#SardarVallabhbhaiPatel को छोड़कर गांधी ने नेहरू को अंतरिम प्रधानमंत्री क्यों बनवाया?

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- Author, दयाशंकर शुक्ल सागर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक, बीबीसी हिंदी के लिए
महात्मा गांधी अगर कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में हस्तक्षेप न करते तो सरदार वल्लभ भाई पटेल स्वतंत्र पहली भारतीय सरकार के अंतरिम प्रधानमंत्री होते.
जिस समय आज़ादी मिली, पटेल 71 साल के थे जबकि नेहरू सिर्फ 56 साल के. देश उस वक्त बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा था.
जिन्ना पाकिस्तान की जिद पर अड़े थे. ब्रितानी हुकूमत ने कांग्रेस को अंतरिम सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था.
कांग्रेस चाहती थी कि देश की कमान पटेल के हाथों में दी जाए क्योंकि वे जिन्ना से बेहतर मोलभाव कर सकते थे, लेकिन गांधी ने नेहरू को चुना.
राजेन्द्र प्रसाद जैसे कुछ कांग्रेस नेताओं ने ज़रूर खुलकर कहा कि 'गांधीजी ने ग्लैमरस नेहरू के लिए अपने विश्वसनीय साथी का बलिदान कर दिया' लेकिन ज्यादातर कांग्रेसी ख़ामोश रहे. बापू ने देश की बागडोर सौंपने के लिए नेहरू को ही क्यों चुना?
आज़ादी के 77 के बाद भी यह सवाल भारत की राजनीति में हमेशा चर्चा में रहा है.
इसका कारण को तलाशने के लिए हमें ब्रिटिश राज के अंतिम वर्षों की राजनीति और गांधी के साथ नेहरू और पटेल के रिश्तों की बारीकियों समझना होगा.

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विरोधी से गांधी भक्त बने थे पटेल
वल्लभ भाई पटेल से गांधी की मुलाकात नेहरू से पहले हुई थी. उनके पिता झेवर भाई ने 1857 के विद्रोह में हिस्सा लिया था. तब वे तीन साल तक घर से गायब रहे थे.
1857 के विद्रोह के 12 साल बाद गांधी जी का जन्म हुआ और 18 साल बाद 31 अक्टूबर 1875 में पटेल का यानी पटेल गांधी से केवल छह साल छोटे थे जबकि नेहरू पटेल से 14-15 साल छोटे थे.
उम्र में छह साल का फर्क कोई ज्यादा नहीं होता इसलिए गांधी और पटेल के बीच दोस्ताना बर्ताव था. पटेल लंदन के उसी लॉ कॉलेज मिडिल टेंपल से बैरिस्टर बनकर भारत लौटे, जहाँ से गांधी, जिन्ना, उनके बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल और नेहरू ने बैरिस्टर की डिग्रियां ली थीं.
उन दिनों वल्लभभाई पटेल गुजरात के सबसे महँगे वकीलों में से एक हुआ करते थे. पटेल ने पहली बार गाँधी को गुजरात क्लब में 1916 में देखा था.
गांधी साउथ अफ़्रीका में झंडे गाड़ने के बाद पहली दफ़ा गुजरात आए थे. देश में जगह-जगह उनका अभिनंदन हो रहा था. उन्हें कुछ लोग 'महात्मा' भी कहने लगे थे लेकिन पटेल गांधी के इस 'महात्मापन' ने जरा भी प्रभावित नहीं थे. वो उनके विचारों से बहुत उत्साहित नहीं थे.
पटेल कहते थे, ''हमारे देश में पहले से महात्माओं की कमी नहीं है. हमें कोई काम करने वाला चाहिए. गांधी क्यों इन बेचारे लोगों से ब्रह्मचर्य की बातें करते हैं? ये ऐसा ही है जैसे भैंस के आगे भागवत गाना.'' (विजयी पटेल, बैजनाथ, पेज 05)
साल 1916 की गर्मियों में गांधी गुजरात क्लब में आए. उस समय पटेल अपने साथी वकील गणेश वासुदेव मावलंकर के साथ ब्रिज खेल रहे थे.
मावलंकर गांधी से बहुत प्रभावित थे. वो गांधी से मिलने को लपके. पटले ने हंसते हुए कहा, ''मैं अभी से बता देता हूं कि वो तुमसे क्या पूछेगा? वो पूछेगा- गेहूं से छोटे कंकड़ निकालना जानते हो कि नहीं? फिर वो बताएगा कि इससे देश को आज़ादी किन तरीकों से मिल सकती है.''
लेकिन बहुत जल्द ही पटेल की गांधी का लेकर धारणा बदल गई.
चंपारण में गांधी के जादू का उन पर जबरदस्त असर हुआ. वो गांधी से जुड़ गए. खेड़ा का आंदोलन हुआ तो पटेल गांधी के और करीब आ गए.
असहयोग आंदोलन शुरू हुआ तो पटेल अपनी दौड़ती हुई वकालत छोड़ कर पक्के गांधी भक्त बन गए और इसके बाद हुआ बारदोली सत्याग्रह जिसमें पटेल पहली बार सारे देश में मशहूर हो गए.
ये 1928 में एक प्रमुख किसान आंदोलन था. प्रांतीय सरकार ने किसानों के लगान में 30 फ़ीसदी की बढ़ोतरी कर दी. पटेल इस आंदोलन के नेता बने और ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा.
इसी आंदोलन के बाद पटेल को गुजरात की महिलाओं ने 'सरदार' की उपाधि दी. 1931 के कांग्रेस के कराची अधिवेशन में पटेल पहली और आखिरी बार पार्टी के अध्यक्ष चुने गए. पहली बार वह 'गुजरात के सरदार' से 'देश के सरदार' बन गए.
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नेहरू का चुनाव
देश को 15 अगस्त 1947 को आज़ाद होना था लेकिन उससे एक साल पहले ब्रिटेन ने भारतीय हाथों में सत्ता दे दी थी. अंतरिम सरकार बननी थी.
तय हुआ था कि कांग्रेस का अध्यक्ष ही प्रधानमंत्री बनेगा. उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे. वो पिछले छह साल से इस पद पर थे. अब उनके जाने का वक्त हो गया था.
तब तक गांधी, नेहरू के हाथ में कांग्रेस की कमान देने का मन बना चुके थे. 20 अप्रैल 1946 को उन्होंने मौलाना को पत्र लिखकर कहा कि वे एक वक्तव्य जारी करें कि अब 'वह अध्यक्ष नहीं बने रहना चाहते हैं.'
गांधी ने बिना लागलपेट पर ये भी साफ़ कर दिया कि 'अगर इस बार मुझसे राय मांगी गई तो मैं जवाहरलाल को पसंद करूंगा, इसके कई कारण हैं. उनका मैं ज़िक्र नहीं करना चाहता.' (कलेक्टट वर्क्स खंड 90 पेज 315)
इस पत्र के बाद पूरे कांग्रेस में ख़बर फैल गई कि गांधी नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं. 29 अप्रैल 1946 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी का नया अध्यक्ष चुना जाना था जिसे कुछ महीने बाद ही अंतरिम सरकार में भारत का प्रधानमंत्री बनना था.
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इस बैठक में महात्मा गांधी के अलावा नेहरू, सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान के साथ कई बड़े कांग्रेसी नेता शामिल थे.
कमरे में बैठा हर शख़्स जानता था कि गांधी नेहरू को अध्यक्ष देखना चाहते हैं.
परपंरा के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव प्रांतीय कांग्रेस कमेटियाँ करती थीं और 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित किया था. बची हुई तीन कमेटियों ने आचार्य जेबी कृपलानी और पट्टाभी सीतारमैया का नाम प्रस्तावित किया था.
किसी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने अध्यक्ष पद के लिए नेहरू का नाम प्रस्तावित नहीं किया था जबकि सारी कमेटियाँ अच्छी तरह जानती थी कि गांधी नेहरू को चौथी बार अध्यक्ष बनाना चाहते हैं.
पार्टी के महासचिव कृपलानी ने पीसीसी के चुनाव की पर्ची गांधी की तरफ बढ़ा दी. गांधी ने कृपलानी की तरफ देखा. कृपलानी समझ गए कि गाँधी क्या चाहते हैं. उन्होंने नया प्रस्ताव तैयार कर नेहरू का नाम प्रस्तावित किया. उस पर सबने दस्तख़त किए. पटेल ने भी दस्तख़त किए. अब अध्यक्ष पद के दो उम्मीदवार थे. एक नेहरू और दूसरे पटेल.

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नेहरू तभी निर्विरोध अध्यक्ष चुने जा सकते थे जब पटेल अपना नाम वापस लें. कृपलानी ने एक कागज पर उनकी नाम वापसी की अर्जी लिखकर दस्तख़त के लिए पटेल की तरफ बढ़ा दी.
मतलब साफ था-चूंकि गांधी चाहते हैं नेहरू अध्यक्ष बनें इसलिए आप अपना नाम वापस लेने के कागज पर साइन कर दें लेकिन आहत पटेल ने दस्तख़त नहीं किए और उन्होंने ये पुर्जा गांधी की तरफ बढ़ा दिया.
गांधी ने नेहरू की तरफ़ देखा और कहा, ''जवाहर वर्किंग कमेटी के अलावा किसी भी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने तुम्हारा नहीं सुझाया है. तुम्हारा क्या कहना है?''
नेहरू ख़ामोश रहे. वहां बैठे सारे लोग ख़ामोश थे. गांधी को शायद उम्मीद थी कि नेहरू कहेंगे, तो ठीक है आप पटेल को ही मौका दें. लेकिन नेहरू ने ऐसा कुछ नहीं कहा. अब अंतिम फैसला गांधी को करना था.
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गांधी ने वो कागज फिर पटेल को लौटा दिया. इस बार सरदार ने उस पर दस्तख़त कर दिए. कृपलानी ने ऐलान किया,''तो नेहरू निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाते हैं.''
कृपलानी ने अपनी किताब 'गांधी हिज़ लाइफ एंड थाटॅ्स' में इस पूरी घटना का विस्तार से ज़िक्र किया है.
उन्होंने लिखा है, ''मेरा इस तरह हस्तक्षेप करना पटेल को अच्छा नहीं लगा. पार्टी का महासचिव होने के नाते में गाँधी की मर्ज़ी का काम यंत्रवत कर रहा था और उस वक्त मुझे ये बहुत बड़ी चीज नहीं लगी. आख़िर ये एक अध्यक्ष का ही तो चुनाव था.''
''मुझे लगा अभी बहुत सी लड़ाइयाँ सामने हैं. लेकिन भविष्य कौन जानता है? मालूम होता है ऐसी तुच्छ घटनाओं से ही किसी व्यक्ति या राष्ट्र की किस्मत पर निर्भर होती है.

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गांधी ने ऐसा क्यों किया?
ये महात्मा गांधी ही कर सकते थे. कांग्रेस का अध्यक्ष कौन बनेगा, ये फ़ैसला एक ऐसा आदमी कर रहा था जो 12 साल पहले ही कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दे चुका था लेकिन कांग्रेसियों के लिए ये बड़ी बात नहीं थी क्योंकि साल 1929, 1936, 1939 के बाद ये चौथा मौका था जब पटेल ने गाँधीजी के कहने पर अध्यक्ष पद से अपना नामांकन वापस लिया था. सब हक्का-बक्का रह गए.
तब के जाने-माने पत्रकार दुर्गादास ने अपनी किताब 'इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू' में लिखा है, ''राजेन्द्र प्रसाद ने मुझसे कहा कि 'गांधीजी ने ग्लैमरस नेहरू के लिए अपने विश्वसनीय साथी का बलिदान कर दिया. और मुझे डर है कि अब नेहरू अंग्रेज़ों के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे.''
''राजेन्द्र बाबू की ये प्रतिक्रिया जब मैंने गाँधी जी को बताई तो वे हँसे और उन्होंने राजेन्द्र की सराहना करते हुए कहा कि नेहरू आने वाली ढेर सारी समस्याओं का सामना करने के लिए ख़ुद को तैयार कर चुके हैं.''
तो सवाल है इतने विरोधों के बावजूद गांधी ने पटेल की जगह नेहरू को क्यों चुना?
जैसे कि गांधी ने कहा था कि उनके पास इसकी कई वजहें हैं लेकिन वे वजहें न किसी ने उनसे पूछी न उन्होंने किसी को बताईं. कांग्रेस में तो किसी में हिम्मत नहीं थी कि वह बापू से पूछे कि सरदार पटेल जैसे योग्य नेता को छोड़कर आपने नेहरू को क्यों चुना?

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सब जानते थे कि पटेल के पाँव ज़मीन पर मजबूती से स्थापित हैं. वो जिन्ना जैसे लोगों से उन्हीं की ज़ुबान में मोलभाव कर सकते हैं.
उनसे जब पत्रकार दुर्गादास ने ये सवाल पूछा तो 'गांधी ने माना कि बतौर कांग्रेस अध्यक्ष पटेल एक बेहतर 'नेगोशिएटर' और 'ऑर्गनाइज़र' हो सकते हैं. लेकिन उन्हें लगता है कि नेहरू को सरकार का नेतृत्व करना चाहिए.''
जब दुर्गादास ने गांधी से पूछा कि आप ये गुण पटेल में क्यों नहीं पाते हैं? तो इस पर गांधी ने हंसते हुए कहा, "जवाहर हमारे कैम्प में अकेला अंग्रेज़ है.''
गांधी को लगा कि दुर्गादास उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हैं तो उन्होंने कहा, ''जवाहर दूसरे नम्बर पर आने के लिए कभी तैयार नहीं होंगे. वो अंतराष्ट्रीय विषयों को पटेल के मुकाबले अच्छे से समझते हैं. वो इसमें अच्छी भूमिका निभा सकते हैं. ये दोनों सरकारी बेलगाड़ी को खींचने के लिए दो बैल हैं. इसमें अंतरराष्ट्रीय कामों के लिए नेहरू और राष्ट्र के कामों के लिए पटेल होंगे. दोनों गाड़ी अच्छी खींचेंगे."
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गांधी के इस प्रेस इंटरव्यू से दो बातें निकल कर आईं. एक ये कि नेहरू नम्बर-2 नहीं होना चाहते थे जबकि गांधी को भरोसा था कि पटेल को नम्बर-2 होने में कोई एतराज़ नहीं होगा और वाकई ऐसा ही हुआ क्योंकि पटेल मुंह फुलाने की बजाए एक हफ्ते के अंदर फिर न केवल सामान्य हो गए बल्कि हंसी-मज़ाक करने लगे.
उनकी बातों पर हँसने वालों में खुद गांधी भी शामिल थे. दूसरी बात ये कि गांधी को लगता कि अपनी अंग्रेज़ियत के कारण सत्ता हस्तांतरण को नेहरू पटेल के मुकाबले ज्यादा बेहतर ढंग से संभाल सकते हैं.
महात्मा गांधी ने एक और मौके पर भी यही बात कही थी कि 'जिस समय हुकूमत अंग्रेजों के हाथ से ली जा रही हो, उस समय कोई दूसरा आदमी नेहरू की जगह नहीं ले सकता. वे हैरो के विद्यार्थी, कैम्ब्रिज के स्नातक और लंदन के बेरिस्टर होने के नाते अंग्रेज़ों को बेहतर ढंग से संभाल सकते हैं.' (महात्मा, तेंदुलकर खंड 8 पेज 3)
यहाँ गांधी सही थे. बाहर की दुनिया में नेहरू का नाम आजादी की लड़ाई में गांधी के बाद दूसरे नम्बर पर था. न केवल यूरोपीय लोग बल्कि अमरीकी भी नेहरू को महात्मा गांधी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानते थे जबकि पटेल के बारे ऐसा बिल्कुल नहीं था.
पटेल को शायद ही कोई विदेशी गाँधी का उत्तराधिकारी मानता हो. लंदन के कहवा घरों में बुद्धिजीवियों के बीच नेहरू की चर्चा होती थी. तमाम वायसराय और क्रिप्स समेत कई अंग्रेज अफसर नेहरू के दोस्त थे. उनसे नेहरू की निजी बातचीत होती थी.
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नेहरू से उलट थे पटेल
दोनों में और भी बड़े अंतर थे जो राजनीति में बहुत मायने रखते हैं. नेहरू एक आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे. उन्हें अंग्रेज़ी और हिन्दी में बोलने और लिखने की कमाल की महारत हासिल थी. नेहरू उदार थे और उनका खुलापन उन्हें लोकप्रिय बनाता था.
वो भावुक और सौदर्यप्रेमी थे जो किसी को भी रिझा सकते थे. इसके उलट पटेल सख़्त और थोड़े रुखे थे. वो व्यवहार कुशल थे लेकिन उतने ही मुंहफट भी. दिल के ठंडे लेकिन हिसाब-किताब में माहिर.
नेहरू जोड़तोड़ में बिलकुल माहिर नहीं थे. वे कांग्रेस में भी अलग-थलग रहने वाले नेता थे. जेल में बंद रहकर वे अपने साथी कांग्रेसियों से गपशप करने की जगह अपनी कोठरी में अकेले बैठ कर 'डिस्कवरी आफ इंडिया' जैसी किताबें लिखते थे. उनकी अभिजात्य वर्ग की अपनी एक अलग दुनिया थी.
वहीं, पटेल राजनीतिक तंत्र का हर पुर्जा पहचानते थे. जोड़-तोड़ करने में महिर थे. यही वजह थी कि प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी में उन्हें 15 में से 2 कमेटियों का समर्थन मिला.
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नेहरू कमाल के वक्ता थे जबकि पटेल को भाषणबाजी से चिढ़ थी. वे दिल से और साफ साफ बोलते थे. ऐसा नहीं था कि मुसलमानों को लेकर उनके मन में आरएसएस जैसी कोई वितृष्णा या पूर्वाग्रह था लेकिन खरा-खरा बोलने के कारण वह देश के मुसलमानों में नापसंद किए जाने लगे.
नेहरू समाजवाद के मसीहा थे तो पार्टी के लिए चंदा इकट्ठा करने वाले पटेल पूंजीवादियों के संरक्षक.
नेहरू आधुनिक हिन्दुस्तान और धर्मनिरपेक्ष भारत का सपना देखते थे तो पटेल राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते थे. हिंदू और हिंदू परम्परा को लेकर उनके मन में कोमल भावनाएं थीं जो वक्त-बेवक्त उन्हें उत्तेजित कर देती थीं.
नेहरू में एक पैनी राजनीतिक अन्तर्दृष्टि थी, बावजूद इसके वे स्वाभाविक रूप से भावुक और जरूरत से ज्यादा कल्पनाशील थे.

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जब नेहरू की चूक से बिगड़ गई बात
नेहरू के अध्यक्ष चुने जाने साल की ही दो घटनाएं हैं जो नेहरू और पटेल के व्यक्तित्व को बखू़बी उजागर करती हैं.
कांग्रेस और लीग, दोनों कैबिनेट मिशन की योजना तकरीबन कबूल कर चुकी थी. अगले महीने अंतरिम सरकार बननी थी, जिसमें दोनों के प्रतिनिधि शामिल होने वाले थे यानी देश का विभाजन टलता हुआ दिख रहा था.
ये बात अलग थी कि कांग्रेस और लीग दोनों अपने हिसाब से कैबिनेट मिशन की योजना का मतलब निकाल रहे थे. ऐसे माहौल में नेहरू ने सात जुलाई 1946 को कांग्रेस कमेटी की बैठक बुलाई जिसमें उन्होंने साफ़ कर दिया कि कांग्रेस के हिसाब से इस योजना में क्या है.
कांग्रेस मानती थी कि चूँकि प्रांतों को किसी समूह में रहने या न रहने की आज़ादी होगी. इसलिए ज़ाहिर है कि उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और असम, जहाँ कांग्रेस की सरकारें हैं, वो पाकिस्तान के बजाय हिंदुस्तान वाले समूह से जुड़ना चाहेंगे.
जिन्ना कांग्रेस की इस व्याख्या से कतई सहमत नहीं थे. उनके अनुसार कैबिनेट मिशन योजना के तहत पश्चिम के चार और पूर्व के दो राज्यों का दो मुस्लिम-बहुल समूह का हिस्सा बनना बाध्यकारी था. बस यहीं सोच का अंतर था.
अभी समझदारी ये थी कि जैसा जो सोच रहा है, सोचे. पहले कांग्रेस और लीग मिलकर अंतरिम सरकार बनाएं. फिर जो जैसा होगा तब वैसा देखा जाएगा. लेकिन इसके तीन दिन बाद 10 जुलाई 1946 को नेहरू ने मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके कहा कि कांग्रेस ने संविधान सभा में शामिल होने का फैसला तो कर लिया है लेकिन अगर उसे ज़रूरी लगा तो वह कैबिनेट मिशन योजना में फेरबदल भी कर सकती है.
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नेहरूने एक बयान देकर कैबिनेट मिशन की सारी योजना को एक मिनट में ध्वस्त कर दिया. इससे अटूट भारत की आख़िरी उम्मीद पर पानी फिर गया.
नाराज़ जिन्ना को मौका मिल गया. उन्होंने भी एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई और साफ़ कह दिया कि कांग्रेस के इरादे नेक नहीं. अब अगर ब्रिटिश राज के रहते मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं दिया गया तो बहुत बुरा होगा.
मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त से डायरेक्ट एक्शन का एलान कर दिया. जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन का नतीजा भारी हिंसा होगी, ये कोई नहीं जानता था. लेकिन सरदार पटेल समझ रहे थे कि नेहरू से बड़ी भारी गलती हो गई. उनकी बात सही थी लेकिन इसका खुला एलान करने की ज़रूरत नहीं थी.
सरदार ने अपने करीबी मित्र और अपने निजी सचिव डीपी मिश्रा को एक ख़त लिखा,"हालांकि नेहरू अब तक चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने जा चुके हैं. लेकिन उनकी हरकतें मासूमियत से भरी लेकिन बचकानी होती हैं. उनकी ये प्रेस कान्फ्रेंस भावुकता से भरी और मूर्खतापूर्ण थी.''
''लेकिन उनकी इन उनकी तमाम मासूम गलतियों के बावजूद उनके अंदर आज़ादी के लिए गजब का जज़्बा और उत्साह है, जो उन्हें बेसब्र बना देता है जिसके चलते वे अपने आप को भूल जाते हैं. जरा-सा भी विरोध होने पर वे पागल हो जाते हैं क्योंकि वे उतावले हैं." (सरदार पटेल करस्पांडेंस पेज 153 )
नेहरू की पहाड़ जैसी भूल का नतीजा बहुत जल्द देश के सामने आ गया. जिन्ना के 'डायरेक्ट एक्शन' से देश में हिंदू- मुस्लिम दंगे भड़क गए. अकेले कलकत्ता शहर में हजारों लोग मारे गए, लाखों लोग बेघर हो गए. नोआखली में भी भारी कत्लेआम हुआ. धीरे-धीरे देश को इन दंगों ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया.
इसके बाद गांधी कलकत्ते से लेकर नोआखली और बिहार तक, दंगे में मारे गए हिन्दुओं और मुसलमानों के ख़ून को साफ करने की 24 घंटे की ड्यूटी पर लगे रहे. ये ड्यूटी आज़ादी मिलने के दिन तक जारी रही.
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तलवार के बदले तलवार उठाने की सलाह
जगह-जगह दंगे हो रहे थे. हिन्दू-मुसलमान मारे जा रहे थे. ऐसे में 'पटेल के हिन्दुत्व' ने उछाल मारा और 23 नवंबर 1946 को मेरठ में कांग्रेस के अधिवेशन में अपना आपा खो बैठे.
अधिवेशन में उन्होंने अपने भाषण में कह दिया, "धोखे से पाकिस्तान लेने की बात मत करो. हाँ अगर तलवार से लेना है तो उसका मुकाबला तलवार से किया जा सकता है.''( 54वां मेरठ कांग्रेस अधिवेशन, केपी जैन)
पटेल का बयान सनसनीखेज था. गांधी की अहिंसा नीति के एकदम उलट. गांधी तक शिकायत तुरंत पहुंच गई.
गांधी ने पटेल को लिखा, ''तुम्हारे बारे में बहुत सी शिकायतें सुनने में आई हैं. बहुत में अतिशयोक्ति हो तो वो, अनजाने में है. लेकिन तुम्हारे भाषण लोगों को खु़श करने वाले और उकसाने वाले होते हैं. तुमने हिंसा-अहिंसा का भेद नहीं रखा है. तुम लोगों को तलवार का जवाब तलवार से देना सिखा रहे हो. जब मौका मिलता है, मुस्लिम लीग का अपमान करने से नहीं चूकते.''
''यदि यह सब सच है तो बहुत हानिकारक है. पद से चिपटे रहने की बात करते हो, और यदि करते हो तो वह भी चुभने वाली चीज है. मैंने तुम्हारे बारे में जो सुना, वह विचार करने के लिए तुम्हारे सामने रखा है. यह समय बहुत नाज़ुक है. हम जरा भी पटरी से उतरे कि नाश हुआ समझो. कार्य-समिति में जो समस्वरता होनी, चाहिए वह नहीं है. गंदगी निकालना तुम्हें आता है; उसे निकालो."
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इसी पत्र में आगे गांधी ने पटेल को ये भी बता दिया कि वो बूढ़े हो गए हैं.
गांधी ने लिखा, ''मुझे और मेरा काम समझने के लिए किसी विश्वसनीय समझदार आदमी को भेजना चाहो तो भेज देना. तुम्हें दौड़कर आने की बिल्कुल जरूरत नहीं. तुम्हारा शरीर भाग-दौड़ के लायक नहीं रहा. शरीर के प्रति लापरवाह रहते हो, यह बिल्कुल ठीक नहीं है." (बापुना पत्रों 2 : सरदार वल्लभभाई ने, पृ. 341-43)
ये दो घटनाएं नेहरू और पटेल के व्यक्तित्व के बारे में बताने के लिए काफ़ी हैं. सच तो ये है कि गांधी 1942 में उस वक्त नेहरू को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुके थे जो दोनों के बीच मतभेद चरम पर थे.
तब गांधी ने कहा था, ''हमें अलग करने के लिए व्यक्तिगत भतभेद से कहीं अधिक ताकतवर शक्तियों की जरूरत होगी. कई वर्षों से मैं ये कहता आया हूं और आज भी कहता हूं कि जवाहरलाल मेरे उत्तराधिकारी होंगे. वे कहते हैं वो मेरी भाषा नहीं समझते और मैं उनकी. फिर भी मैं जानता हूं जब मैं नहीं रहूंगा तब वे मेरी ही भाषा बोलेंगे.'' (इंडियन एनुअल रजिस्टर भाग-1, 1942 पेज 282-283)
लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि गांधी पटेल से कम प्रेम करते थे.
आज न गांधी हैं, न नेहरू और न पटेल. वक्त का पहिया पूरी तरह से घूम गया है. आज नेहरू कटघरे में हैं और गुजरात में लगी लौह पुरुष पटेल की करीब 600 फीट ऊंची दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति इतिहास को पलट कर देख रही है.
कांग्रेस के महान नेता पटेल के 'हिन्दुत्व' पर उस आरएसएस ने कब्जा कर लिया है जिसे पटेल ने कभी प्रतिबंधित किया था.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'महात्मा गांधी : ब्रह्मचर्य के प्रयोग' के लेखक हैं.)
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