आर्थिक सर्वेक्षण में आरटीआई के बारे में ऐसा क्या है, जिस पर विपक्ष उठा रहा है सवाल

नरेंद्र मोदी

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इमेज कैप्शन, विपक्ष ने केंद्र की मोदी सरकार पर इकोनॉमिक सर्वे के ज़रिए आरटीआई को कमज़ोर और ख़त्म करने के प्रयास का आरोप लगाया है (फ़ाइल फ़ोटो)

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने गुरुवार को 2025-26 का आर्थिक सर्वेक्षण जारी किया है.

भारत सरकार ने अनुमान लगाया है कि आने वाले वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था 7% से ज़्यादा दर के साथ बढ़ सकती है, जो ग्लोबल ट्रेड के लिए बढ़ती अनिश्चितता के दौर में एक आशावादी नज़रिया पेश करता है.

इसके अनुसार अप्रैल से शुरू होने वाले नए वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था के 6.8% से 7.2% बढ़ने का अनुमान है. ये आंकड़े बाज़ार के अंदाज़े से ज़्यादा हैं.

हालाँकि अर्थव्यवस्था से जुड़े दावों पर विपक्षी दलों ने सवाल खड़े किए हैं. इसके साथ ही आरटीआई (राइट टू इनफोर्मेशन) के मुद्दे को लेकर इकोनॉमिक सर्वे में जो कहा गया है, उस पर भी सियासी घमासान मचने की आशंका है.

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इकोनॉमिक सर्वे पेश होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, "आज पेश किया गया इकोनॉमिक सर्वे भारत की रिफॉर्म एक्सप्रेस की एक पूरी तस्वीर दिखाता है, ये मुश्किल वैश्विक माहौल में लगातार तरक्की को दर्शाता है."

उन्होंने लिखा, "सर्वे में किसानों, एमएसएमई, युवाओं के रोज़गार और सामाजिक कल्याण पर खास ध्यान देते हुए, सबको साथ लेकर चलने वाले विकास के महत्व पर ज़ोर दिया गया है. इसमें दी गई जानकारी सोच-समझकर पॉलिसी बनाने में मदद करेगी और भारत के आर्थिक भविष्य में भरोसा मज़बूत करेगी."

इकोनॉमिक सर्वे में क्या बताया गया है

निर्मला सीतारमण

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इमेज कैप्शन, इकोनॉमिक सर्वे में विपरीत वैश्विक परिस्थितियों में आर्थिक क्षेत्र में भारत की अच्छी प्रगति की बात कही गई है (सांकेतिक तस्वीर)

इस आर्थिक सर्वेक्षण में मौजूदा वित्त वर्ष के लिए, सरकार का अनुमान है कि खपत और निवेश के कारण अर्थव्यवस्था 7.4% की दर से बढ़ेगी.

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अर्थव्यवस्था पर सालाना रिपोर्ट कार्ड बताती है कि 'हाल के वर्षों में नीतिगत सुधारों के मिले-जुले असर ने अर्थव्यवस्था की मीडियम-टर्म ग्रोथ क्षमता को 7% के क़रीब ला दिया है.'

इन अनुमानों के साथ, अमेरिका के साथ तनाव के बावजूद भारत की ग्रोथ अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से आगे निकलने वाली है. भारत उन कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है जिसने अभी तक अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर साइन नहीं किया है और अब भी 50% अमेरिकी टैरिफ़ से जूझ रहा है. इससे कामगार आधारित प्रमुख सेक्टर को नुक़सान हो रहा है.

इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल के महीनों में दूरगामी पॉलिसी सुधारों को आगे बढ़ाकर इस असर को कम करने की कोशिश कर रहे हैं.

इसके लिए केंद्र सरकार ने कंजम्पशन टैक्स में कटौती की है और बदले हुए लेबर कोड लागू किए हैं, जिसकी मांग उद्योगों की तरफ़ से लंबे समय से की जा रही थी.

भारत ने मई महीने से अब तक चार फ्री ट्रेड एग्रीमेंट भी किए हैं, जिनमें से एक बहुप्रतीक्षित यूरोपीय संघ के साथ एक डील भी शामिल है.

रिपोर्ट जारी होने के बाद नई दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने कहा, "यह 7% अगले कुछ वर्षों में 7.5%-8% तक भी बढ़ सकता है."

उन्होंने कहा कि इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए भारत को और ज़्यादा महत्वाकांक्षी सुधार करने और मैन्युफैक्चरिंग की लागत कम करने की ज़रूरत है.

रिपोर्ट के अनुसार, महंगाई कम है, फर्मों और घरों की बैलेंस शीट बेहतर हैं और खपत की मांग मज़बूत बनी हुई है.

इकोनॉमिक सर्वे में आरटीआई के बारे में क्या कहा गया

कार्ड

आर्थिक सर्वेक्षण में लगभग दो दशक पुराने सूचना के अधिकार (आरटीआई) क़ानून की दोबारा समीक्षा करने की वकालत की गई है.

इसमें गोपनीय रिपोर्टों और ड्राफ़्ट कमेंट्स को सार्वजनिक किए जाने से छूट देने की बात कही गई है. इसके पीछे तर्क दिया गया है कि ऐसी बाध्यताएं शासन के कामकाज को सीमित करती हैं.

सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को कभी भी बेवजह की बेवजह की जिज्ञासाओं का जवाब देने के साधन के रूप में या बाहर से सरकार के कामकाज को माइक्रो मैनेज करने के तंत्र के तौर पर नहीं बनाया गया था.

इसमें कहा गया है कि आरटीआई का उद्देश्य कहीं अधिक व्यापक और ऊंचा है और ये बात खुद क़ानून में साफ़ तौर पर कही गई है.

आर्थिक सर्वेक्षण

तृणमूल कांग्रेस सांसद साकेत गोखले ने लिखा है, "इसमें मोदी सरकार का चुपके से आरटीआई एक्ट को और कमज़ोर करने और ख़त्म करने का इरादा दिखाया गया है. सर्वे में ब्रेनस्टॉर्मिंग नोट्स, वर्किंग पेपर्स और ड्राफ्ट कमेंट्स को आरटीआई से छूट देने का प्रस्ताव है, जिसका मतलब है कि जिस प्रक्रिया से सरकार के फैसले लिए जाते हैं, उसे छिपाना है."

उनके मुताबिक़, "कई मामलों में, गलत पॉलिसी बनाने की बात सिर्फ इसलिए सामने आई क्योंकि आरटीआई आवेदनों के जवाब में फाइल नोटिंग, कमेंट्स वगैरह जनता को उपलब्ध कराए गए थे. पीएम केयर्स को छिपाने, चुनाव आयोग का डेटा देने से इनकार करने जैसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जहां मोदी सरकार ने जानबूझकर आरटीआई एक्ट का उल्लंघन करने की कोशिश की है."

उन्होंने आरोप लगाया है, "अब यह साफ़ है कि मनरेगा को हटाने के बाद, मोदी-शाह का अगला एजेंडा जवाबदेही से बचने के लिए शक्तिशाली आरटीआई एक्ट को ख़त्म करना है."

रोज़गार का सवाल

शशि थरूर

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इमेज कैप्शन, शशि थरूर ने रोज़गार को लेकर सवाल उठाया है (फ़ाइल फ़ोटो)

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने जनवरी में भारत के लिए अपने ग्रोथ के अनुमान को अगले साल के लिए 6.4% तक संशोधित किया, जो उसके पिछले अनुमान 6.2% से थोड़ा ज़्यादा है.

भारत सरकार को उम्मीद है और जैसा कि इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है, "अमेरिका के साथ चल रही व्यापार बातचीत इस साल पूरी होने की उम्मीद है, जिससे विदेशी मोर्चे पर अनिश्चितता कम करने में मदद मिल सकती है."

हालाँकि अर्थव्यवस्था को लेकर जो प्रयास किए जा रहे हैं उसे लेकर यह सवाल बरकरार है कि अमेरिका के साथ ट्रेड डील की कमी से होने वाले नुक़सान की पूरी तरह से भरपाई किस तरह से होगी.

कांग्रेस पार्टी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में टिप्पणी की है, "अगर अर्थव्यवस्था अच्छा कर रही है तो भारत का रुपया क्यों गिर रहा है? हर पांच में से चार भारतीय रोज़ 200 रुपये से कम पर क्यों जी रहे हैं. क्यों आबादी का एक-तिहाई हिस्सा हर रोज़ 100 रुपये कम में जी रहा है."

कांग्रेस ने सवाल किए हैं, "भारत में लोगों की परिवारिक बचत पाँच दशक में सबसे कम क्यों हो गई है. नौकरी कहाँ है?"

कोट कार्ड

कांग्रेस नेता शशि थरूर ने 2026 के इकोनॉमिक सर्वे में भारत के लिए मीडियम-टर्म ग्रोथ के अनुमान पर कहा, "रोजगार का स्तर आर्थिक विकास के संकेतों के हिसाब से नहीं है.

बीजेडी सांसद सस्मित पात्रा ने इकोनॉमिक सर्वे के मुद्दे पर कहा, "रोज़गार किसी भी अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है. आर्थिक सर्वे में स्किलिंग और नौकरियों का ज़िक्र तो किया गया है, लेकिन इसमें कोई ख़ास रोडमैप नहीं बताया गया है कि वे इस नतीजे पर कैसे पहुंचे या आगे क्या करने वाले हैं. जब तक रोजगार और आजीविका का सहारा नहीं बढ़ेगा, तब तक हमारे पास ऐसी अर्थव्यवस्था नहीं होगी जिसमें लोगों के बीच अच्छा-खासा कंजम्पशन हो."

सोशल मीडिया को बनाया गया है मुद्दा

सोशल मीडिया यूजर

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इमेज कैप्शन, इकोनॉमिक सर्वे में सोशल मीडिया पर उम्र के लिहाज से अलग-अलग सामग्रियों को लेकर पाबंदी की चर्चा की गई है (सांकेतिक तस्वीर)

रिपोर्ट में भारत की निर्यात नीतियों, खासकर कृषि, में कमियों को उजागर किया गया है. इसमें कहा गया है कि मूल्य के हिसाब से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े कृषि उत्पादक देश में चार साल के भीतर कृषि, समुद्री और खाद्य और पेय उत्पादों का निर्यात 100 अरब डॉलर तक पहुंचने की क्षमता है.

हालांकि इसमें कहा गया है कि बार-बार नीतिगत बदलावों से सप्लाई चेन बाधित होने, अनिश्चितता पैदा होने और विदेशी खरीदारों के अन्य वैकल्पिक स्रोतों की ओर जाने का ख़तरा है. इसलिए भारत के लिए खोए हुए निर्यात बाजारों को फिर से हासिल करना मुश्किल होगा.

ये टिप्पणियां ऐसे समय आई हैं जब भारत ने अपने हालिया फ़्री ट्रेड समझौतों से डेयरी और अन्य संवेदनशील कृषि उत्पादों को बाहर रखा है. जो घरेलू राजनीतिक विचारों को दर्शाता है. दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देश में किसान एक प्रमुख वोट बने हुए हैं, जहां लाखों छोटे किसानों के पास काफ़ी कम ज़मीन है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि घरेलू ज़रूरतों और निर्यात के अवसरों के बीच बेहतर संतुलन बनाकर, भारत का कृषि उत्पादन निर्यात-आधारित विकास का समर्थन कर सकता है और लक्ष्य को पूरा करने में मदद कर सकता है.

भारत के इकोनॉमिक सर्वे ने सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर उम्र के आधार पर पाबंदियों को चर्चा के लिए एक मुद्दा बनाया है, जबकि कई देशों ने पहले ही नाबालिगों की सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच को सीमित करने के लिए कदम उठाए हैं.

साल 2025-26 के इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है, "ख़ासकर सोशल मीडिया, गैंबलिंग ऐप्स, ऑटो-प्ले फीचर्स और टारगेटेड एडवरटाइजिंग के लिए प्लेटफ़ॉर्म को उम्र वेरिफिकेशन और उम्र के हिसाब से डिफ़ॉल्ट सेटिंग्स लागू करने के लिए ज़िम्मेदार बनाया जाना चाहिए."

भारत सरकार का यह डॉक्यूमेंट सोशल मीडिया के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल और इसके हानिकारक प्रभाव को लेकर दुनिया भर की चिंता को दिखाता है.

क्या कह रहे हैं उद्योग जगत के लोग

आर्थिक सर्वेक्षण

उद्योगपति आनंद महिंद्रा के मुताबिक़, "जिस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया, वह एक ऐसा विषय था जिस पर शायद ही कभी गंभीरता से ध्यान दिया गया हो. शायद पहली बार, भारतीय शहरों को प्रशासनिक तौर पर सोची गई चीज़ों के बजाय, मुख्य आर्थिक सिस्टम के तौर पर देखा गया है."

"यह पिछली पॉलिसी से एक साफ़ बदलाव है, जहाँ शहरों को लेकर मुख्य रूप से आवास की कमी, भीड़भाड़, या लोगों को दी जाने वाली सुविधा के संदर्भ में चर्चा की जाती थी, न कि रणनीतिक संपत्ति के तौर पर."

उनका कहना है, "इकोनॉमिक सर्वे यह मानता है कि शहरीकरण लोगों, कौशल, पूंजी और इंफ्रास्ट्रक्चर को एक जगह लाकर विकास और उत्पादकता को तेज़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे ट्रांज़ैक्शन लागत कम होती है और एफिशिएंसी बेहतर होती है."

आर्थिक मामलों के जानकार और द इंस्टीट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ़ इंडिया के पूर्व प्रेसीडेंट वेद जैन के मुताबिक़, "इकोनॉमिक सर्वे बहुत अच्छा है. इकोनॉमिक सर्वे पिछले एक साल में देश की आर्थिक स्थिति को दिखाता है और आने वाले समय में आने वाली चुनौतियों पर भी रोशनी डालता है."

सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा, "ज़मीनी स्तर पर जो कुछ हो रहा है, यह उसकी बहुत ही वास्तविक तस्वीर पेश करता है. यह एक अहम और व्यवहारिक ऑब्ज़र्वेशन है... यह सर्वे मज़बूत मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल्स को हाईलाइट करता है, जो स्थिर और नियंत्रण में हैं. ख़ासकर ऐसी दुनिया में जो जियोपॉलिटिकल और जियो-इकोनॉमिक अनिश्चितताओं से भरी है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.