कोलकाता: 'बस पाँच मिनट हैं, इसके बाद तुम मुझे कभी नहीं देख पाओगी', ऐसा हुआ भी

मौसमी को उनके पति ने आखिरी फ़ोन कॉल में कहा कि तुम मुझे कभी नहीं देख पाओगी

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas

इमेज कैप्शन, मौसमी को उनके पति ने आखिरी फ़ोन कॉल में कहा कि तुम मुझे कभी नहीं देख पाओगी
    • Author, इल्मा हसन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"हमें पता है कि वह अब नहीं रहे."

कोलकाता के आनंदपुर इलाक़े में 26 जनवरी की सुबह दो गोदामों में लगी आग में अपने परिजनों को खो चुके लोग यही कह रहे हैं.

घटना के चार दिन बीत चुके हैं लेकिन अब तक यह साफ़ नहीं हो पाया है कि इस हादसे में कितने लोगों की मौत हुई और कितने लोग अब भी लापता हैं.

पुलिस का कहना है कि मृतकों की पहचान के लिए डीएनए जांच जारी है. वहीं परिवारों का कहना है कि स्पष्ट जानकारी न मिलने से उनका दर्द और बढ़ गया है.

अधिकारियों के मुताबिक, आग 26 जनवरी की सुबह क़रीब तीन बजे पुष्पांजलि डेकोरेटर्स के गोदाम में लगी और जल्दी ही बगल में बने उस गोदाम तक फैल गई, जहां फूड चेन ''वाओ! मोमो'' का कामकाज होता था.

कोलकाता के आनंदपुर इलाक़े में दो गोदामों में लगी आग की जगह पर खड़ी फ़ायर ब्रिगेड की गाड़ी

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas

बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

मौसमी हालदार के पति पंकज उसी गोदाम परिसर में काम कर रहे थे. मौसमी बताती हैं कि पंकज ने उन्हें सुबह तीन बजकर 11 मिनट पर फ़ोन किया था.

"उन्होंने मुझसे कहा कि आग लग गई है. मैंने उनसे कहा कि किसी तरह बाहर निकलने की कोशिश करें." कुछ ही देर बाद फ़ोन कट गया.

मौसमी ने दोबारा कॉल किया तो पंकज ने फिर फ़ोन उठाया, "उन्होंने कहा - बस पांच मिनट और बचे हैं. इसके बाद तुम मुझे कभी नहीं देख पाओगी."

इसके बाद संपर्क टूट गया.

दिन बीतते गए, उम्मीदें ख़त्म होती गईं

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

मौसमी तुरंत उनके कार्यस्थल की ओर भागीं, लेकिन जब वह वहां पहुंचीं तो पूरी इमारत आग की लपटों में घिरी हुई थी.

वह कहती हैं, "शुरुआत में हमें लगा कि शायद वह बाहर निकल आए हों. लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए और कोई ख़बर नहीं मिली, हमारी सारी उम्मीदें ख़त्म हो गईं. अब हमें लगता है कि उनकी मौत इसी आग में हो गई."

''वाओ! मोमो'' ने कहा है कि इस घटना में उसके काम से जुड़े तीन लोगों, दो कर्मचारी और एक कॉन्ट्रैक्ट पर तैनात सुरक्षा गार्ड की मौत हुई है. हालांकि परिवारों का कहना है कि अब तक शव उन्हें नहीं सौंपे गए हैं.

नयन हालदार के पिता भी उसी गोदाम में काम करते थे. वह कहते हैं, "मैंने अपना डीएनए सैंपल दे दिया है, लेकिन हमें अब तक कोई जानकारी नहीं दी गई है. मैं बस यही चाहता हूं कि अब सच्चाई सामने आ जाए."

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मौतों की संख्या की पुष्टि करना मुश्किल हो रहा है. बारुईपुर के पुलिस अधीक्षक सुवेंद्र कुमार ने बीबीसी से कहा कि पांच सदस्यों की एक विशेष जांच टीम बनाई गई है और एक व्यक्ति को गिरफ़्तार कर आठ दिन की पुलिस हिरासत में लिया गया है.

उनका कहना है कि पुलिस ने 16 अहम सबूत इकट्ठा किए हैं और डीएनए प्रोफ़ाइलिंग की जा रही है. उन्होंने बताया कि पूरे शव नहीं मिले हैं बल्कि सिर्फ़ शरीर के कुछ हिस्से बरामद हुए हैं. इसी वजह से मौतों की संख्या की पुष्टि नहीं हो पा रही है.

पुलिस के अनुसार शरीर के कुछ हिस्से मिले हैं इसलिए मारे गए लोगों की सही संख्या पता नहीं चल पा रही है

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas

पश्चिम बंगाल के अलग-अलग ज़िलों से कोलकाता पहुंचे परिवारों के लिए यह अनिश्चितता परेशान करने वाली है.

सुनील हांसदा बताते हैं कि उनके भाई गोदाम में सुरक्षा गार्ड थे. उन्होंने उन्हें सुबह क़रीब तीन बजकर 10 मिनट पर फ़ोन किया था.

"उसने कहा, आग लग गई है और मैं बाहर नहीं निकल पा रहा हूं. मैं मरने वाला हूं. उसने मुझसे कहा कि उसकी पत्नी और बच्चों का ख्याल रखना."

इसके बाद फ़ोन कट गया. सुनील कुछ ही घंटों में घटनास्थल पर पहुंच गए.

वह कहते हैं, "जब मैं सुबह वहां पहुंचा, तब भी आग जल रही थी. मुझे तभी समझ आ गया था कि मैं अपने भाई को खो चुका हूं. उसकी पत्नी पूरी तरह टूट चुकी है. हमें समझ नहीं आ रहा कि क्या करें."

नयन हालदार बताते हैं कि पंकज ने अपनी आख़िरी कॉल में अपनी पत्नी से कहा था कि दम घुटने से उनके पिता की पहले ही मौत हो चुकी है.

वह कहते हैं, "जब हम मौक़े पर पहुंचे, हालात बहुत ख़राब थे. अधिकारी तब भी आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे थे."

पुलिस ने अब तक यह सार्वजनिक रूप से नहीं बताया है कि आग लगने के वक़्त दोनों गोदामों के अंदर कितने लोग मौजूद थे.

हालांकि चश्मदीदों और परिजनों का कहना है कि यह संख्या आधिकारिक तौर पर बताए जा रहे आंकड़ों से कहीं ज़्यादा हो सकती है.

फ़ायर सेफ़्टी क्लियरेंस नहीं

आग से बर्बाद हुआ गोदाम

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas

पास के एक गोदाम में काम करने वाले एक कर्मचारी ने बीबीसी को बताया कि दोनों गोदाम आमतौर पर रात भर सक्रिय रहते थे.

उसने कहा, "लोडिंग और अनलोडिंग का काम चलता रहता था. अंदर कई लोग होते थे. जितनी संख्या बताई जा रही है, उससे ज़्यादा लोग वहां मौजूद थे."

'वाओ! मोमो' के दो कर्मचारियों ने बीबीसी को बताया कि दोनों गोदामों में तेल, लकड़ी, काग़ज़ और सजावटी सामान जैसी ज्वलनशील चीज़ें रखी हुई थीं. माना जा रहा है कि आग लगने के वक्त कई कर्मचारी सो रहे थे.

परिजनों का कहना है कि आधिकारिक जानकारी न मिलने के कारण वे ख़ुद ही सहकर्मियों और बचे हुए लोगों से बात कर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उस रात अंदर कितने लोग थे.

परिवारों ने आग से बचाव के इंतज़ामों पर भी सवाल उठाए हैं. नयन हालदार का आरोप है कि आग से बाहर निकलने का रास्ता था, लेकिन पड़ोसी गोदाम ने वहां सजावटी सामान रख दिया था, जिससे रास्ता बंद हो गया.

उनका कहना है कि इसी वजह से लोग बाहर नहीं निकल पाए.

गोदाम के बाहर लगा नोटिस

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas

पश्चिम बंगाल अग्निशमन सेवाओं के अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि जिस डेकोरेटर्स के गोदाम में आग लगी थी, वहां वैध फ़ायर सेफ्टी क्लियरेंस नहीं था और बुनियादी अग्निशमन इंतज़ाम भी नहीं थे.

डेकोरेशन गोदाम के मालिक को लापरवाही से मौत के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. पुलिस का कहना है कि आगे की कार्रवाई फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर की जाएगी.

कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने कहा है कि यह जांच की जाएगी कि गोदाम सुरक्षा नियमों के मुताबिक चल रहे थे या नहीं. उन्होंने कहा कि दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी और प्रभावित परिवारों को राहत दी जाएगी.

'वाओ! मोमो' ने एक बयान में कहा है कि आग पड़ोसी गोदाम से उसके परिसर में फैली. कंपनी ने मृतकों के परिवारों को 10 लाख रुपये मुआवज़ा देने के साथ-साथ जीवन भर मासिक आर्थिक सहायता और बच्चों की शिक्षा में मदद का एलान किया है.

लेकिन घटनास्थल के बाहर इंतज़ार कर रहे परिवारों को ये घोषणाएं बहुत कम सुकून देती हैं.

तीन साल की बेटी को है पापा का इंतज़ार

सुनील हांसदा

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas

इमेज कैप्शन, सुनील हांसदा के भाई ने कहा कि मैं मरने वाला हूं, मेरी पत्नी और बच्चों का ख्याल रखना

कई लोगों ने बीबीसी से कहा कि उन्हें अब पूरा यक़ीन है कि उनके अपने इस आग में नहीं बच पाए और वे सिर्फ़ डीएनए पुष्टि का इंतज़ार कर रहे हैं ताकि अंतिम संस्कार कर सकें.

कुछ परिवार अब भी यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि उस रात गोदामों के अंदर कितने लोग मौजूद थे? वह जानकारी जो अब तक प्रशासन ने सार्वजनिक नहीं की है.

मौसमी हालदार कहती हैं, "हमारे लिए यह आंकड़ों की बात नहीं है. यह उन लोगों की बात है जो काम पर गए थे और फिर कभी लौटकर नहीं आए."

मौसमी और पंकज की तीन साल की बेटी है. उसे अब तक यह नहीं बताया गया है कि उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं.

मौसमी कहती हैं, "वह आज भी अपने पापा का इंतज़ार कर रही है कि वह आएंगे और उसके साथ खेलेंगे."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)