You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
सोने से कई गुना महंगी वो चीज़ जो थी क्लियोपैट्रा की पसंद और जिसके लिए एक राजा तक की हत्या कर दी गई
- Author, ज़ारिया गोर्वेट
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
बात साल 2002 की है. सीरियाई रेगिस्तान के एक कोने में क़ातना में मौजूद एक महल के खंडहर में पुरातत्वविद एक शाही कब्र की खोज में लगे हुए थे.
महल का ये खंडहर उस झील के किनारे मौजूद था जो सालों पहले सूख चुकी थी.
उन्हें कुछ निशान दिखाई दिए जो दिखने में धब्बों की तरह थे. उस वक्त उन्हें नहीं पता था कि उनकी ये खोज बेहद अहम साबित होने वाली है.
एक बड़े बरामदे और फिर कई तंग कॉरिडोर से होते हुए वो सीढ़ियों से उतरे और एक गहरे कमरे में पहुंचे. कमरे में एक तरफ बंद दरवाज़ा था जिसके दोनों और एक तरह की दो मूर्तियां थीं.
उन्हें शाही कब्र मिल गई थी. कमरे के भीतर 2000 वस्तुएं थीं, जिनमें गहने और एक बड़ा सोने का हाथ था. लेकिन कमरे की फर्श पर गहरे रंग के बड़े-बड़े धब्बे थे जिसने पुरातत्वविदों का ध्यान अपनी तरफ खींचा.
उन्होंने धूल और मिट्टी की परत से अलग कर इन बैंगनी रंग के धब्बों के नमूने जांच के लिए भेजे.
सीरिया की सूख चुकी झील के पास से इन शोधकर्ताओं को पूरे ज़माने की एक बहुमूल्य और बेहद महत्वपूर्ण चीज़ मिली थी.
ये वो चीज़ थी जिसके कारण साम्राज्य ताकतवर बने रहे, राजाओं की हत्या हुई और कई पीढ़ियों तक शासकों की ताकत को और मज़बूत किया.
इस चीज़ को लेकर मिस्र की रानी क्लियोपैट्रा का जुनून इतना अधिक था कि वो अपनी नाव की पाल के लिए भी इसका इस्तेमाल करती थीं.
कुछ रोमन सम्राटों ने को ये आदेश तक सुनाया था कि उनके उनके अलावा अगर कोई और इस चीज़ से रंगे कपड़े पहनेगा तो उसे मौत की सज़ा दी जाएगी.
ये चीज़ थी टायरियन पर्पल डाई (रंग), जिसे शाही बैंगनी या शाही रंग और अंग्रेज़ी में शेलफिश पर्पल कहा जाता है.
प्राचीन काल का एक दौर था जब ये शाही डाई सबसे महंगा उत्पाद हुआ करता था.
301 ईसा पूर्व में जारी एक रोमन आदेश के अनुसार टायरियन पर्पल डाई को अपने वज़न की तुलना में तीन गुना वज़न के सोने के बदले बेचा जाता था.
लेकिन कभी सम्राटों तक की मांग रहा ये रंग वक्त के साथ गायब हो गया. 15वीं सदी तक इसे बनाने की कला कहीं खो गई और आज के दौर में इसे बनाने की कला शायद ही किसी को पता है.
मौजूदा दौर में इसे फिर से बनाने की कोशिश हो रही है.
ट्यूनीशिया के उत्तर-पूर्वी इलाक़े में जहां कभी फ़ोनीशियाई शहर (भूमध्य सागर के तट पर बसी एक प्राचीन सभ्यता) कार्थेज हुआ करता था, वहां एक छोटी सी झोपड़ी में एक व्यक्ति बीते 16 साल से इस रंग को बनाने की कोशिश में लगे हैं.
वो समुद्री घोंघों को पकड़कर उन्हें फोड़ते हैं, उनकी अंतड़ियों से वो ऐसी चीज़ बना सके हैं जो कुछ-कुछ टायरियन पर्पल जैसी है.
रंग का इतिहास और साम्राज्य
प्राचीन काल की बात की जाए तो टायरियन पर्पल शक्ति, संप्रभुता और धन का प्रतीक माना जाता था, जिसे समाज के केवल सबसे ऊंचे ओहदे पर बैठे लोग ही इस्तेमाल कर पाते थे.
प्राचीन दौर के लेखक इसके इस्तेमाल से आने वाले रंग को लेकर सटीक विवरण देते हैं जो इसके नाम के अनुरूप है. वो इसे जमे हुए खून की तरह, कुछ-कुछ काला... गहरा लाल-बैंगनी रंग बताते हैं.
23 ईसा पूर्व में जन्मे रोमन विद्वान और इतिहासकार प्लिनी द एल्डर ने इसे "रोशनी के सामने रखने पर चमकदार दिखने वाला" बताया है.
अपने विषेश गहरे रंग और धुलाई के साथ रंग न छूटने के कारण दक्षिणी यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया की प्राचीन सभ्यताओं के लोग इस रंग को पसंद करते थे.
फ़ोनीशिया सभ्यता के लोगों के लिए ये इतना ख़ास था कि इसका नाम उन्होंने अपने शहर "टायर" के नाम पर रखा था, उन्हें "बैंगनी लोगों" के रूप में जाना जाने लगा.
इस रंग की छाप कपड़ों से लेकर नावों की पाल, तस्वीरों, फर्नीचर, प्लास्टर, दीवारों की पेंटिंग, गहनों, यहां तक कि कफ़न तक पर पाई जा सकती है.
40 ईसा पूर्व में रोम के सम्राट ने मॉरिटानिया के राजा की अचानक हत्या का आदेश दिया था.
कहा जाता है कि वो रोमन शाही परिवार के दोस्त थे लेकिन उनकी ग़लती ये थी कि वो ग्लैडियेटर का एक मैच देखने के लिए बैंगनी रंग के कपड़े पहन कर आए थे. इस रंग के कारण बढ़ने वाली ईर्ष्या, इसको पाने की इच्छा की तुलना कभी-कभी एक तरह के पागलपन से की जाती थी.
समुद्री जीव से बनने वाली चीज़
अजीब बात ये है कि कभी बेहद मूल्यवान माना जाने वाला ये रंग अपने समकालीन लैपिस लाजुली (बैंगनी रंग का रत्न) या फिर लाल रंग देने वाले रोज़ मैडर (रुबिया टिंक्टरम नाम के पौधे की जड़) की तरह सुंदर रत्न या पेड़-पौधों से नहीं आया था.
बल्कि ये एक तरल पदार्थ ये आया था जिसे म्यूरेक्स परिवार में समुद्री घोंघे बनाते हैं. सही कहें तो ये लार (स्लाइम) जैसे म्यूकस से आया था.
समुद्री घोंघे की तीन प्रजातियों की लार से टायरियन पर्पल का उत्पादन किया जा सकता है. इनमें से हर एक से एक अलग रंग बनाया जा सकता है- हेक्साप्लेक्स ट्रंकुलस से नीला-बैंगनी, बोलिनस ब्रैंडारिस से लाल-बैंगनी और स्ट्रैमोनिटा हेमास्टोमा से लाल रंग.
म्यूरेक्स समुद्री घोंघों को समुद्र के चट्टानी तट से हाथों से या फिर जाल में फंसा कर पकड़ा जाता है. इन्हें इकट्ठा कर के इनका स्लाइम इकट्ठा किया जाता है.
कहीं कहीं पर घोंघे की श्लेष्म ग्रंथि (म्यूकस ग्लैंड) पर एक ख़ास चाकू से चीरा लगाया जाता था.
एक रोमन लेखक के अनुसार ग्रंथि पर चीरा लगाने से घोंघे के घाव से "आंसुओं की तरह" स्लाइम बहने लगता था. इसे इकट्ठा कर हमाम-दस्ता में पीसा जाता था. छोटी प्रजाति के घोंघों को पूरी तरह से कुचल दिया जाता था.
डाई कैसे बनता था, किसी को नहीं पता
लेकिन इस रंग को लेकर इतिहास के दस्तावेज़ों में इतनी ही जानकारी है, जो हमें पता है.
लेकिन घोंघे के बिना रंग वाले स्लाइम से गाढ़ा बैंगनी रंग कैसे तैयार होता था, इसे लेकर विवरण या तो अस्पष्ट है, या कहीं-कहीं पर विरोधाभासी और कभी-कभी ग़लत लगता है.
अरस्तू ने कहा था कि ये म्यूकस ग्रंथियां "बैंगनी मछली" के गले से आती हैं.
डाई उद्योग में भी ये जानकारी बेहद गोपनीय रखी जाती थी. डाई बनाने के हर रंगरेज़ के अपने-अपने नुस्ख़े होते थे जिसमें कई चरणों वाले फ़ार्मुले होते थे. वो ये फॉर्मुले किसी के साथ साझा नहीं करते थे. इस कारण ये समझना मुश्किल है कि म्यूकस से बैंगनी रंग कैस बना.
पुर्तगाल के लिस्बन के नोवा विश्वविद्यालय में कंज़र्वेशन की प्रोफ़ेसर मारिया मेलो कहती हैं, "समस्या यह है कि लोगों ने ये महत्वपूर्ण नुस्ख़े कभी लिखे ही नहीं."
इस मामले में सबसे विस्तृत जानकारी प्लिनी ने दी है. उन्होंने ईसा पूर्व पहली सदी में इस प्रक्रिया के बारे में विस्तार से लिखा है.
उन्होंने लिखा, "म्यूकस ग्रंथि से अलग करने के बाद उनमें नमक डाला जाता था और तीन दिनों के लिए फर्मेन्ट होने के लिए छोड़ दिया जाता था. इसके बाद पकाने का चरण शुरू होता था, इसे संभवतः टिन या सीसे के बर्तनों में "मध्यम" आंच पर पकाया जाता था. ये तब तक किया जाता था जब तक पूरी मिश्रण घटकर बस थोड़ा ही रह जाता था."
"इसके बाद दसवें दिन रंग को किसी कपड़े में लगाकर परीक्षण किया जाता था. अगर कपड़े पर इच्छा अनुरुप रंग चढ़ा, तो रंग तैयार हो जाता था."
मुश्किल ये थी कि हर एक घोंघे से बेहद कम मात्रा में म्यूकस मिलता था. ऐसे में केवल एक ग्राम टायरियन पर्पल रंग बनाने के लिए भी में लगभग 10,000 घोंघों की ज़रूरत पड़ती थी.
जिन इलाक़ों में ये डाई बनाया जाता था वहां अरबों समुद्री घोंघों के खोल मिले हैं. असल में, टायरियन पर्पल के उत्पादन को इतिहास के पहले केमिकल इंडस्ट्री के रूप में भी वर्णित किया गया है.
ग्रीस के थेसालोनिकी के एरिस्टोटल विश्वविद्यालय में कंज़र्वेशन केमिस्ट्री के प्रोफ़ेसर आयोनिस करापनागियोटिस कहते हैं कि "डाई बनाना असल में आसान नहीं है."
वे समझाते हैं कि "टायरियन पर्पल दूसरे डाई की तरह नहीं है जहां उसे बनाने के लिए ज़रूरी कच्चा माल आसानी से उपलब्ध है. ये घोंघे के म्यूकस में मौजूद केमिकल से बनता है जो माकूल परिस्थिति में रंग में तब्दील होते हैं. ये आश्चर्यजनक है."
डाई बन गया इतिहास
29 मई 1453 को कॉन्स्टेंटिनोपल के बाइजन्टाइन शहर पर ऑटोमन का कब्जा हो गया. इस तरह पूर्वी रोमन साम्राज्य का अंत हुआ और टायरियन पर्पल भी इतिहास का हिस्सा बन गया.
उस समय शहर के उद्योग के केंद्र में इसका डाई इंडस्ट्री था. ये रेग कैथलिक ईसाइयों से जुड़ चुका था, कैथलिक पादरी इस डाई से रंगा चोगा पहना करते थे, इस रंग के कपड़ों में वो अपने धर्मिक ग्रंथ रखा करते थे.
लेकिन अधिक टैक्स के कारण ये उद्योग पहले ही बंद होने की कगार पर पहुंच चुका था.
ऑटोमन के कब्ज़े के बाद इसके ऊपर से ईसाई धर्मगुरुओं का नियंत्रण ख़त्म हो गया. इसके बाद पोप ने फ़ैसला लिया कि लाल रंग ईसाई धर्म की ताकत का नया प्रतीक बनेगा. इसे बनाने में स्केल कीटों का इस्तेमाल होता था, इसे बनाना आसान भी था और ये सस्ते में बनाया जा सकता था.
हालांकि टायरियन पर्पल के ख़त्म होने के और भी कारण रहे हो सकते हैं. 2003 में दक्षिणी तुर्की में वैज्ञानिकों को एंड्रियाके के प्राचीन बंदरगाह के पास समुद्री घोंघे के खोल का बड़ा ढेर मिला. उन्होंने अनुमान लगाया कि ये 6वीं सदी का ढेर है जिसमें 600 लाख घोंघों के खोल हैं.
दिलचस्प बात ये थी कि इस ढेर में जो सबसे नीचे यानी सबसे पुराने खोल थे वो मोटे और बड़े थे जबकि सबसे ऊपर यानी बाद में फेंके गए खोल काफी छोटे थे. ये खोज बताती है कि उस दौर में बड़ी संख्या में इन समुद्री घोंघों को पकड़ा गया होगा और फिर एक वक्त आया होगा जब कोई भी परिपक्व घोंघा नहीं बचा होगा. शोधकर्ता कहते हैं कि हो सकता है कि इसी कारण से टायरियन पर्पल का उत्पादन ख़त्म हो गया होगा.
लेकिन इस खोज के कुछ सालों बाद, एक और खोज से इस प्राचीन रंग को फिर से बनाने को लेकर उम्मीद जगी.
आधुनिक दौर में प्राचीन रंग
सितंबर 2007 में एक दिन, ट्यूनीशिया के ट्यूनिस शहर के बाहरी इलाक़े में रहने वाले मोहम्मद घासेन नोइरा समुद्र के किनारे टहल रहे थे.
वो कहते हैं, "बीती रात तूफान आया था, इस कारण रेत पर जेलिफ़िश, समुद्री शैवाल, छोटे केकड़े, मोलस्क जैसे बहुत सारे जीव थे जो मरे हुए थे और यहां-वहां पड़े थे."
वो कहते हैं उन्हें एक जगह पर लाल-बैंगनी रंग दिखा, जो एक फटे हुए समुद्री घोंघे से निकलता हुा लग रहा था.
उन्हें टायरियन पर्पल के बारे में पढ़ी बातें याद आईं. उन्होंने पास के बंदरगाह में जाकर देखा. वहां उन्हें मछुआरों के जाल में फंसे उस तरह के और भी कई घोंघे मिले.
उन्होंने इनसे रंग बनाने की कोशिश की. नोइरा का प्रयोग शुरूआत में निराशाजनक था क्योंकि जब उन्होंने घोंघे की अंतड़ियां निकालीं तो उन्हें उसमें केवल सफेद तरल म्यूकस मिला. उन्होंने उसे एक बैग में डाल दिया और थककर सोने चले गए.
वो कहते हैं कि सवेरे उठ कर उन्होंने देखा तो वो पदार्थ जो पानी की तरह था वो अब दूसरे रंग का हो गया था.
आज वैज्ञानिक ये जानते हैं कि घोंघे का म्यूकस जब सूर्य की रोशनी के संपर्क में आता है तो उसका रंग बदल जाता है. वो पहले पीला, हलका नीला, नीला और फिर बैंगनी रंग का हो जाता है.
प्रोफ़ेसर आयोनिस करापनागियोटिस कहते हैं कि "जिस दिन धूप निकली हो उस दिन आप ये करें तो इसमें पांच मिनट से भी कम समय लगता है."
लेकिन ये पक्का टायरियन पर्पल नहीं है. प्रोफ़ेसर मारिया मेलो कहती हैं, "इस रंग में दरअसल कई अलग-अलग के मॉलिक्यूल होते हैं जो साथ मिलकर काम करते हैं."
वो कहती हैं इसमें नीला, बैंगनी, गाढ़ा नीला और लाल रंग के मॉलिक्यूल होते हैं, आप अपनी ज़रूरत के अनुसार रंग पा सकते हैं लेकिन इसके बाद इसे डाई बनाने की भी अलग प्रक्रिया होती है, जो कि कपड़ों पर चढ सके.
एक वैज्ञानिक ने 12,000 घोंघों से मिले म्यूकस से 1.4 ग्राम पर्पल रंग बनाया. लेकिन ये उन्होंने कैमिकल का इस्तेमाल कर इंडस्ट्रियल तरीके से किया.
लेकिन मोहम्मद नोइरा चाहते हैं कि वो प्राचीन तरीके से टायरियन पर्पल बनाएं. इस कोशिश में वो 16 साल बिता चुके हैं.
उन्होंने कई बार रंग बनाया लेकिन वो कभी टायरियन पर्पल के नज़दीक नहीं पहुंच पाए. वो प्लिनी के लिखे दस्तावेज़ पढ़कर प्राचीन तरीके से डाई बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "मैं अब तक वही प्राचीन रंग बना नहीं पाया हूं. वो रंग जीता-जागता दिखता था, रोशनी के साथ उसकी चमक बदलती रहती थी, ऐसा लगता था कि वो आपकी नज़रों के साथ खेल रहा है."
नोइरा रंग बनाने की अपनी कोशिश और प्रयोग को दुनिया की अलग-अलग जगहों पर दिखा चुके हैं. उन्होंने अपनी कोशिशों की प्रदर्शनी लंदन में ब्रिटिश संग्रहालय और बोस्टन में ललित कला संग्रहालय में लगाई है.
लेकिन ये बात भी सच है कि एक बार विलुप्त हो चुका, टायरियन पर्पल एक बार फिर ख़तरे में है.
हालांकि ये चुनौती आक्रमण, या इसे बनाने की प्रकिया को सीक्रेट रखना नहीं है. बल्कि नोइरा कहते हैं कि म्यूरेक्स समुद्री घोंघे प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण ख़तरे में हैं.
स्ट्रैमोनिटा हेमास्टोमा, लाल रंग देने वाला घोंघा पहले ही पूर्वी भूमध्य सागर से ग़ायब हो चुका है.
तो अगर किसी तरह टायरियन पर्पल को एक बार फिर इतिहास से पन्नों से निकाल कर दुनिया में लाया भी जाए, तो ये हमेशा हमारे साथ रहेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है. हो सकता है कि ये रंग एक बार फिर इतिहास बन जाए.
(ये बीबीसी फ्यूचर की कहानी की अनुवाद है. मूल कहानी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)