पश्चिमी देशों की तकनीक के सहारे रूस के भीतर तबाही मचाते यूक्रेन के लकड़ी से बने ड्रोन

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- Author, जॉनथन बीएल, बीबीसी रक्षा संवाददाता
- पदनाम, थॉमस स्पेंसर, बीबीसी वेरिफ़ाई
रूस के भीतर हमलों के लिए यूक्रेन लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है. इसमें यूक्रेन को पश्चिमी मुल्कों की तकनीक और आर्थिक मदद मिल रही है.
हालांकि तनाव बढ़ने की आशंका से नेटो सैन्य गठबंधन के सहयोगी सदस्य, यूक्रेन को पश्चिमी मुल्कों से मिले हथियारों का इस्तेमाल रूस के भीतर करने की इजाज़त देने इनकार कर रहे हैं.
बीते कुछ महीनों में यूक्रेन ने रूस के भीतर लंबी दूरी तक हमले बढ़ा दिए हैं, वो सप्ताह में कई बार ड्रोन का इस्तेमाल कर रणनीतिक तौर पर अहम ठिकानों पर हमले कर रहा है.
वो रूसी वायु सेना के ठिकानों, तेल और हथियारों के डिपो और उसके कमांड सेंटर्स को निशाना बना रहा है.
यूक्रेनी कंपनियां अब सैकड़ों वन-वे (एक बार इस्तेमाल होने वाले) ड्रोन का उत्पादन कर रही हैं.पश्चिमी देशों में बने इसी तरह के ड्रोन के मुक़ाबले यूक्रेन के ये ड्रोन काफ़ी सस्ते में बनाए जा रहे हैं.
एक कंपनी ने बीबीसी को बताया कि बेहद मामूली खर्च पर यूक्रेन, रूस की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर पा रहा है. क्योंकि सस्ते ड्रोन को मार गिराने के लिए रूसी एयर डिफ़ेंस सिस्टम को महंगी मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है.

बीबीसी ने कई ऐसे कई लोगों से बात की है जो इस मिशन में शामिल हैं. इनमें यूक्रेन का सबसे बड़ा वन-वे ड्रोन उत्पादक और एक तकनीकी कंपनी शामिल है जो इस तरह के हमलों को अंजाम देने के लिए सॉफ्टवेयर बनाती है.
टर्मिनल ऑटोनमी से जुड़े फ्रांसिस्को सेरा-मार्टिन्स कहते हैं कि यूक्रेन की ये रणनीति रूस के सामने मुश्किल चुनौती पेश कर रही है. वो मानते हैं कि और थोड़े और निवेश के साथ ये युद्ध की दिशा बदल सकती है और इसका रुख़ यूक्रेन के पक्ष में मोड़ सकती है.
उन्होंने टर्मिनल ऑटोनॉमी नाम की ये कंपनी 18 महीने पहले बनाई है. वो इसके संस्थापकों में से एक हैं.
ये कंपनी अब एक महीने में सौ से अधिक लंबी दूरी तर मार करने वाले एक्यू400 साइथ ड्रोन बना रही है. इन ड्रोन की क्षमता 750 किलोमीटर यानी 450 मील है.
इसके अलावा कंपनी हम महीने सौ से अधिक कम दूरी वाले एक्यू100 बेयोनेट ड्रोन भी बना रही है. ये ड्रोन एक बार में सौ से अधिक किलोमीटर तक की उड़ान भर सकते हैं.

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ये ड्रोन लकड़ी के बने हुए हैं और इन्हें यूक्रेन की पुरानी फ़र्नीचर फ़ैक्ट्रियों में असेंबल किया जा रहा है.
ऑस्ट्रेलियान आर्मी रॉयल इंजीनियर्स के पूर्व अधिकारी सेरा-मार्टिन्स ने अपने यूक्रेनी पार्टनर के साथ एक कंपनी बनाई है जिसे अमेरिका ने फ़ाइनेंस किया है.
ये कम से कम तीन उन कंपनियों में से एक है जो यूक्रेन में बड़े पैमाने पर ड्रोन्स बना रही हैं.
सेरा-मार्टिन अपने ड्रोन्स को फ़्लाइंग फ़र्नीचर कह कर बुलाते हैं.
वे कहते हैं कि इन्हें असेंबल करने में एक घंटा लगता और फिर आधे घंट में इसमें मोटर, विस्फोटक और इलेक्ट्रॉनिक्स लगाए जाते हैं.
उनकी कंपनी के बेयोनेट ड्रोन की क़ीमत कुछ हज़ार डॉलर होती है. इसकी तुलना में, इन ड्रोन्स को उड़ाने के लिए रूस को जो मिसाइल इस्तेमाल करनी पड़ती है उसकी क़ीमत 10 लाख डॉलर से भी अधिक होती है.

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सिर्फ़ सस्ते ड्रोन ही जंग पर अपना असर छोड़ रहे हैं.
पलांटिर एक बड़ी अमेरिकी डेटा एनालिसिस कंपनी है. ये पहली पश्चिमी कंपनी थी जिसने यूक्रेन की युद्ध में मदद करनी शुरू की थी.
इस कंपनी ने यूक्रेन के तोपखाने को हथियारों के सटीक मार करने की क्षमता बढ़ाने में मदद की है.
अब इस कंपनी ने यूक्रेन को लंबी दूरी तक मार करने वाले ड्रोन्स के हमलों की प्लानिंग में मदद देनी शुरू कर दी है.
पालंटिर में काम कर रहे ब्रिटिश इंजीनियरों ने एक ऐसा प्रोग्राम तैयार किया है जो ड्रोन्स को उनके टार्गेट तक पहुँचाने का सबसे बढ़िया रूट तैयार करता है.
पलांटिर ने साफ़ किया है कि वो किसी मिशन का हिस्सा नहीं हैं लेकिन उन्होंने क़रीब हज़ार यूक्रेनी नागरिकों को अपने सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग दी है.
बीबीसी ने खुद देखा है कि सैद्धांतिक तौर पर ये तकनीक कैसे काम करती है. लगातार मिल रहे डेटा की मदद से ये रूसी एयर डिफेंस, उनके रडार और इलेक्ट्रोनिक जैमर्स की हरकत का पता लगा सकती है. दिखने में ये एक टोपोग्राफ़िकल चार्ट की तरह होता है.
जंग जितनी उलझेगी एयर डिफ़ेंस भी ही उतने मज़बूत होते जाएंगे. यूक्रेन ने कॉमर्शियल सैटेलाइट्स के ज़रिए कई लोकेशन को चिह्नित कर लिया है.
पेलेंटिर के लूई मोसली कहते हैं कि इस प्रोग्राम से यूक्रेन रूस के इलेक्ट्रॉनिक वारफ़ेयर और एयर डिफ़ेंस सिस्टम को चकमा देकर अपने लक्ष्य पहुँच रहा है.
यूक्रेन के लंबी दूरी तक मार करने वाले ड्रोन्स के हमलों को उनकी ख़ुफ़िया एजेंसियां संचालित कर रही हैं. उनकी तरफ़ से कोई जानकारी तो नहीं मिली है पर बीबीसी को अन्य सूत्रों ने इन हमलों का ब्योरा दिया है.
अधिकतर हमले रात के वक्त किए जा रहे हैं. इनमें से अधिकतर को मार गिराया जाता है. इनमें महज़ 10 प्रतिशत के आस-पास ही अपने लक्ष्य तक पहुँच पाते हैं. इन में से कुछ ड्रोन तो यूक्रेन के अपने एयर डिफ़ेंस सिस्टम द्वारा ही फ़्रेंडली फ़ायर का शिकार हो जाते हैं.

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यूक्रेन को रूस के इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से भी निपटना है. टर्मिनल ऑटोनमी के साइथ ड्रोन विज़ुअल पॉजिशनिंग के सहारे चलते हैं और ये ड्रोन ज़मीन का आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से आकलन करते हैं. इनमें पायलट की कोई भूमिका नहीं होती.
पेलेंटिर सॉफ़्टवेयर पहले से ही ड्रोन के लिए बेहतरीन रूट तैयार कर लेता है. सेरा-मार्टिन्स कहते हैं कि एक साथ बहुत सारे ड्रोन्स से हमले के ज़रिए रूस के एयर डिफ़ेंस सिस्टम पर दबाव डाला जा सकता है.
इसके अलावा ड्रोन में उन मिसाइलों से काफ़ी सस्ते होते हैं जिनसे रूस इन्हें निशाना बनाएगा. इससे रूस की काफ़ी मिसाइलें भी ज़ाया होंगी.
रॉयल यूनाइटेड सर्विसज़ इंस्टीट्यूट में प्रोफ़ेसर जस्टिन ब्रोंक कहते हैं कि यूक्रेन के लॉन्ग रेंज ड्रोन द्वारा किए जा रहे हमले रूस को दुविधा में डाल रहे हैं. हालांकि रूस के पास तगड़ा एयर डिफ़ेंस सिस्टम है पर फिर भी वो हर चीज़ की सुरक्षा तो नहीं करता.
प्रोफ़ेसर ब्रोंक कहते हैं कि यूक्रेन के ड्रोन हमलों के बाद आम रूस नागरिक सोच रहे होंगे कि 'सरकार हमें पूरी तरह से सुरक्षित नहीं सकती और रूस ख़तरे में है.'
यूक्रेन के ड्रोन रूस के भीतर 1000 किलोमीटर तक देखे गए हैं. कुछ को तो मास्को को ऊपर गिराया गया है. लेकिन फ़ोकस सैन्य ठिकानों पर ही रहा है. नीचे दिया गया मैप पिछले एक महीने में निशाने पर लिए गए टार्गेट हैं. इनमें पांच रूसी हवाई अड्डे भी हैं.
प्रोफ़ेसर ब्रोंक कहते हैं कि रूसी सैन्य हवाई अड्डों पर हमले रूस के ग्लाइड बमों का प्रभावशाली बदला है.
इन हमलों ने रूस को अपने सैन्य हवाई अड्डों को और पीछे खिसकने के लिए मजबूर किया है. नतीजतन यूक्रेन पर हवाई हमलों की संख्या में भी कमी आई है.

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सैटेलाइट से मिली तस्वीरों से पता चलता है कि यूक्रेनी ड्रोन्स ने मेरीनोव्का एयरबेस पर काफ़ी तबाही की है.
यूक्रेन का मानना है कि वो पश्चिम देशों में से लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियारों से और अधिक मज़बूत हो सकता है. लेकिन फ़िलहाल यूक्रेन के सहयोगियों ने उसके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया है.
अमेरिका और जर्मनी में इस बात का भी डर है कि यूक्रेन को अगर ऐसे हथियार दिए गए तो उन्हें भी युद्ध में घसीटा जा सकता है. लेकिन इस डर के बावजूद पश्चिमी देश और कंपनियां यूक्रेन की मदद कर रही हैं.
यूक्रेन बहुत हद तक अब भी घरेलू स्तर पर बने ड्रोन ही इस्तेमाल कर रहा है. यूक्रेन को लगता है कि युद्ध जीतने का एक ही तरीका है. और वो है जंग को रूस की भीतर तक ले जाना.
फ्रांसिस्को सेरा-मार्टिन्स को भी लगता है कि पश्चिमी देशों के कंपनियां फ़िलहाल भी एक धुआंधार अत्याधुनिक युद्ध लड़ने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि वो बहुत ऊंची क़ीमत पर कम संख्या में ही दूर तक मार करने वाले हथियार मुहैया करवा पा रही हैं.
वे कहते हैं कि इस वक़्त यूक्रेन को अच्छे हथियारों की दरकार है.
बीबीसी ने एक यूक्रेनी कंपनी से बात की जो क्रूज़ मिसाइल पर काम कर रही है. उनकी मिसाइलें ब्रिटेन में स्ट्रॉम शेडो मिसाइल की तुलना में दस गुना सस्ती होगी.
पश्चिमी देशों के गलतफ़हमियों के बावजूद यूक्रेन रूस पर हमले बढ़ाने की योजनाएं बना रहा है.
सेना-मार्टिन्स कहते हैं, "आप जो फ़िलहाल देख रहे हैं वो कुछ भी नहीं है. इस साल के अंत तक जो कुछ होगा उसकी तुलना में जो अब हो रहा है वो कुछ भी नहीं है."
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