'मोदी की अर्थनीति' की विरासत मिलीजुली रही है: रघुराम राजन

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रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर और दुनिया भर में अपनी आर्थिक विशेषज्ञता के लिए चर्चित रघुराम राजन ने कहा है कि भारत बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जा रही मज़बूत आर्थिक वृद्धि दर पर भरोसा कर बड़ी ग़लती कर रहा है.
रघुराम राजन ने कहा कि भारत को चाहिए कि वह अपनी संरचानात्मक समस्याओं को सुलझाए तभी वह मज़बूती से उभर सकता है.
बीबीसी संवाददाता निखिल इनामदार को दिए इंटरव्यू में रघुराम राजन ने पीएम मोदी के 10 साल के कार्यकाल में भारत की अर्थव्यवस्था पर विस्तार से बात की है.
राजन मानते हैं कि बीते सालों में लोगों पर निवेश नहीं किया गया है.
वो कहते हैं, “इन्फ़्रास्ट्रक्चर के लेवल पर नीतियों को लागू करना बेहद मज़बूत रहा है, चिंता की बात ये है कि अर्थव्यवस्था को और उदार बनाए जाने की ज़रूरत थी. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती और चिंता की बात ये है कि हमने अब तक मानवीय पूंजी विकसित नहीं की है. हमने लोगों में निवेश नहीं किया है.”
“महामारी गुज़री है और बहुत से बच्चे (स्कूलों में) पीछे छूट गए हैं, कुछ राज्यों को छोड़कर हमने उन बच्चों पर निवेश नहीं किया है. उन बच्चों को वापस स्कूलों में लाने में हम नाकाम रहे हैं. कुपोषण अभी भी 35 फ़ीसदी है जो कि सब-सहारा अफ़्रीका के कई देशों से अधिक, यह स्वीकार्य नहीं है.”
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लेकिन लोग ये मानते हैं कि आर्थिक विकास के लिहाज से ये दशक अब तक का सबसे बेहतर दशक रहा है. सरकार इसे इसी तरह से पेश कर रही है.
रघुराम राजन इस मुद्दे पर कहते हैं कि "आंकड़ें इसकी तस्दीक नहीं करते हैं. आंकड़े ये कहते हैं कि हम सात-साढ़े सात प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं. हम महामारी से पहले के दौर की स्थिति से चार-पांच फीसदी पीछे चल रहे हैं. आप बेरोज़गारी के आंकड़ों को देखें तो स्थिति चिंताजनक लगेगी. सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने वाले लोगों के आंकड़ें देखें, रेलवे की नौकरी के लिए एक करोड़ 20 लाख लोग आवेदन कर रहे हैं. ये सब कुछ मिली जुली स्थिति का संकेत देते हैं. हां, अच्छी चीज़ें हुई हैं लेकिन हालात उतने भी अच्छे नहीं हैं."
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के प्रोफ़ेसर राजन ने ब्लूमबर्ग को भी एक इंटरव्यू दिया है. इसमें उन्होंने कहा कि चुनाव के बाद भारत में जो भी नई सरकार आएगी उसे लोगों की शिक्षा और स्किल पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए.
राजन ने कहा कि बिना शिक्षा और स्किल के भारत युवा आबादी का फ़ायदा नहीं उठा सकता है.
उन्होंने कहा कि “एक अरब 40 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में 30 से नीचे की उम्र वालों की तादाद आधी से ज़्यादा है. जिन दावों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है, उन पर भरोसा करना एक बड़ी ग़लती होगी. भारत के राजनेता चाहते हैं कि लोग इन दावों पर भरोसा करें और ऐसा माहौल तैयार हो कि लोग भरोसा करने लगें ये फिर से सरकार बना रहे हैं.”
पीएम मोदी के लक्ष्य को किया ख़ारिज

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्ष्य रखा है कि भारत को 2047 तक विकसित देश बनाना है लेकिन रघुराम राजन इस लक्ष्य को ख़ारिज करते हैं.
राजन ने कहा कि यह बहुत तार्किक नहीं है क्योंकि भारत के बच्चे बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर पा रहे हैं और बीच में ही पढ़ाई छूटने की दर बहुत ज़्यादा है.
राजन ने कहा, ''हमारी श्रम शक्ति बढ़ रही है लेकिन इसका फ़ायदा तभी मिलेगा जब अच्छा रोज़गार हासिल होगा. भारत के लिए सबसे ज़रूरी यह है कि वो अपनी श्रम शक्ति को रोज़गार मुहैया कराए और नए रोज़गार पैदा करे.''
राजन ने भारत के स्कूली बच्चों की पढ़ने की क्षमता पर भी सवाल उठाया है. उन्होंने कहा कि ग्रेड थ्री के केवल 20.5 प्रतिशत बच्चे ही ग्रेड टू के टेक्स्ट पढ़ सकते हैं.
राजन ने कहा कि भारत की साक्षरता दर वियतनाम जैसे एशियाई देश से भी नीचे है. उन्होंने कहा कि ऐसे आँकड़े हमें निराश करते हैं, हमें मानवीय संसाधन में गुणवत्ता की कमी दशकों पीछे धकेल रही है.
रघुराम राजन ने कहा कि आठ प्रतिशत की टिकाऊ वृद्धि दर के लिए भारत को अभी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है, भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर जो उम्मीद की जा रही थी, उसमें ये आँकड़े निराशा पैदा करते हैं.
चिप मैन्युफ़ैक्चरिंग की जगह इसको मानते हैं बेहतर
भारत में तेज़ी से हो रहे विस्तार का फ़ायदा उठाने के लिए विदेशी निवेशक भारत का रुख़ कर रहे हैं.
इसी के मद्देनज़र सरकार का अनुमान है कि आगामी वित्त वर्ष में वृद्धि दर 7 फ़ीसदी से अधिक हो जाएगी. इस वजह से ये दुनिया में भारत को सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना रही है.
राजन का कहना है कि मोदी सरकार उच्च शिक्षा में सालाना बजट बढ़ाने की तुलना में चिप मैन्युफ़ैक्चरिंग में सब्सिडी पर अधिक ख़र्च करने की नीति अपना रही है जो कि ग़लत रास्ते पर चलने वाला है.
सेमी-कंडक्टर के बिज़नेस को भारत में चलाने के लिए 760 अरब रुपये की सब्सिडी दी गई है जबकि उच्च शिक्षा के लिए 476 अरब रुपये बजट में दिए गए हैं.
राजन ने कहा कि शिक्षा प्रणाली को ठीक करने के काम की जगह चिप मैन्युफ़ैक्चरिंग जैसे हाई प्रोफ़ाइल प्रोजेक्ट्स पर सरकार का ध्यान अधिक है जबकि उसे इन उद्योगों के लिए प्रशिक्षित इंजीनियरों को पैदा करने की ज़रूरत है.
उन्होंने कहा, ''मुझे चिंता इस बात की है कि हम प्रतिष्ठा के लिए परियोजनाओं पर अधिक केंद्रित हो गए हैं, जो एक बड़े महान राष्ट्र की महत्वाकांक्षा की ओर इशारा करता है. जैसे कि चिप मैन्युफ़ैक्चरिंग. लेकिन हम उन आधार को छोड़ रहे हैं जो कि एक टिकाऊ चिप मैन्युफ़ैक्चरिंग उद्योग में योगदान देते हैं.”
राज्यों को नियंत्रण देने की वकालत

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शिकागो यूनिवर्सिटी के बूथ स्कूल ऑफ़ बिज़नेस में फ़ाइनेंस के प्रोफ़ेसर राजन वैश्विक अर्थव्यवस्था के जाने-माने टिप्पणीकार हैं और साथ ही वो भारत की नीतियों को लेकर खुलकर बोलते रहे हैं.
साल 2016 में भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर के रूप में उनका कार्यकाल समाप्त हो गया था, जिसके बाद वो अध्यापन क्षेत्र में वापस चले गए थे.
हाल ही में उनकी ‘ब्रेकिंग द मोल्ड: रीइमेजिनिंग इंडियाज इकोनॉमिक फ़्यूचर’ नामक किताब आई है जिसमें वो सह-लेखक हैं. उन्होंने भारत के विकास को लेकर अपने नज़रिए को लिंक्डइन पर वीडियो के ज़रिए शेयर भी किया है.
शिक्षा बेहतर करने के अलावा राजन ने प्रशासन के लिए कई नीतियों को प्राथमिकता देने को कहा है, जिनमें असमानता कम करने और श्रम आधारित उत्पादन को बढ़ाने की सलाह है.
उन्होंने ये भी कहा कि भारत का गवर्निंग सिस्टम बहुत सेंट्रलाइज़्ड है और राज्यों को नियंत्रण देने से विकास को बेहतर करने में मदद मिलेगी.
राजन ने कहा कि ‘हमें व्यावहारिक दृष्टिकोण की ज़रूरत है.’
चीन के पूर्व नेता डेंग जियाओपिंग के वक्तव्य का हवाला देते हुए राजन ने कहा कि अगर भारत चीन से कुछ सीख सकता है तो वो ये होना चाहिए कि ‘इससे फ़र्क नहीं पड़ता है कि बिल्ली काली है या सफ़ेद है, फ़र्क़ इससे पड़ता है कि वो चूहा पकड़ती है या नहीं.’
जियाओपिंग को ही चीन के आर्थिक कायाकल्प का अगुवा माना जाता है.

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मोदी सरकार की आलोचना करते रहे हैं रघुराम राजन
यह पहली बार नहीं है जब रघुराम राजन ने मोदी सरकार को निशाने पर लिया है. इससे पहले भी वह मोदी सरकार की कथित बहुसंख्यकवादी राजनीति को लेकर आलोचना करते रहे हैं.
अक्टूबर 2019 में राजन ने कहा था कि बहुसंख्यकवाद और निरंकुशता से देश अंधकार में जाएगा और अस्थिरता बढ़ेगी.
राजन ने कहा था कि भारत की अर्थव्यवस्था में वृद्धि दर टिकाऊ नहीं है और लोकप्रिय नीतियों के कारण ख़तरा है कि अर्थव्यवस्था कहीं लातिन अमरीकी देशों की तरह न हो जाए.
रघुराम राजन ने भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती के लिए नोटबंदी और जीएसटी को ज़िम्मेदार ठहराया था. अमेरिका की ब्रॉन यूनिवर्सिटी में ओपी जिंदल लेक्चर में राजन ने कहा था कि सरकार पर प्रोत्साहन पैकेज को लेकर काफ़ी दबाव है.
रघुराम राजन आईएमएफ़ के मुख्य अर्थशास्त्री भी रहे हैं. राजन ने भारतीय अर्थव्यवस्था में आई रुकावट के लिए मोदी सरकार में सारी शक्तियों के केंद्रीकृत होने को ज़िम्मेदार बताया था.
उन्होंने कहा था, ''मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में अर्थव्यवस्था के लिए कुछ अच्छा नहीं किया क्योंकि इस सरकार में सारी शक्तियां एक जगह थीं. ऐसे में सरकार के पास अर्थव्यवस्था को लेकर कोई दृष्टिकोण नहीं था. मंत्रियों के पास कोई ताक़त नहीं थी. ब्यूरोक्रेट्स फ़ैसले लेने को लेकर अनिच्छुक थे. गंभीर सुधार के लिए कोई आइडिया नहीं था.''
राजन ने कहा था, ''यहां तक कि सीनियर अधिकारियों को बिना कोई सबूत के हिरासत में ले लिया गया. मैं इस बात को लेकर दुखी हूं कि पूर्व वित्त मंत्री को बिना कोई जांच के जेल में कई हफ़्तों स रखा गया है. संस्थानों की कमज़ोरी से सभी सरकारों के निरंकुश बनने की आशंका रहती है. ऐसा 1971 में इंदिरा गांधी के वक़्त में भी था और अब 2019 में मोदी के वक़्त में है.''
तब रघुराम राजन की आलोचना को जबाव देते हुए बीजेपी में विदेश मामलों के प्रमुख विजय चौथाईवाले ने ट्वीट किया था, "एक पूर्व आरबीआई प्रमुख ने सरकार चलाई और देश ने दस साल खो दिए. मोदी का शुक्रिया कि भारत अब ये ग़लती नहीं दोहराएगा."
चौथाईवाले ने अपने ट्वीट में नाम लिए बग़ैर मनमोहन सिंह पर निशाना साधा, क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी पहले आरबीआई के गवर्नर थे और 2004 से लेकर 2014 तक वह भारत के प्रधानमंत्री रहे थे.
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