BBC SPECIAL: क्या गांधी हत्याकांड में सावरकर का था अहम रोल?

    • Author, शम्सुल इस्लाम
    • पदनाम, शिक्षाविद, बीबीसी हिंदी के लिए

मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या की साज़िश में शामिल लोगों की पहचान को लेकर पिछले दो-तीन सालों से लगातार भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है.

सुप्रीम कोर्ट ने भी अक्टूबर 2017 में गांधी की हत्या की जांच फिर से शुरू करने को लेकर दायर की गई याचिका को मंज़ूरी दी है.

गांधी की हत्या के लिए नाथूराम विनायक गोडसे और नारायण आप्टे को 15 नवंबर 1949 को फांसी दी गई थी.

गांधी की हत्या के मामले में सहअभियुक्त और नाथूराम के छोटे भाई गोपाल गोडसे को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी.

गोपाल गोडसे ने अपनी किताब 'गांधी वध और मैं' में लिखा, ''गांधी-वध पिस्तौल हाथ में लेने और गोली मार देने जैसी सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि एक ऐतिहासिक और अपूर्व घटना थी. ऐसी घटनाएं युगों में कभी-कभी होती हैं. नहीं! युग-युग में भी नहीं, ऐसी घटनाएं नहीं हुआ करती हैं."

गांधी और उनके हत्यारों की सोच का फ़र्क

गांधी की हत्या भारतीय राष्ट्रीयता के बारे में दो विचारधाराओं के बीच संघर्ष का परिणाम थी. गांधी का जुर्म यह था कि वे एक ऐसे आज़ाद भारत की कल्पना करते थे जो समावेशी होगा. जहाँ विभिन्न धर्मों और जातियों के लोग बिना किसी भेदभाव के रहेंगे.

दूसरी ओर, गांधी के हत्यारों ने हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों विशेषकर विनायक दामोदर सावरकर के नेतृत्व वाली हिन्दू महासभा में सक्रिय भूमिका निभाते हुए हिंदुत्व का पाठ पढ़ा था.

हिन्दू अलगाववाद की इस वैचारिक धारा के अनुसार, केवल हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करते थे.

हिंदुत्व विचारधारा के जनक सावरकर ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन 'हिंदुत्व' नामक ग्रन्थ में किया था.

याद रहे भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने वाली यह किताब अँगरेज़ शासकों ने सावरकर को तब लिखने का अवसर दिया था, जब वे जेल में थे और उनपर किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधियां करने पर पाबंदी थी.

सावरकर को मिली छूट की वजह

इसको समझना ज़रा भी मुश्किल नहीं है कि अंग्रेज़ों ने यह छूट क्यों दी थी?

शासक गाँधी के नेतृत्व में चल रहे साझे स्वतंत्रता आंदोलन के उभार से बहुत परेशान थे और ऐसे समय में सावरकर का हिन्दू-राष्ट्र का नारा शासकों के लिए आसमानी वरदान था.

इन्होंने हिंदुत्व के सिद्धांत की व्याख्या शुरू करते हुए हिंन्दुत्व और हिंदू धर्म में फ़र्क किया. लेकिन जब तक वे हिंदुत्व की परिभाषा पूरी करते, दोनों के बीच अंतर पूरी तरह से ग़ायब हो चुका था.

हिंदुस्तान और कुछ नहीं बल्कि राजनीतिक हिंदू दर्शन बन गया. यह हिंदू अलगाववाद के रूप में उभरकर सामने आ गया. अपना ग्रंथ समाप्त करते हुए सावरकर हिंदुत्व और हिंदूवाद के बीच के अंतर को पूरी तरह भूल गए.

'सिर्फ हिंदू भारतीय राष्ट्र का अंग'

इनके मुताबिक, केवल हिंदू भारतीय राष्ट्र का अंग थे और हिंदू वो थे -

  • जो सिंधु से सागर तक फैली हुई इस भूमि को अपनी पितृभूमि मानते हैं
  • जो रक्त संबंध की दृष्टि से उसी महान नस्ल के वंशज हैं
  • जिसका प्रथम उद्भव वैदिक सप्त सिंधुओं में हुआ था
  • जो उत्तराधिकार की दृष्टि से अपने आपको उसी नस्ल का स्वीकार करते हैं और इस नस्ल को उस संस्कृति के रूप में मान्यता देते हैं जो संस्कृत भाषा में संचित है.

राष्ट्र की इस परिभाषा के चलते सावरकर का निष्कर्ष था कि 'ईसाई और मुसलमान समुदाय, जो ज़्यादा संख्या में अभी हाल तक हिंदू थे और जो अभी अपनी पहली ही पीढ़ी में नए धर्म के अनुयायी बने हैं, भले ही हमसे साझा पितृभूमि का दावा करें और लगभग शुद्ध हिंदू खून और मूल का दावा करें, लेकिन उन्हें हिंदू के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती क्योंकि नया पंथ अपना कर उन्होंने कुल मिलाकर हिंदू संस्कृति का होने का दावा खो दिया है.'

गांधी की हत्या क्यों?

यह भारतीय राष्ट्र की समावेशी कल्पना और विश्वास था जिसके लिए गांधी की हत्या की गई. गांधी का सबसे बड़ा जुर्म यह था कि वे सावरकर की हिन्दू राष्ट्रवादी रथ-यात्रा के लिए सबसे बड़ा रोड़ा बन गए थे.

गांधी की हत्या में शामिल मुजरिमों के बारे में आज चाहे जितनी भी भ्रांतियां फैलाई जा रही हों, लेकिन भारत के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल का मत बहुत साफ़ था, जिनसे हिंदुत्ववादी टोली गहरा भाईचारा दिखाती है.

पटेल का मानना था कि आरएसएस, विशेषकर सावरकर और हिन्दू महासभा का इस जघन्य अपराध में सीधा हाथ था. उन्होंने हिन्दू महासभा के वरिष्ठ नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 18 जुलाई 1948 को लिखे खत में बिना किसी हिचक के लिखा:

  • 'जहां तक आरएसएस और हिंदू महासभा की बात है, गांधी जी की हत्या का मामला अदालत में है और मुझे इसमें इन दोनों संगठनों की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहिए
  • लेकिन हमें मिली रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संस्थाओं का, ख़ासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर काण्ड संभव हो सका. मेरे दिमाग़ में कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का अतिवादी धड़ा षडयंत्र में शामिल था.'

सरदार ने गांधी की हत्या के 8 महीने बाद 19 सितंबर 1948 को आरएसएस के मुखिया एमएस गोलवलकर को सख़्त शब्दों में लिखा:

''हिन्दुओं का संगठन बनाना, उनकी सहायता करना एक प्रश्न है. पर, उनकी मुसीबतों का बदला, निहत्थे व लाचार औरतों, बच्चों व आदमियों से लेना दूसरा प्रश्न है.

उनके अतिरिक्त यह भी था कि उन्होंने कांग्रेस का विरोध करके और इस कठोरता से कि न व्यक्तित्व का ख़्याल, न सभ्यता व विशिष्टता का ध्यान रखा, जनता में एक प्रकार की बेचैनी पैदा कर दी थी, इनकी सारी तक़रीरें सांप्रदायिक विष से भरी थीं.

हिन्दुओं में जोश पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबन्ध करने के लिए यह आवश्यक न था कि वह ज़हर फैले. उस ज़हर का फल अन्त में यही हुआ कि गांधीजी की अमूल्य जान की कु़र्बानी देश को सहनी पड़ी और सरकार व जनता की सहानुभूति ज़रा भी आरएसएस के साथ न रही, बल्कि उनके ख़िलाफ़ हो गई.

उनकी मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो खुशी जताई और मिठाई बांटी उससे यह विरोध और भी बढ़ गया और सरकार का इस हालत में आरएसएस के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना ज़रूरी ही था.''

सावरकर हुए थे बरी

यह सच है कि गांधी की हत्या मामले में सावरकर बरी कर दिए गए. गांधी हत्या केस में दिगंबर बागड़े के बयान ( महात्मा गांधी की हत्या का षड्यंत्र रचने में सावरकर की महत्वपूर्ण भूमिका थी) के बावजूद वे इसलिए मुक्त कर दिए गए कि इन षड्यंत्रों को साबित करने के लिए कोई 'स्वतंत्र साक्ष्य' नहीं था.

क़ानून कहता है कि रचे गए षड्यंत्र को अदालत में सिद्ध करना हो तो इसकी पुष्टि स्वतंत्र गवाहों द्वारा की जानी चाहिए.

निश्चित ही यह एक असंभव कार्य होता है कि बहुत ही गोपनीय ढंग से रची जा रही साजिशों का कोई 'स्वतंत्र साक्ष्य' उपलब्ध हो पाए. बहरहाल क़ानून यही था और गांधी की हत्या के केस में सावरकर सज़ा पाने से बच गए.

ऐसा ही कुछ अल्लाह बख़्श के मामले में देखने को मिला था. अल्लाह बख्श जिन्होंने मुस्लिम लीग़ की पाकिस्तान की मांग के ख़िलाफ़ देश के मुसलमानों का एक बड़ा आंदोलन 1940 में खड़ा किया था. अल्लाह बख्श के मुस्लिम लीग़ी हत्यारे/साज़िशकर्ता सज़ा पाने से बच गए. अल्लाह बख्श की हत्या 1943 में हुई थी.

सावरकर के ख़िलाफ़ अपील क्यों नहीं की गई?

हालांकि यह बात आज तक समझ से बाहर है कि निचली अदालत ने सावरकर को दोषमुक्त किया था, इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सरकार ने हाईकोर्ट में अपील क्यों नहीं की.

सावरकर के गांधी हत्या में शामिल होने के बारे में न्यायाधीश कपूर आयोग ने 1969 में अपनी रिपोर्ट में साफ़ लिखा कि वे इसमें शामिल थे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

सावरकर का 26 फरवरी 1966 को देहांत हो चुका था. यह अलग बात है कि इस सबके बावजूद सावरकर की तस्वीरें महाराष्ट्र विधानसभा और भारतीय संसद की दीवारों पर सजाई गईं और देश के हुक्मरान पंक्तिबद्ध होकर इन तस्वीरों पर पुष्पांजलि करते हैं.

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