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