इसराइल-ईरान टकराव में कौन सा देश किसके साथ और भारत का क्या रुख़ है?

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ईरान ने एक अक्तूबर की रात इसराइल पर क़रीब 200 मिसाइलों से हमला किया है. इसराइल और हिज़्बुल्लाह के बीच जारी संघर्ष का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है.
इन हमलों के बाद अमेरिका ने स्पष्ट तौर पर इसराइल का समर्थन किया है. आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इस क्षेत्र में हालात बिगड़ सकते हैं.
बीते क़रीब एक साल से इसराइल हमास के बीच जंग चल रही है. इस कारण ग़ज़ा और वेस्ट बैंक में 40 हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान जा चुकी है.
हाल के दिनों में इसराइल ने हिज़्बुल्लाह को निशाना बनाना शुरू किया है. इसराइल लेबनान में ज़मीन के रास्ते भी आक्रमण कर रहा है.
इस बढ़ते संघर्ष पर अरब मुल्क़ के साथ ही दुनियाभर के कई देश स्पष्ट तौर पर बँटे हुए नज़र आ रहे हैं.

क़रीब दो महीने पहले हमास नेता इस्माइल हनिया की ईरान की राजधानी तेहरान में हत्या हुई थी.
हनिया 1980 के दशक से ही इस समूह के नेता रहे हैं.
बीती 28 सितंबर को हिज़्बुल्लाह ने इसराइली हमले में अपने नेता हसन नसरल्लाह की मौत की पुष्टि की थी, उसके बाद से मध्य-पूर्व में संघर्ष और गंभीर होता जा रहा है.
इसराइल हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर लेबनान में हमले जारी रखे हुए है और अब उसने हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर ज़मीन से सैन्य कार्रवाई भी शुरू कर दी है.
हनिया की मौत के बाद ईरान ने फौरन कोई सैन्य प्रतिक्रिया नहीं दी थी, लेकिन एक अक्तूबर के ईरान के मिसाइल हमलों ने मध्य-पूर्व के इस संघर्ष को बढ़ा दिया है.
इसराइल के ख़िलाफ़ इस्लामिक देशों को एकजुट करने के लिए ईरान ने पहले ही इन मुल्कों से इसराइल से व्यापार ख़त्म करने की अपील की थी.
दूसरी तरफ़ अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देश इसराइल के साथ खड़े हैं और इस युद्ध में उसकी मदद कर रहे हैं.
ईरान के ताज़ा हमलों के बाद नीदरलैंड्स के राजनेता और सांसद सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई से भिड़ते हुए दिखे.

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किसके साथ हैं अरब देश
अरब जगत के सुन्नी मुस्लिम बहुल देशों ने भले ही हिज़्बुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह के इसराइली हमले में मारे जाने की खुलकर निंदा न की हो लेकिन वो लेबनान की संप्रभुता की बात ज़रूर करते हैं.
सऊदी अरब
क़रीब 4 महीने पहले रफ़ाह के शरणार्थी कैंप पर इसराइल के जानलेवा हमले के बाद सऊदी अरब ने कहा था कि इसराइल को फ़लस्तीन का अस्तित्व स्वीकार करना होगा. सऊदी अरब के इस बयान को उस समय काफ़ी अहम माना जा रहा था.
सुन्नी नेतृत्व वाले सऊदी अरब ने हसन नसरल्ला की मौत के बाद पिछले हफ़्ते कहा था कि लेबनान में जो कुछ भी हो रहा है, वह गंभीर चिंता का विषय है. सऊदी ने लेबनान की संप्रभुता और उसकी सुरक्षा की बात कही. लेकिन सऊदी अरब ने नसरल्लाह का ज़िक्र नहीं किया.
जानकारों का मानना है कि सऊदी नेतृत्व को इसका अहसास है कि अगर उसने फ़लस्तीनियों के संघर्ष से मुँह मोड़ा तो इससे इलाक़े में और वैश्विक स्तर पर उसकी छवि पर असर पड़ेगा.
मक्का, मदीना के कारण सऊदी अरब मुसलमानों के लिए एक पवित्र जगह रही है. हर साल लाखों मुसलमान हज करने सऊदी अरब जाते हैं.
मुस्लिम देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कॉर्पोरेशन यानी ओआईसी का मुख्यालय सऊदी अरब में है और इसे सऊदी की अगुवाई वाला संगठन माना जाता है.
ऐसे में सऊदी अरब की नरमी से उसकी छवि को नुक़सान पहुंच सकता है.
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई)
सुन्नी नेतृत्व वाला देश संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) हसन नसरल्लाह की मौत और उसके बाद पैदा हुए हालात पर अब तक पूरी तरह ख़ामोश नज़र आ रहा है.
यूएई के अलावा क़तर और बहरीन भी इस मुद्दे पर चुप हैं.
हालांकि बहरीन, ओमान, क़तर, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत के खाड़ी के छह देशों वाले संगठन गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) ने बयान जारी कर लेबनान की संप्रभुता, सुरक्षा और स्थिरता का समर्थन किया है.
जीसीसी ने लेबनान-इसराइल सीमा पर तुरंत संघर्ष-विराम पर ज़ोर दिया है.
साथ ही बयान में ये भी कहा गया है कि कोई भी हथियार लेबनान की सरकार की अनुमति के बिना मौजूद न हो और वहां दूसरे किसी देश का प्रशासन भी न हो.

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इसराइल-फ़लस्तीन मुद्दे पर कौन किसके साथ
क़तर
मध्य-पूर्व में संघर्ष के मुद्दे पर क़तर सभी पक्षों से बातचीत कर संघर्ष को रोकने के पक्ष में रहा है.
हालाँकि उसका इसराइल के साथ कोई औपचारिक संबंध नहीं है.
मिस्र
नसरल्लाह की मौत के बाद मिस्र के राष्ट्रपति अब्दल फ़तेह अल-सीसी ने लेबनान के प्रधानमंत्री नाजिब मिकाती से फ़ोन पर बात की और उन्होंने नसरल्लाह का नाम लिए बिना कहा कि मिस्र लेबनान की संप्रभुता के उल्लंघन को नामंज़ूर करता है.
ईरान की प्रॉक्सीज़ और उसकी नीतियों को लेकर मिस्र उसके ख़िलाफ़ रहा है. हालांकि ईरान की सरकार से मिस्र की अनौपचारिक बातचीत होती रही है.
मिस्र के राष्ट्रपति ने नसरल्लाह के मारे जाने के बाद कहा था कि पूरा इलाक़ा मुश्किल हालात में है. उन्होंने कहा कि मिस्र चाहता है कि इस इलाक़े की स्थिरता और सुरक्षा हर हाल में सुनिश्चित हो.
जॉर्डन
अरब मुल्क जॉर्डन की सीमा वेस्ट बैंक से मिलती है और यहां फ़लस्तीनी शरणार्थियों की बड़ी संख्या रहती है.
इसराइल जब बना तो इस क्षेत्र की एक बड़ी आबादी भागकर जॉर्डन आ गई थी. इस युद्ध में जॉर्डन फ़लस्तीनियों के साथ खड़ा है और वह 'दो देशों' के सिद्धांत की बात करता है.
तुर्की
तुर्की और इसराइल में 1949 से ही राजनयिक संबंध हैं. इसराइल को मान्यता देने वाला पहला मुस्लिम बहुल देश तुर्की ही था.
हालांकि, तुर्की और इसराइल के बीच रिश्ते में साल 2002 के बाद से उतार-चढ़ाव रहे हैं. फ़लस्तीन के मुद्दे पर तुर्की हमेशा इसराइल पर हमलावर रहा है.

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भारत किसके साथ
इसराइल-ईरान संघर्ष के बीच भारत ने इन दोनों देशों में रह रहे अपने नागरिकों के लिए एडवाइज़री जारी की है. भारत इस मुद्दे पर शांतिपूर्ण समझौते के पक्ष में रहा है.
हालांकि भारत साल 1988 में फ़लस्तीनी राष्ट्र को मान्यता देने वाले पहले देशों में से एक था. लेकिन हाल के वर्षों में मध्य-पूर्व के हालात पर भारत किसी एक पक्ष की तरफ स्पष्ट तौर पर झुका नज़र नहीं आता है.
पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा में इसराइल के ख़िलाफ़ लाए गए एक प्रस्ताव में एक साल के अंदर ग़ज़ा और वेस्ट बैंक में इसराइली कब्ज़े को ख़त्म करने की बात कही गई थी.
ये प्रस्ताव इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस यानी आईसीजे की एडवाइज़री के बाद लाया गया था. 193 सदस्यों की संयुक्त राष्ट्र महासभा में 124 सदस्य देशों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया.
14 देशों ने इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोटिंग की और भारत समेत 43 देश इस वोटिंग से दूर रहे.
ब्रिक्स गुट में ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ़्रीका शामिल हैं. ब्रिक्स गुट में भारत एकमात्र देश है, जो वोटिंग से बाहर रहा था.

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पाकिस्तान किसके साथ
संयुक्त राष्ट्र में इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोटिंग करने वालों में अमेरिका, फिजी, हंगरी, अर्जेंटीना जैसे 14 देश शामिल रहे.
इस प्रस्ताव के पक्ष में वोटिंग करने वालों में पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, मलेशिया और रूस जैसे 124 देश शामिल रहे.
संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुई वोटिंग को संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीनी राजदूत रियाद मंसूर ने ''आज़ादी और इंसाफ़ की लड़ाई'' में अहम मोड़ बताया था.
इसराइल के राजदूत डैनी डेनन ने इस वोटिंग को शर्मनाक फ़ैसला बताया था.
भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान की बात करें तो हसन नसरल्लाह की मौत के बाद पाकिस्तान में लोगों ने इसराइल के ख़िलाफ़ उग्र प्रदर्शन किए थे.
ऐसे प्रदर्शन कश्मीर और लखनऊ में भी देखने को मिले थे.
7 अक्तूबर 2023 को हमास ने इसराइल पर बड़े पैमाने पर एक सुनियोजित हमला किया था.
हमले में क़रीब 1200 इसराइली मारे गए थे.
इसके बाद इसराइल ने ग़ज़ा में सैन्य कार्रवाई शुरू की थी. इसराइली कार्रवाई में अब तक ग़ज़ा और वेस्ट बैंक में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं.
इसराइली हमलों के कारण लेबनान में भी मरने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















