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कहानी खुदीराम बोस की, जिन्हें 18 साल की उम्र में दी गई फांसी की सज़ा -विवेचना
साल 1906 में मिदनापुर में एक मेले का आयोजन किया गया. सत्येंद्रनाथ बोस ने वन्दे मातरम शीर्षक से अंग्रेज़ी शासन का विरोध करते हुए एक पर्चा छपवाया था. खुदीराम बोस को मेले में इस पर्चे के वितरण की ज़िम्मेदारी सौंपी गई.
वहां अंग्रेज़ों के एक पिट्ठू रामचरण सेन ने उनको शासन विरोधी पर्चा बांटते देख लिया. उन्होंने इसकी सूचना वहां तैनात एक सिपाही को दे दी.
पुलिस के एक सिपाही ने खुदीराम को पकड़ने का प्रयास किया. खुदीराम ने उस सिपाही के मुंह पर एक घूंसा जड़ दिया. तभी वहां दूसरे पुलिस वाले पहुंच गए. उन सबने मिलकर खुदीराम बोस को पकड़ लिया.
खुदीराम बोस ने बहुत कम उम्र में देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी. खुदीराम के 133वें जन्मदिन पर उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर नज़र डाल रहे हैं रेहान फ़ज़ल विवेचना में.
वीडियो प्रोडक्शनः परवाज़ लोन
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