पाकिस्तान के सिंध में हिंदुओं को डकैतों के ख़िलाफ़ सड़क पर क्यों आना पड़ा

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- Author, रियाज़ सुहैल
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, कराची
"मेहरबानी करके हमारा बच्चा वापस ला दें. जब तक हमारा बच्चा वापस नहीं मिल जाता, हम वापस नहीं जाएंगे. एक महीने में हमारी क्या हालत हो गई, सागर के पिता और उनकी पत्नी की हालत तो देखो."
सिंध के सीमावर्ती शहर कशमोर में हो रहे विरोध प्रदर्शन में ऋषि बाई भी भाग ले रही हैं. ये धरना प्रदर्शन कशमोर से अगवा किए गए पांच लोगों की छुड़ाने के लिए किया गया है.
अगवा किए गए पांच लोगों में से तीन को कल रात छोड़ दिया गया, लेकिन ऋषि बाई के बेटे सागर कुमार और सात वर्षीय प्रियंका अभी तक अपहर्ता के क़ब्ज़े में हैं और फ़िलहाल उनके लिए विरोध प्रदर्शन जारी है.
धरने में जब ऋषि बाई प्रशासन और राजनेताओं से अपील कर रही थीं तो उस दौरान कुछ लोग हाथों में गुरुनानक की तस्वीर लिए हुए थे.
सागर कुमार की मां ने इस तस्वीर को हाथ में लेकर कहा, "हम अपने पीर की तस्वीर लेकर आएं हैं, इनके नाम पर हमारे बच्चे को छोड़ दो."
ऋषि बाई की आवाज़ सुनकर धरने में शामिल लोगों की आँखों में भी आंसू आ गए और महिलाएं उन्हें तसल्ली देने लगीं.
26 वर्षीय सागर कुमार का लगभग डेढ़ महीने पहले अपहरण कर लिया गया था.
वह कशमोर शहर में एक केबिन चलाते थे, उनके साथ मुखी जगदीश उनका सात साल का बेटा जयदीप और कशमोर अस्पताल के एमएस डॉक्टर मुनीर नाइच का भी अपहरण कर लिया गया था.
कशमोर से कराची तक धरने

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उत्तरी सिंध के कशमोर, कंधकोट, घोटकी और शिकारपुर जिले लंबे समय से डकैतों का गढ़ बने हुए हैं, यहां लोगों को ज़बरन अगवा करने के अलावा 'हनी ट्रैप' में फंसा कर भी अपहरण किया जाता है.
अगवा किए गए लोगों को छुड़ाने के लिए रविवार को 'अल्पसंख्यक अधिकार मार्च' की तरफ़ से कराची के क्लिफ़्टन इलाके में स्थित स्मारक 'तीन तलवार' पर धरना दिया गया.
धरने में शामिल हुए लोगों की तरफ़ से कच्छ में सैन्य ऑपरेशन की भी मांग की गई है. हिंदू समुदाय की तरफ़ से कशमोर और कंधकोट में, हड़ताल और विरोध प्रदर्शन किए गए.
पिछले चार दिनों से चल रहे धरने में सिंधी राष्ट्रवादी पार्टियों के अलावा अन्य राजनीतिक दल भी शामिल हुए.
इन धरनों और विरोध प्रदर्शनों की संख्या बढ़ती जा रही है और अब ये हैदराबाद, घोटकी, सुक्कुर, पन्नू आक़िल और उमरकोट सहित एक दर्जन से भी ज़्यादा छोटे बड़े शहरों में किए जा रहे हैं.
कशमोर में इस धरने को संबोधित करते हुए सिंध यूनाइटेड पार्टी के नेता ज़ैन शाह ने कच्छ में सैन्य ऑपरेशन की मांग की है.
उन्होंने दावा किया है, कि ख़राब पुलिस व्यवस्था के कारण अपहरण का कारोबार चरम पर पहुंच गया है. कच्चे और पक्के सभी अपराधियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाकर नागरिकों को सुरक्षा मुहैया कराई जाए.
आश्वासन और बरामदगी

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रविवार शाम कराची में आयोजित धरने को संबोधित करते हुए कशमोर कंधकोट ज़िले के पूर्व प्रांतीय मंत्री मीर शब्बीर बजारानी ने प्रदर्शनकारियों को आश्वासन दिया कि डॉक्टर मुनीर नाइच, मुखी जगदीश, जयदीप और सागर कुमार को 12 घंटों के अंदर छुड़वा लिया जाएगा.
हालांकि बारह घंटे तो नहीं लेकिन 36 घंटे के बाद डॉक्टर मुनीर, मुखी जगदीश और उनका बेटा रिहा होकर अपने घर पहुंच चुके हैं.
सोशल मीडिया पर शब्बीर बजारानी के इस आश्वासन को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि 'क्या सरदारों के अपहरणकायर्ताओं के साथ संबंध हैं?'
पूर्व प्रांतीय मंत्री शब्बीर बजारानी ने किसी भी समझौते या संरक्षण से इनकार किया है.
उनका कहना था कि उन्हें एसएसपी ने बताया था कि अगवा किए गए लोगों को बारह घंटे में रिहा करा लिया जाएगा, यही बात उन्होंने प्रदर्शनकारियों से कही थी.
उन्होंने कहा कि "कशमोर और अन्य शहरों में हड़ताल और विरोध प्रदर्शन हो रहे थे जिसकी वजह से पुलिस दबाव में थी."
पूर्व प्रांतीय मंत्री से जब सवाल किया गया कि पहले आपकी पार्टी पीपीपी की सरकार में थी, उस समय पुलिस इतनी कामयाब क्यों नहीं हो रही थी?
इस पर उन्होंने जवाब दिया कि "उन्होंने आईजी सिंध और मुख्यमंत्री से मुलाक़ात की है और उन्हें उन लोगों के नाम भी दिए थे जो इन घटनाओं में शामिल रहे हैं."
पुलिस कार्रवाई के बग़ैर रिहाई

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कशमोर से अगवा किए गए डॉक्टर मुनीर नाइच, मुखी जगदीश और उनके बेटे जयदीप अपने घर तो आ गए हैं, लेकिन उनकी बरामदगी के लिए पुलिस की तरफ़ से किसी ऑपरेशन या मुठभेड़ की कोई ख़बर नहीं है.
एसएसपी अमजद शेख़ ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "पुलिस कई दिनों से डकैतों की तलाश में थी और यह बरामदगी उसी का नतीजा है."
हालांकि, वो ये स्पष्ट नहीं कर सके कि इस बरामदगी के लिए क्या कार्रवाई की गई.
एसएसपी अमजद शेख़ शिकारपुर में तैनात हैं लेकिन कशमोर कंधकोट जिले का अतिरिक्त प्रभार भी उनके ही पास है.
उनका कहना था कि "जब उन्होंने कार्यभार संभाला था, तो उस समय 52 लोग अगवा थे, जिनमें से सात बच्चों सहित 42 लोगों को वो छुड़वा चुके हैं."
उनका दावा है कि इस दौरान उन्होंने बच्चों को अगवा करने वाले एक गैंग के कुछ लोगों को भी पकड़ा है.
सोशल मीडिया पर पुलिस पर लगे आरोपों को ख़ारिज करते हुए एसएसपी अमजद शेख़ ने कहा कि "अगर फ़िरौती का मामला भी होता है तो वह डकैतों और अगवा किये गए व्यक्ति के परिवार के बीच रहता है, इसमें पुलिस की कोई भूमिका नहीं होती है."
अगर अगवा किए गए व्यक्ति के परिजनों के पास इतनी रक़म होती तो वे उन्हें पहले ही रिहा करा लेते. वे दो से ढाई महीने तक इंतजार नहीं करते.
कशमोर के पत्रकार मुमताज़ सोलंकी का कहना है, "दबाव डालने के लिए पुलिस डकैतों के रिश्तेदारों और मददगारों को गिरफ्तार कर लेती है, इस दबाव के बाद एक डील होती है, जिसमें अगवा किये गए लोगों को छोड़ने के बदले पुलिस उनके रिश्तेदारों को छोड़ती है."
उनके मुताबिक़, "इसमें फ़िरौती का भी दख़ल रहता है मुखी और उनके बेटे को छोड़ने के लिए फ़िरौती की डील आख़िरी चरण में थी."
कशमोर धरने और सिंध में अपहरण की घटनाएं सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय रही.
एक्स (ट्विटर) पर ख़ालिद हुसैन कुरी लिखते हैं कि "अगर डकैत सरदारों के पाले हुए हैं, तो पुलिस दोषी है, अगर डकैत पुलिस के पाले हुए हैं, तो भी पुलिस दोषी है, लेकिन अगर डकैतों को पुलिस और सरदार साथ में मिलकर पाल रहे हैं, तो भी दोष पुलिस का ही है."
पत्रकार इमदाद सूमरो लिखते हैं कि डकैतों के चंगुल से बरामद होने वाला व्यापारी और मासूम बच्चा सिंध पुलिस के कार्रवाई पर एक बड़ा सवालिया निशान है.
पुलिस जो काम लंबे समय से नहीं करा सकी वह दो दिन के धरने से कैसे हो गया. पुलिस और सरदार बंधकों को वापस कैसे ले आए?
उन्होंने सवाल किया कि क्या अगवा किये गए लोग सच में डकैतों के पास थे, या किसी मुखिया के चंगुल में थे, या डकैतों के नाम पर पुलिस के पास थे?
एडवोकेट शिहाब ओस्तु लिखते हैं कि "पूरा सिंध विरोध प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन डकैतों को बचाने वालों के राजनीतिक संरक्षक सत्ता की दौड़ में लगे हुए हैं."
शहनीला ज़रदारी लिखती हैं कि "जब एक विरोध प्रदर्शन से इतनी जल्दी बरामद किये जा सकते हैं, तो पहले क्यों नहीं हुए?' क्या पुलिस को सक्रीय करने के लिए विरोध प्रदर्शन ज़रूरी है? कशमोर में रहने वालों को आख़िर पुलिस ने डकैतों के रहमो करम पर क्यों छोड़ दिया?"
एक और महीना लगता
डकैतों से छुड़ाए गए मुखी जगदीश ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि हम पुलिस की मुठभेड़ की वजह से छूट पाए हैं.
उन्होंने बताया कि हमें बलूचिस्तान में कहीं और शिफ्ट किया जा रहा था तो पुलिस की डकैतों के साथ मुठभेड़ हुई और लुटेरे हमें छोड़कर भाग गए.
वहां मौजूद पुलिसकर्मी ने कहा, कि घबराओ नहीं हम पुलिस वाले हैं और मुझे अपने साथ ले आये, लेकिन मेरी आंखों पर पट्टी बंधी रही.
हालांकि, मुखी जगदीश ने कल रात धरने को संबोधित करते हुए इसके उलट बयान दिया.
धरने को संबोधित करते हुए कहा कि डाकुओं ने उन्हें कहा कि कराची तीन तलवार से लेकर कशमोर तक विरोध प्रदर्शन हो रहा है जिसकी वजह से तुम्हें छोड़ रहे हैं, इसके बाद वो नौ बजे हमें गाड़ी में लेकर निकल गए और दो ढाई घंटे के बाद हमें छोड़ दिया गया.
उनके मुताबिक़, "जनता के विरोध की वजह से उन्हें जल्दी छोड़ दिया गया नहीं तो इसमें एक डेढ़ महीना और लग जाता."
डकैतों ने सोशल मीडिया पर मुखी जगदीश और सागर कुमार के वीडियो भी शेयर किए थे, जिसमें दोनों लोगों को जंज़ीरों से बांधकर उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा था.
हालांकि, बीबीसी से बात करते हुए मुखी जगदीश ने इस बात से इनकार किया और कहा कि डकैतों रिश्तेदारों पर दबाव बनाने के लिए यह नाटक किया था, उन्हें बहुत अच्छी तरह से रखा गया था. वे मांस मछली नहीं खाते, इसलिए उनके लिए दाल बनाई जाती थी.
मुखी जगदीश के बेटे जयदीप ने जब ये कहा कि "खाने में रूखी रोटी दी जाती थी' तो मुखी ने स्पष्ट करते हुए कहा कि नहीं, ऐसा नहीं था, जब वे मांस या मछली बनाते थे तो रूखी रोटी दी जाती थी."
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