ईरान और मिस्र की ‘बेमिसाल दोस्ती’ दुश्मनी में कैसे बदली?

    • Author, कीवान हुसैनी
    • पदनाम, बीबीसी अरबी

ईरान और इसराइल में जारी तनाव के बीच ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने जॉर्डन और मिस्र का एक असामान्य दौरा किया है.

मिस्र अरब दुनिया और मध्य पूर्व में एक ख़ास स्थान रखता है और इस पृष्ठभूमि में ईरान के राजनीतिक नेता पिछले कई साल से मिस्र के साथ संबंध सुधारने के लिए कोशिश कर रहे हैं.

ईरान और मिस्र मध्य पूर्व के न केवल दो सबसे अधिक आबादी वाले देश हैं बल्कि साथ ही ये दोनों देश मध्य पूर्व के दूसरे देशों की तुलना में एक अलग राजनीतिक और सामाजिक पहचान रखते हैं.

मध्य पूर्व के दूसरे देश 20वीं सदी में अस्तित्व में आए हैं, जबकि प्राचीन संस्कृतियों का केंद्र होने के कारण ईरान और मिस्र का मध्य पूर्व में एक ऊंचा स्थान है.

ईरान और मिस्र में दोस्ताना संबंध का इतिहास विवादों और समझौतों से भरा पड़ा है.

ख़ास तौर पर अगर आप पिछले 150 सालों पर नज़र दौड़ाएं तो पता चलता है कि यह दोनों देश जहां कई बार बहुत से मामलों में एक दूसरे के बेहद क़रीब आए हैं, वहीं ऐसा समय भी आया जब वह टकराव और दुश्मनी के रास्ते पर भी चले हैं.

फ़िलहाल ईरान और मिस्र के बीच कूटनीतिक संबंध बेहद सीमित हैं और हाल के वर्षों में की जाने वाली कई कोशिशों के बावजूद दोनों देशों ने अभी तक एक दूसरे के यहां अपना राजदूत तैनात नहीं किया है.

लेकिन, ग़ज़ा की जंग और लेबनान पर इसराइली हमलों ने तेहरान और क़ाहिरा को संबंध दोबारा सुधारने का एक नया मौक़ा दिया है.

हाल की ईरानी कूटनीतिक गतिविधियां साफ़ तौर पर कम से कम ईरान की ओर से समझौते की तीव्र इच्छा का परिचय देते हैं.

दरअसल ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची का मिस्र समेत क्षेत्र के दूसरे देशों का दौरा करने का मक़सद ईरान और इसराइल के बीच जारी तनाव पर बातचीत करना था.

अपने इस दौरे के दौरान अब्बास अराग़ची लेबनान, इराक़ और सऊदी अरब के बाद मिस्र और जॉर्डन गए थे.

इन सारी गतिविधियों में मिस्र को एक विशेष बढ़त हासिल है, क्योंकि न केवल उसकी सीमा इसराइल के साथ मिलती है बल्कि उसके इसराइल के साथ औपचारिक कूटनीतिक संबंध भी हैं.

इसके अलावा मिस्र ने इसराइल और हमास के बीच वार्ता में अहम भूमिका भी निभाई है.

ईरान और मिस्र के संबंधों के इतिहास पर नज़र डालने से मालूम होता है कि भौगोलिक दूरियों और गंभीर समस्याओं के बावजूद दोनों देशों के बीच दोस्ती और सहयोग की बहुत सी वजहें थीं.

हालांकि, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली घटनाएं इन दोनों देशों के बीच के संबंध पर असर डाल रही हैं.

पारिवारिक संबंध

अगर अतीत की बात की जाए तो क्षेत्र में उस्मानिया सल्तनत और इसके बाद फ़्रांस और इंग्लैंड जैसी औपनिवेशिक शक्तियों की मौजूदगी के कारण ईरान और मिस्र के बीच कूटनीतिक संबंध बहुत ठोस न हो सके.

16वीं सदी की शुरुआत में मिस्र उस्मानिया सल्तनत का एक राज्य बन गया लेकिन 19वीं सदी के आख़िर में यह ब्रिटेन के क़ब्ज़े में चला गया.

सन 1922 में अंग्रेज़ों ने मिस्र की आज़ादी को सरकारी तौर पर मान तो लिया मगर उन्होंने विदेश नीति, सेना, स्वेज़ नहर और मिस्र में मौजूद शक्ति के दूसरे केंद्रों का नियंत्रण मिस्र के हवाले करने से इनकार कर दिया. इस दौरान ईरान के बारे में अंग्रेज़ों की रणनीति अलग थी.

उन्होंने ईरान में रज़ा शाह नाम के एक फ़ौजी कमांडर का समर्थन किया जिसने सन 1921 में एक सैनिक विद्रोह के ज़रिए काफ़ी हद तक सत्ता पर क़ब्ज़ा किया. इसके पांच साल के अंदर अहमद शाह क़ाजार का तख़्ता पलट कर रज़ा शाह ने पहलवी राजा के नाम से ख़ुद ताज पहन लिया.

इस तरह पहले विश्व युद्ध के तुरंत बाद ईरान और मिस्र में ऐसे बादशाहों का शासन आ गया जिनकी आर्थिक और राजनीतिक नीतियां अपने देश की जनता की इच्छा या हितों से ज़्यादा ब्रिटेन की राजशाही के अधीन थीं.

मिस्री शाही दरबार के साथ रज़ा शाह के संबंधों को पूरी तरह परवान चढ़ने में लगभग दो दशक लगे.

जब ईरान के शाह अपने बड़े बेटे और युवराज मोहम्मद रज़ा के लिए दुल्हन की तलाश में थे तो उन्होंने मिस्र के बादशाह फ़ारूक़ की बहन फ़ौज़िया को चुना.

और यह पसंद रज़ा शाह और मिस्र के बादशाह फ़ारूक़ दोनों के लिए बड़ा राजनीतिक और प्रतीकात्मक लाभ लेकर आई.

पहलवी परिवार की नई-नई बादशाहत को क़ानूनी आधार देने के लिए यह एक अहम क़दम था, यानी एक ऐसे शाही परिवार से संबंध स्थापित करना जो लंबे अरसे से चला आ रहा था.

दूसरी तरफ़ शाह फ़ारूक़, जिनका देश एक पश्चिमी ताक़तों के नियंत्रण में था और जिनको अरब क्षेत्र में एक अयोग्य और कठपुतली शासक के तौर पर देखा जाता था, इस सियासी शादी से ख़ुद को शासक के तौर पर मिलने वाले फ़ायदे से पूरी तरह अवगत थे.

सन 1939 में ईरानी युवराज मोहम्मद रज़ा पहलवी की मिस्र की शहज़ादी फ़ौज़िया से शादी के बाद दोनों देशों ने आधुनिक इतिहास में पहली बार एक दूसरे के देश में राजदूत भेजे.

इस तरह तेहरान और क़ाहिरा के बीच औपचारिक तौर पर पूर्ण कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत हुई.

यह वह समय था, जब पारिवारिक रिश्ते और दोनों देशों के क्षेत्रीय महत्व की पृष्ठभूमि में यह संबंध एक उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ता दिखा.

शाह फ़ारूक़ का पतन

समय बीतने के साथ युवराज शहज़ादा मोहम्मद रज़ा की फ़ौज़िया से शादी ईरान के शाही परिवार के लिए परेशानी और तकलीफ़ की वजह बन गई.

इस दौर में हालांकि दोनों देशों में आपसी कूटनीतिक संबंध तो थे लेकिन रज़ा शाह की विदेश नीति बनाने में मिस्र कोई भूमिका अदा नहीं कर पा रहा था.

शाह फ़ारूक़ और उनके प्रधानमंत्री को कूटनीतिक फ़ैसले लेने में बेहद सीमित आज़ादी मिली हुई थी.

ईरान और मिस्र के औपचारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित होने के तुरंत बाद ही दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया और दोनों देश औपनिवेशिक शक्तियों, विशेष कर ब्रिटेन की युद्ध नीतियों को बढ़ावा देने के औज़ार बन गए.

युद्ध की समाप्ति के बाद दोनों देश ब्रिटेन के नियंत्रण में मध्य पूर्व की शासन व्यवस्था का हिस्सा बन गए जिसमें अमेरिका और फ़्रांस का हस्तक्षेप कम था.

हालांकि, दोनों देशों में कूटनीतिक संबंध कोई असाधारण बात नहीं थी लेकिन इस दौरान कभी उनके बीच टकराव या दुश्मनी की बात भी सामने नहीं आई.

इसकी बुनियादी वजह यह थी कि ईरान और मिस्र दोनों ही अपने-अपने देश में ग़रीबी पर क़ाबू पाने के लिए सुधार की कोशिश कर रहे थे.

इसके अलावा दोनों देश यूरोप की राजधानियों से अपने-अपने संसाधन और अहम नीतियों पर दोबारा नियंत्रण पाने की कोशिश में लगे हुए थे.

ईरान और मिस्र के संबंधों में यह ख़ास दौर सन 1952 में नाटकीय तौर पर बदल गया जब मिस्र में सैनिक अधिकारियों के एक समूह ने देश में ब्रिटेन समर्थित राजशाही का तख़्ता पलट दिया और देश की अर्थव्यवस्था पर क़ब्ज़ा कर लिया.

इस घटना को बाद में ‘1952 की क्रांति’ का नाम दिया गया जिसके बाद शाह फ़ारूक़ को गद्दी से हटना पड़ा और इस तरह मिस्र से लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी बादशाहत का ख़ात्मा कर दिया गया.

बादशाहत के अंत के तीन साल के अंदर जमाल अब्दुल नासिर ने नवस्थापित मिस्र गणतंत्र में सत्ता हासिल कर ली.

इसके बाद से मिस्र अरब राष्ट्रवाद और मध्य पूर्व में लोकतांत्रिक क्रांतियों का झंडाबरदार बनकर सामने आया.

इसके बाद जल्द ही ईरान भी सऊदी अरब और इराक़ जैसी दूसरी बादशाहत के साथ मिस्र विरोधी कैंप में आ गया.

अरब राष्ट्रवादी नेता जमाल अब्दुल नासिर के लिए ईरान के शाह केवल एक और क्षेत्रीय बादशाह ही नहीं बल्कि एक ग़ैर अरब बादशाह भी थे जिन्हें पश्चिम का समर्थन मिला हुआ था.

जमाल अब्दुल नासिर ने अपने अरब राष्ट्रवादी प्रोपेगैंडा में ईरान को ख़ास तौर पर निशाना बनाया और ईरान पर इसराइल के साथ गठबंधन करके मुसलमानों को धोखा देने और अमेरिकी हथियारों से लैस सेना तैयार करने जैसे आरोप लगाए.

अनवर सादात और ईरान के शाह की दोस्ती

जमाल अब्दुल नासिर को क्षेत्र में अपने राजनीतिक मक़सदों को आगे बढ़ाने में बहुत सी रुकावटों का सामना करना पड़ा और इसराइल के साथ होने वाली जंगों में लगातार हार के बाद आख़िर में साल 1970 में जमाल अब्दुल नासिर की अचानक मौत हो गई.

उनके उत्तराधिकारी अनवर सादात ने (जो 1952 की क्रांति में जमाल अब्दुल नासिर के साथ थे) अपने देश की महत्वपूर्ण नीतियों को लगभग पूरी तरह बदल कर रख दिया.

अनवर सादात ने इसराइल की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाया, इख़्वानुल मुस्लिमीन के साथ समझौते की कोशिश की और ईरान के शाह के साथ क़रीबी संबंध बनाए.

शुरू में ईरानी आर्थिक मदद के फ़ायदे पर आधारित संबंध तेज़ी से आगे बढ़े. उस वक़्त अनवर सादात ने तेहरान के दौरे के मौक़े पर मोहम्मद रज़ा पहलवी की मौजूदगी में फ़ारसी में लिखी कुछ बातें पढ़ कर सुनाईं जिनमें दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक दोस्ती का ज़िक्र था.

इस मौक़े पर उन्होंने श्रोताओं को ईरानियों और मिस्रियों के बीच प्राचीन सभ्यता से चले आ रहे व्यापक संबंधों की याद दिलाई.

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि दोनों देश साझा इतिहास रखने की वजह से एक जैसे हैं.

अपने सरकारी बयानों में ईरान के शाह और अनवर सादात ने एक दूसरे की बहुत बड़ाई की और आम लोगों के बीच एक-दूसरे के लिए अपनेपन का इज़हार करने में हिचकिचाहट महसूस नहीं की.

सन 1973 में मिस्र ने दूसरे अरब देशों के सहयोग से सिनाई प्रायद्वीप और गोलान की पहाड़ियों पर इसराइल का दावा सामने आने पर इसराइल पर हमला किया लेकिन जंग के शुरुआती दिनों में ही उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

युद्ध ख़त्म होने के बाद इसराइल के साथ संबंध तय करने में अनवर सादात ने कूटनीति का रास्ता अपनाया और इस रणनीति में ईरान के शाह का भरपूर समर्थन भी उन्हें मिला.

अमेरिकी दस्तावेज़ों के अनुसार जब ईरान के साथ दो साल बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जेराल्ड फ़ोर्ड से मुलाक़ात के लिए वॉशिंगटन गए तो उनसे कहा कि अगर मोअम्मर गद्दाफ़ी जैसे अति क्रांतिकारी विचारों वाले लोग सऊदी अरब को राजनीतिक तौर पर अस्थिर करने में कामयाब हो जाते हैं तो ईरान और मिस्र को सऊदी अरब के तेल के संसाधनों पर साझा कंट्रोल संभाल लेना चाहिए.

जब मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी का तख़्ता पलट दिया गया और वह स्थाई तौर पर अपना देश छोड़ गए तो सादात ने ईरान के पूर्व शाह के साथ भाईचारे का रवैया अपनाया.

यहां तक कि शाह के निर्वासन के दौर में अनवर सादात ने हमेशा उनके साथ ऐसा बर्ताव रखा जैसे कि वह अब भी सत्ता में हों.

जब ईरान के शाह के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण समर्थक अमेरिका ने उनकी गंभीर बीमारी के बावजूद उन्हें न्यूयॉर्क शहर के अस्पताल में इलाज कराने की इजाज़त देने से इनकार कर दिया तो यह अनवर सादात ही थे जिन्होंने उनकी मौत तक खुले दिल और सम्मान के साथ उनकी मेज़बानी की.

मोहम्मद रज़ा शाह की मौत के बाद अनवर सादात ने उनके लिए बड़े पैमाने पर सरकारी जनाज़े की व्यवस्था की जिसमें उन्होंने दुनिया को दिखाया कि उन्हें व्यक्तिगत तौर पर शाह से कितना प्यार था.

ख़ालिद इस्लामबूली

ईरान में शाह का तख़्ता पलट कर सरकार में आने वाले इस्लामी क्रांतिकारियों की अनवर सादात से दुश्मनी शाह को शरण देने के मामले से आगे बढ़ गई थी.

ईरानी क्रांति के उत्कर्ष के दौर में सादात ने अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के नेतृत्व में इसराइली प्रधानमंत्री मेनाचेम बेगिन के साथ शांति समझौते पर दस्तख़त किए.

ईरानी क्रांति के तुरंत बाद मार्च 1979 में मिस्र वह पहला अरब देश बन गया जिसने सरकारी तौर पर इसराइल को मान्यता देते हुए उससे पूर्ण कूटनीतिक संबंध स्थापित किया.

अनवर सादात के इस क़दम ने मध्य पूर्व में हलचल मचा दी और अरब दुनिया के महत्वपूर्ण नेता की हैसियत से मिस्र की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए जाने लगे.

इसराइल के साथ शांति समझौते पर दस्तख़त करने के तीन साल बाद सादात की ख़ालिद अल-इस्लामबूली नाम के एक मिस्री सैनिक अधिकारी ने हत्या कर दी.

इसके बाद बड़े पैमाने पर अस्थिरता, राजनीतिक हिंसा सशस्त्र इस्लामी क्रांति या यहां तक कि गृह युद्ध की आशंका ने मित्र को अपनी लपेट में ले लिया.

एक तीखी प्रतिक्रिया के तौर पर मिस्री सेना ने सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के लिए सादात के उप प्रमुख हुस्नी मुबारक का समर्थन किया.

ईरान और मिस्र के संबंध ईरान के पूर्व शाह की क़ाहिरा में मौजूदगी और इसराइल के साथ सादात के शांति समझौते की वजह से पहले से ही तनावपूर्ण थे. यह संबंध अब कट्टर दुश्मनी में बदल गया.

ईरान ने राजनीतिक प्रोपेगैंडे में अनवर सादात को मारने वाले ख़ालिद अल इस्लामबूली को एक बहादुर लड़ाके के तौर पर दिखाया और तेहरान की एक सड़क का नाम बदलकर उसे ‘शहीद ख़ालिद अल इस्लामबूली स्ट्रीट’ का नाम दे दिया.

और यह वह समय था जब मिस्र और ईरान में दुश्मनी अपने चरम को पहुंच गई.

हुस्नी मुबारक

ईरान इराक जंग की शुरुआत में मिस्र ने सद्दाम हुसैन का समर्थन किया और जैसे-जैसे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता गया मिस्र सद्दाम हुसैन के अहम सहयोगियों में से एक बन गया.

यहां तक कि मिस्र ने इस जंग के लिए इराक को हथियार भी दिए.

ईरान के ख़िलाफ़ खुली दुश्मनी जताने और सद्दाम हुसैन के पूर्ण समर्थन ने मिस्र के लिए ख़ास तौर पर खाड़ी के देशों के साथ गठबंधन बनाने की राह आसान की.

इसके अलावा क्षेत्रीय शक्तियों से यह रणनीतिक सहयोग ईरान इराक युद्ध के ख़त्म होने के बाद भी जारी रहा.

लेकिन सन 1990 के दशक की शुरुआत में जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला करने और उसे इराक़ में मिला लेने का फ़ैसला किया तो मिस्र इराक़ के ख़िलाफ़ खड़ा हो गया.

हालांकि यह परिस्थिति भी तेहरान और क़ाहिरा के बीच संबंध बेहतर नहीं कर सकी और ईरान ने मिस्र पर इसराइल और अमेरिका की कठपुतली होने का आरोप लगाने का सिलसिला जारी रखा.

1990 के दशक के मध्य में मिस्र ने इसराइल- फ़लस्तीन विवाद के हल के लिए कूटनीतिक कोशिशों का ज़बर्दस्त समर्थन किया जबकि ईरान ने अमेरिका की ओर से शुरू की गई शांति वार्ता का कड़ा विरोध किया.

फ़लस्तीनियों ने क़ाहिरा में इस बात के लिए एक समझौते पर दस्तख़त किए कि ग़ज़ा का प्रशासन कैसे चलाया जाए.

इसके साथ मिस्र इसराइल और जॉर्डन के बीच होने वाली वार्ता का भी बड़ा समर्थक रहा जिसकी वजह से आख़िर में दोनों देशों के बीच पूर्ण कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए.

उस समय तक मिस्र की ओर से इसराइल को मान्यता देने के संबंध में दिए जाने वाले कड़े बयानों का असर काफ़ी हद तक कम हो चुका था.

लेकिन जो कुछ फ़लस्तीनी इलाक़ों में हो रहा था वह उन शांति समझौतों से मेल नहीं खाता था.

सन 1995 में फ़लस्तीनियों के साथ शांति के सबसे बड़े समर्थक इसराइली प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन की हत्या कर दी गई और इसराइल ने अपना रास्ता पूरी तरह से बदल दिया.

उस समय से इसराइल ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के अनुसार फ़लस्तीन की साल 1967 की सीमाओं को मान्यता देने से इनकार कर दिया और फ़लस्तीनी शरणार्थियों की वापसी के अधिकार को अस्वीकार कर दिया.

इसके बाद इक्कीसवीं सदी इसराइल और क्षेत्र के लिए बहुत शांति के साथ नहीं बल्कि व्यापक पैमाने पर फ़लस्तानियों के विरोध प्रदर्शन के साथ शुरू हुई.

नई सदी

21वीं सदी की शुरुआत में तेहरान और क़ाहिरा के बीच मतभेद और गहरे हो गए.

लेबनान में मिस्र ने हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ सुन्नी समूहों का समर्थन किया क्योंकि वह एक शक्तिशाली शिया इस्लामी संगठन के उभरने और उसके प्रभाव से सहज नहीं था.

सन 2003 में अमेरिका और ब्रिटेन ने सद्दाम हुसैन का तख़्ता पलट दिया जिसके बाद ईरान ने इराक़ में शक्ति और प्रभाव हासिल किया जो मिस्र को बिल्कुल पसंद नहीं आया.

उस समय के ईरानी राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी ने मिस्र के साथ कूटनीतिक संबंध बहाल करने की कोशिश की तो दोनों देशों के बीच लंबे समय के बाद यह संबंध किसी हद तक बहाल हुआ. लेकिन इन संपर्कों का भी कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया.

सन 2006 में जब इसराइल ने लेबनान और हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर एक महीने से ज़्यादा समय तक बमबारी की तो ईरान और मिस्र के बीच की खाई फिर से और गहरी हो गई.

इस जंग के दौरान मिस्र ने सऊदी अरब की तरह हिज़्बुल्लाह की आलोचना की लेकिन दो साल बाद ग़ज़ा की जंग के दौरान दोनों देश एक बार फिर विरोधी पक्षों के बीच खड़े पाए गए.

सन 2009 में जब राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे के ख़िलाफ़ लाखों ईरानियों के प्रदर्शन की तस्वीर दुनिया भर में देखी गई तो मिस्र के सरकारी टेलीविज़न ने बार-बार उन तस्वीरों को दिखाया और ईरानी सरकार पर निहत्थे प्रदर्शनकारियों को हिंसा के साथ दबाने का आरोप लगाया.

ईरानी सरकार उस साल बड़े पैमाने पर होने वाले प्रदर्शनों के बावजूद बच तो गई लेकिन दो साल से भी कम समय के बाद अरब दुनिया के बड़े हिस्सों में इसी तरह की बग़ावतें देखने में आईं.

हुस्नी मुबारक के अपदस्थ होने के बाद इख़्वानुल मुस्लिमीन के मोहम्मद मुर्सी ने मतदान में राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत लिया.

सन 2011 में मुर्सी ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए तेहरान का दौरा किया.

इसके दो साल बाद मोहम्मद अहमदी निज़ाद ने इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) की बैठक में शामिल होने के लिए क़ाहिरा का दौरा किया.

लेकिन इसके तुरंत बाद व्यापक पैमाने पर प्रदर्शनों के बाद मिस्री सेना ने मुर्सी की सरकार का तख़्ता पलट दिया और अब्दुल फ़त्ताह अल सीसी ने सत्ता पर क़ब्ज़ा जमा लिया.

इसके बाद के वर्षों में सीसी ने सऊदी अरब के साथ पूरी तरह गठबंधन किया.

याद रहे कि सऊदी अरब ने मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में अपनी विदेश नीति को पूरी तरह बदल दिया था और ईरान के उत्कर्ष का मुक़ाबला करते हुए क्षेत्रीय शक्ति के तौर पर वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश की थी.

नया दौर

हालांकि तेहरान में ख़ालिद अल इस्लामबूली स्ट्रीट का नाम बदलने के फ़ैसले समेत ईरान की किसी कोशिश के नतीजे में मिस्र के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं हो सका लेकिन क़ाहिरा के साथ तनाव को कम करने के लिए तेहरान की रणनीति में बहुत बदलाव नहीं आया.

चाहे वह ईरान- सऊदी विवादों के दौरान मिस्र का मोहम्मद बिन सलमान को पूर्ण समर्थन की बात हो या क्षेत्र में फ़लस्तीन के समर्थकों को अलग-थलग करने की इसराइल की बड़े पैमाने पर की गईं कोशिशें, ईरान ने हमेशा क़ाहिरा के साथ अपने तनाव को संभालना चाहा है.

इसराइल- फ़लस्तीन वार्ता में हिस्सा लेने वाले अहम देशों में मिस्र सबसे ऊपर रहा है.

यह अपनी असामान्य भौगोलिक स्थिति और बड़ी आबादी की वजह से ईरान के लिए हमेशा एक बेहद लाभदायक आर्थिक और राजनीतिक साझेदार साबित हो सकता है.

अब ईरान और इसराइल के बीच तनाव असामान्य स्तर पर पहुंच चुका है.

ऐसे में ईरान ने मिस्र से अनुरोध किया है कि हाल के तनाव और भविष्य के संभावित विवादों को देखते हुए अगर मिस्र ईरान के साथ गठबंधन नहीं भी करता है तो कम से कम ईरान के दुश्मनों की पंक्ति में शामिल न हो.

ईरानी राजनेता और सरकारी मीडिया क्षेत्र में वर्तमान दुश्मनी और तनाव को इसराइल विरोधी नीति के हिस्से के तौर पर ढालने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं.

उनका दावा है कि ईरान की ज़रूरी विदेश नीति के तहत क्षेत्रीय देशों के साथ कोई दुश्मनी या मुक़ाबला नहीं है और इसराइल; ईरान और मध्य पूर्व के दूसरे देशों का ‘असल दुश्मन’ है.

अमेरिका की ओर से भरपूर आर्थिक सहायता पर निर्भर करने वाले सीसी और मिस्र के सैनिक नेताओं के लिए ईरान के साथ संबंध स्थापित करना हमेशा की तरह मुश्किल है.

दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं. हमास और इस्लामी जिहाद जैसे ग्रुपों के बारे में उनकी अलग सोच भी मतभेद की बड़ी वजह है.

लेबनान की स्थिति, यमन में हूती सरकार, सीरिया का गृह युद्ध, बशर अल असद की भूमिका और इराक़ के घटनाक्रम, यह सब भी द्विपक्षीय संबंधों में रुकावट बन रहे हैं.

यही वजह है कि ईरान और मिस्र दोनों के लिए कूटनीतिक संबंध रहने के बावजूद संबंधों में सुधार, चार दशकों से अधिक की दुश्मनी और प्रतिस्पर्धा के ख़ात्मे की संभावना अनिश्चित है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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