बिहार में बालू खनन: कितना बड़ा है कारोबार और क्यों होता है इसे लेकर संघर्ष

बिहार में बालू खनन

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से

पर्यावरण पर नज़र रखने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनईपी के मुताबिक़ पानी के बाद लोगों के इस्तेमाल में आने वाला दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक संसाधन 'बालू' और 'कंकड़' हैं.

दुनिया भर में हर साल 50 बिलियन टन (5 अरब टन) बालू और कंकड़ का इस्तेमाल कंस्ट्रक्शन के काम में होता है.

कुछ दशक पहले तक बालू का खनन घाटों के आसपास रहने वाले ग़रीब परिवारों का काम था. आमतौर पर वो ही बैलगाड़ियों पर लादकर इसे शहरों और कस्बों में बेचते थे. ट्रैक्टर और ट्रक से भी बालू ख़रीदने पर इसकी ढुलाई और मज़दूरी का ही ख़र्च चुकाना होता था.

मांग बढ़ने के साथ ही बालू की भी क़ीमत तय होने लगी. फिर शुरु हुई वर्चस्व की लड़ाई, बालू घाटों पर कब्ज़ा और खनन में गैंगवार.

जानकारों का दावा है कि बिहार में भी बालू में सरकार को भी 'बड़ा मुनाफ़ा' दिखने लगा और उसने खनन के पट्टे, लाइसेंस और नीलामी के माध्यम से इसे कमाई का जरिया बना लिया.

'बालू' अब मुफ़्त की चीज़ न रहकर 'पीला सोना' कहलाने लगा है और इस धंधे में बड़ी-बड़ी कंपनियां भी शामिल हो गई हैं.

बिहटा में महिला अधिकारी पर हमला

इसी सोमवार को बिहार की राजधानी पटना के बिहटा इलाक़े में कुछ लोगों ने पुलिस और खनन विभाग की महिला अधिकारी पर हमला कर दिया. आरोपों के मुताबिक़ महिला अधिकारी पर हमला करने वाले लोग बालू के अवैध खनन से जुड़े हुए हैं.

खनन विभाग की टीम उस दौरान बालू के अवैध कारोबार की जांच करने के लिए पहुंची थी. इसमें परिवहन विभाग के लोग भी ट्रकों की ओवरलोडिंग की जांच कर रहे थे.

इस छापेमारी में पुलिस के क़रीब 25 जवान सरकारी टीम की मदद के लिए मौजूद थे. खनन और परिवहन विभाग के लोगों को मिला दें तो यह तादाद क़रीब 50 की थी.

इतनी बड़ी टीम की मौजूदगी में भी खनन कारोबार से जुड़े लोगों ने सरकारी अधिकारियों के साथ मारपीट की और खनन विभाग की एक महिला इंस्पेक्टर को ज़मीन पर घसीटकर पीटा भी.

बिहार में बालू खनन

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यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ और बिहार पुलिस की साख पर भी इसने कई सवाल खड़े किए. इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी बिहार के पुलिस महानिदेशक को चिट्ठी लिखकर इसपर ज़ल्द और सख़्त कार्रवाई की मांग की है.

पटना के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने बीबीसी को बताया है कि इस मामले में तीन लोगों को चोट आई थी और इस घटना के संबंध में चार एफ़आईआर दर्ज की गई है. इसमें क़रीब 50 लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया है.

दरअसल इस छापेमारी में बालू के अवैध खनन और ट्रकों पर ओवरलोडिंग के आरोप में क़रीब 50 ट्रकों को ज़ब्त किया गया था. इसी के विरोध में कई ट्रक ड्राइवर और कंडक्टर ने पत्थरबाज़ी और हंगामा शुरू कर दिया था.

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यह घटना पटना के बिहटा थाना इलाक़े में परेव सोन घाट पर हुई थी. बिहार में सोन नदी के बालू को इलाक़े में कंस्ट्रक्शन के लिहाज़ से बेहतर माना जाता है क्योंकि इसमें मिट्टी की मात्रा कम होती है.

इसलिए सोन नदी के बालू की मांग बहुत ज़्यादा होती है और यह बिहार के अलावा पड़ोसी राज्यों तक भी पहुंचाई जाती है. पटना के एसएसपी के मुताबिक़ इस तरह के हमले की घटना सोन घाट पर पहली बार हुई है.

गैंगवार के बढ़ते मामले

बिहार राज्य के लिए बालू के मुद्दे पर हिंसा का यह पहला मामला नहीं है. राज्य में बालू के अवैध कारोबार से जुड़े लोगों ने सरकारी टीम के अधिकारियों और कर्मचारियों पर पहले भी कई बार हमले किए हैं.

बिहार में पटना, भोजपुर, रोहतास, औरंगाबाद, सारण और वैशाली जैसे ज़िलों में सरकारी टीम या अधिकारी पर 'बालू माफ़िया' के हमले की घटना ज़्यादा देखने को मिलती है.

बिहार के भोजपुर में साल 2021 में सोन नदी से बालू का अवैध खनन करने के आरोप में क़रीब 50 लोगों को गिरफ़्तार किया गया था. इस कार्रवाई में कई नाव भी ज़ब्त की गईं थी.

बालू का अवैध कारोबार इतना बड़ा है कि कई बार दो गुटों के बीच कई बार 'गैंगवार' भी हुए हैं.

पिछले साल सितंबर महीने में बिहटा के ही अमनाबाद दियारा इलाक़े में दो गुटों के बीच भारी गोलीबारी हुई थी. इसमें आधिकारिक तौर पर कम से कम एक व्यक्ति की मौत भी हुई थी. स्थानीय मीडिया में आई खबरों में मरने वालों की संख्या ज़्यादा बताई गई थी.

बिहार पुलिस के मुताबिक़ यह 'फौजिया' और 'सिपाही' गिरोह के बीच का संघर्ष था. सिपाही गिरोह का सरग़ना पहले से ही जेल में था, लेकिन गिरोह के बाक़ी लोगों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए यह गोलीबारी की थी.

भारत के कई इलाक़ों में बालू के लिए हिंसा और हमले की घटना आम बात है. इंडिया वाटर पोर्टल के आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2017 में भारत में बालू के अवैध खनन को रोकने की कोशिश में 26 लोगों को जान गंवानी पड़ी थी. इसमें पत्रकार और पुलिसवाले भी शामिल हैं.

बिहार राज्य के खान और भूतत्व विभाग ने साल 2022-23 में राज्य में बालू के अवैध कारोबार के संबंध में 4435 एफ़आईआर दर्ज की है. इसमें बालू का अवैध खनन, परिवहन और उसका भंडारण भी शामिल है.

इन मामलों में 2439 लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया है और बीस हज़ार से ज़्यादा वाहन भी ज़ब्त किए गए हैं. इसी सख़्ती और छापेमारी में बिहार में अक्सर बालू के अवैध कारोबार से जुड़े लोग और बालू के खनन की निगरानी करने वाली टीम के बीच संघर्ष होता है.

बालू खनन

बालू बना 'पीला सोना'

इंडिया वाटर पोर्टल के मुताबिक़ भारत में बालू की बड़ी मांग की वजह से यह काफ़ी फायदे वाला कारोबार है और इसी से बालू का अवैध खनन भी होता है.

भारत सरकार के खनन मंत्रालय के मुताबिक़ जिन शहरों के आसपास बालू मौजूद नहीं है, वहां मांग की वजह से बालू की कीमतें आसमान को छू रही हैं. मंत्रालय ने साल 2018 के अपने फ़्रेमवर्क में बताया है कि बंगलुरू और मुंबई जैसे शहरों में एक ट्रक बालू की क़ीमत 70 हज़ार से एक लाख़ रुपये तक होती है.

मंत्रालय के मुताबिक़ कई इलाक़ों में खनन से जुड़े लोग और इसकी ढुलाई करने वालों का एक 'समूह' बन गया है.

साल 1970 तक भारत में बालू आमतौर पर मुफ़्त की चीज़ हुआ करती थी. लोगों को इसके लिए नदी घाट से कंस्ट्रक्शन की जगह तक लाने के लिए ढुलाई का ख़र्च देना होता था. विकास और मांग बढ़ने के साथ ही बालू की कमी भी होती गई है.

यूएनईपी का आकलन है कि धरती के चारों ओर 27 मीटर मोटी और 27 मीटर ऊंची यानि क़रीब आठ मंज़िला दीवार बनाने में जितने बालू और कंकड़ की ज़रूरत होगी, उतनी मात्रा में बालू और कंकड़ हर साल धरती पर कंस्ट्रक्शन के काम में ख़र्च हो जाता है.

भारत के खनन मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में कंस्ट्रक्शन उद्योग की विकास दर साल 2011-15 के दौरान तीन फ़ीसदी से कम थी, जबकि साल 2016-20 के बीच इसके छह फ़ीसदी रहने का अनुमान लगाया गया था.

वहीं इंडिया वाटर पोर्टल के मुताबिक़ भारत में साल 2020 में कंस्ट्रक्शन के काम के लिए क़रीब डेढ़ बिलियन टन बालू की ज़रूरत का अनुमान था, इस लिहाज से यह एक बड़े फ़ायदे का कारोबार है.

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सरकार को करोड़ों की कमाई

पटना के ए एन सिंहा इस्टीट्यूट में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास के मुताबिक़ 1970 के दशक में सरकार और इस कारोबार से जुड़े लोगों को बालू के खनन में मुनाफ़ा दिखने लगा था.

प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास कहते हैं, "इसी मुनाफ़े में नदी घाटों के आसपास गुटों का जन्म हुआ और वर्चस्व की लड़ाई में वो घाटों पर कब्ज़ा करने लगे. फिर सरकार ने भी बालू के खनन पर टैक्स लगाकर कमाई का रास्ता तलाश लिया."

बिहार में साल 2016 में शराब पर पाबंदी लगने के बाद से बालू का खनन सरकार के लिए भी राजस्व का एक बड़ा ज़रिया है.

बिहार के खान और भूतत्व विभाग के निदेशक मो. नैय्यर ख़ान ने बीबीसी को बताया कि पिछले वित्त वर्ष यानी साल 2022-23 में सरकार ने बालू के कारोबार से 2650 करोड़ रुपये की कमाई की है. इसमें ईंट के कारोबार का भी एक छोटा हिस्सा शामिल है.

पिछले वित्त वर्ष के दौरान राज्य भर में बालू का अवैध कारोबार रोकने के लिए क़रीब 23 हज़ार छापेमारी गई थी और इसमें विभाग ने 300 करोड़ रुपये का ज़ुर्माना भी वसूला था.

प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास दावा करते हैं, "साल 2021 के अंत में मैंने निजी काम के लिए एक ट्रैक्टर बालू ख़रीदना चाहा तो मुझे इसकी क़ीमत 15,000 रुपये बताई गई. जब मैंने इसकी पड़ताल की तो पता चला कि कंपनियां बालू को सरकार के स्वीकृत दाम से तीन से चार गुना दाम पर बेचती हैं."

प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास के मुताबिक़ बिहार में सरकारी दर पर एक ट्रैक्टर बालू की क़ीमत चार हज़ार रुपये के आसपास होनी चाहिए. यह क़ीमत अलग-अलग इलाक़ों में थोड़ी कम या ज़्यादा हो सकती है.

उसके बाद उन्होंने यह शिकायत सरकार तक पहुंचाई. फिर जांच के बाद कई ठेकेदारों, सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों पर कार्रवाई भी हुई.

विद्यार्थी विकास आरोप लगाते हैं कि इन सबके बावज़ूद भी उनको क़रीब आठ हज़ार रुपये में एक ट्रैक्टर बालू ख़रीदना पड़ा. इस तरह का 'भ्रष्टाचार भी कई बार ठेकेदारों को मनमानी करने की छूट देता है.'

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रोज़गार से जुड़ी चुनौती

बिहार में नदियों के किनारे रहने वाले लोगों का पारंपरिक व्यवसाय बालू का खनन कर उसकी ढुलाई करना था. वो इसे पास के शहरों और कस्बों में बेचकर रोज़ी-रोटी कमाते थे.

प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास के मुताबिक़ बिहार में 20 से 30 फ़ीसदी मज़दूर बालू या इससे जुड़े क्षेत्र में काम करते हैं. इसमें बालू के खनन से लेकर उसकी ढुलाई और कंस्ट्रक्शन उद्योग तक शामिल है.

ज़ाहिर है जब बालू की क़ीमत बढ़ जाती है, तो कंस्ट्रक्शन उद्योग में काम मंदा हो जाता है. ऐसे में मज़दूरों के लिए रोज़ी-रोटी का संकट शुरू हो जाता है.

वहीं सरकार की तरफ से जब-जब बालू खनन पर सख़्ती होती है, तब बालू के खनन से लेकर कंस्ट्रक्शन उद्योग तक पर इसका असर पड़ता है.

दूसरी तरफ घाटों के किनारे रहने वाले लोगों को लगता है कि सरकार ने बालू घाटों को अपने नियंत्रण में लेकर उनका पारंपरिक पेशा छीन लिया है. ठेकेदारी शुरू होने से बालू बेचने वाले भी मज़दूर बनकर रह गए हैं.

राज्य में फ़िलहाल 524 बड़े बालू घाट हैं, जहां से आधिकारिक तौर पर बालू का खनन किया जा सकता है. बिहार में पिछले क़रीब एक दशक से बालू घाटों के लिए सरकार की तरफ से नीलामी की जाती है.

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नीलामी या बोली लगाने से बालू घाटों पर बड़ी-बड़ी कंपनियों का कब्ज़ा शुरू हो गया. ख़ास बात यह भी है कि इससे बिहार के बालू घाट चुनिंदा कंपनियों के कब्ज़े में आने लगे.

सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक़ साल 2015 में चौबीस ज़िलों के सभी बालू घाटों से अगले पांच साल के लिए बालू के खनन का ठेका 19 कंपनियों के पास था.

विद्यार्थी विकास कहते हैं, "इन इलाक़ों में मॉल या फ़ैक्ट्री नहीं है, जहां जाकर लोग मज़दूरी करेंगे. रोज़ी रोटी पर संकट की आशंका में अक्सर इन इलाक़ों में लोगों और पुलिस के बीच झड़प देखने को मिलती है."

वहीं मानसून के दौरान बालू के खनन पर रोक होती है, ताकि इस दौरान जलीय जीवों के प्राकृतिक व्यवहार और प्रजनन पर असर न पड़े. लेकिन पिछड़े इलाकों में इस मौसम में भी अवैध तरीके से बालू के खनन की कोशिश की जाती है, क्योंकि इसकी अच्छी क़ीमत मिल जाती है.

प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास आरोप लगाते हैं, "खनन की पूरी प्रक्रिया की ज़िम्मेदारी जिलाधिकारी के पास होनी चाहिए. बालू के खनन में नियमों के तहत इसमें पुलिस की कोई भूमिका नहीं है, लेकिन जगह-जगह थाने और पुलिस वाले इसमें शामिल हैं."

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