राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा से कितनी बदल पाए अपनी छवि?

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- Author, इक़बाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राहुल गांधी इन दिनों राजस्थान में हैं. कांग्रेस के मीडिया प्रभारी जयराम रमेश ने गुरुवार को मीडिया से बात करते हुए कहा कि यात्रा के सौ दिन पूरे होने की ख़ुशी में राहुल गांधी जयपुर में प्रेस कॉन्फ़्रेंस करेंगे और उसी दिन शाम को जयपुर के अल्बर्ट हॉल में 'भारत जोड़ो कॉन्सर्ट' का भी आयोजन होगा.
उनके अनुसार, इस अवसर पर गायिका सुनिधि चौहान भी होंगी. हिमाचल प्रदेश के नव-निर्वाचित मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू अपने सभी विधायकों के साथ जयपुर में 'भारत जोड़ो यात्रा' में शामिल होंगे.
राहुल गांधी ने सात सितंबर को तमिलनाडु के कन्याकुमारी से इस यात्रा की शुरुआत की थी. वो कई राज्यों से होते हुए फ़िलहाल राजस्थान में हैं और वो क़रीब 3750 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद संभवत: फ़रवरी में कश्मीर पहुंचेंगे जहां यात्रा ख़त्म होगी.
राहुल गांधी की इस यात्रा के दौरान समाज के अलग-अलग हिस्सों के लोग शामिल हो रहे हैं.
फ़िल्मी दुनिया से स्वरा भास्कर, पुजा भट्ट, रिया सेन और आनंद पटवर्धन शामिल हुए. सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय भी शामिल हुईं और तेलंगाना में रोहित वेमुला की मां भी.
शिवसेना के आदित्य ठाकरे और महात्मा गांधी को पड़पोते तुषार गांधी भी शामिल हुए. खेल की दुनिया से भी कई लोग अब तक शामिल हो चुके हैं.
स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा भी राहुल गांधी के साथ चले हैं. अब तक जो लोग इस यात्रा में शामिल हुए हैं उनमें शायद सबसे ज़्यादा चर्चा आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की हो रही है.
राजन बुधवार को राजस्थान के सवाई माधोपुर में इस यात्रा में शामिल हुए थे. इसके बाद रघुराम राजन और राहुल गांधी के बीच आर्थिक असमानता समेत अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम मुद्दों पर बातचीत भी हुई. बीजेपी ने इस मुलाक़ात की आलोचना भी की.

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बीजेपी की प्रतिक्रिया

बीजेपी में विदेश मामलों के प्रमुख विजय चौथाईवाले ने ट्वीट किया,"एक पूर्व आरबीआई प्रमुख ने सरकार चलाई और देश ने दस साल खो दिए. मोदी का शुक्रिया कि भारत अब ये ग़लती नहीं दोहराएगा."
हालांकि बीजेपी शुरू से ही इस यात्रा का विरोध करती रही है.
बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा गुरुवार को तेलंगाना में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' पर हमला करते हुए कहा कि यह 'भारत तोड़ो यात्रा' है.
नड्डा ने कहा, "यह एक प्रायश्चित यात्रा है क्योंकि राहुल गांधी के पूर्वजों ने भारत को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है."
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एक तरफ़ बीजेपी इसे भारत तोड़ो यात्रा क़रार दे रही है तो दूसरी तरफ़ समाज के विभिन्न वर्ग के लोग उसमें शामिल हो रहे हैं.
ऐसे में यह एक बड़ी चुनौती है कि राहुल गांधी की अब तक की यात्रा का आकलन कैसे किया जाए.
इस दौरान गुजरात और हिमाचल में विधानसभा चुनाव, दिल्ली में एमसीडी चुनाव, लोकसभा की एक और पांच राज्यों में विधानसभा की छह सीटों के लिए उपचुनाव भी हुए.
गुजरात में बीजेपी ने जहां अब तक की सबसे बड़ी जीत दर्ज की वहीं, कांग्रेस को राज्य में अब तक की सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा.
हिमाचल में कांग्रेस सरकार बनाने में ज़रूर कामयाब हो गई, लेकिन दिल्ली के एमसीडी चुनाव में भी उसका अब तक का सबसे ख़राब प्रदर्शन रहा. राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुए उपचुनाव में कांग्रेस को जीत हासिल हुई.

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भारत जोड़ो यात्रा का मक़सद

लेकिन क्या इन चुनावी नतीजों को राहुल गांधी की यात्रा से जोड़कर देखा जाना चाहिए. इसका जवाब ख़ुद कांग्रेस के मीडिया प्रभारी जयराम रमेश ने गुरुवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान दिया.
उन्होंने कहा कि 'भारत जोड़ो यात्रा' 'चुनाव जीतो' या 'चुनाव जिताओ यात्रा' नहीं है.
जयराम रमेश ने इसी दौरान आगे कहा कि यात्रा का एक उद्देश्य यह ज़रूर था कि कांग्रेस संगठन को मज़बूत किया जाए, उसे संजीवनी दी जाए.
जयराम रमेश ने कहा कि मोदी सरकार की नीयत और नीतियों के कारण आर्थिक विषमता बढ़ रही है, सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है और राजनीतिक तानाशाही एक हक़ीक़त हो गई है.
उनके अनुसार, 'राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का असल मक़सद इन तीन मुद्दों पर भारत की जनता से संवाद करना है और इसके ख़िलाफ़ एक नैरेटिव तैयार करना है.'
अगर कांग्रेस के ही तय किए गए पैमाने पर इस यात्रा का मूल्यांकन किया जाए तो सवाल उठता है कि अब तक इस यात्रा से राहुल गांधी ने क्या पाया और क्या खोया.
जानी मानी पत्रकार राधिका रामासेशन कहती हैं, "इस यात्रा ने मुझे थोड़ा कन्फ़्यूज़ किया इसका मक़सद क्या है. राहुल गांधी ना तो कोई दार्शनिक हैं, ना ही कोई धर्म गुरु हैं, राहुल गांधी पूरी तरह एक राजनेता हैं तो फिर उन्हें राजनीति से अलग करके आप नहीं देख सकते हैं."
राधिका कहती हैं कि यात्रा के दौरान लोग राहुल गांधी से जुड़ते हुए साफ़ दिख रहे हैं, लेकिन राजनीतिक तौर पर इससे क्या हासिल हुआ, फ़िलहाल यह तय कर पाना मुश्किल है.

भारत जोड़ो यात्रा
- सात सितंबर को तमिलनाडु के कन्याकुमारी से शुरू हुई
- अब तक तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश से गुज़री
- फ़िलहाल राजस्थान से गुज़र रही है कांग्रेस की यात्रा
- हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब और जम्मू कश्मीर से होकर गुज़रना है
- यात्रा के दौरान कई जाने-माने लोग इसमें शामिल हुए
- संभवत: फ़रवरी में यात्रा संपन्न होगी

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कांग्रेस संगठन कितना मज़बूत हुआ

राधिका रामासेशन के अनुसार, अगर कांग्रेस संगठन की बात की जाए तो कई राज्यों में कांग्रेस का संगठन अभी भी है, कहीं कमज़ोर है और कहीं पूरी तरह से ख़त्म हो चुका है.
उनके मुताबिक, कर्नाटक में इसका असर साफ़ दिखा जहां सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार दोनों गुटों ने एक साथ मिलकर मेहनत की और राहुल गांधी की यात्रा को वहां काफ़ी सफल बनाया.
उनके अनुसार, महाराष्ट्र में कांग्रेस शिवसेना और एनसीपी के पीछे एक छोटी-सी पार्टी बन गई है, लेकिन उसके बावजूद राहुल गांधी की यात्रा के दौरान कांग्रेस का संगठन वहां मज़बूत दिखा.
राजस्थान का ज़िक्र करते हुए राधिका कहती हैं कि अशोक गहलोत और सचिन पायलट के आपसी मतभेद के बावजूद संगठन ने भीड़ जुटाने में अहम रोल अदा किया.
वो कहती हैं, "कांग्रेस का संगठन कितना मज़बूत हआ है, इसकी असल परीक्षा अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में होगी. कर्नाटक, मध्यप्रेदश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान समेत कुल 13 राज्य हैं जहां 2024 के आम चुनाव से पहले विधानसभा चुनाव होने वाले हैं."

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राधिका रामासेशन का कहना है कि आर्थिक विषमता एक गंभीर मुद्दा है. गुजरात चुनाव के दौरान जब वो वहां गईं तो लोगों के बीच में यह एक मुद्दा था हालांकि चुनाव परिणाम में उसका असर नहीं दिखा.
उनके अनुसार, महंगाई और बेरोज़गारी आम जनता के बीच एक बड़ा मुद्दा है और अगर राहुल गांधी इस पर लगातार अपनी आवाज़ उठाते रहे तो 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस को इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है.
यह सच है कि पिछले कुछ सालों में सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ा है, लेकिन राधिका रामासेशन का मानना है कि इस मामले में बीजेपी काफ़ी कामयाब हुई है और राहुल गांधी जो बात कर रहे हैं वो उनका सबसे कमज़ोर मुद्दा है और लोगों पर इसका असर नहीं हो रहा है.
उनके अनुसार, कांग्रेस की 'राजनीतिक तानाशाही' के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिश भी कोई ख़ास सफल होती नहीं दिख रही है.
वो कहती हैं, "आज की तारीख़ में भी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता काफ़ी उंचाई पर है. तानाशाही वाला मुद्दा लोगों के दिमाग़ में नहीं घुस रहा है. लोग कहते हैं कि मोदी ने इमरजेंसी तो नहीं लागू की है तो फिर तानाशाही क्या है?"

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2024 का आम चुनाव है जेहन में

वरिष्ठ पत्रकार और फ़िलहाल दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) से जुड़े आसिम अली का मानना है कि इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य यह है कि बीजेपी की विचारधारा के ठीक विपरीत एक अलग विचारधारा को जनता के सामने रखा जाए.
उनका मानना है कि इस यात्रा के ज़रिए कांग्रेस ने अपने वैचारिक संकट को दूर कर दिया है और वो पूरी तरह बीजेपी और आरएसएस का विरोध करती हुई नज़र आ रही है.
जानी मानी राजनीति विज्ञानी प्रोफ़ेसर ज़ोया हसन ने ट्रिब्यून अख़बार में एक लेख लिखा है जिसमें वो कहती हैं कि भारत जोड़ो यात्रा राजनीति में बहुसंख्यकवाद का मुक़ाबला करने, सामाजिक बंटवारे और असहिष्णुता के ख़िलाफ़ स्वस्थ संवाद क़ायम करने का पहला गंभीर प्रयास है.
आसिम अली के अनुसार, 'अब तक होता यह है कि सिर्फ़ चुनावों के समय पर विचारधारा की बात होती है और अक्सर बीजेपी के ही रखे गए वैचारिक मुद्दे (लव जिहाद और गोहत्या जैसे मुद्दे) पर कांग्रेस को प्रतिक्रिया देनी पड़ती है और बीजेपी उसमें बाज़ी मार लेती है.'
उनका कहना है कि राहुल गांधी जनता के बीच जाकर यह संदेश देना चाह रहे हैं कि मीडिया और दूसरे संस्थानों की विश्वसनीयता पूरी तरह ख़त्म हो चुकी है और इसीलिए वो जनता से सीधे संवाद करने के लिए ख़ुद उनके पास चलकर आए हैं.
उनके अनुसार, राहुल गांधी किसी राज्य के चुनाव के लिए चिंतित नहीं हैं और उनका सारा ध्यान 2024 के चुनाव पर केंद्रित है.
लेकिन कांग्रेस तो कहती है कि इस यात्रा का चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है, इसके जवाब में आसिम अली कहते हैं कि आम आदमी पार्टी का इंडिया अगेंस्ट करप्शन (2011-12) या आंध्र प्रदेश में वाईएसआर की यात्रा के बारे में भी यही कहा जाता था कि यह चुनावी यात्रा नहीं है, लेकिन यह सबको पता है कि यह पूरी तरह राजनीतिक यात्रा होती है.
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राहुल गांधी की छवि पर क्या पड़ा असर?

इस यात्रा से राहुल गांधी या कांग्रेस को क्या हासिल हुआ, इसके जवाब में आसिम अली कहते हैं कि सबसे बड़ा असर राहुल गांधी की निजी छवि पर पड़ा है.
इसके लिए आसिम अली कॉमेडियन कुणाल कामरा का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि 'कामरा पहले राहुल गांधी का बहुत मज़ाक़ उड़ाते थे, लेकिन कुणाल कामरा का यात्रा में ख़ुद शामिल होना इस बात का संकेत है कि नागरिक समाज का वो हिस्सा जो बीजेपी और कांग्रेस को एक जैसा मानते थे, उनकी सोच भी बदल रही है.'
वो कहते हैं कि मीडिया राहुल गांधी के बारे में अब बहुत कम बात कर रही है और यही राहुल गांधी के लिए एक सफलता है क्योंकि मीडिया पहले राहुल गांधी के बारे में बहुत होस्टाइल रहा करती थी.
आसिम अली के अनुसार, इस यात्रा की जो तस्वीरें निकल कर आ रही हैं वो बहुत हद तक एक संदेश दे रही हैं.
उनके अनुसार राहुल गांधी का संदेश बिल्कुल साफ़ है कि वो बेरोज़गारों, नौजवानों, दलितों, आदिवासियों, ग़रीबों, किसानों और मुसलमानों के साथ खड़े दिख रहे हैं और वो 2024 चुनाव में एक सीधी वैचारिक रेखा खींचना चाह रहे हैं.
वो कहते हैं, 'राहुल गांधी लोगों को विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि मोदी सरकार के दौरान भारत के कुछ गिने चुने बिज़नेस घरानों को सारा लाभ हो रहा है और समाज का बाक़ी हिस्सा वंचित रह रहा है. इस यात्रा के ज़रिए राहुल गांधी यह संदेश देना चाह रहे हैं कि वो मोदी सरकार और गिन चुने बिज़नेस घरानों का विरोध कर रहे हैं और उनसे पीड़ित लोगों के साथ खड़े हुए हैं.'
आसिम अली के अनुसार, राहुल गांधी की इस यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस 2024 का चुनाव किन मुद्दों पर लड़ेगी.

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मीडिया में भारत जोड़ो यात्रा की कवरेज

लेकिन मीडिया जिस तरह से राहुल गांधी की यात्रा को ना के बराबर कवर कर रही है उससे राहुल गांधी अपनी बात उन लोगों तक पहुंचाने में ज़्यादा सफल नहीं हो पा रहे हैं.
मेनस्ट्रीम मीडिया में कवरेज कम होने के कारण कांग्रेस इस यात्रा के प्रचार के लिए सोशल मीडिया पर निर्भर है.
साल 2019 में सीएसडीएस के एक सर्वे का हवाला देते हुए आसिम अली कहते हैं कि भारत में 49 फ़ीसद लोग टीवी चैनल से ख़बरें लेते हैं जबकि 10 फ़ीसद लोग अख़बार में ख़बरें पढ़ते हैं और केवल तीन फ़ीसद लोग सोशल मीडिया के ज़रिए ख़बरें जान पाते हैं.
लेकिन यह भी सच है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वालों की तादाद रोज़ाना बढ़ती जा रही है और दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के बीच भी मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ा है जो कि कांग्रेस और ख़ास कर राहुल गांधी के लिए एक अच्छी ख़बर है.
लेकिन सभी विश्लेषक इस बात पर सहमत हैं कि राहुल गांधी अपनी इस भारत जोड़ो यात्रा में कितना सफल होते हैं इसका सही आकलन चुनाव परिणाम से ही तय किया जा सकता है.
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