रघुराम राजन की राहुल गांधी से मुलाक़ात पर भड़की बीजेपी, क्या बोली कांग्रेस

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भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने बुधवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ लंबी बातचीत में कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अगला साल मुश्किलों से भरा हो सकता है.
राजन बुधवार को राहुल गांधी के नेतृत्व वाली 'भारत जोड़ो यात्रा' में राजस्थान के सवाई माधोपुर में शामिल हुए थे. इसके बाद दोनों के बीच आर्थिक असमानता समेत अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम मुद्दों पर बातचीत हुई.
बीजेपी ने रघुराम राजन के साथ राहुल गांधी की बातचीत की आलोचना करते हुए कहा कि राजन को कांग्रेस ने ही नियुक्त किया था, ऐसे में उनके साथ बातचीत पर किसी तरह का आश्चर्य नहीं होना चाहिए.
बीजेपी में विदेश मामलों के प्रमुख विजय चौथाईवाले ने ट्वीट किया, "एक पूर्व आरबीआई प्रमुख ने सरकार चलाई और देश ने दस साल खो दिए. मोदी का शुक्रिया कि भारत अब ये ग़लती नहीं दोहराएगा."
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चौथाईवाले ने अपने ट्वीट में नाम लिए बग़ैर मनमोहन सिंह पर निशाना साधा, क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी पहले आरबीआई के गवर्नर थे और 2004 से लेकर 2014 तक वह भारत के प्रधानमंत्री रहे थे.
इस पर कांग्रेस की ओर से पी चिदंबरम ने कहा है कि बीजेपी इस मुलाक़ात को लेकर इसलिए नाराज़ है क्योंकि पीएम मोदी अर्थशास्त्रियों से नहीं मिलते और अर्थशास्त्री उनसे नहीं मिल सकते.
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इसके साथ ही कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा, "मोदी सरकार के पूरे मंत्री एक साथ आकर भी रघुराम राजन की क्षमताओं की बराबरी नहीं कर सकते. अगर वे नोटबंदी जैसा फ़ैसला लेने से पहले रघुराम राजन जैसे शख़्स से सलाह-मशविरा करते तो देश की अर्थव्यवस्था उस तबाही से बच जाती जिसमें पीएम मोदी ने इसे झोंक दिया है."

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अर्थव्यवस्था पर क्या बोले रघुराम राजन
राहुल गांधी ने इस बातचीत में भारत की मौजूदा आर्थिक स्थितियों, आर्थिक असमानता और लघु उद्योगों के सामने चुनौतियों को लेकर सवाल किए.
इस पर रघुराम राजन ने कहा, "बढ़ती हुई असमानता एक बड़ी समस्या है. ये सिर्फ़ चुनिंदा उद्योगपतियों की बात नहीं है. उच्च मध्यवर्ग की आय महामारी के दौरान बढ़ गयी, क्योंकि वे घर से काम कर सकते थे. ग़रीब लोगों को कारखानों में जाकर काम करना पड़ता था और फ़ैक्ट्रियां बंद होने से उन्हें मासिक आय नहीं हुई.
ऐसे में महामारी के दौरान ये खाई काफ़ी बढ़ गयी. जो सबसे ग़रीब है, उन्हें तो राशन आदि मिलता है. अमीरों का कोई नुक़सान नहीं हुआ है. लेकिन निम्न मध्यवर्ग को काफ़ी नुक़सान हुआ.
इस वर्ग की नौकरियां चली गयीं, बेरोज़गारी बढ़ रही है, इस वर्ग के लोग कर्ज़ ज़्यादा ले रहे हैं. ब्याज़ दर बढ़ रही है. इस वर्ग को काफ़ी नुक़सान हुआ है. ऐसे में हम जो भी नीति बनाएं, उनके लिए बनानी चाहिए."
कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी की राजनीतिक आलोचना करते हुए अंबानी और अडानी जैसे भारत के शीर्ष उद्योगपतियों का ज़िक्र करते हैं.
राजन के साथ भी बातचीत में राहुल गांधी ने कुछ चुनिंदा लोगों के हाथों में आर्थिक शक्ति के केंद्रित होने पर सवाल किया.
इस पर रघुराम राजन ने कहा, "आपने कुछ उद्योगपतियों में आर्थिक ताक़त केंद्रित होने की बात की, मुझे लगता है कि हमें इस तरफ़ भी ध्यान देने की ज़रूरत है. हम पूंजीवाद के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते. लेकिन हमें प्रतिस्पर्धा के लिए संघर्ष करना है."
इस पर राहुल गांधी ने सवाल किया कि 'आपके कहने का मतलब ये है कि हम मोनोपॉली के ख़िलाफ़ हो सकते हैं?'
रघुराम राजन ने कहा, "जी हां, हम मोनोपॉली के ख़िलाफ़ हो सकते हैं. लेकिन पूंजीवाद तो...ये जो छोटे व्यवसायी और बड़े उद्योगपति दोनों देश के लिए अच्छे हैं. लेकिन मोनोपॉली अच्छी नहीं है."
बता दें कि दुनिया भर में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए सरकारें संघर्षरत हैं.
अमेरिका में फ़ेसबुक, गूगल, अमेज़ॉन और माइक्रोसॉफ़्ट जैसी शीर्ष टेक कंपनियों को प्रतिस्पर्धा से जुड़ी सुनवाई के मामले में अमेरिकी संसद के सामने पेश होना पड़ा था.

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'सर्विस सेक्टर में भारत ला सकता है क्रांति'
राहुल गांधी ने इस बातचीत में सवाल किया कि आने वाले समय में भारत में किस तरह की आर्थिक क्रांति आने की संभावनाएं हैं.
उन्होंने कहा कि भारत में हरित क्रांति, श्वेत क्रांति और कंप्यूटर क्रांति के बाद अब कौन-सी क्रांति आ सकती है.
इस पर रघुराम राजन ने कहा, "पहली क्रांति तो सर्विस सेक्टर में आ सकती है. हम यहां से बैठकर अमेरिका के लिए काम कर सकते हैं. जैसे हम यहां के डॉक्टर से वहां टेलि-मेडिसिन सेवाएं उपलब्ध करा सकते हैं और काफ़ी ज़्यादा मात्रा में फ़ॉरेन एक्सचेंज कमा सकते हैं. हमारी ओर से सेवाओं का निर्यात हमें निर्यात की दुनिया में सुपरपावर बना देगा."
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि 'एक दूसरी हरित क्रांति भी हो रही है. अगर हम उस पर ज़ोर दें तो हम पवन-चक्कियां बनाने में सबसे आगे हो सकते हैं. हम अपनी इमारतों को कार्बन उत्सर्जन से मुक्त कर सकते हैं.
जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा नुक़सान दक्षिण एशिया में होगा. आप पहले ही बांग्लादेश और पाकिस्तान को इससे जूझते हुए देख चुके हैं. भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा. हम भी इसी क्षेत्र में हैं. ऐसे में हमें इस क्षेत्र पर ज़ोर देना होगा."
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हम इनोवेट (नवप्रवर्तन) कर सकते हैं और मुझे लगता है कि संभावनाएं काफ़ी हैं, हमें भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपनी सोच को आकार देना चाहिए."
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भारत की हालत सोचनीय?
भारत की मौजूदा आर्थिक स्थितियों पर उन्होंने कहा कि 'अगला साल इस साल से भी ज़्यादा मुश्किल होने वाला है क्योंकि इस साल युद्ध की वजह से कई समस्याएं थीं. और दुनिया में आर्थिक विकास की रफ़्तार धीमी होने जा रही है क्योंकि ब्याज दरें बढ़ाई जा रही हैं जो कि विकास दर कम करता है.
भारत पर भी इसका असर होगा. भारत में भी ब्याज दरें बढ़ गयी हैं, लेकिन भारतीय निर्यात भी कम हो रहा है."
भारत में बढ़ती महंगाई को लेकर उन्होंने कहा, "भारत में महंगाई की समस्या खाने-पीने की चीज़ों के दाम बढ़ने से जुड़ी है जो कि आर्थिक विकास के लिए नकारात्मक है. अगर हम अगले साल पांच फ़ीसद की दर से भी बढ़े तो हम क़िस्मत वाले होंगे. इन आंकड़ों के साथ समस्या ये है कि आपको ये समझना होगा कि आप इनकी तुलना किस आंकड़े से कर रहे हैं.
अगर पिछले साल आपकी एक तिमाही बहुत ख़राब रही और आप उसी से तुलना कर रहे हैं तो आपकी स्थिति बेहतर दिखती है. ऐसे में अगर आप महामारी से पहले और अब के आंकड़ों में तुलना करें तो दो फ़ीसद का अंतर है जो कि हमारे लिए बहुत ख़राब है."
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