आनंद मोहन सिंह की रिहाई से क्यों ताज़ा हो गई हैं बिलकिस बानो मामले की यादें

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार के बाहुबली नेता और पूर्व सांसद आनंद मोहन सिंह की जेल से रिहाई में राज्य सरकार की भूमिका को लेकर बड़ा सवाल ये उठ खड़ा हुआ है कि क्या राज्य सरकारें कुछ चुनिंदा सज़ायाफ़्ता दोषियों को जेल से रिहा करवाने के लिए नियमों को तोड़-मरोड़ रही हैं.
इस मामले ने पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर हुए उस प्रकरण की याद भी ताज़ा कर दी है जिसमें 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो से सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में उम्र-क़ैद की सज़ा काट रहे 11 दोषियों को गोधरा जेल से रिहा कर दिया गया था.
ये मामला फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित है. इन 11 दोषियों की रिहाई को लेकर सवाल क्यों उठे थे उसका ज़िक्र हम आगे करेंगे.
पहले बात करते हैं आनंद मोहन सिंह की जिन्हें गुरुवार 27 अप्रैल को बिहार की सहरसा जेल से रिहा कर दिया गया. उन्हें साल 1994 में गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया की हत्या के मामले में दोषी पाया गया था.
आनंद मोहन सिंह को साल 2007 में मौत की सज़ा सुनाई गई थी जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया था.
आनंद मोहन सिंह की रिहाई तो चर्चा में है ही, लेकिन साथ ही बिहार सरकार की 10 अप्रैल को जारी की गई उस अधिसूचना पर भी सवाल उठ रहे हैं जिसके ज़रिये राज्य सरकार ने बिहार प्रिज़न मैन्युअल में एक ऐसा संशोधन किया जिसे किए बिना आनंद मोहन सिंह को रिहा नहीं किया जा सकता था.
ये भी पढ़ें:-बिलकिस बानो गैंगरेप- दोषियों को सज़ा से रिहाई तक

इमेज स्रोत, ANI
नियमों में क्या बदलाव किया गया?
10 अप्रैल को जारी अधिसूचना में बिहार के गृह विभाग ने "काम पर तैनात सरकारी सेवक की हत्या" को बिहार प्रिज़न मैन्युअल 2012 के सेक्शन 481(i)(a) से हटाने की घोषणा की.
साल 2012 में जारी किए गए बिहार प्रिज़न मैन्युअल के सेक्शन 481(i)(a) में बलात्कार और क़त्ल जैसे जघन्य अपराधों के साथ-साथ "काम पर तैनात सरकारी सेवक की हत्या" को भी शामिल किया गया था.
इस सेक्शन के तहत जिन अपराधों को लाया गया उनमें दोषी पाए गए और आजीवन कारावास की सज़ा भुगत रहे दोषियों की रिहाई का कोई प्रावधान नहीं था. ये प्रावधान उस सूरत में भी नहीं था जिसमें दोषी ने जेल में 20 साल की सज़ा भुगत ली हो.
आसान शब्दों में कहा जाए तो अगर बिहार सरकार 10 अप्रैल की अधिसूचना से प्रिज़न मैन्युअल में संशोधन करके एक वाक्य नहीं हटाती तो आनंद मोहन सिंह को रिहा नहीं किया जा सकता था.
ग़ौरतलब है कि इस संशोधन के बाद आनंद मोहन सिंह समेत 27 सज़ायाफ़्ता लोगों की रिहाई का रास्ता भी खुल गया है.
ये भी पढ़ें:-बिलकिस बानो मामलाः ऐसे छूट गए गैंगरेप के 11 गुनहगार

इमेज स्रोत, Getty Images
'ये सरकार का विवेक है'
जब बीबीसी ने बिहार के मुख्य सचिव आमिर सुभानी से संपर्क किया और इस संशोधन को लेकर हो रही आलोचना के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, "ये संशोधन सही और न्यायोचित है. ये सही किया गया है."
"ये सरकार का डिस्क्रेशन (विवेकानुसार) है और सरकार ने इसमें संशोधन किया है. मेरा ये समझना है कि ये संशोधन किसी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए नहीं किया गया है."
वहीं बिहार विधान परिषद के सदस्य और जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता नीरज कुमार का कहना था कि इस संशोधन को लेकर लगाए जा रहे आरोप राजनीति से प्रेरित हैं.
नीरज कुमार ने इस मामले की बराबरी बिलकिस बानो मामले से करते हुए कहा, "पहली बात तो ये है कि भारत सरकार ने 2022 में एक एडवाइज़री जारी की थी जिसमें कहा गया था कि कुछ श्रेणियों के बंदियों को न छोड़ा जाए. गुजरात सरकार ने उसका उल्लंघन किया तो किसी ने सवाल खड़ा नहीं किया."
ख़बरों के मुताबिक़, आनंद मोहन सिंह ने व्यंग्यात्मक तरीक़े से बिलकिस बानो मामले में रिहा किए गए दोषियों का ज़िक्र करते हुए कहा कि कि गुजरात में भी एक फ़ैसला नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल के दबाव में लिया गया है.
नीरज कुमार का कहना है कि आनंद मोहन सिंह 15 साल से ज़्यादा समय जेल में बिता चुके थे और उनकी रिहाई होने से पहले सभी क़ानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया.
उन्होंने कहा, "इस तरह के आरोप राजनीति से प्रेरित हैं. बिहार की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है."

इमेज स्रोत, Getty Images
बिलकिस मामले में कैसे रिहा हुए थे दोषी?
बिलकिस बानो के सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में 11 लोग उम्रक़ैद की सज़ा काट रहे थे.
पिछले साल 15 अगस्त को इन दोषियों को रिहा कर दिया गया. उस समय गुजरात सरकार ने कहा कि इन दोषियों की रिहाई का फ़ैसला सरकार की बनाई गई एक समिति ने 'सर्वसम्मति' से लिया.
इस फ़ैसले पर पहुँचने के लिए इस समिति ने गुजरात सरकार की 1992 की उस सज़ा-माफ़ी नीति को आधार बनाया था जिसमें किसी भी श्रेणी के दोषियों को रिहा करने पर कोई रोक नहीं थी.
1992 की सज़ा-माफ़ी नीति को आधार बनाने की आलोचना इसलिए हुई थी क्योंकि गुजरात सरकार ने साल 2014 में सज़ा-माफ़ी की एक नई नीति बनाई थी जिसमें कई श्रेणी के दोषियों की रिहाई पर रोक लगाने के प्रावधान थे.
इस नई नीति में कहा गया था कि बलात्कार और हत्या के लिए दोषी पाए गए लोगों को सज़ा-माफ़ी नहीं दी जाएगी.
तो ये बात साफ़ हो गई थी कि अगर गुजरात सरकार की बनाई गई जेल एडवाइज़री समिति 2014 की सज़ा-माफ़ी की नीति के मुताबिक़ चलती तो बिलकिस बानो केस में दोषी पाए गए सज़ायाफ़्ता मुजरिमों की रिहाई नहीं हो सकती थी.
इस मामले में गुजरात सरकार की आलोचना इस बात पर भी हुई कि जिस जेल एडवाइज़री समिति ने उन 11 दोषियों को सर्वसम्मति से रिहा करने का फ़ैसला लिया, उसके दो सदस्य भारतीय जनता पार्टी के विधायक, एक सदस्य बीजेपी के पूर्व निगम पार्षद और एक बीजेपी की महिला विंग की सदस्य थीं.
वहीं आनंद मोहन सिंह मामले के बारे में बिहार के मुख्य सचिव आमिर सुभानी का कहना है कि इस मामले पर जिस समिति ने फ़ैसला लिया, उसके अध्यक्ष गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव हैं और समिति में दो न्यायिक सदस्य भी हैं.
ये भी पढ़ें:-रूस के पास कौन-कौन से परमाणु हथियार हैं?

इमेज स्रोत, ANI
'ये राजकीय दया पक्षपातपूर्ण है'
बिहार सरकार का कहना है कि क़ैदियों की रिहाई पर विचार करने वाली समिति की पिछले 6 सालों में अब तक 22 बैठकें हो चुकी हैं जिनमें 1,161 बंदियों को छोड़ने पर विचार किया गया और आख़िरकार 698 बंदियों को छोड़ा गया.
सरकार ने ये भी कहा है कि क़ैदियों की रिहाई के फ़ैसले पर पहुँचने से पहले ज़िले के एसपी, प्रोबेशन अफ़सर से और ट्रायल कोर्ट के जज से भी रिपोर्ट मंगाई जाती है.
इन रिपोर्टों में रिहाई की सिफ़ारिश की जाने पर ही किसी भी क़ैदी को रिहा किया जाता है.
लेकिन बिहार सरकार इस सवाल का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रही है कि क्यों उसने 10 अप्रैल की अधिसूचना जारी कर नियमों में बदलाव किया.
प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग में कार्यरत हैं और एक जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार हैं.
बिलकिस बानो और आनंद मोहन सिंह के मामलों के सन्दर्भ में वो कहते हैं कि दोनों मामलों में समानता तो है ही और वो बहुत स्पष्ट है, "ये कहना कि बिहार सरकार ने सामान्य तौर पर नियमों में ये परिवर्तन किया है और किसी को ध्यान में रख कर नहीं किया है. लेकिन जिस वाक्यांश को हटाया गया है उसे हटाने का सीधा फ़ायदा आनंद मोहन सिंह को ही मिलता है."
ये लोगों को बेवक़ूफ़ बनाने की बात है क्योंकि इसका पहला फ़ायदा आनंद मोहन सिंह को ही मिला है.
वो कहते हैं, "इसलिए ये निष्कर्ष सीधे ही निकाला जा सकता है कि वास्तव में ये किसके लिए किया गया है और किसे इसका लाभ मिला है?
प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद के मुताबिक़, ये कोई सामान्य राजकीय दया का मामला नहीं है.
ये राजकीय दया पक्षपातपूर्ण है और राजनीतिक लाभ के लिए की गई है. ये बहुत स्पष्ट है.
तो क्या इस मामले में भी बिलकिस बानो मामले की तरह नियमों से छेड़छाड़ हुई है? प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि अगर दोनों मामलों की तुलना न भी की जाए तो भी ये कहा जा सकता है कि अपने ख़ास या चुनिंदा सज़ायाफ़्ता लोगों को नियमों में बदलाव करके रिहा करवाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है और "ये चिंता का विषय है."
वो कहते हैं, "ये जो हुआ है इसके बारे में कहा जा रहा है कि ये एक अति-विशेष को प्रसन्न करने के लिए किया गया है. ये बहुत ख़तरनाक़ है क्योंकि एक बार जब आप अपराध को स्वीकृति दे देते हैं तो अपराध के अलग-अलग प्रकारों को भी आप स्वीकृति दे देते हैं."
ये भी पढ़ें:-गुजरात दंगा: कितनों को इंसाफ़ मिला और कितने नाउम्मीद

इमेज स्रोत, BBC TELUGU
फ़ैसले पर नाराज़गी
डीएम जी कृष्णैया की पत्नी उमा का कहना है कि बिहार सरकार के इस फ़ैसले से समाज में ग़लत सन्देश जाएगा और अपराधियों को प्रोत्साहन मिलेगा. वे सोचेंगे कि जघन्य हत्या करने पर भी वे छूट जाएंगे.
उमा कृष्णैया का कहना है कि उन्होंने अपने पति के हत्यारे को वापस जेल भेजने के लिए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की है.

गुरुवार की सुबह आनंद मोहन सिंह के जेल से बाहर आने के कुछ घंटों बाद उनकी बेटी पद्मा ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया कि परिवार "निराश" है.
उन्होंने कहा, "मैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से दोबारा विचार करने का अनुरोध करती हूं. उनकी सरकार ने एक ग़लत उदाहरण पेश किया है. यह सिर्फ़ एक परिवार के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए अनुचित है."
साथ ही उन्होंने कहा कि परिवार अदालत में फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करेगा.
इसी बीच आनंद मोहन सिंह की "क़ैदियों के वर्गीकरण नियमों में बदलाव कर" की गई रिहाई के विषय पर भारतीय नागरिक और प्रशासनिक सेवा (केंद्रीय) संघ ने गहरी निराशा व्यक्त की है.
एक बयान में इस संघ ने कहा कि ये फ़ैसला न्याय से वंचित करने जैसा है और इससे लोक सेवकों के मनोबल में गिरावट तो होती ही है, साथ ही न्याय के शासन का मज़ाक़ उड़ता है.
संघ ने बिहार सरकार से जल्द से जल्द इस फ़ैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है.
ये भी पढ़ेंः-
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















