इस बार ईरान पर अमेरिका का संभावित हमला अलग क्यों होगा?

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- Author, अमीर आज़मी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ फ़ारसी
अमेरिकी नौसेना का यूएसएस अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप अमेरिकी सेंट्रल कमांड के दायित्व वाले इलाक़े में ईरान के जल क्षेत्र के क़रीब पहुंच गया है. इससे यह आशंका बढ़ गई है कि हालात किसी बड़े टकराव की ओर बढ़ सकते हैं.
यह तैनाती ऐसे समय में हुई है जब ईरान में हाल के वर्षों में विरोध प्रदर्शनों को सबसे व्यापक और हिंसक तरीके से कुचला गया है. इससे यह भी साफ़ होता है कि अमेरिका और ईरान अब सीधे टकराव के कितने क़रीब आ गए हैं.
ईरान के नेता इस समय दोतरफ़ा दबाव में हैं.
एक तरफ़ ऐसा आंदोलन है जो अब सीधे-सीधे शासन को हटाने की मांग कर रहा है, और दूसरी तरफ़ अमेरिका के राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने अपनी मंशा जानबूझकर साफ़ नहीं की है. इससे न सिर्फ़ ईरान में, बल्कि पहले से ही अस्थिर पूरे इलाक़े में बेचैनी बढ़ गई है.
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पहले तनावों को सावधानी के साथ संभाला है तेहरान ने

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अमेरिकी सैन्य हमले की सूरत में, ज़रूरी नहीं कि ईरान की प्रतिक्रिया पहले की स्थितियों की तरह जानी-पहचानी, नपी-तुली रणनीति के मुताबिक ही हो.
ईरान में घरेलू अशांति को हिंसक तरीके से दबाने के संदर्भ में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया धमकियां, ऐसे वक्त में आई हैं जब इस्लामिक रिपब्लिक अंदरूनी तौर पर बेहद दबाव में है. ऐसे में अब अगर अमेरिका हमला करता है, तो हालात के तेज़ी से बिगड़ने का ख़तरा पहले से कहीं ज़्यादा है.
पिछले कुछ वर्षों में ईरान ने आम तौर पर देर से और सीमित जवाब देना पसंद किया है.
21–22 जून 2025 को अमेरिका के ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले के बाद, ईरान ने अगले दिन क़तर में अमेरिकी संचालन वाले अल उदैद एयर बेस पर मिसाइल हमला किया था.
राष्ट्रपति ट्रंप के मुताबिक, ईरान ने इस हमले की जानकारी पहले ही दे दी थी, जिससे एयर डिफेंस सिस्टम ने ज़्यादातर मिसाइलों को रोक दिया. इस पूरे घटनाक्रम को ईरान की तरफ़ से यह संदेश देने की कोशिश माना गया कि वह अपने इरादों पर अडिग है, लेकिन बड़े युद्ध से बचना चाहता है.
इसी तरह का पैटर्न ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान, जनवरी 2020 में भी दिखा था.
तीन जनवरी 2020 को बग़दाद एयरपोर्ट के पास कुद्स फ़ोर्स के कमांडर क़ासिम सुलेमानी की अमेरिकी ड्रोन हमले में मौत के बाद, ईरान ने पांच दिन बाद इराक़ में अमेरिकी ऐन अल-असद एयरबेस पर मिसाइलें दागी थीं.
तब भी पहले से चेतावनी दी गई थी. हालांकि किसी अमेरिकी सैनिक की मौत नहीं हुई, लेकिन बाद में दर्जनों लोगों ने दिमाग़ी चोट (ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजरी) की शिकायत की. इस घटना ने भी यही धारणा मज़बूत की कि ईरान तनाव भड़काने के बजाय उसे काबू में रखना चाहता था.

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हालांकि इस बार हालात साफ़ तौर पर पहले से अलग हैं.
ईरान, 1979 में इस्लामिक रिपब्लिक की स्थापना के बाद से अब तक के घरेलू अशांति के सबसे गंभीर दौरों में से एक से बाहर निकल रहा है.
दिसंबर के आख़िर और जनवरी की शुरुआत में भड़के विरोध प्रदर्शनों को बेहद सख़्ती और हिंसक कार्रवाई से दबा दिया गया. देश के भीतर मौजूद मानवाधिकार संगठनों और मेडिकल कर्मचारियों का कहना है कि कई हज़ार लोग मारे गए हैं, जबकि इससे कहीं ज़्यादा लोग घायल हुए हैं या हिरासत में लिए गए हैं.
मरने वालों की सही संख्या बता पाना मुश्किल है क्योंकि ईरान में पिछले कई हफ़्तों से इंटरनेट बंद है. ईरानी अधिकारियों ने इन मौतों की ज़िम्मेदारी लेने से इनकार किया है. इसके बजाय उन्होंने इसे 'आतंकी समूहों' की करतूत बताया है और इसराइल पर अशांति भड़काने का आरोप लगाया है.
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव ने हाल ही में कहा कि इन प्रदर्शनों को पिछले साल की 12 दिनों की जंग का ही अगला हिस्सा समझा जाना चाहिए. इस तरह की व्याख्या से यह समझ में आता है कि सरकार ने सुरक्षा को सबसे ऊपर रखकर जवाब क्यों दिया, और इसी तर्क का इस्तेमाल शायद कार्रवाई के पैमाने और उसकी तीव्रता को सही ठहराने के लिए किया गया.
हालांकि सड़कों पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों की संख्या अब कम हो गई है, लेकिन वे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं. लोगों की शिकायतें अब भी जस की तस हैं, और समाज के बड़े हिस्से तथा सत्ता पर काबिज़ व्यवस्था के बीच की खाई शायद ही कभी इतनी चौड़ी दिखी हो.
कहा जा रहा है कि आठ और नौ जनवरी को सुरक्षा बलों का नियंत्रण कुछ कस्बों और बड़े शहरों के कई इलाकों में अस्थायी तौर से हट गया था, जिसके बाद उन्होंने भारी बल प्रयोग करके दोबारा हालात पर काबू पाया.
थोड़े समय के लिए नियंत्रण चला जाने से अधिकारी बुरी तरह हिल गए हैं. इसके बाद जो शांति दिख रही है, वह बातचीत से नहीं आई है बल्कि थोपी गई है, जिससे हालात बेहद विस्फोटक बने हुए हैं.
कैसा है ईरान का रवैया?

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इस पृष्ठभूमि में अमेरिका के किसी भी संभावित हमले का स्वरूप बेहद अहम हो जाता है.
अगर हमला सीमित रहता है, तो अमेरिका इसे सैन्य सफलता बताकर तुरंत क्षेत्रीय युद्ध से बच सकता है.
लेकिन ऐसा कदम ईरानी अधिकारियों को देश के भीतर सख़्त अभियान का एक और दौर चलाने का बहाना भी दे सकता है.
ऐसे हालात में नए सिरे से दमन, बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां और पहले से हिरासत में मौजूद प्रदर्शनकारियों के लिए कड़ी सज़ाओं, जिनमें फांसी तक शामिल हो सकती है, का ख़तरा पैदा हो सकता है.
दूसरी तरफ़, अगर अमेरिका का अभियान इतना बड़ा हुआ कि वह ईरान की मौजूदा सत्ता को गंभीर रूप से कमज़ोर या पंगु कर दे, तो देश अराजकता की ओर बढ़ सकता है.
नौ करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले देश में सरकार का अचानक ढह जाना किसी साफ़ या तेज़ बदलाव की ओर ले जाने वाला नहीं होगा. इसके बजाय इससे लंबे समय तक चलने वाली अस्थिरता, गुटों के बीच हिंसा और पूरे इलाक़े में इसके असर फैलने की आशंका है- ऐसे नतीजे जिन्हें संभालने में सालों लग सकते हैं.
इन्हीं खतरों की वजह से ईरान की भाषा के लगातार और ज़्यादा सख़्त होती जा रही है.
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर और नियमित सेना, दोनों के वरिष्ठ कमांडरों के साथ-साथ ऊंचे राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों ने चेतावनी दी है कि अमेरिका का कोई भी हमला, चाहे वह किसी भी पैमाने का हो, जंग माना जाएगा.
इस तरह के बयानों ने ईरान के पड़ोसियों को भी बेचैन कर दिया है, ख़ासकर उन खाड़ी देशों को जहां अमेरिकी सेनाएं तैनात हैं. ईरान की त्वरित प्रतिक्रिया इन देशों को सीधे ख़तरे में डाल सकती है, भले ही वे सीधे तौर पर संघर्ष में शामिल हों या नहीं. इससे यह आशंका बढ़ जाती है कि लड़ाई ईरान और अमेरिका से कहीं आगे तक फैल सकती है.
अमेरिका के सामने भी अपनी सीमाएं हैं.
ट्रंप बार-बार ईरानी अधिकारियों को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़ हिंसा न करने की चेतावनी देते रहे हैं और अशांति के चरम पर उन्होंने ईरानियों से कहा था कि 'मदद आ रही है.' ये बयान ईरान के भीतर व्यापक रूप से फैल गए और उन्होंने प्रदर्शनकारियों के बीच उम्मीदें जगा दीं.

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दोनों पक्ष रणनीतिक परिदृश्य को समझ रहे हैं.
ट्रंप जानते हैं कि पिछले साल की 12 दिनों की जंग के बाद ईरान सैन्य रूप से पहले से कमज़ोर हो चुका है, और तेहरान भी इस बात से वाक़िफ़ है कि ट्रंप को पूरे पैमाने के, बिना किसी तय अंत वाले युद्ध में उतरने की खास इच्छा नहीं है.
यह आपसी समझ थोड़ी तसल्ली दे सकती है, लेकिन यही चीज़ ख़तरनाक गलतफ़हमियां भी पैदा कर सकती है- जहां दोनों पक्ष अपनी ताक़त या पकड़ को ज़रूरत से ज़्यादा आंक लें या फिर सामने वाले के इरादों को ग़लत समझ बैठें.
ट्रंप के लिए किसी न किसी तरह का संतुलन ढूंढना बेहद ज़रूरी है, चाहे वह जैसा भी हो. उन्हें ऐसा नतीजा चाहिए जिसे वह अपनी जीत के तौर पर पेश कर सकें, लेकिन साथ ही ईरान को न तो नए सिरे से दमन के दौर में धकेलें और न ही देश को अराजकता की ओर ले जाएं.
ईरानी नेतृत्व के लिए ख़तरा वक़्त और धारणा से जुड़ा है.
हालिया अशांति के पैमाने ने देश को भीतर तक हिला दिया है और अगर नेता यह मानने लगें कि बाहर के ख़तरों को रोकने और देश के भीतर नियंत्रण दोबारा हासिल करने के लिए तीखी प्रतिक्रिया देना ज़रूरी है तो ईरान अपना पहले वाला तरीका न अपनाए.
लेकिन त्वरित जवाब देने से ग़लत अनुमान का ख़तरा काफ़ी बढ़ जाएगा, जिससे इलाक़े के दूसरे देश भी लड़ाई में खिंच सकते हैं.
जब दोनों तरफ़ ज़बरदस्त दबाव हो और पैंतरे चलने की गुंजाइश बहुत कम रह जाए, तो लंबे समय से चला आ रहा तनातनी का यह खेल शायद अपने सबसे ख़तरनाक मोड़ के क़रीब पहुंच रहा है. ऐसा मोड़, जहां ज़रा सा संतुलन बिगड़ने की कीमत सिर्फ़ सरकारों को नहीं, बल्कि लाखों आम ईरानी नागरिकों और पूरे आसपास के क्षेत्र को भुगतनी पड़ सकती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.














