पुतिन की सेना यूक्रेन के आगे कैसे बेबस हुई? पांच ज़रूरी सवालों के जवाब

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यूक्रेन ने दावा किया है कि उसकी सेना रूस में 1000 स्क्वॉयर किलोमीटर भीतर घुस गई है.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस हमले को "उकसावे वाला बड़ा कदम" बताया. उन्होंने रूसी सेना को आदेश दिया कि "दुश्मन को हमारे क्षेत्र से बाहर निकाला" जाए.
इस बीच यूक्रेन के सैनिक कुर्स्क क्षेत्र में मौजूद हैं. यहां दोनों देशों की सेनाओं के बीच बीते करीब एक हफ्ते से संघर्ष हो रहा है.
पिछले सप्ताह रूस के कुर्स्क क्षेत्र में यूक्रेन ने हमला किया था. इस हमले का फ़ैसला यूक्रेन ने क्यों किया है?
सीमा पार यूक्रेन के इस ऑपरेशन से जुड़े पांच ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब हम आपको इस रिपोर्ट में बताएंगे.

कुर्स्क में क्या हुआ है?
6 अगस्त को यूक्रेनी सैनिकों ने यूक्रेन की सीमा से लगे रूस के कुर्स्क इलाक़े में अचानक हमला कर दिया. हालाँकि यह हमला कितना बड़ा था इसकी सही जानकारी जुटा पाना करना मुश्किल है.
शुरू में ऐसा लग रहा था कि यह ऑपरेशन व्लादिमीर पुतिन की सरकार के विरोध में रूसी गुटों की ओर से समय-समय पर की जाने वाली घुसपैठ है. इन गुटों ने यूक्रेन के रास्ते रूस में आने की कोशिश की थी.
ऐसा लग रहा था कि इसमें सैकड़ों अन्य जातीय रूसी लोग शामिल थे.
लेकिन जैसे ही यह नया हमला रूसी क्षेत्र में आगे बढ़ा, रूसी सैन्य ब्लॉगर्स ने सीमा से लगभग 30 किमी दूर भारी लड़ाई की सूचना दी.
कुर्स्क क्षेत्र के गवर्नर ने राष्ट्रपति पुतिन को बताया कि 28 रूसी गांव यूक्रेनी हाथों में हैं और यह स्पष्ट हो गया कि इस हमले में यूक्रेनी सैनिक शामिल थे.
ऐसा मालूम होता है कि जब भारी जंग वाले इलाक़ों में रूस अपनी सैन्य शक्ति को मुख्य सीमा रेखा पर कई जगहों पर केंद्रित कर रहा था, यूक्रेन ने हल्की सुरक्षा वाली सीमा का फायदा उठाकर रूस में घुसने का फैसला किया.
एक वरिष्ठ यूक्रेनी सुरक्षा अधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करते हुए समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, “हम आक्रामक हैं. इसका मक़सद दुश्मन के सैनिकों को ज़्यादा से ज़्यादा नुकसान पहुंचाना और रूस में हालात को अस्थिर करना है, क्योंकि वो अपनी सीमा की रक्षा करने में असमर्थ हैं.”

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यूक्रेन ने कुर्स्क में रूस पर हमला क्यों किया?
शुरू में इस हमले के बारे में यूक्रेन खामोश रहा. बाद में राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने परोक्ष रूप से 10 अगस्त को इसे स्वीकार किया.
उन्होंने दावा किया कि यूक्रेन ने “आक्रमण करने वालों के इलाक़े में युद्ध को आगे तक ले जाना" जारी रखा है. उन्होंने इसके पीछे कोई स्पष्ट वजह नहीं बताई.
लेकिन 12 अगस्त को घोषणा की गई कि क़रीब 1 हज़ार वर्ग किमी रूसी क्षेत्र अब यूक्रेन के कब्ज़े में है.
उसके बाद से सैन्य और राजनीतिक विश्लेषक इस "क्यों" प्रश्न का उत्तर देने की कोशिश कर रहे हैं.
ज़्यादातर इस बात से सहमत हैं कि सामरिक उद्देश्य से रूस का ध्यान भटकाना इस घुसपैठ के मुख्य मक़सद में से एक हो सकता है.
यूक्रेन पिछले कई महीनों से अपने पूर्व के इलाक़े में रूसी सेना को रोकने के लिए संघर्ष कर रहा है.
रूसी सेना पिछले महीने चैसिव यार के रणनीतिक शहर पर कब्ज़ा करते हुए आगे बढ़ रही है. यूक्रेन के लिए उत्तर-पूर्व और दक्षिण में भी हालात इसी तरह से मुश्किल है.
यूक्रेन ने अपने पूर्वी इलाक़ों से दबाव हटाने के लिए रूस में कुर्स्क क्षेत्र में क़रीब 1100 किमी की सीमा रेखा के कई जगहों पर जंग लड़ने का फ़ैसला किया है.

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रूस की सेना से संख्या में कम और कम हथियार होने के बावजूद यूक्रेनी अधिकारियों ने दुश्मन सैनिकों को अलग-अलग मोर्चे शुरू कर बिखराने के लिए यह जुआ खेला है.
सुरक्षा विशेषज्ञ प्रोफेसर मार्क गेलोटी ने बीबीसी को बताया कि यूक्रेन पिछले महीनों से संघर्ष के युद्ध में फंसा हुआ है. वहाँ जमीन पर बहुत कम हलचल है और अब उसे बढ़त हासिल करने के लिए जोख़िम लेने की ज़रूरत है.
एक यूक्रेनी कमांडर ने 'द इकोनॉमिस्ट' से बात करते हुए यह भी कहा कि यह एक जुआ था, "हमने युद्ध के लिए तैयार अपनी टुकड़ी को उनकी सीमा पर सबसे कमज़ोर जगह पर भेजा."
उन्होंने कहा कि जुआ उस तेज़ी से सफल नहीं हो रहा है जितनी यूक्रेन को उम्मीद थी.
“उनके कमांडर बेवकूफ नहीं हैं. वो सेना आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन उतनी तेज़ी से नहीं जितनी हम चाहते हैं. वो जानते हैं कि हम साजो सामान को 80 या 100 किमी तक नहीं बढ़ा सकते.”

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रूस ने कैसी प्रतिक्रिया दी है?
रूस ने फौरन ही यूक्रेन के घुसपैठ को पीछे धकेलने को "आतंकवाद विरोधी अभियान" करार दिया.
रूस ने 1 लाख़ 20 हज़ार से ज़्यादा लोगों को कुर्स्क क्षेत्र से हटने के लिए कहा है और अन्य 11 हज़ार लोगों को पड़ोस के बेलगोरोड इलाक़े से हटाया है.
रूसी अधिकारियों ने स्थानीय निवासियों को प्रति व्यक्ति 115 डॉलर के मुआवज़े की पेशकश की है और इलाक़े में संघीय आपातकाल की घोषणा की है.
रूसी सेना के जनरल स्टाफ के प्रमुख जनरल वालेरी गेरासिमोव ने पिछले हफ़्ते कई बार दावा किया कि यूक्रेनी घुसपैठ रोक दी गई है, जबकि ज़मीन पर हालात इसके विपरीत थे.
राष्ट्रपति पुतिन की अध्यक्षता में इस संकट के समाधान के लिए रूस की सुरक्षा परिषद की नई बैठक आयोजित की गई थी. इस ख़ास बैठक में जनरल गेरासिमोव मौजूद नहीं थे.
दूसरी ओर पुतिन के सबसे क़रीबी सहयोगियों में से एक, रूस की सुरक्षा सेवा (एफ़एसबी) के प्रमुख अलेक्जेंडर बोर्टनिकोव इस बैठक में मौजूद थे.
घटनाओं पर अपने ताज़ा बयान में रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने यूक्रेन पर शांतिपूर्ण आम लोगों पर हमला करने का आरोप लगाया है और "उचित प्रतिक्रिया" का वादा किया है.
प्रोफ़ेसर गेलोटी का कहना है कि यूक्रेन को रूस से कड़ी जवाबी कार्रवाई का वास्तविक ख़तरा है.
"पुतिन एक बड़ी अपील के साथ कई लाख सैनिकों को अपने सशस्त्र बलों में शामिल कर सकते हैं."
उन्होंने कहा कि रूस संघर्ष को बढ़ाने के अन्य तरीके ढूंढ सकता है.
हाल के महीनों में यूक्रेन को अपने ऊर्जा के बुनियादी ढांचे के पर विनाशकारी रूसी बमबारी का सामना करना पड़ा है, जिससे इसका ज़्यादातर हिस्सा या तो नष्ट हो गया या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गया.
रूस का यह अभियान संभावित रूप से और भी गंभीर हो सकता है.

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क्या यूक्रेन ने युद्ध का रुख़ मोड़ दिया है?
रूस में यूक्रेन की घुसपैठ की सहजता को संदर्भों में रखने की ज़रूरत है और ज़रूरी नहीं कि जल्द ही इस संघर्ष का अंत हो.
मार्क गेलोटी कहते हैं, "यह क़रीब 50 मील लंबा और 20 मील चौड़ा इलाक़ा है. रूस और यूक्रेन के क्षेत्रफल की तुलना में यह कुछ नहीं है. लेकिन इसका राजनीतिक असर ज़्यादा महत्वपूर्ण है.”
कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि यूक्रेन अपने पश्चिमी सहयोगियों और ख़ास तौर पर अमेरिका को यह दिखाना चाहता है कि उसकी सेना लड़ाई जारी रख सकती है.
इससे कम से कम या तात्कालिक तौर पर यूक्रेन की बातचीत करने की क्षमता भी बढ़ी है.
रूसी क्षेत्र के 30 किमी अंदर जहाँ यूक्रेन के सैनिक खड़े हैं, इसकी संभावना कम है कि रूस युद्ध की रेखा को फ्रीज़ करने के किसी भी सुझाव को स्वीकार करेगा.
यूक्रेन के इस ऑपरेशन ने देश के अंदर रूसियों के लिए युद्ध की कहानी को भी बदल दिया है.
यह अब "विशेष सैन्य अभियान" नाम का एक संघर्ष नहीं है, बल्कि यह उन्हें प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित करने वाली घटना है.
बीबीसी की पूर्वी यूरोप संवाददाता सारा रेन्सफ़ोर्ड कहती हैं, "रूस में प्रेस पर नियंत्रण के माहौल में भी कुर्स्क क्षेत्र से आने वाली रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि कुछ लोग सवाल पूछ रहे हैं."

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ज़ेलेंस्की और पुतिन के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?
रूस और यूक्रेन दोनों देशों के नेताओं के लिए यह समय उनके राष्ट्रपतियों का एक ख़ास क्षण है.
एक सत्तावादी और अक्सर कठोर नेता माने जाने वाले व्लादिमीर पुतिन, अपने क़रीबी लोगों और ख़ास तौर पर सुरक्षा सेवाओं पर भरोसा करते हैं.
उनके लिए यह घटना एक बड़ी चुनौती पेश करता है. इसमें मारे गए या घायल हुए रूसी सैनिकों की संख्या को छिपाना मुश्किल होता जा रहा है.
हज़ारों रूसियों के विस्थापित होने के साथ यह छवि बनाए रखना भी मुश्किल है कि सबकुछ उसके नियंत्रण में है और यह एक पूर्ण युद्ध नहीं है.

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मार्क गेलोटी कहते हैं, "हर बार यह क्रेमलिन के प्रोपेगेंडा में ज़्यादा से ज़्यादा धैर्य जोड़ता है."
"हमने पिछली जंग में यह देखा है. अफगानिस्तान में सोवियत युद्ध से लेकर चेचन्या तक रूस एक तय कहानी को बनाए रखने में सफल रहा है, लेकिन कुछ समय बाद असलियत सामने आती है."
कई वजहों से रूस में यह घुसपैठ वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की के लिए भी उतनी ही मुश्किल हो सकती है.
विश्लेषक एमिल कस्तेहेल्मी का कहना है कि यूक्रेन के लिए सबसे अच्छा नतीजा यह होगा कि "नुक़सान के बावजूद, अपना इलाक़ा वापस पाने के लिए रूस महत्वपूर्ण मोर्चों से अपने संसाधनों को हटा दे.''
हालाँकि इससे थोड़े समय के लिए यूक्रेन का उत्साह बढ़ेगा. लेकिन इसके नतीजे में उसे पूर्व के इलाक़े में और भी अधिक ज़मीन का नुकसान हो सकता है.
यहाँ दोनों देशों के बीच भीषण लड़ाई जारी है और कुछ रूसी सैन्य ब्लॉगर यहाँ सफलता की बात कर रहे हैं, हालाँकि अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है.
प्रोफेसर गेलोटी का कहना है कि युद्ध में मौजूदा गतिरोध को दूर करने के लिए चीजों को आगे ले जाने की ज़रूरत है. हालाँकि अभी उथल-पुथल तेज़ी से चल रही है. लेकिन इसका नतीजा क्या होगा यह अभी तक स्पष्ट नहीं है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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