गुरुमूर्ति बने RBI में निदेशक, मोदी सरकार पर उठ रहे सवाल

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- Author, टीम बीबीसी
- पदनाम, नई दिल्ली
दक्षिणपंथी विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क़रीबी कहे जाने वाले एस गुरुमूर्ति को भारत के केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) में अंशकालिक निदेशक बनाया गया है.
आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के जाने के बाद से ही मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस आरोप लगाती रही है कि केंद्र सरकार बैंक के स्वतंत्र फ़ैसले लेने की क्षमता को प्रभावित कर रही है.
मंगलवार की रात स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक गुरुमूर्ति की आरबीआई में नियुक्ति का फ़ैसला आया. जब नवंबर 2016 में पीएम मोदी ने नोटबंदी का फ़ैसला किया था तो इसके पीछे गुरुमूर्ति का ही दिमाग़ बताया गया था.
विचारधारा का इनाम?
गुरुमूर्ति अगले चार सालों तक आरबीआई बोर्ड में अंशकालिक निदेशक रहेंगे. गुरुमूर्ति के साथ सतीश मराठे को भी बोर्ड का निदेशक बनाया गया है. मराठे बैंकर रहे हैं और वो एक एनजीओ के भी मालिक रहे हैं.
गुरुमूर्ति की नियुक्ति को विदेशी मीडिया ने भी तवज्जो दी है. फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने लिखा है कि हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी पर बैंकों की स्वायत्तता को कमज़ोर करने के आरोप लग रहे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ने कहा है कि गुरुमूर्ति को उनकी हिन्दूवादी विचारधारा के कारण ही नियुक्त किया गया है.
गुहा ने बीबीसी से कहा, ''गुरुमूर्ति ख़ुद को चार्टड अकाउंटेंट कहते हैं. इसके अलावा तो उनकी कोई विशेषज्ञता है नहीं. उन्होंने ही मोदी जी को नोटबंदी और मुद्रा योजना का आइडिया दिया था और उसे स्वीकार भी किया. वो आरएसएस और स्वदेशी जागरण मंच से जुड़े रहे हैं इसलिए ये इनाम मिला है.''
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फैसले में कुछ ग़लत नहीं: भाजपा नेता

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गुहा ने कहा कि वित्त मंत्रालय भी एक चार्टड अकाउंटेंट के पास है और अब आरबीआई में निदेशक का पद भी.
गुहा यहां वित्त मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे पीयूष गोयल का ज़िक्र कर रहे थे जो पेशे से चार्टड अकाउंटेंट रहे हैं.
हालांकि सत्ताधारी पार्टी भाजपा का कहना है कि इस फैसले में कुछ ग़लत नहीं है.
भाजपा नेता और अर्थशास्त्र के जानकार नरेंद्र तनेजा ने बीसीसी से कहा, "बोर्ड में कुल 20 निदेशक होते हैं, जिनमें से एक पद गुरुमूर्ति को स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दिया गया है. जिसकी भी सरकार होती है, वे अपने विचार के लोगों को पद देते ही हैं. अलग-अलग विचार वाले लोगों को लाने में दिक्कत नहीं है. गुरुमूर्ति चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, उनकी विशेषज्ञता है, इसलिए इस फैसले में कुछ फैसले में ग़लत नहीं है."
निदेशक बनाए जाने के बाद गुरुमूर्ति ने ट्विटर पर लिखा है, ''मुझे पहली बार यह पद मिला है. मैंने कभी निजी क्षेत्र या पीएसयू में निदेशक के पद को स्वीकार नहीं किया. मैंने कभी पीएसयू या निजी कंपनी में कोई ऑडिट भी नहीं किया. मैं स्वतंत्र होकर बोलना चाहता था. लेकिन जब दबाव बढ़ा कि मुझे लोगों के हित में काम करना चाहिए तो मैंने इसे स्वीकार किया.''
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गुरुमूर्ति की नियुक्ति पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कोई टिप्पणी नहीं की है. अपनी नई भूमिका में गुरुमूर्ति बैंक की कार्यप्रणाली पर नज़र रखेंगे. बोर्ड की मीटिंग में उनके पास एक वोट देने का भी हक़ होगा. हालांकि वो किसी मुद्रा नीति समिति का हिस्सा नहीं होंगे जो ब्याज़ दरों का निर्धारण करती है.
इससे पहले गुरुमूर्ति आरबीआई की नीतियों को लेकर बोलते रहे हैं. वह रघुराम राजन के प्रमुख आलोचकों में रहे हैं. राजन आईएमएफ़ में अर्थशास्त्री थे और उन्हें यूपीए सरकार के समय वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम ने आरबीआई का गवर्नर बनाया था.
साल की शुरुआत में गुरुमूर्ति ने एक ट्वीट किया था, "भारत के केंद्रित समाधान तलाशने के बजाय आरबीआई वैश्विक विचारों के अधीन काम कर रहा है. ऐसा करके रघुराम राजन ने आरबीआई की स्वायत्तता को नुक़सान पहुंचाया है. आरबीआई अब इस लाइन से हट नहीं सकेगा, क्योंकि उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा से अलग होने का डर रहेगा. आरबीआई ने भारत के लिए सोचने की अपनी क्षमता खो दी है."
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आरबीआई की करते रहे हैं आलोचना

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देश को क़र्ज़ से उबारने और अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कई लोग सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण की वकालत करते हैं लेकिन गुरुमूर्ति ऐसी कोशिशों का विरोध कर चुके हैं.
गुरुमूर्ति ने ट्वीट में कहा था, "मैं कह चुका हूं कि आरबीआई देश के व्यापार को नष्ट कर रहा है और सरकार पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण का दबाव बना रहा है. आरबीआई ये सब एक एजेंडा के तहत कर रहा है. ये ग़लत है. आरबीआई को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो देश के लिए हों और देश के काम भी आएं."
2016 में लागू किए गए विवादित नोटबंदी के फैसले का उन्होंने पुरज़ोर समर्थन किया था. उस वक़्त 500 और एक हज़ार के नोटों को रातोंरात चलन से बाहर कर दिया गया था.
नोटबंदी के ज़रिए सरकार काले धन की समस्या से निपटना चाहती थी, लेकिन कई जानकार मानते हैं कि इससे देश की अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचा.
राजनीतिक समीक्षक और पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने पिछले साल अपनी एक रिपोर्ट में गुरुमूर्ति को उन कुछ गिने-चुने लोगों में से एक बताया था जिन्होंने इस नीति को लेकर प्रधानमंत्री मोदी को सलाह दी थी.
कुछ अधिकारियों की माने तो इस मामले में आरबीआई गवर्नर, वित्त मंत्री और मुख्य आर्थिक सलाहकार को भी अंधेरे में रखा गया था. हालांकि गुरुमूर्ति ने यह भी कहा था कि सरकार इस नीति को सही तरीक़े से लागू करने में नाकाम रही और इस आधार पर उन्होंने सरकार की आलोचना भी की थी.
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