क्या सावरकर ने भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस को वाक़ई प्रभावित किया था?

    • Author, स्नेहा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

संसद हो या सड़क, विनायक दामोदर सावरकर का नाम किसी-न-किसी वजह से चर्चा में रहता है.

कभी ये चर्चा सावरकर की 140वीं जयंती के मौक़े पर भारत की संसद की नई इमारत के उद्घाटन से शुरू होती है.

सावरकर पर बहस तब भी शुरू हुई जब मानहानि केस में माफ़ी मांगने के सवाल पर राहुल गांधी ने कहा था, "मेरा नाम सावरकर नहीं है. मेरा नाम गांधी है, गांधी किसी से माफ़ी नहीं मांगता."

सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए सावरकर 'वीर' हैं, आदर्श व्यक्तित्व हैं, हिंदुत्व के सबसे बड़े सिद्धांतकार हैं.

'इंडिया' गठबंधन के अहम सहयोगी उद्धव ठाकरे की शिवसेना के लिए भी सावरकर अत्यंत सम्मानित शख्सियत हैं. दूसरी ओर, कांग्रेस सावरकर को पसंद नहीं करती जिसकी कई बड़ी ऐतिहासिक और वैचारिक वजहें हैं, कांग्रेस बार-बार याद दिलाती है कि उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत से कई बार माफ़ी मांगी थी.

सावरकर पर फ़िल्म 'स्वतंत्र वीर सावरकर'

28 मई यानी सावरकर जयंती के मौक़े पर फ़िल्म 'स्वतंत्र वीर सावरकर' का टीज़र जारी हुआ. इस बायोपिक में सावरकर की भूमिका में रणदीप हुड्डा हैं और फ़िल्म के डायरेक्टर भी वो ख़ुद ही हैं.

बायोपिक के टीजर में सुनाई देता है, "आज़ादी की लड़ाई 90 साल चली लेकिन ये लड़ाई कुछ लोगों ने ही लड़ी थी, बाकी सब तो सत्ता के भूखे थे."

गांधी की हत्या के मामले में सावरकर मुख्य अभियुक्तों में शामिल थे. हालांकि पर्याप्त सबूतों के अभाव में जज ने सावरकर को बरी कर दिया था.

अलग-अलग मुद्दों पर गांधी की आलोचना कोई नई बात नहीं है, लेकिन गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को 'देशभक्त' बताने का चलन नया है, इस सिलसिले में बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का बयान दिलचस्प है जिसके लिए प्रधानमंत्री ने कहा था कि वे उन्हें "दिल से माफ़ नहीं कर पाएँगे."

इसी की अगली कड़ी में फ़िल्म 'स्वतंत्र वीर सावरकर' के टीज़र में कहा गया है, "गांधी जी बुरे नहीं थे लेकिन अगर वो अपनी अहिंसावादी सोच पर अड़े नहीं रहते तो भारत 35 साल पहले ही आजाद हो जाता."

इतना ही नहीं, 'स्वतंत्र वीर सावरकर' के टीज़र में लिखा है, "सावरकर वो व्यक्ति थे, जिन्होंने भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और खुदीराम बोस को प्रेरित किया था."

रणदीप हुड्डा ने सावरकर का टीजर जारी करते हुए लिखा, "द मोस्ट वांटेड इंडियन बाय द ब्रिटिश. नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और खुदीराम बोस जैसे क्रांतिकारियों के प्रेरणास्रोत. वीर सावरकार कौन थे? उनकी सच्ची कहानी देखें."

इस टीज़र में किए दावों के बाद ये सवाल उठे कि क्या वाक़ई खुदीराम बोस, भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस सावरकर से प्रभावित थे?

क्या हैं तथ्य और सावरकर से जुड़े इन दावों पर इतिहासकारों का क्या कहना है? हम यही समझने की कोशिश कर रहे हैं.

भगत सिंह और सावरकर कभी नहीं मिले

सावरकर को 1910 में नासिक के कलेक्टर एमटी जैक्सन की हत्या समेत कई मामलों में गिरफ़्तार किया गया था और मुकदमे के बाद उन्हें अंडमान के सेल्यूलर जेल यानी काला पानी भेज दिया गया.

भगत सिंह पर कई किताबें लिख चुके प्रोफेसर चमनलाल फ़िल्म के टीज़र में किए गए दावे को खारिज करते हैं.

प्रोफेसर चमल लाल कहते हैं, "सावरकर से भगत सिंह की कभी मुलाकात नहीं हुई और न ही वे उनसे प्रेरित थे. ये बात बिल्कुल सही है कि उन्होंने 1924 में एक लेख में सावरकर का ज़िक्र ज़रूर किया था. यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि इस लेख में उन्होंने सिर्फ़ सावरकर का ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम देशभक्तों का, क्रांतिकारियों का नाम सम्मान के साथ लिया था. इसमें लेनिन और गैरीबाल्डी के साथ सावरकर का नाम भी है."

इसके बरअक्स 'वीर सावरकर: द मैन हू कुड हैव प्रीवेंटेड पार्टिशन' (वो व्यक्ति जो बँटवारा टाल सकता था) के लेखक उदय माहूरकर टीज़र में किए दावों को सही ठहराते हैं.

माहूरकर कहते हैं, "इस बात के काफी सबूत हैं कि वो प्रभावित थे. चाहे उनके लेख हों या फिर जेल में उनके पास सावरकर की किताब '1857' का होना हो."

वो कहते हैं, "भगत सिंह सावरकर के प्रशंसक थे, इसमें कोई शक की बात ही नहीं है. इस बात को दबाने की कोशिशें होती रहती हैं. जब भगत सिंह ने 'मतवाला' पत्रिका में वो लेख लिखा था जिसमें सावरकर का ज़िक्र है, उस समय सावरकर रत्नागिरी के अपने घर में नज़रबंद थे."

माहूरकर और प्रोफेसर चमन लाल जिस लेख की बात कर रहे हैं, भगत सिंह ने वो लेख साल 1924 में लिखा था.

भगत सिंह का यह लेख बलवंत सिंह (छद्म नाम) के नाम से कलकत्ता से प्रकाशित साप्ताहिक 'मतवाला' के दो अंकों में 'विश्वप्रेम' शीर्षक से छपा था.

इसी लेख में भगत सिंह ने महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक समेत कई और लोगों का भी ज़िक्र किया था.

जेल डायरी और सावरकर की किताब

भगत सिंह जेल में भी खूब पढ़ते थे और इस बात की तस्दीक उनके जेल के नोट करते हैं.

फ्रेडरिक एंगेल्स, बर्टैंड रसेल, व्लादिमीर लेनिन, कार्ल मार्क्स, विक्टर ह्यूगो, फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की की किताबों के साथ सावरकर की किताब 'हिंदू पद-पादशाही' की भी कुछ पंक्तियाँ उनके नोट्स में शामिल थीं.

भगत सिंह ने इन लेखकों की किताबों की कुछ पंक्तियां अपनी नोटबुक में लिखी थीं. इन पंक्तियों के आगे-पीछे उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं लिखी है.

1857 के स्वतंत्रता संग्राम को लेकर लिखी सावरकर की किताब के बारे में कहा जाता है कि भगत सिंह के साथियों ने इस किताब को छपवाकर इसकी प्रतियां बांटी भी थी.

सावरकर की यह किताब पहले मराठी में आई थी, जिसका नाम है- '1857 का स्वातंत्र्य समर.' ये किताब 1909 में प्रकाशित हुई थी और इसे पहली ऐसी किताब कहा जाता है जिसमें 1857 के विद्रोह के बारे में विस्तार से जानकारी थी.

चमनलाल कहते हैं कि भगत सिंह और उनके साथियों के पास भी वो प्रति पहुँची. इसके बाद उन लोगों ने इस किताब का हिंदी में अनुवाद कराके अपने प्रयत्न से भूमिगत रूप से छापी और वो किताब बाँटी भी.

उनका कहना है, "भगत सिंह जब 1929-31 के बीच जेल में थे तो उसमें सावरकार का एक बार भी ज़िक्र नहीं करते. सारा ज़िक्र वो लेनिन और दूसरे कम्युनिस्ट नेताओं का करते हैं. तब तक वो पूरी तरह से खुद को कम्युनिस्ट के रूप में पेश करने लगे थे. वो किताब उन्होंने इसलिए छापी थी क्योंकि इसमें 1857 के संघर्ष का विस्तृत वर्णन है."

हालांकि माहूरकर का कहना है कि भगत सिंह और सावरकर को अलग-अलग खांचे में रखने की कोशिशें की जाती है और इसमें सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि भगत सिंह फांसी पर चढ़ गए और सावरकर ने माफी माँग ली, जबकि सच्चाई यह है कि दोनों ही क्रांतिकारियों की रणनीति अलग-अलग थी.

'सावरकर और भगत सिंह, दो बिल्कुल अलग विचार'

सावरकर पर गहन अध्ययन कर चुके पत्रकार और लेखक निरंजन टाकले का कहना है, "सावरकर के जीवन का पहला हिस्सा रोमांटिक रिवोल्यूशनरी का है, जिसमें वे विलायती कपड़ों की होली जलाते हैं, 1857 पर किताब लिखते हैं, जिसमें एक तरह से वो सेक्युलरिज्म की बात करते हैं लेकिन अपने जीवन के दूसरे भाग में उनका रूप बिल्कुल अलग है."

विनायक दामोदर सावरकर और भगत सिंह की विचारधारा में क्या अंतर है?

दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर रहे शम्स-उल-इस्लाम कहते हैं, "भगत सिंह और सावरकर की विचाधारा में ज़मीन-आसमान का अंतर है. इन दोनों में कोई ताल्लुक नहीं है. भगत सिंह सभी धर्मों की एकता की बात कर रहे थे जबकि सावरकर की पूरी विचारधारा हिंदू वर्चस्व की है."

सावरकर ही वो व्यक्ति थे, जिन्होंने पहली बार हिंदुत्व को एक राजनीतिक विचारधार की तरह बताया.

प्रोफेसर शम्स-उल-इस्लाम ने कहा, "सावरकर ने हिंदुत्व को इस तरह से परिभाषित किया है कि मुसलमान और इसाई इस देश का हिस्सा नहीं हैं. उनके मुताबिक़, हिंदुस्तान (हिंदुस्थान) उसका है जिसकी पितृभूमि, मातृभूमि और पुण्यभूमि यहीं हो."

पुण्यभूमि से मतलब तीर्थ स्थलों से हैं, सावरकर का तर्क है कि जिन लोगों के तीर्थस्थल भारत में नहीं बल्कि भारत से बाहर हैं, उनकी आस्था भारत में संदिग्ध है क्योंकि उस भूमि का आदर करेंगे जहाँ उनके तीर्थ हैं.

वो कहते हैं, "भगत सिंह मेहनतकशों के शासन के बारे में बात करते थे जबकि सावरकर हिंदुओं का राज चाहते थे."

सुभाषचंद्र बोस से सावरकर की मुलाकात

यूरोप की कई देशों की यात्रा के बाद 1936 में सुभाषचंद्र बोस भारत लौटे थे.

अंग्रेज सरकार ने उन्हें वियना में ये चेतावनी दी थी कि अगर वो भारत लौटते हैं तो उनकी गिरफ़्तारी हो सकती है. लेकिन वो इसे अनसुना कर देते हैं और भारत पहुंचते ही उन्हें गिरफ़्तार कर लिया जाता है.

जेल से छूटने के बाद 1938 में गुजरात के सूरत के हरिपुरा में बोस कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. 1939 में वो फिर अध्यक्ष बने मगर कांग्रेस के भीतर मतभेद बढ़ने पर उन्होंने पार्टी छोड़ दी.

ये वो दौर था जब बोस द्वितीय विश्वयुद्ध के मद्देनज़र यह मानने लगे थे कि यूरोप के संकट का फायदा उठाकर आजादी हासिल की जा सकती है, लेकिन कांग्रेस के भीतर इस मत को लेकर एकजुटता नहीं थी.

सुभाष चंद्र बोस ने अपनी किताब 'द इंडिया स्ट्रगल'में इस बात का ज़िक्र किया है कि इस दौरान महात्मा गांधी और उनके बीच लंबी बातचीत होती थी.

वो महात्मा गांधी को इस बात के लिए मनाने की कोशिश करते थे कि यूरोप के संकट के बीच आज़ादी की मजबूत लड़ाई देश भर में और देश के बाहर भी छेड़ी जाए.

इस दौरान वो मुस्लिम लीग के अध्यक्ष जिन्ना और हिंदू महासभा के अध्यक्ष सावरकर से भी मिले थे.

नेताजी की इस किताब के पेज नंबर 344 पर जिक्र है, "मिस्टर जिन्ना उन दिनों सिर्फ़ अंग्रेजों की मदद से पाकिस्तान बनाने की योजना के बारे में सोच रहे थे. कांग्रेस के साथ मिलकर अंग्रेजों के ख़िलाफ़ एक संयुक्त लड़ाई छेड़ने की बात उन्हें ज्यादा अपील नहीं कर रही थी."

बोस ने इस बैठक में उन्हें यह तक सलाह दी थी कि अगर ये लड़ाई जीत ली जाए तो वो भारत के पहले प्रधानमंत्री तक बन सकते हैं.

इसी किताब में वो सावरकर के बारे में लिखते हैं, "मिस्टर सावरकर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से बेखबर दिखे और वो सिर्फ़ ये सोच रहे थे कि कैसे हिंदू, भारत में ब्रिटेन की सेना में शामिल होकर मिलिट्री ट्रेनिंग हासिल कर सकते हैं."

इस किताब में ये बातें लिखी गईं है कि बोस इन मुलाकातों के बाद इस नतीजे पर पहुंचने के लिए मजबूर थे कि मुस्लिम लीग या हिंदू महासभा से कुछ भी उम्मीद नहीं की जा सकती है.

इन मुलाक़ातों के बाद सुभाषचंद्र बोस को घर में नज़रबंद कर दिया गया जहां से वे पठान का वेश बनाकर जनवरी, 1941 की एक रात घर से निकले और कई देशों की सीमा पार करते हुए जापान पहुँच गए.

सावरकर से प्रभावित थे बोस?

'सावरकर: कालापानी और उसके बाद' किताब के लेखक अशोक कुमार पांडेय कहते हैं, "सुभाष चंद्र बोस जब जापान में थे तो उन्होंने अपने एक भाषण में सावरकर और जिन्ना दोनों की आलोचना की थी. भारत में भी उन्होंने दोनों से मुलाकात कर सांप्रदायिकता का रास्ता छोड़ने के लिए कहा था इसलिए कहीं से भी सुभाषचंद्र बोस के सावरकर से प्रभावित होने की बात सही नहीं है."

पब्लिकेशन डिविजन ने सुभाष चंद्र बोस के भाषणों का एक संकलन छापा है, 'सेलेक्टेड स्पीचेज ऑफ सुभाष चंद्र बोस.'

31 अगस्त, 1942 को आज़ाद हिंद रेडियो ने सुभाष चंद्र बोस का एक भाषण प्रसारित किया था. ये भाषण 'द क्विट इंडिया मूवमेंट' के बारे में है.

इसमें उन्होंने कहा था, "एक तरफ़ तो भारत में ये आंदोलन आग की तरफ फैल रहा है और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत के पक्ष में राय बन रही है."

वो इसमें जिन्ना और सावरकर से एक आग्रह करते हैं, "मैं मिस्टर जिन्ना और मिस्टर सावरकर समेत उन सभी नेताओं से आग्रह करना चाहूंगा, जो अब भी ब्रिटेन के साथ समझौता करने के बारे में सोचते हैं. कल ब्रिटिश सम्राज्य नहीं बचेगा."

उन्होंने कहा, "वे सभी लोग, समूह और पार्टी जो आजादी की लड़ाई में शामिल हो रहे हैं उनके लिए कल के भारत में एक सम्मानित जगह होगी."

लेखक उदय माहूरकर बताते हैं कि सुभाष चंद्र बोस जब बाहर गए और सशस्त्र अभियान को आगे बढ़ाना शुरू किया तो उस समय रास बिहारी बोस, जापान हिंदू महासभा के प्रमुख थे और उन्होंने उनकी काफ़ी मदद की.

माहूरकर दावा करते हैं, "सुभाष चंद्र बोस को बाहर जाने की सलाह देने वाले लोगों में से एक सावरकर भी थे. इसका ज़िक्र सावरकर ने 1952 में 'अभिनव भारत' के एक कार्यक्रम में मंच पर किया."

सुभाषचंद्र बोस के रिश्तेदार क्या कहते हैं?

इस फ़िल्म का टीज़र जारी होने के बाद सुभाष चंद्र बोस के रिश्ते के पोते और सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणीकार चंद्रकुमार बोस ने कहा कि फ़िल्म ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर रही है.

वे कहते हैं कि सुभाष चंद्र बोस सावरकर से प्रेरित नहीं थे.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "आजादी की लड़ाई में जो भी शामिल था या जो भी शामिल होना चाहता था, बोस उससे बात करते थे लेकिन हिंदू महासभा और बोस की विचारधारा एकदम विपरीत है."

चंद्रकुमार बोस बताते हैं, "सुभाष चंद्र बोस के राजनीतिक विचार सेक्युलर थे. वो काली भक्त थे. वो स्वामी विवेकानंद के शिष्य भी थे लेकिन वो धर्म और राजनीति को अलग-अलग रखते थे. जबकि हिंदू महासभा हिंदुत्व की विचारधारा में विश्वास करती है. जो सावरकर की विचारधारा है और जो श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विचारधारा है, वो अलग है, लेकिन सुभाष चंद्र बोस से उनका कोई मेल नहीं है."

चंद्र कुमार बोस कहते हैं कि सावरकर स्वतंत्रता सेनानी थे और काम करने का उनका अपना तरीका था. उन्होंने अपने तरीके से इसमें योगदान दिया. उन्हें जेल में यातनाएं दी गईं और इसके लिए उनकी प्रशंसा की जाती है.

चंद्रकुमार बोस कहते हैं कि सावरकर के जीवन को दिखाने के लिए सुभाष चंद्र बोस को जोड़ना सही नहीं है. ऐसा करके सावरकर का ही अपमान किया जा रहा है.

वो कहते हैं, "सही इतिहास दिखाइए, गलत इतिहास दिखाने से भारत की 140 करोड़ जनता आपके ख़िलाफ़ चली जाएगी."

फ़िल्म यह भी दावा करती है कि खुदीराम बोस भी सावरकर से प्रभावित थे.

खुदीराम बोस स्वतंत्रता संग्राम में सबसे कम उम्र में शहादत देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे. उन्होंने मुजफ्फरपुर में एक ब्रितानी जज की हत्या की साजिश रची थी लेकिन इस हमले में अन्य लोगों की मौत हो गई. उन्हें 11 अगस्त, 1908 को फांसी दे दी गई. उस समय उनकी उम्र महज 18 साल थी.

निरंजन टाकले कहते हैं, "ये फ़िल्म दावा करती है कि खुदीराम बोस सावरकर से प्रेरित थे जबकि सच्चाई यह है कि खुदीराम बोस की 1908 में मौत हो गई. सावरकर को लोग जानने लगे थे उनकी पहली किताब '1857' के बाद, वो किताब आई है 1910 में तो फिर कोई तुक ही नहीं बनता है कि उनके सावरकर से प्रभावित होने का."

टाकले पूछते हैं, "बोस ने गांधी और नेहरू के नाम पर तो आज़ाद हिंद फौज के ब्रिगेड का नाम रखा लेकिन सावरकर के नाम पर कहाँ रखा?"

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