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मिस्र की जिस अल-हाकिम मस्जिद में गए पीएम मोदी, उसका भारत से कनेक्शन
अंशुल सिंह
बीबीसी संवाददाता
अमेरिका के आधिकारिक दौरे के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने अगले पड़ाव मिस्र पहुंचे हैं.
अपने दौरे के पहले दिन जहां उन्होंने मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतेह अल-सीसी से मुलाक़ात की और कई अहम मुद्दों पर चर्चा की, वहीं दौरे के दूसरे दिन उन्होंने काहिरा में मौजूद ऐतिहासिक अल-हाकिम मस्जिद का दौरा किया.
मिस्र में मौजूद 11वीं सदी के इस मस्जिद की मरम्मत का काम भारत में रहने वाले दाउदी वोहरा समुदाय के लोगों की मदद से पूरा हुआ है.
इसकी मरम्मत का काम तीन महीने पहले ही पूरा हुआ है.
मिस्र के अपने दो दिन के दौरे के दूसरे दिन मोदी 1012 में बनी इस मस्जिद को देखने पहुंचे और इसकी दीवारों और दरवाज़ों पर बनी नक्काशी को देखा और वहां मौजूद लोगों से बात की.
इससे पहले विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा ने पीएम मोदी के अल-हाकिम मस्जिद के दौरे के बारे में जानकारी देते हुए बताया, ''मिस्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 जून को अल-हाकिम मस्जिद का दौरा करेंगे, जिसे 11वीं शताब्दी में बनाया गया था और दाऊदी बोहरा समुदाय ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था.''
मस्जिद को ऐतिहासिक काहिरा के हिस्से के रूप में 1979 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल के रूप में शामिल किया था.
इसके अलावा मोदी 'हेलिओपोलिस कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव सेमेटरी' भी जाएंगे. यहां मोदी प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मिस्र के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देंगे.
पीएम मोदी की यह पहली मिस्र यात्रा है और साल 1997 के बाद किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की मिस्र की पहली आधिकारिक यात्रा है.
अल-हाकिम मस्जिद का इतिहास
मिस्र की राजधानी काहिरा दुनियाभर में इस्लामी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है.
यहां इस्लाम से जुड़ीं इमारतें और अलग-अलग कालखंड की मस्जिदें मौजूद हैं. इन्हीं मस्जिदों में से एक है अल-हाकिम मस्जिद.
अल-हाकिम मस्जिद के बारे में जानकारी देते हुए प्रोफेसर डोरिस बेहरेंस अबुसैफ अपनी किताब 'इस्लामिक आर्किटेक्चर इन काइरो: एन इंट्रोडक्शन' में लिखती हैं कि जिन परिस्थितियों में अल-हकीम मस्जिद का निर्माण किया गयाा वह असामान्य हैं.
मस्जिद का निर्माण फ़ातिमी ख़िलाफ़त के पांचवें ख़लीफ़ा अल-अज़ीज़ ने दसवीं शताब्दी (990 ईस्वी) के आख़िर में शुरू करवाया था.
फ़ातिमी ख़िलाफ़त अरबी मूल की थी. वे खुद को पैग़ंबर मोहम्मद की बेटी फ़ातिमा और उनके पति अली से जुड़ा मानते हैं. अली पहले शिया इमाम थे.
निर्माण शुरू होने के एक साल बाद मस्जिद में पहली बार नमाज़ पढ़ी गई, हालांकि इमारत तब भी पूरी तरह से नहीं बनी थी.
इतिहासकारों का मानना है कि तब तक मस्जिद में सिर्फ़ नमाज़ वाला कमरा ही बना था.
अमेरिकी इतिहासकार जोनाथन एम. ब्लूम की किताब 'द मॉस्क ऑफ अल-हाकिम इन काइरो' के मुताबिक़, इस अधूरी बनी मस्जिद में करीब 12 साल तक नमाज़ अदा करने का सिलसिला चलता रहा और साल 1002-03 में अल-अज़ीज़ के बेटे और फ़ातिमी ख़िलाफ़त के छठवें ख़लीफ़ा अल-हाकिम ने मस्जिद का पुनर्निर्माण शुरू कराया.
इन्हीं अल-हाकिम के नाम पर मस्जिद का नाम अल-हाकिम रखा गया है.
दस साल बाद साल 1013 में मस्जिद पूरी तरह से बनकर तैयार हुई.
इस समय मस्जिद की लंबाई 120 मीटर और चौड़ाई 113 मीटर थी.
यह आकार में मशहूर अल-अज़हर मस्जिद से दोगुनी थी और इसके निर्माण की कुल लागत 45 हज़ार दिनार थी.
तब मस्जिद मूल रूप से काहिरा शहर की दीवारों के बाहर थी लेकिन साल 1087 में मस्जिद शहर के अंदर पहुंच गई.
इस काम को फ़ातिमी ख़िलाफ़त के आठवें ख़लीफ़ा अल-मुस्तानसिर के वज़ीर बद्र अल-जमाली ने अंजाम दिया था.
बद्र अल-जमाली ने काहिरा शहर की दीवारों को उत्तर दिशा में मस्जिद तक बढ़ा दिया था.
जब मस्जिद क्षतिग्रस्त हुई
13वीं सदी के मध्य में मिस्र में ममलूक सल्तनत का राज स्थापित हो चुका था.
साल 1303 में मिस्र में भूकंप आया और इसके चलते गीज़ा पिरामिड से लेकर कई मस्जिदों को नुकसान पहुंचा.
क्षतिग्रस्त हुई मस्जिदों में अल-हाकिम मस्जिद भी शामिल थी.
इसके बाद ममलूक सुल्तान अबु-अल-फ़तह ने इसे ठीक कराया.
इस समय तक मस्जिद का इस्तेमाल इस्लामी शिक्षा के लिए भी किया जा रहा था.
आधुनिक ढांचे से पहले कई शताब्दियों में मस्जिद का आंतरिक भाग खंडहर हो चुका था और मस्जिद के रूप में इसका उपयोग कभी-कभी ही किया था.
लेखक कैरोलीन विलियम्स ने अपनी किताब 'इस्लामिक मोनूमेंट्स इन काइरो: अ प्रैक्टिकल गाइड' में बताया है कि अलग-अलग कालखंडों में मस्जिद परिसर का इस्तेमाल अलग-अलग ढंग से किया गया था.
ईसाई धर्मयुद्ध के दौरान मस्जिद का इस्तेमाल जेल के रूप में, अय्यूबी साम्राज्य के सलाउदीन द्वारा अस्तबल के रूप में, नेपोलियन द्वारा एक किले के रूप में, 1890 में एक इस्लामी कला संग्रहालय और फिर 20वीं सदी में लड़कों के स्कूल के रूप में किया गया था.
मस्जिद को मिला दाऊदी बोहरा समुदाय का साथ
1970 के दशक के अंत में एक बार फिर मस्जिद का पुनर्निर्माण कार्य शुरू हुआ.
इस निर्माण कार्य की ज़िम्मेदारी दाऊदी बोहरा समुदाय के 52वें धर्मगुरु मोहम्मद बुरहानुद्दीन ने ली थी.
मोहम्मद बुरहानुद्दीन का संबंध भारत से था और सामाजिक क्षेत्र में योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित किया था.
अल-हाकिम मस्जिद के जीर्णोद्धार में सफेद संगमरमर और सोने की सजावट का प्रयोग किया गया और इसमें 27 महीनों का समय लगा था.
इसके बाद 24 नवंबर 1980 को आधिकारिक तौर पर मस्जिद को खोला गया.
उद्घाटन के लिए भव्य समारोह का आयोजन किया गया था.
समारोह में मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात, धर्मगुरु मोहम्मद बुरहानुद्दीन, सरकार के उच्च अधिकारियों और अल-अज़हर यूनिवर्सिटी से जुड़े धार्मिक लोग शामिल हुए थे.
करीब चार दशक बाद साल 2017 में दाऊदी बोहरा समुदाय और मिस्र के पर्यटन एवं पुरावशेष मंत्रालय ने मस्जिद को लेकर एक साझा पहल शुरू की थी.
इसके तहत मस्जिद के वास्तुशिल्प का नवीनीकरण करने के साथ-साथ मस्जिद की दीवारों का नमी से बचाव और CCTV कैमरे लगाए जाने थे.
2017 से शुरू हुआ ये प्रोजेक्ट 2023 तक चला और छह सालों के दौरान इसमें 20 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो गए.
फिर इसी साल फ़रवरी के महीने में मिस्र की चौथी सबसे पुरानी और दूसरी सबसे बड़ी अल-हाकिम मस्जिद को पर्यटकों के लिए खोला गया था.
मौदी के दौरे पर क्या सोचते हैं दाऊदी बोहरा समुदाय के लोग?
पीएम मोदी के अल-हाकिम मस्जिद के दौरे और उसके महत्व को समझने के लिए बीबीसी ने दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े लोगों से बात की है.
मुंबई के एक कॉलेज में पढ़ाने वाले डॉ. तालिब यूसुफ कहते हैं कि ये दाऊदी बोहरा समुदाय के साथ पूरे हिन्दुस्तान के लिए गर्व का पल होगा.
डॉ. तालिब यूसुफ कहते हैं, ''दाऊदी बोहरा हिन्दुस्तान की एक छोटी सी कम्युनिटी है और ये हमारी लिए बड़ी ख़ुशी की बात है कि पीएम मोदी अल-हाकिम मस्जिद जा रहे हैं. इस कदम से दुनियाभर में देश की एकता और अखंडता का संदेश जाएगा.''
अल-हाकिम मस्जिद पर डॉ. तालिब ने कहा, ''मिस्र की अल-हाकिम मस्जिद दुनिया भर में बसे दाऊदी बोहरा समुदाय के लोगों के लिए ख़ास और ऐतिहासिक है. इसमें मुस्लिम धर्म को मानने वाले सारे समुदाय के लोग जाते हैं और नमाज़ पढ़ते हैं.''
पीएम मोदी के बारे में बीबीसी से बात करते हुए दाऊदी बोहरा समुदाय के एक और व्यक्ति कहते हैं कि बोहरा समुदाय के प्रति पीएम मोदी का लगाव तब से है जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे.
वो कहते हैं, ''जब भी पीएम मोदी विदेश यात्रा पर जाते हैं और वहां उन्हें दाऊदी बोहरा समुदाय के लोग मिलते हैं तो मोदी उन लोगों से बड़ी आत्मीयता से मिलते हैं. पीएम गुजरात से हैं और गुजरात में दाऊदी बोहरा की अच्छी ख़ासी आबादी है. इसलिए दोनों तरफ़ से एक-दूसरे के प्रति लगाव दिखता है.''
मस्जिद की बनावट
अल-हाकिम मस्जिद काहिरा में फ़ातिमी वास्तुकला और इतिहास का एक नायाब उदाहरण है.
आयताकार मस्जिद 13 हज़ार 560 वर्ग मीटर के क्षेत्र को कवर करती है, जिसके बीच में पांच हज़ार वर्ग मीटर का बड़ा सा आंगन है.
आंगन के चारों तरफ़ बड़े-बड़े हॉल बने हुए हैं.
मस्जिद की सबसे खास बात इसके दोनों छोर पर बनीं मीनारें हैं, जिनका निर्माण मस्जिद के शुरुआती दिनों में करवाया गया था.
दोनों मीनारों का डिज़ाइन काफी मौलिक है जो उन्हें उस समय दुनिया के दूसरों हिस्से में मौजूद मीनारों से अलग बनाता था.
इन मीनारों का बाहरी हिस्सा और आधार ममलूक शैली में बना है जबकि अंदरूनी मूल भाग फ़ातिमी शैली में बना है.
मस्जिद का मुख्य भाग और मीनारें पत्थर से बनी हैं, जबकि बाकी संरचना में ईंट का इस्तेमाल किया गया है.
इसमें कुल तेरह दरवाज़े हैं और आंगन के बीचों-बीच पानी का स्रोत मौजूद है.
मोदी विदेश में कब-कब मस्जिद गए?
ऐसा पहली बार नहीं है जब पीएम मोदी किसी विदेश दौरे के बीच मस्जिद जा रहे हैं.
इससे पहले मोदी ओमान से लेकर संयुक्त अरब अमीरात के दौरों पर मस्जिद में जा चुके हैं.
शेख ज़ायद मस्जिद: अगस्त 2015 में मोदी संयुक्त अरब अमीरात के दो दिवसीय दौरे पर गए थे.
इस यात्रा के पहले दिन मोदी ऐतहासिक शेख ज़ायद मस्जिद भी गए थे.
तब मोदी के साथ यूएई के तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री शेख हमदान बिन मुबारक अल नाहयान भी मौजूद थे.
सुल्तान कबूस मस्जिद: फ़रवरी 2018 में मोदी पश्चिमी एशिया में जॉर्डन, फलस्तीन, यूएई और ओमान के दौरे पर गए थे.
इस दौरान मोदी ओमान की राजधानी मस्कट में मौजूद सुल्तान कबूस मस्जिद भी गए थे.
ये ओमान की सबसे बड़ी मस्जिद है, जिसे भारतीय बालू पत्थर से बनाया गया है.
चूलिया मस्जिद: मई-जून 2018 में मोदी ने तीन देशों का दौरा किया था.
ये देश हैं- इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर. सिंगापुर की यात्रा के दौरान मोदी पहले श्री मरियम्मां मंदिर पहुंचे थे और फिर चूलिया मस्जिद पहुंचे थे.
इस मस्जिद का निर्माण चूलिया मुस्लिम समुदाय ने करवाया था जो तमिल मुसलमानों का एक समुदाय है.
इस्तिकलाल मस्जिद: ये मस्जिद इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में मौजूद दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है.
मई 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मस्जिद में पहुंचे थे और उनके साथ इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति जोको विडोडो मौजूद थे.
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