गुजरात में कांग्रेस ने बीजेपी के सामने घुटने क्यों टेक दिए?

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- Author, शुभम किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 2017 के गुजरात चुनाव के जब नतीजे आए, उस समय राहुल गांधी कांग्रेस की कमान संभालने के लिए तैयार हो रहे थे.
77 सीटों के साथ कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही थी, लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर रहा था कि बीजेपी को टक्कर देने में वो कामयाब रही.
राहुल गांधी ने जमकर प्रचार किया और अशोक गहलोत और अहमद पटेल ने पार्टी को एकजुट रखा.
कयास लगाए जा रहे थे कि अगली बार कांग्रेस इतनी ही ताक़त से लड़ी, तो सत्ता उससे दूर नहीं रह पाएगी. लेकिन 8 दिसंबर 2022 को जो नतीजे आए, पाँच साल पहले कांग्रेस के किसी भी नेता या राजनीतिक विश्लेषक ने उसकी कल्पना भी नहीं की होगी.
कांग्रेस सिमट कर 17 सीटों पर पहुँच गई, वोट का प्रतिशत 30 से भी नीचे चला गया. पहली बार चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी 13 प्रतिशत वोट पाने में कामयाब रही.
यहाँ तक कि 30 सीटों पर आम आदमी पार्टी कांग्रेस को पछाड़ नंबर दो पर रही.
जानकारों का कहना है कि कांग्रेस की ये हालत उसकी अपनी वजह से हुई है.

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राहुल गांधी ने किया किनारा
राहुल गांधी पूरे देश की यात्रा पर निकले हुए हैं, उनकी 'भारत जोड़ो यात्रा' को मिल रहे समर्थन की चर्चा भी हो रही है.
लेकिन उन्होंने इस पूरी यात्रा के दौरान गुजरात से किनारा कर लिया. पूछे जाने पर भी राहुल ने कहा कि इस यात्रा का चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है.
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं कि ये बात समझ से परे है.
वो कहती हैं, "एक ऐसे समय में भारत जोड़ों यात्रा प्लान की गई जब अहम चुनाव हो रहे थे और इसमें गुजरात पर ध्यान नहीं दिया गया."

"मुझे लगता है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को ज़बरदस्त रिस्पॉन्स मिला है. लोगों को लग रहा है कि पहली बार कोई हमारे पास पैदल चलकर हमारी बात सुनने आया है. लेकिन किसी भी पार्टी का सही टेस्ट उसके लिए वोट होता है. वोटर को कैसे बूथ तक लेकर जाएँगे, इस बात से कांग्रेस अलग होती जा रही है."
वो कहती हैं कि कांग्रेस किसी राजनीतिक पार्टी की बजाय किसी एनजीओ की तरह काम कर रही है.
नीरजा चौधरी कहती हैं कि ''ये यात्रा जनवरी 2023 से शुरू हो सकती थी, या फिर गुजरात के रास्ते इसे निकाला जा सकता था, लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया, और नतीजों में गुजरात को नज़रअंदाज़ करने का फल दिख रहा है.''
उनके मुताबिक़ गुजरात के नेता नाराज़ थे और हताश महसूस कर रहे थे.

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हिदुस्तान टाइम्स की नेशनल पॉलिटिकल एडिटर सुनेत्रा चौधरी कहती हैं, "आप कैसे एक पूर्व अध्यक्ष होते हुए ये प्रतिक्रिया दे सकते हैं कि यात्रा का कांग्रेस से लेना-देना नहीं है, इसका चुनाव पर फ़र्क पड़ेगा."
हालांकि वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा का मानना है कि राहुल की यात्रा की शुरुआत कहाँ से हुई और कब हुई वो मायने नहीं रखता. लेकिन पार्टी का गुजरात में मौजूद नहीं रहना मायने रखता है.
वो कहते हैं, "राजनीति में ग़ायब रहना आत्मघाती है. गुजरात में इसी का नमूना देखने को मिल रहा है. यही हाल ओडीशा और तेलंगाना में भी देखने को मिल रहा है. आंध्र प्रदेश में भी हाल कुछ ऐसा ही है."
बीजेपी ने भी राहुल की ग़ैर मौजूदगी का फ़ायदा उठाया. अमित शाह ने एक रैली में कहा कि राहुल को पता है कि नतीजे क्या होंगे, इसलिए वो वहाँ नहीं आ रहे.
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप जोशी कहते हैं, "कांग्रेस ने टिकट देकर सबको छोड़ दिया. इससे लोगों को एक ग़लत सिग्नल मिला. उन्हें लगा कि हम क्यों वोट करें."

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2017 का मोमेंटम जारी नहीं रख सके
विनोद शर्मा कहते हैं कि कांग्रेस 2017 में 77 सीटें जीतने के बाद अपना मोमेंटम जारी रखने में विफल रही.
विनोद शर्मा कहते हैं, "राहुल गांधी आगे से लड़ रहे थे, उस समय अहमद पटेल भी थे. जब नेता लड़ता है, आगे से तो कार्यकर्ता भी लड़ता है. छोटे-बड़े सभी नेता साथ हो लेते हैं. जब नेता ही नहीं होता तो लगता है कि ये लड़ाई है ही नहीं, वॉकओवर दे दिया गया है."
शर्मा कहते हैं कि कांग्रेस ने बीजेपी को वॉकओवर दिया और बीजेपी ने इसका भरपूर इस्तेमाल किया. नीरजा चौधरी भी कहती हैं कि कांग्रेस में इच्छाशक्ति का अभाव था.
वो कहती हैं, "2017 में बीजेपी को 99 सीटें मिलीं और कांग्रेस को 77. अगर ये उल्टा होता, तो एक घंटे के अंदर मीटिंग होती, हार के कारणों की चर्चा होती और बीजेपी अपनी ग़लतियों को सुधारने पर चर्चा करती."
वो कहती हैं, "ये चुनाव कांग्रेस जीत सकती थी, 101 प्रतिशत जीत सकती थी."

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गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार श्याम पारेख कहते हैं कि कांग्रेस ने बीजेपी की तरह की एनर्जी और स्ट्रैटेजी नहीं दिखाई.
उनके मुताबिक़, "लगा ही नहीं कि वो बीजेपी से सत्ता छीनने की कोशिश कर रही है. इसका फ़ायदा आम आदमी पार्टी को भी मिला है."
गुजरात में कांग्रेस की सक्रियता कम दिख रही थी, लेकिन उसके नेता कहते रहे थे कि कांग्रेस साइलेंट कैंपेन चला रही है. गुजरात कांग्रेस के इनचार्ज रघु शर्मा ने तो 125 सीटें जीतने तक का दावा कर दिया था.
टीवी टुडे से बात करते हुए उन्होंने कहा था, "बीजेपी हमें उनकी स्ट्रैटेजी की तरह काम करते देखना चाहती है. लेकिन इस बार हम उन्हें कोई चान्स नहीं देना चाहते कि वो ध्रुवीकरण करे या नैरेटिव सेट करे. हम बीजेपी की पिच पर क्यों खेलें. हम ये चुनाव अपनी स्ट्रैटेजी पर लड़ रहे हैं."
सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार इसे बहाना मानते हैं. वो कहते हैं कि 2017 में कांग्रेस ने बीजेपी की जड़ें हिला दी थीं, लेकिन फिर उसे वैसा ही छोड़ दिया.
वो कहते हैं, "बीजेपी ने उसमें खाद डाली. जब चुनाव का समय आया कांग्रेस ने उतनी ताक़त नहीं झोंकी जितनी ज़रूरत थी, कांग्रेस नेता बहाने बनाते रहे कि साइलेंट कैंपेन चल रहा है, वो गाँव-गाँव जा रहे हैं, द्वार-द्वार जाकर कैंपेन कर रहे हैं, लेकिन नतीजे तो ये बताते हैं कि उनकी स्ट्रैटेजी ने काम नहीं किया है."

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संसाधनों की कमी के कारण सिर्फ़ हिमाचल पर ध्यान?
पीएम मोदी ने गुजरात में 30 से ज़्यादा रैलियाँ कीं. बीजेपी के सभी क़द्दावर नेता मैदान में उतरे थे.
वहीं कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी ने आख़िरी दौर में रैलियां कीं, उनके बड़े नेता भी नदारद रहे. हालाँकि हिमाचल में कांग्रेस चर्चा में रही, कई मुद्दों पर लगातार बोलती रही और कांग्रेस के नेता भी वहाँ दिखते रहे.
विनोद शर्मा कहते हैं, "आपके पास कितना पैसा है आप उसी के हिसाब से निवेश करेंगे. तो कांग्रेस की हिमाचल में इन्वेस्टमेंट तो कामयाब रही. उन्हें चुनावी जीत की संजीवनी चाहिए थी, वो उनको पहाड़ी इलाक़ों से मिल गई. इतने दिनों से कांग्रेस ने चुनाव नहीं जीता था. इस बार तो जीत मिली है."
लेकिन सुनेत्रा चौधरी तेजस्वी यादव का उदाहरण देती हैं. वो कहती हैं, "कांग्रेस के पास गुजरात में रिसोर्स नहीं थे, बीजेपी जितने पैसे नहीं थे, लेकिन बिहार में तेजस्वी यादव के पास भी इतने ही रिसोर्स थे, लेकिन वो हर ज़िले में गए."

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आम आदमी पार्टी ने मारी वोटों में सेंध
पहली बार चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी 13 प्रतिशत वोट पाने में कामयाब रही.
कांग्रेस का वोट प्रतिशत जो पिछले चुनावों में 40 प्रतिशत था, गिरकर 27 प्रतिशत हो गया.
कांग्रेस ने 2017 चुनाव में 27 में से 15 आरक्षित सीटों पर जीत हासिल की थी. बीजेपी ने इस बार 23 सीटों पर जीत हासिल की.
यही नहीं कुल सीटों में 30 सीटों पर आम आदमी पार्टी दूसरे नंबर पर रही.
विनोद शर्मा कहते हैं, "ये साफ़ दिख रहा है कि आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के वोट में सेंध मारी है."
"इस बार कांग्रेस का कैंपेन कमज़ोर था, कांग्रेस लोगों तक नहीं पहुँच पाई, ये सब उसी का नतीजा है."
सुनेत्रा चौधरी भी मानती हैं कि ट्राइबल एरिया में कांग्रेस का वोट कम होने और बीजेपी की जीत का कारण है कि आम आदमी पार्टी ने वोट काटे हैं.

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प्रदीप जोशी कहते हैं, "दक्षिण गुजरात की 35 में से 33 सीटें जो बीजेपी को मिली हैं, उसमें से 13 सीटें आदिवासी थीं, बीजेपी ने इनमें से 11 सीटें जीत लीं."
जीत के बाद पीएम मोदी ने भी आदिवासी समुदाय से समर्थन का ज़िक्र किया.
उन्होंने कहा, "आज भाजपा को आदिवासी समुदाय का ज़बरदस्त समर्थन मिल रहा है. ये भाजपा ही है जिसके प्रयासों से देश को पहली आदिवासी राष्ट्रपति मिली हैं. भाजपा सरकार ने ऐसे कई क़दम उठाए हैं जिसने आदिवासी समुदाय को आर्थिक तौर पर सशक्त बनाने की दिशा में कार्य किया है."
इसके अलावा बीजेपी पाटीदारों का भरोसा जीतने में भी कामयाब रही.

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हिदुत्व और नरेंद्र मोदी का क़द
हिंदुत्व हमेशा ही गुजरात में अहम भूमिका निभाता रहा है और इस मामले में कांग्रेस बीजेपी की बराबरी नहीं कर सकती.
नीरजा चौधरी कहती हैं, "गुजरात में हिंदुत्व का मुद्दा था, आफ़ताब के मामले को भी मुद्दा बनाने की कोशिश की गई. ये बताने की कोशिश हुई कि हमारे यहाँ लड़कियाँ सुरक्षित हैं."
लेकिन वो कहती हैं कि सबसे बड़ा कारण नरेंद्र मोदी की शख़्सियत थी.
हालाँकि महंगाई, बेरोज़गारी समेत कई दूसरे मुद्दे थे जिनकी कांग्रेस चर्चा करती रहती है, लेकिन नतीजे दिखा रहे हैं कि नरेंद्र मोदी का जादू इन सब पर हावी रहा.

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श्याम पारेख कहते हैं, "लोग नाराज़ ज़रूर हैं, महंगाई से और दूसरी चीज़ों से, लेकिन वो इतने नाराज़ नहीं हैं कि बीजेपी को बाहर का रास्ता दिखा दें."
हार के बाद अब राहुल गांधी पुनर्गठन की बात कर रहे हैं.
अपने ट्विटर पर उन्होंने लिखा, "हम गुजरात के लोगों का जनादेश विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हैं. हम पुनर्गठन कर, कड़ी मेहनत करेंगे और देश के आदर्शों और प्रदेशवासियों के हक़ की लड़ाई जारी रखेंगे."
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युवा वोटरों की भूमिका
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने हार स्वीकार करते हुए कहा कि लड़ाई विचारधारा की है और कमियों को दूर किया जाएगा.
वहीं पीएम मोदी ने जीत का श्रेय उन युवाओं को दिया जिन्होंने 'कांग्रेस की बुराई' नहीं देखी.
उन्होंने कहा, "इस चुनाव में गुजरात में एक करोड़ से भी ज़्यादा ऐसे वोटर्स थे जिन्होंने मतदान किया, लेकिन उन्होंने कभी भी कांग्रेस की बुराइयों को देखा नहीं था. उन्होंने केवल भाजपा की सरकार को ही देखा था. युवाओं की प्रकृति होती है कि वो जाँच-परख कर ही वोट देते हैं. वो इसलिए वोट नहीं देते कि वो दशकों से सत्ता में रही. जब उन्हें भरोसा होता है तब ही वो वोट देते हैं, जब उन्हें सरकार का काम प्रत्यक्ष नज़र आता है तब वो उन्हें वोट देते हैं."
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