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सुभाष चंद्र बोस रानी लक्ष्मीबाई को भारत की जोन ऑफ़ आर्क क्यों मानते थे
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
20 नवंबर 1853 को दोपहर तीन बजे झाँसी के राजा गंगाधर राव ने पाँच साल के एक बच्चे दामोदर राव को गोद लेने के एक समारोह का आयोजन किया था.
उन्होंने इस समारोह में ब्रिटिश सरकार के पॉलिटिकल एजेंट मेजर एलिस को भी आमंत्रित किया था. समारोह के बाद मेजर एलिस ने अंग्रेज़ी में भाषण दिया था, जिसे वहाँ मौजूद अधिकतर लोग समझ नहीं पाए थे.
भाषण का आख़िरी वाक्य था, ‘यॉर हाइनेस, ब्रिटिश सरकार आपकी वसीयत का सम्मान करे, उसके लिए मैं एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दूँगा.’
अगले ही दिन सुबह साढ़े चार बजे झाँसी के सातवें राजा गंगाधर राव स्वर्ग सिधार गए थे. लगभग चार महीने बाद 15 मार्च, 1854 को 11 बजे के आसपास पॉलिटिकल एजेंट मेजर एलिस ने झाँसी के किले के दरवाज़े पर पहुँचकर रानी लक्ष्मीबाई से मिलने की इच्छा प्रकट की थी.
इस अनुरोध की विचित्र बात ये थी कि उन्होंने रानी से कहा था कि इस मुलाक़ात में उनके मंत्री भी उपस्थित रहें तो बेहतर होगा.
क्रिस्टोफ़र हिबर्ट अपनी किताब द ग्रेट इंडियन म्यूटिनी 1857 में लिखते हैं, ‘'मेजर एलिस ने अपना गला साफ़ कर कहा था कि उन्हें कलकत्ता से संदेश प्राप्त हुआ है. भारत के गवर्नर जनरल ने दामोदर राव को गोद से इनकार कर दिया है. फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने झाँसी राज्य का अधिग्रहण करने का फ़ैसला किया है.
अब से झाँसी राज्य के नागरिक ब्रिटिश सरकार के शासन में रहेंगे और उसे ही वो सारे कर चुकाएंगे जो उनसे अपेक्षित हैं. यहाँ मौजूद एक अनुवादक ने एलिस के वक्तव्य का मराठी में अनुवाद किया था. ये सुनते ही रानी ने अपने आसन से उठने की कोशिश की थी. उनकी सहायिका मंदेर ने धीरे से अपना हाथ उनकी बाँह पर रख कर उन्हें रोका था. रानी अपने आसन पर बैठ गई थीं. थोड़ी देर की शाँति के बाद कक्ष में उनकी मज़बूत आवाज़ में वो मशहूर स्वर गूँजे थे, ‘मेरी झाँसी नहीं दूँगी’.’
मेजर एलिस ने उन्हें दिलासा देने की कोशिश की थी, ‘यॉर हाईनेस, मैं पूरी कोशिश करूँगा कि आपको पर्याप्त धन दिया जाए और ब्रिटिश सरकार आपके साथ अच्छा सलूक करे. निजी तौर पर मैं इस फ़ैसले की निंदा करता हूँ. मुझे इस बात का बहुत दुख है कि मुझे आपको ये फ़ैसला सुनाने का आदेश दिया गया है.’
रानी ने अपने सभी मंत्रियों, रिश्तेदारों और सहायकों से चले जाने के लिए कहा था और अपने आपको एक कमरे में बंद कर लिया था.
रानी ने अंग्रेज़ों से लड़ने का फ़ैसला किया
शाम तक झाँसी के किले पर लोगों का जमघट लग चुका था. अंग्रेज़ों के झाँसी पर कब्ज़े की ख़बर आग की तरह फैल चुकी थी.
लोगों ने अपनी दुकानें बंद कर दी थीं और इस फ़ैसले के विरोध में उन्होंने उस दिन अपने घर के चिराग न जलाने का फ़ैसला किया था. पूरे शहर में अंधकार फैला हुआ था.
रानी ने अपने पिता के ज़रिए लोगों को संदेश कहलवाया था, ‘'आप लोग शांतिपूर्वक अपने घर जाइए. अभी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है. हम मुश्किल समय से गुज़र रहे हैं लेकिन आपकी रानी इसका कोई समाधान निकाल लेगी.’
इसके बाद रानी लक्ष्मीबाई ने अपने ख़ास सलाहकारों दीवान नरनसेन, कश्मीर मल और अपने पिता मोरोपंत तांबे को अपने कमरे में तलब कर कहा था, ‘'मैंने इस फ़ैसले का विरोध करने का निर्णय लिया है. हमारे पास सेना है और झांसी के लोग मेरे साथ हैं. मैं उनका नेतृत्व कर अंग्रेज़ों से लड़ाई लड़ूंगी. हो सकता है कि हम हार जाएं लेकिन हम तिरस्कृत होने से बच जाएंगे.’'
15 वर्ष की आयु में झांसी के राजा गंगाधर राव से विवाह
रानी लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम मणिकर्णिका था. उनका जन्म वाराणसी में हुआ था. उनके पिता मोरोपंत तांबे पदच्युत मराठा पेशवा के भाई के सलाहकार थे. जब वो बहुत छोटी थीं तो लक्ष्मीबाई की माँ का निधन हो गया था.
बचपन से ही उन्होंने घुड़सवारी करना और तलवार चलाना सीख लिया था. सन 1843 में सिर्फ़ 15 वर्ष की आयु में लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव से हो गया था.
सन 1842 में उनकी पहली पत्नी का निधन हो गया था.
इरा मुखौटी अपनी किताब ‘हीरोइंस, पावरफ़ुल इंडियन वीमेन ऑफ़ मिथ एंड हिस्ट्री’ में लिखती हैं, ‘विवाह के समय रानी का नाम मणिकर्णिका से बदल कर लक्ष्मीबाई कर दिया गया था. वो सन 1853 में गंगाधर राव की मृत्यु तक 10 सालों तक झांसी का रानी रहीं. उनके विवाह की अजीब बात ये थी कि उनके पिता मोरोपंत तांबे उनके साथ उनके ससुराल आए थे और उनके साथ ही झांसी में रहने लगे थे.’
गवर्नर जनरल डलहौज़ी ने किया था ‘डॉक्ट्रीन ऑफ़ लैप्स’ लागू
लक्ष्मीबाई के पति गंगाधर राव को महिलाओं की तरह सजने संवरने का अजीब शौक था.
विष्णुभट्ट गोडसे जो उन दिनों झांसी में थे, अपनी आत्मकथा ‘माई ट्रैवेल्स, द स्टोरी ऑफ़ द 1857 म्यूटिनी’ में लिखते हैं, ‘इस तरह की अफ़वाहें थीं कि गंगाधर राव गाहेबगाहे औरतों की तरह व्यवहार करना शुरू कर देते थे. वो अचानक महल की छत पर जाकर पुरुषों के कपड़े उतार कर साड़ी चोली पहन लेते थे. और हाथों में कड़े, गले में मोतियों का हार, नाक में नथनी और पैरों में पाज़ेब भी पहनते थे.''
लक्ष्मीबाई अपने पति का इस हरकत पर क्या सोचती थीं या उनकी अपने पति के बारे में क्या राय थी, इसका कोई प्रामाणिक साक्ष्य या दस्तावेज़ नहीं मिलता.’
लॉर्ड डलहौज़ी जब भारत के गवर्नर जनरल बन कर आए तो उनकी आयु मात्र 36 वर्ष की थी.
उन्होंने ‘डॉक्ट्रीन ऑफ़ लैप्स’ लागू किया था जिसके अनुसार अगर कोई राजा बिना संतान के मर जाता था तो वो अपना कोई वारिस गोद नहीं ले सकता था और उसके राज्य को ब्रिटिश राज में मिला लिया जाता था.
इस तरह अंग्रेज़ों ने पंजाब, सिक्किम, अवध और उदयपुर को अपने राज में मिला लिया था. जब झाँसी को भी इसी तरह अंग्रेज़ राज को हिस्सा बना लिया गया तो रानी ने गवर्नर जनरल को पत्र लिखकर इसे लागू करने के लिए एक महीने की मोहलत मांगी.
लेकिन अंग्रेज़ों ने इसे अस्वीकार कर दिया और उन्हें राजमहल छोड़कर एक तिमंज़िला हवेली ‘रानी महल’ में जाने के लिए मजबूर कर दिया.
जॉन लैंग को मिला रानी को देखने का मौका
रानी लक्ष्मीबाई ने तब उस ज़माने के मशहूर वकील जॉन लैंग की सेवाएं लीं. लैंग ऑस्ट्रेलिया के रहने वाले थे और उन्होंने ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ कई मुकदमें जीते थे. वो मेरठ में रहते थे और वहीं से एक अख़बार ‘मुफ़स्सिल’ निकालते थे.
उनको फ़ारसी और हिंदुस्तानी बोलनी आती थी. रानी ने उनको अपना केस समझाने के लिए झांसी तलब किया. वो उनसे पर्दे के पीछे मिलीं लेकिन लैंग को संयोग से उन्हें देखने का मौका मिल गया.
जॉन लैंग अपनी किताब ‘इन द कोर्ट ऑफ़ रानी ऑफ़ झाँसी’ में लिखते हैं, ‘रानी के बेटे ने अचानक पर्दा हटा दिया और मुझे कुछ क्षणों के लिए रानी को देखने का मौक़ा मिल गया. वो मझोले क़द की महिला थीं. उनका चेहरा गोल था. वो न तो गोरी थीं और न ही काली. उनका रंग गेहुँया था. उन्होंने सोने की एक कान की बाली के सिवा कोई ज़ेवर नहीं पहन रखा था. उन्होंने सफ़ेद मलमल की एक साड़ी पहनी हुई थी.
उनकी सिर्फ़ एक चीज़ ख़राब थीं और वो थी उनकी आवाज़ जो बहुत कर्कश थी. पर्दा हटने पर वो थोड़ा नाराज़ हुई थीं और फिर हँसते हुए बोली थीं कि ‘मैं उम्मीद करती हूँ कि मुझे देखकर आपकी मेरे और मेरे कष्टों के प्रति सहानुभूति कम नहीं हुई होगी.’ मैंने इसका जवाब देते हुए कहा था, ‘अगर गवर्नर जनरल को आपको मेरी तरह देखने का मौका मिल जाता तो वो तुरंत आपको झांसी वापस दे देते.’’
अंग्रेज़ों ने रानी की अपील ठुकराई
लैंग से रानी की मंत्रणा कई घंटों तक चली. उन्होंने लैंग की मदद से गवर्नर जनरल डलहौज़ी से अपील कर उन्हें 1804, 1817 और 1832 में की गई संधियों की याद दिलाई, जिसमें रामचंद्र राव और उनके वारिसों को झांसी पर राज करने की गारंटी दी गई थी लेकिन डलहौज़ी ने इस अपील को ख़ारिज कर दिया.
सन 1854 में झांसी पर अंग्रेज़ों का कब्ज़ा हो गया और कैप्टेन एलेक्ज़ेडर स्कीन को झाँसी में सुपरिंटेंडेंट नियुक्त किया गया. रानी की पेंशन तय कर दी गई और अंग्रेज़ किसानों से भूमि कर वसूल करने लगे.
एक समय रानी ने वापस वाराणसी जाने का भी मन बनाया लेकिन उनके सलाहकारों ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी. इस दौरान रानी ने फिर से घुड़सवारी शुरू कर दी.
झांसी के आसपास उन्हें घोड़े की सवारी करते देखा जाता और वो रानी न रहते हुए भी रोज़ शाम को अपना दरबार लगातीं. उस दौरान वो अक्सर सफ़ेद रंग की चंदेरी साड़ी पहनतीं लेकिन कभी कभी पुरुषों की तरह ढीला पजामा, कसा हुआ कोट और बालों को ढंकने के लिए पगड़ी भी पहनतीं.
वो सन 1856 तक अंग्रेज़ सरकार से झाँसी पर कब्ज़े के ख़िलाफ़ अपील करती रहीं लेकिन अंग्रेज़ों ने उनकी एक न सुनी.
1857 का विद्रोह झांसी तक पहुंचा
मई, 1857 में मेरठ में अग्रेज़ों के ख़िलाफ़ विद्रोह शुरू हुआ जो बहुत जल्दी पूरे उत्तर भारत में फैल गया. झांसी में जो अंग्रेज़ सेना तैनात थी उसके अधिकतर सैनिक भारतीय थे.
टवेल्थ नेटिव इंफ़ेट्री के जवानों ने 5 जून, 1857 को झांसी किले पर कब्ज़ा कर लिया और जेल मे बंद सभी कैदियों को रिहा कर दिया.
झाँसी में रह रहे अंग्रेज़ लोगों ने अपनी सुरक्षा के लिए किले में शरण ली और रानी लक्ष्मीबाई को संदेश भिजवाया कि वो उनकी रक्षा करें.
लेकिन तीन दिनों के अंदर रह रहे सभी अंग्रेज़ पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की हत्या कर दी गई. अंग्रेज़ो ने बाद में दावा किया कि इस हत्याकांड में रानी का हाथ था लेकिन इसके कोई पुख़्ता सबूत नहीं मिलते.
जैसे ही विद्रोही सैनिक दिल्ली के लिए रवाना हुए रानी ने झांसी की सुरक्षा की तरफ़ ध्यान देना शुरू कर दिया. वो रानी महल से दोबारा किले के अंदर अपने राजमहल में चली गईं और रोज़ दरबार लगाने लगीं.
झांसी में हथियारों, बंदूकों, गोलियों और बारूद का उत्पादन फिर से शुरू हो गया. उन्होंने एक टकसाल की भी शुरुआत की और ग़रीबों को खाना और कपड़ा बाँटा जाने लगा. इसी दौरान वो सैनिकों जैसे कपड़े पहनने लगीं.
विष्णुभट्ट गोडसे लिखते हैं, ‘उनके कमरबंद से चांदी की दो पिस्टल और रत्नों से जड़ी तलवार लटकने लगी. वो अपने बालों का बड़ा जूड़ा बनाने लगीं और वो एक देवी के अवतार जैसी दिखाई देने लगीं.
उन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ने का मन बना लिया. किले के अंदर आटा, घी और चीनी के भंडार को जमा किया जाने लगा और रानी ने किले के आसपास सभी पेड़ों को काट देने के आदेश दे दिए ताकि अगर अंग्रेज़ उनपर हमला करें तो उन्हें भीषण गर्मी में पेड़ों की छाँव नसीब न हो.’
अंग्रेज़ों ने घेरा झांसी का किला
इस बीच ब्रिटेन से आए अंग्रेज़ सैनिकों को झांसी का विद्रोह कुचलने के लिए भेजा गया. इनका नेतृत्व कर रहे थे लड़ाई के मैदान में ख़ासा नाम कमा चुके जनरल ह्यूज रोज़. अंग्रेज़ सेना ने 18 पाउंड के तोप के गोलों से झाँसी के किले की दीवार को भेदने की कोशिश की. रानी और उनके सैनिकों ने उनका कड़ा प्रतिरोध किया.
ह्यूज रोज़ इससे इतना प्रभावित हुआ कि उसने एम मेन्सफ़ील्ड को भेजे पत्र में लिखा, ‘विद्रोहियों के तोपख़ाने का प्रमुख ग़ुलाम ग़ौस ख़ाँ अव्वल दर्जे का तोपची था. जिस तरह उसने हमारा सामना किया, अपने नुकसान की भरपाई की और हम पर बार बार गोले बरसाए, वो देखने लायक था. कई जगह तो वो हमारा बराबरी से मुकाबला करते हुए दिखे.
दोपहर को घोड़े पर सवार रानी को अपने ठिकानों का मुआएना करते और अपने सैनिकों का जोश बढ़ाते हुए देखा जा सकता था.’
लेकिन रानी की सेना बहुत दिनों तक अंग्रेज़ों का दबाव सह नहीं पाई. 3 अप्रैल, 1858 को अंग्रेज़ सैनिक झाँसी के किले की दीवार भेदने में सफल हो गए.
रानी ने झांसी का किला छोड़ा
तीन अप्रैल की ही आधी रात को रानी लक्ष्मीबाई ने किले के अहाते में अपने कुछ सौ सैनिकों को जमा किया.
इरा मुखौटी लिखती हैं, ‘रानी अपने घुड़सवार सैनिकों के साथ किले से नीचे उतर कर खुले मैदान मे आ गईं. वो एक चांदी के रंग के घोड़े पर सवार थीं. उनके हाथ में चांदी के हत्थे वाली तलवार थी.
अगले कुछ हफ़्ते रानी ने बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाके में बिताए. उस समय इतनी तेज़ गर्मी पड़ रही थी कि हाथियों की आँखों से आँसू निकल रहे थे.’
रानी और उनके सैनिक 150 किलोमीटर का रास्ता तय करते हुए काल्पी पहुंचे जहाँ पहले से ही तात्या टोपे और नाना साहब के भतीजे राव साहब पहुंचे हुए थे. यहाँ अंग्रेज़ो से हुई लड़ाई में उनकी हार हुई.
विष्णु भट्ट गोडशे को उन दिनों रानी से मिलने का मौका मिला.
वो अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, ‘रानी ने पुरुष पठान जैसे कपड़े पहने हुए थे. उनका चेहरा धूल से सना हुआ था और वो बहुत थकी हुई दिखाई दे रही थीं.’
ग्वालियर के किले पर रानी का कब्ज़ा
रानी लक्ष्माबाई, तात्या टोपे और राव साहब काल्पी से बच निकलने में कामयाब हो गए. उनका अगला ठिकाना था ग्वालियर. वहाँ पर उन्होंने ग्वालियर के किले पर कब्ज़ा कर लिया.
वहाँ के महाराजा जयाजीराव सिंधिया वहाँ से बच कर अंग्रेज़ो की शरण में आगरा पहुंच गए. सिंधिया के सैनिक विद्रोह कर रानी के सैनिकों से जा मिले.
वहाँ पर सिंधिया के ख़ज़ाने से रानी लक्ष्मीबाई को मोतियों का एक बेशकीमती हार तोहफ़े में दिया गया. जनरल रोज़ को एक बार फिर रानी के सैनिकों का सामना करने के लिए ग्वालियर भेजा गया.
तलवारों से हुई लड़ाई में एक अंग्रेज़ सैनिक के वार से लक्ष्मीबाई अपने घोड़े से नीचे गिर पड़ी. उस समय कैप्टेन क्लेमेंट वॉकर वहाँ मौजूद थे.
बाद में उन्होंने इस लड़ाई का वर्णन करते हुए लिखा, ‘घोड़े पर सवार और हाथों में तलवार लिए एक महिला हर जगह दिखाई दे रही थीं. हमारे एक सैनिक ने उनके सिर पर वार किया. उनके नीचे गिरने पर हमें पता चला कि वो झांसी की रानी थीं.’
इस लड़ाई का विवरण गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग के कागज़ातों में भी मिलता है. ‘उनके घोड़े को गोली लगी और उसने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया. उन्होंने अंग्रेज़ सैनिक पर गोली चलाई लेकिन इससे पहले ही उसने उनके सिर पर वार कर दिया.
बाद में ह्यूज रोज़ और 8 हुसर्स के इतिहास में रानी के अपूर्व साहस और बुद्धिमानी की बहुत तारीफ़ की गई. 8 हुसर्स के रेजिमेंटल इतिहास मे दर्ज किया गया कि ‘रानी की मृत्यु के साथ ही विद्रोहियों ने अपना सबसे बहादुर और सर्वश्रेष्ठ सैनिक नेता खो दिया.
रानी के अंतिम क्षण
रानी के अंतिम क्षणों का वर्णन ग्रीस के प्रिंस मिशेल की किताब द रानी ऑफ़ झांसी में मिलता है.
प्रिंस मिशेल लिखते हैं, ‘रानी के सैनिक उन्हें उठाकर पास के मंदिर में ले आए. वहाँ के पुजारी ने गंगा जल से रानी के सूखे हुए होठों को तर किया. रानी अपनी अंतिम साँसें ले रही थीं. उन्होंने टूटते हुए शब्दों में कहा, मैं दामोदर को आपके ज़िम्मे छोड़ती हूँ.
उन्होंने अपने गले से मोतियों का हार उतारने की कोशिश की. फिर उन्होंने टूटती साँसों के बीच कहा, मैं नहीं चाहती कि मेरा शव अंग्रेज़ों को मिले. ये कहते ही रानी ने अपनी अंतिम साँस ली.
वहाँ मौजूद रानी के सैनिकों ने कुछ लकड़ियोँ जमा कर रानी के शव को उनके ऊपर लिटा कर उसमें आग लगा दी. जब रॉड्रिक ब्रिग्स मंदिर में घुसे तो वहाँ सब कुछ शाँत था.
वहाँ रानी के सैनिकों के कई रक्तरंजित शव पड़े हुए थे. तभी उसकी नज़र एक चिता पर पड़ी जिसकी लपटें अब धीमी पड़ रही थीं. उन्होंने अपने बूट से आग बुझाने की कोशिश की. तभी उसे मानव शरीर के जले हुए अवशेष दिखाई दिए. रानी की हड्डियाँ करीब करीब राख बन चुकी थीं.’
टैगोर, सावरकर, सुभाष बोस और नेहरू ने की लक्ष्मीबाई की तारीफ़
रानी की मौत के 19 साल बाद रबींद्रनाथ टैगौर ने लक्ष्मीबाई पर एक लेख लिखा ‘झांसीर रानी.’
इसमें उन्होंने बताया ‘रानी युवा थीं, बीस साल से कुछ साल ऊपर थीं, सुंदर थीं, शक्तिशाली थीं और सबसे बढ़कर इरादे की पक्की थीं.’
कुछ सालों बाद विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी किताब ‘इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस, 1857’ में लिखा था, ‘रानी ने अपनी जान देकर अपने उद्देश्य को हासिल लिया था. उन्होंने अपने लोगों को जिस तरह संगठित किया था, ऐसी क्षमता पुरुषों में भी नहीं पाई जाती.’
बीस के दशक में सुभद्रा कुमारी चौहान ने लक्ष्मीबाई पर एक लंबी कविता लिखी थी, ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.’
सन 1943 में सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज की एक रेजिमेंट का नाम झाँसी की रानी रेजिमेंट रखा था.
बोस रानी को भारतीय वीरता और नेतृत्व को सबसे बड़ा प्रतीक मानते थे और उनकी तुलना फ़्राँस की जोन ऑफ़ आर्क से करते थे.
जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में लिखा था, ‘1857 की लड़ाई यूँ तो कई लोगों ने लड़ी थी लेकिन सबसे ज़्यादा नाम कमाया था झाँसी की रानी रानी लक्ष्मीबाई ने.’
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