यूजीसी के नए नियम लाने के पीछे क्या थी सरकार की मंशा?

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि भेदभाव के नाम पर क़ानून का कोई दुरुपयोग न हो, ये केन्द्र, राज्य सरकारों और यूजीसी सभी की जिम्मेदारी है.
    • Author, प्रेरणा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन यानी यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यह कहते हुए रोक लगा दी कि इनके प्रावधानों को पहली नज़र में देखने पर अस्पष्टता नज़र आती है.

कोर्ट ने कहा कि इन नियमों के दुरुपयोग की आशंका है, इसलिए विशेषज्ञों की एक समिति इन नियमों की खामियों को दूर करने पर विचार कर सकती है. बीजेपी के कई नेताओं का कहना है कि सरकार कोर्ट के फ़ैसले का पालन करेगी.

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने भी कोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराते हुए कहा कि नए नियमों को लागू करने के बाद सामाजिक तनाव का माहौल बन गया था.

उन्होंने एक्स पर किए अपने पोस्ट में लिखा है, ''इस मामले में सामाजिक तनाव आदि का वातावरण पैदा ही नहीं होता अगर यूजीसी नए नियम को लागू करने से पहले सभी पक्ष को विश्वास में ले लेती और जांच कमेटी आदि में भी अपरकास्ट समाज को नेचुरल जस्टिस के अन्तर्गत उचित प्रतिनिधित्व दे देती.''

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही नए नियमों पर रोक लगा दी हो पर अब भी ये मुद्दा गंभीर चर्चा का विषय बना हुआ है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन नियमों को लाने के पीछे सरकार की मंशा क्या थी?

बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें

दरअसल, यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन ने पिछले साल मार्च महीने में संसदीय शिक्षा समिति को विश्वविद्यालय परिसरों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों से जुड़ी जानकारी दी थी.

इसमें बताया गया था कि साल 2019-20 से लेकर 2022-23 के बीच विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें लगभग 118% बढ़ी हैं.

साल 2019-20 में जहां कुल 173 शिकायतें दर्ज हुईं, वहीं 2020-21 में 182, 2021-22 में 186, 2022-23 में 241 और 2023-24 में 378 शिकायतें दर्ज हुईं.

यानी 2019 से 2024 के बीच उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव की कुल 1,160 शिकायतें दर्ज हुई हैं.

यह डेटा 704 विश्वविद्यालयों और 1,553 कॉलेजों से इकट्ठा किया गया था.

साल 2020 में तत्कालीन राज्यसभा सांसद वंदना चव्हाण के सवाल के जवाब में एचआरडी मंत्रालय ने बताया था कि 2015 से 2018 के बीच जाति के आधार पर भेदभाव के कुल 295 मामले अलग-अलग यूनिवर्सिटी या शिक्षण संस्थानों में दर्ज किए गए.

तो क्या यही वजह थी कि सरकार यूजीसी के नए नियम लेकर आई थी?

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि 'नए नियमों को लाने के लिए सरकार ने कोई अलग से पहल नहीं की थी.

उनका कहना है, "यह इंदिरा जयसिंह और दिशा वाडेकर (वरिष्ठ वकील) की पहल का नतीजा था. 2017 में जब रोहित वेमुला की खुदकुशी का मामला आया, उसके बाद से वेमुला एक्ट बनाने की मांग उठती रही. उसके भी पहले साल 2006-07 के दौरान एम्स में खुदकुशी से जुड़ी कुछ घटनाएं हुई थीं, जिसके बाद यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन सुखदेव थोराट को शिक्षण संस्थानों में भेदभाव से जुड़े गाइडलाइन्स बनाने के निर्देश दिए गए थे.''

अपूर्वानंद बताते हैं कि साल 2012 में आई इस नियमावली में पहली बार शिक्षण संस्थानों में भेदभाव के तथ्य को रेखांकित किया गया और बताया गया कि किन उपायों के ज़रिए इसे रोका जा सकता है.

लेकिन यह नियमावली प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाई. यही कारण था कि रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मां ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाख़िल की और फिर ये नए नियम लाए गए.

रोहित वेमुला हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र थे, जिन्होंने साल 2016 में यूनिवर्सिटी कैंपस में कथित जाति आधारित भेदभाव के कारण खुदकुशी कर ली थी.

वहीं पायल तड़वी पुणे के एक मेडिकल कॉलेज की छात्रा थीं, जिनकी 2019 में इसी तरह के भेदभाव के कारण मौत हुई थी.

सरकार की मंशा

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी का मानना है कि नए नियमों को लाने के पीछे की मंशा ओबीसी तबके को आकर्षित करना भी था.

अब तक शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा में ओबीसी वर्ग के लोगों को शामिल नहीं किया गया था. लेकिन संसदीय समिति ने यूजीसी से इसमें ओबीसी वर्ग के छात्रों को भी शामिल करने का निर्देश दिया था. इसके बाद नए नियमों में जो जातिगत भेदभाव की परिभाषा तय की गई, उसमें ओबीसी वर्ग को भी शामिल किया गया.

इस पर नीरजा चौधरी कहती हैं, ''हमारी राजनीति ओबीसीकरण की तरफ़ बढ़ रही है. ओबीसी तबका काफ़ी मज़बूत हुआ है और यह बीजेपी की पहचान से जुड़ी राजनीति का बड़ा हिस्सा है. इसलिए ओबीसी वर्ग को इसमें शामिल कर के बीजेपी अपने कुछ राजनीतिक हितों को साधना चाहती थी.''

लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अगर जनरल कैटेगरी के छात्रों की नाराज़गी बढ़ती, तो इस नई स्थिति को संभालना बीजेपी के लिए चुनौती बन जाता.

वह कहती हैं, ''बीजेपी के अंदर इस बात को लेकर सुगबुगाहट थी कि पार्टी बहुत अधिक आइडेंटिटी पॉलिटिक्स कर रही है, जिससे सामान्य वर्ग के लोग नज़रअंदाज़ हो रहे हैं.''

अब यूजीसी के जिन नियमों पर यह पूरा विवाद शुरू हुआ है, उन्हें समझते हैं. इसके लिए सबसे पहले यूजीसी की भूमिका को संक्षेप में जानते हैं.

यूजीसी के नए नियम

यूजीसी के नए नियमों से जुड़ा चौदह पन्नों का नोटिफ़िकेशन.

इमेज स्रोत, UGC

इमेज कैप्शन, यूजीसी के नए नियमों से जुड़ा चौदह पन्नों का नोटिफ़िकेशन.

यूजीसी के चौदह पन्नों वाले नोटिफ़िकेशन के पेज नंबर दो पर इसे लाने के पीछे का उद्देश्य बताया गया था.

उसमें लिखा है, ''उच्च शिक्षण संस्थानों में धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म-स्थान या विकलांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग, विकलांगों के साथ भेदभाव को ख़त्म करना.''

इसी के नीचे जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा भी दी गई थी, जिसमें लिखा है, ''जाति आधारित भेदभाव का अर्थ अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव है.''

आपत्ति दर्ज कराने वाले लोगों का कहना था कि इन नियमों का इस्तेमाल सामान्य वर्ग के स्टूडेंट्स के ख़िलाफ़ किया जा सकता है और उन पर फ़र्ज़ी आरोप लगाए जा सकते हैं. वहीं आपत्ति जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर भी थी.

हालांकि प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि शिक्षण संस्थानों में अक्सर आरक्षण से पहुंचे छात्रों के साथ ही भेदभाव देखने को मिलता है, इसलिए ज़ाहिर है कि जातिगत भेदभाव की परिभाषा में आरक्षित वर्ग के छात्रों को ही शामिल किया जाएगा.

वह कहते हैं, ''आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के छात्रों को भी तो इसमें शामिल किया गया था, लेकिन विरोध करने वाले इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर रहे थे.''

यूजीसी के पूर्व चेयरमैन सुखदेव थोराट ने भी एक निजी समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में बताया था कि नए नियम विभाजनात्मक नहीं हैं.

इसके बावजूद विरोध जारी रहा.

विरोध की वजहें

यूजीसी के नए नियमों के ख़िलाफ़ छात्रों का प्रदर्शन

इमेज स्रोत, ANI

इमेज कैप्शन, यूजीसी के नए नियमों के ख़िलाफ़ छात्रों का प्रदर्शन

विरोध की एक और वजह 'समान अवसर केंद्र' था.

दरअसल, इसी नोटिफ़िकेशन के पेज नंबर चार पर यूनिवर्सिटीज़ में समान अवसर केंद्र स्थापित करने की बात कही गई थी. इसका काम यह देखना था कि वंचित समूहों के लिए नीतियां और कार्यक्रम प्रभावी रूप से लागू हो रहे हैं या नहीं.

इसी समान अवसर केंद्र के तहत एक समता समिति बनाने का भी प्रावधान था, जो भेदभाव की शिकायतों की जांच करती.

इस समिति में ओबीसी, विकलांग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात कही गई थी.

ऐसे में विरोध करने वालों ने सवाल उठाया कि इस समिति में सामान्य वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है. उनके मुताबिक़ निष्पक्ष जांच के लिए समिति में सामान्य वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व भी ज़रूरी है.

समर्थन और विरोध की आवाज़ें

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और विपक्ष के भी कई नेता यूजीसी के इन नियमों का बचाव कर रहे थे.

धर्मेंद्र प्रधान कह चुके हैं कि भेदभाव के नाम पर क़ानून का कोई दुरुपयोग न हो, ये केन्द्र, राज्य सरकारों और यूजीसी, सभी की जिम्मेदारी है. उन्होंने ये भी कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है और सभी कदम संविधान के दायरे में रहकर ही उठाए जाएंगे.

लेकिन भारतीय जनता पार्टी को इस मामले में अपने कुछ कार्यकर्ताओं और नेताओं के विरोध का भी सामना करना पड़ा. रायबरेली के बीजेपी किसान मोर्चा के अध्यक्ष श्याम सुंदर त्रिपाठी ने यूजीसी के नए नियमों के विरोध में इस्तीफ़ा दे दिया.

वहीं यूपी के कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि बीजेपी सत्ता में बने रहने के लिए फूट डाल रही है, पहले उसने हिंदू-मुसलमान के नाम पर लड़ाया और अब हिंदुओं को ही जाति में बांट रही है.

शिवसेना (उद्धव गुट) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने भी नए नियमों को लेकर सवाल उठाए और इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया.

ऐसे में जो तबका इन नए नियमों के विरोध में खड़ा था, उसे सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से राहत मिली है. लेकिन इससे जुड़ा मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में है और इसकी अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी.

इस दिन कोर्ट रोहित वेमुला की मां की ओर से 2012 के यूजीसी नियमों को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई भी करेगा. इस याचिका में वेमुला की मां ने कहा है कि 2012 के नियम प्रभावी रूप में उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू ही नहीं हुए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित