भारत-ईयू एफ़टीए से किसको क्या हासिल होगा, जानिए विशेषज्ञों की राय

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- Author, जुगल पुरोहित
- ........से, नई दिल्ली
'मदर ऑफ़ ऑल डील्स', 'सबसे बड़ा समझौता', 'वास्तव में ऐतिहासिक'- ऐसे कई विशेषण भारत–यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच हुई 16वीं बैठक के नतीजों के बारे में इस्तेमाल किए जा रहे हैं.
हालाँकि, इनमें से ज़्यादातर टिप्पणियाँ 'भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौते (एफ़टीए)' की बातचीत पूरी होने से जुड़ी हैं. इसके बारे में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह साझी समृद्धि का नया ब्लूप्रिंट है.
यह एफ़टीए क्या हासिल करना चाहता है? क्या कई चीज़ें इसमें शामिल नहीं हैं? इससे जुड़े अलग-अलग क्षेत्र और लोग, इसका क्या असर देख रहे हैं? भारत के बाहर, इसके बारे में कैसी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं?

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क्या दांव पर लगा है?
यूरोपीय संघ (ईयू) अभी 27 देशों का समूह है.
यह एकीकृत बाज़ार की तरह काम करता है, यानी सामान, सेवाएँ, पूंजी और लोग- बिना तकनीकी, क़ानूनी या प्रशासनिक रुकावटों के एक-दूसरे देश आ-जा सकते हैं.
ईयू की अर्थव्यवस्था बड़ी है. उसका कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) लगभग 20 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के आसपास माना जाता है. इनमें जर्मनी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. उसके बाद फ़्रांस और इटली आते हैं.

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दूसरी ओर वर्ल्ड बैंक के अनुसार, भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से भी एक है. पिछले 25 सालों में भारत की अर्थव्यवस्था चार गुना हुई है और प्रति व्यक्ति आय लगभग तीन गुना हो गई है.
दोनों मिलकर लगभग दो अरब की जनसंख्या को कवर करते हैं.
साल 2024–25 में दोनों के बीच सामानों का दोतरफ़ा व्यापार 136.54 अरब डॉलर था. वहीं इसी दौरान सेवाओं का व्यापार भी 83.1 अरब डॉलर से अधिक रहा.
भारत और ईयू ने मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत साल 2007 में शुरू की थी.
हालाँकि, साल 2013 में यह रुक गई और फिर 2022 में दोबारा शुरू हुई. भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने मंगलवार को कहा कि एफ़टीए पर ज़्यादातर काम फ़रवरी 2025 के बाद ही शुरू हुआ.
एफ़टीए में क्या शामिल है और क्या नहीं?
भारत सरकार का कहना है कि समझौते के बाद भारत के 99 फ़ीसदी से ज़्यादा निर्यात यूरोपीय संघ (ईयू) में ख़ास रियायतों के साथ जा सकेंगे.
इस समझौते में वस्तुओं, सेवाओं, व्यापार संबंधी समाधानों, सीमा शुल्क और व्यापार सुविधा के साथ-साथ एसएमई और डिजिटल व्यापार जैसे उभरते क्षेत्र भी शामिल हैं.

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भारत को उम्मीद है कि उसके टेक्सटाइल, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्नजवाहरात, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग सामान और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों के निर्यात में तेज़ी से बढ़ोतरी होगी.
वहीं, ईयू को उम्मीद है कि उसके सामानों का निर्यात साल 2032 तक दोगुना हो जाएगा क्योंकि समझौते के तहत उसके 96.6 फ़ीसदी निर्यात पर लगने वाले शुल्क हट जाएँगे या कम हो जाएँगे.
ईयू का यह भी कहना है कि भारत ने उसे टैरिफ़ के ऐसे फ़ायदे दिए हैं जो किसी और देश को नहीं मिले. मिसाल के तौर पर, कारों पर शुल्क 110 फ़ीसदी से धीरे-धीरे घटकर सिर्फ़ 10 फ़ीसदी तक आ जाएगा और कार पार्ट्स पर शुल्क पाँच से 10 साल में पूरी तरह ख़त्म हो जाएगा.
लेकिन यह एफ़टीए हर चीज़ पर लागू नहीं होता.

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गोयल ने साफ़ किया कि संवेदनशील मुद्दों को इन बातचीतों से बाहर रखा गया है. मतलब, ईयू को भारत में डेयरी, अनाज, पोल्ट्री, सोयामील, कुछ फल सब्ज़ियों जैसे क्षेत्रों के बाज़ार में पहुँच नहीं दी गई है.
दूसरी ओर ईयू ने भी बताया कि बीफ़, चिकन मीट, चावल और चीनी जैसे उत्पादों को समझौते से बाहर रखा गया है.
लेकिन इन प्रावधानों के लागू होने के लिए, इस समझौते का लागू होना ज़रूरी है.

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ईयू के अनुसार, एफ़टीए के पूरे दस्तावेज़ का अनुवाद ईयू की सभी आधिकारिक भाषाओं में किया जाएगा और फिर दो चरणों में उसकी समीक्षा होगी. भारत को भी अंतिम दस्तावेज़ को मंज़ूरी देनी होगी. तब ही यह समझौता लागू हो पाएगा.
पूर्व भारतीय राजनयिक डॉ. मोहन कुमार ने यूरोप में काम किया है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मामलों के जानकार हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि यह प्रक्रिया वक़्त ले सकती है. उनके शब्दों में, "मेरी राय में, ज़्यादा से ज़्यादा साल 2027 की पहली छमाही तक यह एफ़टीए लागू हो जाएगा".
कौन-कौन सी चिंताएँ हैं?
अजय श्रीवास्तव ट्रेड सर्विस के पूर्व अधिकारी रह चुके हैं और अब ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) चलाते हैं.
इस समझौते के बारे में उनके एक विश्लेषण में कहा गया है, "ख़ासकर ऐसे वक़्त में जब वैश्विक व्यापार बिखर रहा है, रणनीतिक तौर पर यह एफ़टीए भारत–ईयू आर्थिक संबंधों को एक स्थिर और नियम आधारित ढाँचे में जोड़ता है. हालाँकि, इसका असर उन मुद्दों की वजह से सीमित हो जाता है, जिन पर अभी समझौता नहीं हो पाया.''
''ईयू का 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (सीबीएएम)' इस समझौते के बाहर है. इससे एक असंतुलन बनता है. यानी ईयू के सामान भारत में बिना शुल्क के आ सकते हैं लेकिन भारतीय निर्यातकों को यूरोप में 'कार्बन टैक्स' देते रहना पड़ेगा."

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सीबीएएम क्या है?
सीबीएएम, ईयू का एक तरीक़ा है. इसके ज़रिए वे ऐसे सामानों पर अलग से कार्बन क़ीमत लगाते हैं, जिनके बनने में ज़्यादा कार्बन निकलता है और जो ईयू में आयात किए जाते हैं.
उनके मुताबिक़, इसका मक़सद ईयू के बाहर के देशों में भी पर्यावरण को कम नुक़सान पहुँचाने वाले उत्पादन को बढ़ावा देना है.
दूसरी ओर, भारत के वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि अन्य क़दमों के अलावा, 'तकनीकी बातचीत' भी शुरू की जाएगी ताकि भारतीय उद्योग सीबीएएम के बावजूद ईयू के बाज़ारों तक पहुँच बना सकें.

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बुधवार को कांग्रेस ने भी इस मुद्दे को उठाया और कहा कि "भारत के एल्युमिनियम और स्टील उद्योगों के लिए सीबीएएम से छूट न मिल पाना हमारी बड़ी चिंताओं में से एक है."
इसके जवाब में पीयूष गोयल ने एक बयान कांग्रेस के कथित 'नकारात्मक और निराशावादी दृष्टिकोण' की निंदा की.
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इस बीच, एक जनवरी 2026 से भारत और कुछ अन्य देशों को ईयू की उस व्यवस्था से तीन साल के लिए बाहर कर दिया गया जिसके तहत भारतीय निर्यात पर कम या लाभकारी शुल्क लगते थे.
इसका सबसे ज़्यादा असर खनिज उत्पाद, प्लास्टिक, रबर, टेक्स्टाइल, मोतीरत्न, इस्पात और मशीनरी जैसे क्षेत्रों पर पड़ेगा. हालाँकि, अभी यह साफ़ नहीं है कि इस मुद्दे पर हाल में भारत और यूरोपीय संघ के बीच कोई बातचीत हुई है या नहीं.
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. मोहन कुमार ने बीबीसी से कहा, "मैं मानता हूँ कि मौजूदा सकारात्मक संबंधों के बीच यह एक परेशान करने वाली बात है. अब हमारे उत्पाद और उद्योगों को वे फ़ायदे नहीं मिलेंगे जो पहले मिलते थे. कम से कम तब तक जब तक एफ़टीए लागू नहीं होता.''
हालाँकि उनके मुताबिक़, ''लेकिन यह अचानक नहीं हुआ. हमें पहले से पता था कि ये फ़ायदे इसी समय ख़त्म होने वाले हैं."
जीटीआरआई के विश्लेषण में यह भी बताया गया है कि भारत और ईयू की राय कई मुद्दों पर अलग रही है. जैसे, सरकारी ख़रीद, बौद्धिक संपदा, श्रम और पर्यावरण जैसे मुद्दे.
विश्लेषण के अनुसार, इन मुद्दों पर स्थिति तभी साफ़ होगी जब समझौते का क़ानूनी मसौदा सार्वजनिक किया जाएगा.

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दिल्ली में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम से जुड़े एक प्रतिनिधि ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी से कहा, "हमें देखना होगा कि एफ़टीए कैसे लागू होता है.''
''कई पुराने एफ़टीए में शुरू-शुरू में बहुत उत्साह था लेकिन बाद में पता चला कि उनसे हमें उतना लाभ नहीं मिला. मैं सरकार से यह भी कहूँगा कि सर्टिफ़िकेशन की प्रक्रिया के मानक तय किए जाएँ ताकि भारत और ईयू की अलग-अलग प्रक्रियाओं की वजह से व्यापार अटका न रहे."
डॉ. अजय सहाय वाणिज्य मंत्रालय द्वारा बनाये गए भारतीय निर्यात संगठन (एफ़आईईओ) के महानिदेशक हैं.
भारत का सबसे बड़े व्यापार साझेदार अमेरिका है. उसको लेकर उन्होंने बताया कि भारतीय उत्पादों पर ज़्यादा अमेरिकी टैरिफ़ लगने की वजह से इस एफ़टीए को एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है.
उन्होंने कहा, "हाँ, इसे लागू होने में समय लगेगा. यह चिंता का विषय है. अगर यह एफ़टीए इस साल लागू हो जाए तो हमारे निर्यात को फ़ायदा होगा. लेकिन मैं यह नहीं कहूँगा कि इससे उन क्षेत्रों की पूरी तकलीफ़ दूर हो जाएगी जिन्हें अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 फ़ीसदी टैरिफ़ की वजह से नुक़सान हो रहा है."
आख़िर में, आगे की चुनौतियाँ क्या होंगी?

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एफ़टीए की बातचीत पूरी होने के अलावा भारत और ईयू ने 12 और व्यापक दस्तावेज़ों पर भी दस्तख़त किए. ये दोनों के बीच रणनीतिक एकजुटता दिखाते हैं.
ईयू रूस को ख़ासतौर से यूक्रेन के साथ जंग की वजह से अपने लिए बहुत बड़ा ख़तरा मानता रहा है. तो यहाँ एक सवाल है कि क्या ईयू भारत और रूस के बढ़ते रिश्तों पर एतराज़ करेगा?
एक और सवाल. अमेरिका, जहाँ डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति हैं, वह इस पूरे मामले को कैसे देखेगा?
27 जनवरी को अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीयर ने कहा, "मेरी राय में, इस एफ़टीए से भारत को ज़्यादा फ़ायदा होगा. उसकी पहुँच यूरोप के बाज़ार तक और बढ़ जाएगी."

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इसके अलावा भारत और ईयू में इस पर भी सहमति बनी है कि कुशल कामगारों, विद्यार्थियों और पेशेवरों के आनेजाने को और आसान बनाने के लिए भी क़दम उठाये जाएँ.
लेकिन सवाल यह है, क्या इससे ईयू के कुछ देशों में आव्रजन से जुड़ी चिंता बढ़ सकती है?
इन सवालों पर डॉ. मोहन कुमार का कहना है, "मुझे नहीं लगता कि रूस अब कोई बड़ी समस्या है. जैसे यूरोपीय देश चाहते हैं, भारत भी चाहता है कि यह संघर्ष (रूस-यूक्रेन) जल्दी ख़त्म हो. ईयू को समझना होगा कि भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था में रूस को शामिल करना होगा. नहीं तो वे हमेशा टकराव की हालत में रहेंगे.''

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वह कहते हैं, ''अमेरिका इसे कैसे देखेगा? मेरी राय में, अमेरिका को इसे नकारात्मक रूप से नहीं देखना चाहिए क्योंकि वही अमेरिका अपने साझेदार देशों से कहता रहा है कि वे ज़्यादा ज़िम्मेदारी लें. यहाँ भारत और ईयू दोनों दिखा रहे हैं कि वे ज़्यादा कर रहे हैं."
दूसरी ओर, बीबीसी से बात करते हुए, अटलांटिक काउंसिल में दक्षिण एशिया मामलों के वरिष्ठ विशेषज्ञ माइकल कुगलमैन कहते हैं, "भारत इस साझेदारी को वैश्विक व्यापार में चीन के बढ़ते असर का मुक़ाबला करने के एक तरीक़े के रूप में भी देखेगा. यह एक ऐसी भूमिका है, जो उसने पहले अमेरिका के साथ निभाने की कोशिश की थी. अब हालात बदल गए हैं. ईयू भी चीन का मुक़ाबला करने के लिए भारत को एक उपयोगी साझेदार मानता है."
हालाँकि, यह सब होने के लिए, डॉ. मोहन कुमार के अनुसार, भारत और ईयू दोनों को अभी काफ़ी काम करना है.
उन्होंने कहा, "भारत को गहरे और संरचनात्मक आर्थिक सुधार करने होंगे. जैसे, बेहतर नियामक ढाँचा, भूमि सुधार, बिजली के क्षेत्र में सुधार और श्रम सुधार करने होंगे. ईयू को भी, ख़ासकर लोगों के आने-जाने के मुद्दे पर और लचीला होना होगा. इस क़दम से ईयू के भीतर इमिग्रेशन विरोधी समूहों की नाराज़गी नहीं बढ़नी चाहिए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












