कांग्रेस बिहार में अगड़ी जातियों को ही क्यों याद कर रही है?

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
बिहार में मंडल की राजनीति के बाद पिछड़ी जातियों के वोट पर हर पार्टी की नज़र होती है.
ऐसे समय में कांग्रेस ने राज्य में बड़ी संख्या में अगड़ी जाति के लोगों को अलग-अलग ज़िलों की ज़िम्मेवारी सौंपी है.
कांग्रेस ने बिहार में पार्टी के 39 ज़िलाध्यक्षों की नियुक्ति की है, इनमें 12 भूमिहार और 8 ब्राह्मण और 6 राजपूत बिरादरी के हैं.
कांग्रेस ने 38 में से क़रीब 25 ज़िलों की कमान अगड़ी जातियों को सौंपी है. जबकि इनमें पांच मुस्लिम चेहरे भी शामिल हैं.
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मंडल की राजनीति शुरू होने के बाद पिछले तीन दशक में कांग्रेस बिहार में काफ़ी कमज़ोर हो चुकी है.
ऐसे में क्या कांग्रेस नया दांव खेलकर अगड़ी जातियों के अपने पुराने वोटरों को लुभाने की कोशिश कर रही है?
बिहार कांग्रेस के प्रवक्ता असित नाथ तिवारी कहते हैं, "कांग्रेस पार्टी जाति की राजनीति नहीं करती है और न ही हम किसी जाति से जुड़े कार्यक्रमों में जाते हैं. जो लोग पार्टी में सक्रिय रहे हैं, उन्हें ज़िलाध्यक्ष बनाया गया है. इसके अलावा कुछ है तो वह संयोग है."
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क्यों याद आई अगड़ी जातियां
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "बिहार में अगड़ी जाति के लोगों को महत्व देने के पीछे एक वजह ऐतिहासिक है. कांग्रेस का नेतृत्व शुरू से ही अगड़ी जातियों के हाथ में रहा है."
राज्य में कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्रियों को देखें तो जगन्नाथ मिश्र, एसएन सिन्हा, भागवत झा आज़ाद और बिंदेश्वरी दुबे सभी अगड़ी जातियों के थे.
माना जाता है कि 1950-1960 के दशक में ही अगड़ी जातियों के ख़िलाफ़ राजनीति में पिछड़ी जातियां कांग्रेस से दूर चली गई थीं. बिहार में कांग्रेस अगड़ी जातियों, दलितों और मुस्लिमों के बीच सिमटी हुई थी.
वहीं, वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार नवीन उपाध्याय का मानना है कि कांग्रेस धीरे-धीरे अपने पुराने वोट बैंक को दोबारा हासिल करने की कोशिश कर रही है और इसका पहला क़दम मल्लिकार्जुन खड़गे को पार्टी का अध्यक्ष बनाना था.
वो कहते हैं, "इसका यह असर हुआ है कि कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस को दलितों का बड़ा वोट मिला. मुस्लिम वोटरों ने भी वहां जेडीएस को छोड़ कांग्रेस को वोट दिया, जिसकी वजह से कांग्रेस को इतनी बड़ी जीत मिली है. कांग्रेस निश्चित तौर पर इस प्रयोग को आगे ले जाना चाहती है."
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कांग्रेस का गिरता ग्राफ़
साल 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को बिहार में क़रीब 8 फ़ीसदी वोट और एक सीट पर जीत मिल पाई थी. यह सीमांचल की किशनगंज सीट थी, जहां मुस्लिम वोटरों की आबादी काफ़ी ज़्यादा है.
साल 2014 के लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस को राज्य में कोई बड़ी सफलता नहीं मिली थी. उस वक़्त बिहार की महज़ दो सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली थी और क़रीब 9 फ़ीसदी वोट ही मिले थे.
बिहार में कांग्रेस ने अंतिम बार साल 1985 में राज्य में अपनी सरकार बनाई थी, जब उसे विधानसभा चुनावों में 196 सीटों पर जीत मिली थी.
साल 1989 में हुए भागलपुर दंगे और फिर साल 1990 में शुरू हुई 'मंडल' की राजनीति ने कांग्रेस की जड़ें हिला दीं.
इन दो घटनाओं के बाद साल 1990 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस महज़ 71 सीटें जीत पाई और उसके बाद से राज्य में पार्टी का ग्राफ़ लगातार गिरता चला गया.
वरिष्ठ पत्रकार नवीन उपाध्याय के मुताबिक़, कांग्रेस जब तक बिहार में सत्ता में रही, दलित, मुस्लिम और अगड़ी जातियों के वोटरों के सहारे ही रही.
नवीन उपाध्याय कहते हैं, "मंडल की राजनीति के बाद दलितों के वोट कई पार्टियों में बंट गए. मुस्लिम वोट आरजेडी और अगड़ी जातियों के वोट बीजेपी की तरफ चले गए. जबकि पिछड़ी जातियों के वोट अलग-अलग पार्टियों के पास हैं."
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कितनी उम्मीद
नवीन उपाध्याय मानते हैं कि अगड़ी जातियों के बीच आरजेडी को लेकर हमेशा एक संदेह रहा है, ऐसे में कांग्रेस अगर अगड़ी जातियों को जगह देती है इसका फ़ायदा महागठबंधन को भी हो सकता है.
बिहार में अगड़ी जातियों के वोट क़रीब 13 फ़ीसदी माने जाते हैं. सबसे ख़ास बात यह है कि उनका वोट बिखरा हुआ नहीं, बल्कि कुछ इलाक़ों में केंद्रित है. यह वोट कई सीटों पर हार-जीत का फ़ैसला करता है.
नवीन उपाध्याय कहते हैं, "औरंगाबाद को चित्तौड़गढ़ ऑफ़ बिहार कहते हैं, इस इलाक़े में राजपूत वोटरों का दबदबा है, मुज़फ़्फरपुर और बेगूसराय में भूमिहार, जबकि पटना में कायस्थों का वोट निर्णायक होता है, वहीं उत्तर बिहार की कई सीटों पर ब्राह्मण वोटर हार-जीत तय करते हैं."
नवीन उपाध्याय के मुताबिक़ आरजेडी के पास मुस्लिमों और यादवों का बड़ा वोट बैंक है जो क़रीब 30 फ़ीसदी वोट है, इसके अलावा नीतीश कुमार का भी एक वोट बैंक है और ऐसे में अगर अगड़ी जातियों के कुछ वोट महागठबंधन की तरफ आ जाएं तो इसे हरा पाना असंभव हो जाएगा.
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केवल माहौल या वोट भी?
पुष्पेंद्र कुमार भी इस बात से सहमत दिखते हैं कि अगड़ी जातियों से कांग्रेस ही नहीं बल्कि महागठबंधन को भी फ़ायदा हो सकता है.
उनका मानना है कि कांग्रेस को बने रहने के लिए अगड़ी जातियों के वोट की ज़रूरत है, वह अपने बुनियादी वोट के बिना आगे बढ़ ही नहीं सकती.
वो कहते हैं, "अगड़ी जातियों को महत्व देने के पीछे महागठबंधन की भी एक मौन सहमति हो सकती है, क्योंकि इससे वो बीजेपी के वोट काट सकते हैं और इससे महागठबंधन के दलों को भी कोई ख़तरा नहीं है."
पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "लेकिन इससे कांग्रेस बिहार में कोई विस्तार कर लेगी ऐसा नहीं लगता है, बल्कि अगड़ी जातियों को महत्व देने से चुनावी हवा बनाने में मदद मिल सकती है, क्योंकि ये साधन-संपन्न लोग हैं."
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