बाबरी मस्जिद को लेकर जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल का क्या था नज़रिया

सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू

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बाबरी मस्जिद को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयान को लेकर कांग्रेस नेताओं की ओर से तीख़ी प्रतिक्रिया के बाद ये विवाद और तेज़ हो गया है.

मंगलवार को राजनाथ सिंह ने गुजरात में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि देश के पहले प्रधानमंत्री 'जवाहरलाल नेहरू सार्वजनिक धन से बाबरी मस्जिद बनवाना चाहते थे, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल ने उनकी योजना सफल नहीं होने दी.'

विपक्ष के कई नेताओं ने रक्षा मंत्री के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत करने और असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है.

साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में राम मंदिर के निर्माण की मंज़ूरी दी थी और अभी पिछले 25 नवंबर को ही ध्वजारोहण कार्यक्रम हुआ जिसके साथ ही मंदिर निर्माण के पूरा होने की बात कही गई.

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राजनाथ सिंह ने क्या कहा था?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मंगलवार को गुजरात में सरदार वल्लभ भाई पटेल के 150वें जन्मदिवस पर एक कार्यक्रम में बोल रहे थे.

उन्होंने कहा, "जब पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरकारी खजाने से पैसा खर्च करके बाबरी मस्जिद बनवाने की चर्चा छेड़ी थी तो उसका भी विरोध सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया था. उस समय उन्होंने सरकारी पैसे से बाबरी मस्जिद नहीं बनने दिया."

राजनाथ सिंह ने कहा, "फिर नेहरू जी ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण का मुद्दा उठाया तो सरदार पटेल ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा कि सोमनाथ मंदिर का मामला अलग है, वहां 30 लाख रुपये जनता ने दान दिए हैं, ट्रस्ट बनाया है और सरकार का एक भी पैसा नहीं खर्च हुआ है."

उन्होंने कहा, "इसी तरह अयोध्या में आज जो भव्य राम मंदिर बनकर तैयार हुआ है, उसमें सरकार के खजाने से एक पैसा खर्च नहीं हुआ है."

"सारा खर्च देश की जनता ने दिया है. यही पंथनिरपेक्षता और सेक्युलरिज़्म की परिभाषा है और सरदार पटेल ने इसे व्यवहार में उतारा."

कांग्रेस की तीखी प्रतिक्रिया

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राजनाथ सिंह के बयान पर कांग्रेस और विपक्ष के नेताओं की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं.

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि अगर उनके पास सबूत है तो उसे सामने लाएं और सबको बताएं."

कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने पूछा, "उन्हें ये सूचनाएं कहां से मिलती हैं. वो रक्षा मंत्री हैं, मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. उन्हें एक गंभीर राजनेता माना जाता है."

"इसलिए उन्हें वो सम्मान बनाए रखना चाहिए कि जब भी आप इस तरह के बयान दें, ख़ासकर ऐतिहासिक संदर्भ में, तो आपके पास तथ्यात्मक सबूत ज़रूर होने चाहिए."

कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, "मुझे रक्षा मंत्री की ओर से ऐसे बयान की उम्मीद नहीं थी...उनसे पास इसके कोई सबूत नहीं हैं लेकिन हमारे पास इस बात का सबूत है कि 800 साल पुराने झंडेवालान मंदिर को आरएसएस की पार्किंग के लिए ढहा दिया गया...राजनाथ सिंह को हमारी सलाह है कि वो प्रधानमंत्री के क़दमों पर न चलें."

बीजेपी के राज्यसभा सदस्य और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने बुधवार को पार्टी मुख्यालय में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "राजनाथ सिंह ने जो कहा, उसका स्रोत 'इनसाइड स्टोरी ऑफ सरदार पटेल, डायरी ऑफ मणिबेन पटेल' नाम की किताब है."

त्रिवेदी ने कहा कि किताब के 24वें पेज पर लिखा है, "नेहरू ने भी बाबरी मस्जिद का सवाल उठाया था, लेकिन सरदार पटेल ने स्पष्ट कर दिया था कि सरकार मस्जिद बनवाने पर कोई पैसा खर्च नहीं कर सकती."

प्रेसवार्ता के दौरान त्रिवेदी ने पुस्तक के कुछ अंश पढ़ते हुए कहा, "उन्होंने (पटेल ने) नेहरू से कहा कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रश्न बिल्कुल अलग है, क्योंकि इस उद्देश्य के लिए ट्रस्ट बनाया गया है और लगभग 30 लाख रुपये एकत्र किए गए हैं."

बाबरी मस्जिद का ज़िक्र करते नेहरू के पत्र

जवाहरलाल नेहरू

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इमेज कैप्शन, 22 दिसंबर 1949 में बाबरी मस्जिद के मुख्य परिसर में मूर्तियां रखे जाने को लेकर नेहरू काफ़ी नाराज़ थे.

इंडियन एक्सप्रेस ने नेहरु आर्काइव्स के आधार पर नेहरू के उन पत्रों का उल्लेख किया है जो 1949 में बाबरी मस्जिद के बारे में लिखे गए थे.

इसके अनुसार, 22 दिसंबर 1949 को कुछ लोग अयोध्या के बाबरी मस्जिद परिसर में घुसे और केंद्रीय गुंबद के नीचे भगवान राम और सीता की मूर्ति रख दी.

अखबार के मुताबिक इस बात से खिन्न नेहरू ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत समेत कई नेताओं को पत्र लिखा. ये सभी पत्र द नेहरू आर्काइव्स में मौजूद हैं.

नेहरू का मानना था कि अयोध्या की स्थिति का असर कश्मीर मुद्दे पर और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान के साथ भारत के व्यवहार पर पड़ेगा. वह उस समय के अयोध्या के ज़िला मजिस्ट्रेट केके नैयर से भी नाराज़ थे, जिन्होंने मूर्तियाँ हटाने से इनकार कर दिया था.

26 दिसंबर 1949 को, मूर्तियाँ रखे जाने के तुरंत बाद, नेहरू ने पंत को एक तार भेजा, "अयोध्या की घटनाओं से मैं परेशान हूँ. आशा है कि आप व्यक्तिगत रूप से इस मामले में दिलचस्पी लेंगे. वहाँ एक ख़तरनाक उदाहरण पेश हो रहा है जो बुरे नतीजे देगा."

फरवरी 1950 में, उन्होंने पंत को एक और पत्र लिखा, "अगर आप मुझे अयोध्या की स्थिति से अवगत कराते रहें तो मुझे खुशी होगी. जैसा कि आप जानते हैं, मैं इसे बहुत अहमियत देता हूँ और इसके पूरे भारत पर, खासकर कश्मीर पर असर को भी गंभीरता से देखता हूँ."

उन्होंने यह भी पूछा कि क्या उन्हें खुद अयोध्या जाना चाहिए, जिस पर पंत ने जवाब दिया कि "अगर समय सही होता तो मैं खुद आपको अयोध्या जाने को कहता."

एक महीने बाद, गांधीवादी केजी मशरूवाला को लिखे पत्र में उन्होंने कहा, "आपने अयोध्या मस्जिद का ज़िक्र किया है. यह घटना दो या तीन महीने पहले हुई और मैं इसको लेकर बहुत गंभीर रूप से परेशान रहा हूँ."

"यूपी सरकार ने बहादुरी का दिखावा किया, लेकिन असल में बहुत कम किया… पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने कई मौकों पर इस कृत्य की निंदा की, लेकिन ठोस कार्रवाई से इसलिए रुके रहे क्योंकि उन्हें बड़े पैमाने पर दंगे का डर था…मैं पूरी तरह यक़ीन रखता हूँ कि अगर हमारी तरफ़ से व्यवहार ठीक होता, तो पाकिस्तान से निपटना कहीं आसान होता."

उन्होंने अपनी लाचारी भी जताई, "मुझे नहीं पता कि देश में बेहतर माहौल कैसे बनाया जाए. सिर्फ़ सद्भाव की बात करना लोगों को चिढ़ाता है. बापू शायद कर सकते थे, लेकिन हम इस तरह की बातों के लिए बहुत छोटे हैं."

जुलाई 1950 में, उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री को लिखा, "हम फिर किसी तरह की तबाही की तरफ़ बढ़ रहे हैं....जैसा कि आप जानते हैं, अयोध्या में बाबरी मस्जिद का मामला हमारे लिए एक बड़ा मुद्दा है और हमारी पूरी नीति और प्रतिष्ठा को गहराई से प्रभावित करता है."

"लेकिन इसके अलावा, लगता है कि अयोध्या की हालत बद से बदतर हो गई है. यह भी संभव है कि ऐसी परेशानी मथुरा और अन्य जगहों पर भी फैल जाए."

इससे पहले, अप्रैल में, उन्होंने पंत को एक लंबा पत्र लिखा, "मैं लंबे समय से महसूस कर रहा हूँ कि यूपी का पूरा माहौल साम्प्रदायिक नज़रिए से बिगड़ रहा है."

"सच तो यह है कि यूपी मेरे लिए लगभग एक पराई ज़मीन बनता जा रहा है. मैं वहाँ फिट नहीं होता… यूपी कांग्रेस कमेटी, जिसके साथ मैं 35 साल से जुड़ा हूँ, अब जिस तरह काम करती है वह मुझे हैरान करता है…"

"सदस्य, जैसे विश्वंभर दयाल त्रिपाठी, लिखने और बोलने का ऐसा दुस्साहस रखते हैं जो हिंदू महासभा के किसी सदस्य के लिए भी आपत्तिजनक होता."

सरदार पटेल का बाबरी मस्जिद मुद्दे पर रुख़

पटेल

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इमेज कैप्शन, सरदार पटेल ने इस मामले को शांतिपूर्वक सुलझाने की बात की थी.

नेहरू की तरह, पटेल ने भी मूर्तियां रखे जाने के बाद पंत को पत्र भेजा (संदर्भ: सरदार पटेल्स कॉरस्पॉन्डेंस, वॉल्यूम 9, संपादक दुर्गा दास).

"प्रधानमंत्री ने आपको पहले ही एक तार भेजा है जिसमें उन्होंने अयोध्या की घटनाओं पर चिंता जताई है. मैंने भी लखनऊ में आपसे इस पर बात की थी. मुझे लगता है कि यह विवाद बेहद अनुचित समय पर उठाया गया है…"

उन्होंने लिखा, "व्यापक साम्प्रदायिक मुद्दों को हाल में ही विभिन्न समुदायों की आपसी सहमति से सुलझाया गया है. जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, वे अभी अपने नए परिवेश में स्थिर हो रहे हैं."

"हम कह सकते हैं कि विभाजन का पहला झटका और उसकी अनिश्चितताएं अब कम हो रही हैं और यह भी कि बड़े पैमाने पर वफ़ादारियों के बदलाव की संभावना कम है."

उन्होंने आगे कहा, "…मेरा मानना है कि इस मुद्दे को आपसी सहनशीलता और सद्भाव की भावना में शांतिपूर्वक सुलझाया जाना चाहिए. मैं समझता हूँ कि जो कदम उठाया गया है उसके पीछे गहरा भावनात्मक तत्व है."

"लेकिन ऐसी बातें तभी शांतिपूर्वक हल हो सकती हैं जब हम मुस्लिम समुदाय की स्वेच्छा को अपने साथ लें. ज़बरदस्ती से ऐसे विवाद नहीं सुलझाए जा सकते. उस स्थिति में कानून और व्यवस्था की ताक़तों को हर हाल में शांति बनाए रखनी पड़ेगी."

"अगर इसलिए शांत और समझाने वाले तरीक़ों को अपनाना है, तो किसी भी आक्रामक या दबाव आधारित एकतरफा कार्रवाई को स्वीकार नहीं किया जा सकता."

"मैं पूरी तरह यक़ीन रखता हूँ कि इस मुद्दे को इतना जीवंत नहीं बनाया जाना चाहिए और मौजूदा अनुचित विवादों को शांतिपूर्ण तरीक़े से हल किया जाना चाहिए. जो काम हो चुका है उसे आपसी समझदारी की राह में बाधा नहीं बनने देना चाहिए."

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