क्या पाकिस्तान सच में ऐसी मिसाइल बना सकता है जो अमेरिका तक पहुंच जाए?

    • Author, मुनज़्ज़ा अनवार
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद

पाकिस्तान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम के बारे में अमेरिका की आशंका बढ़ती ही जा रही है.

पहली बार अमेरिकी प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने औपचारिक तौर पर दावा किया है कि पाकिस्तान ने एक ऐसी 'कारगर मिसाइल टेक्नोलॉजी' तैयार कर ली है जो उसे अमेरिका को भी निशाना बनाने के योग्य बनाएगी.

अमेरिकी थिंक टैंक कार्नेगी एंडॉमेन्ट के बैनर तले आयोजित होने वाले एक समारोह को संबोधित करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के राष्ट्रीय सुरक्षा उप सलाहकार का कहना है कि पाकिस्तान ने लॉन्ग रेंज मिसाइल सिस्टम और ऐसे दूसरे हथियार बना लिए हैं जो उसे बड़ी रॉकेट मोटर्स से परीक्षण करने की क्षमता देते हैं.

उनका कहना है, "अगर यह सिलसिला जारी रहता है तो पाकिस्तान के पास दक्षिण एशिया से बाहर भी अपने लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता आ जाएगी, इसमें अमेरिका भी शामिल है और इस बात से पाकिस्तान की संस्थाओं पर वास्तविक सवाल उठते हैं."

अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा उप सलाहकार का बयान एक ऐसे समय में सामने आया है जब दो दिन पहले ही बाइडन प्रशासन ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों से लैस लंबी दूरी तक मार करने वाले बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम से कथित तौर पर जुड़े चार संस्थानों पर प्रतिबंध लगा दिया है. इनमें इस मिसाइल प्रोग्राम की निगरानी करने वाला सरकारी संस्थान नेशनल डेवलपमेंट कॉम्प्लेक्स (एनडीसी) भी शामिल है.

अमेरिका के लिए संभावित ख़तरों के बारे में बात करते हुए अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा उप सलाहकार जॉन फाइनर का कहना था कि ऐसे देशों की सूची छोटी है जो परमाणु हथियार भी रखते हों और उनके पास सीधे अमेरिका को निशाना बनाने की क्षमता भी हो. अमेरिका के ऐसे विरोधी हैं- रूस, उत्तर कोरिया और चीन.

उनके अनुसार, "हमारे लिए यह मुश्किल होगा कि हम पाकिस्तान के उठाए गए क़दमों को अमेरिका के लिए ख़तरे के तौर पर न देखें. मुझ समेत हमारे प्रशासन के सीनियर अधिकारियों ने कई बार इन आशंकाओं को पाकिस्तान के वरिष्ठ अधिकारियों के सामने रखा है."

अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के उप सलाहकार का कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका का पार्टनर रहा है और वह साझा हितों पर पाकिस्तान के साथ काम करने की भी इच्छा रखते हैं. लेकिन उनका कहना था, "इसके बाद हमारे पास यह सवाल भी उठता है कि पाकिस्तान ऐसी क्षमता क्यों प्राप्त कर रहा है जो हमारे ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो सके."

उनके अनुसार, "दुर्भाग्य से हमें लगता है कि पाकिस्तान हमारी और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आशंकाओं को गंभीरता से लेने में नाकाम हुआ है."

अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा उप सलाहकार के बयान के बाद बीबीसी ने विशेषज्ञों से बात कर यह जानने की कोशिश की है कि अमेरिका को यह आशंका क्यों है कि पाकिस्तान ऐसी मिसाइल तैयार कर रहा है जो अमेरिका में लक्ष्यों को निशाना बना सकेगी? इस समय इस आशंका की वजह क्या है और क्या पाकिस्तान सच में ऐसी मिसाइल बना सकता है जो अमेरिका तक पहुंच जाए?

इसके अलावा इस लेख में हमने यह भी जानने की कोशिश की है कि पाकिस्तान का वह मिसाइल प्रोग्राम, जो हाल में अमेरिकी प्रतिबंधों का निशाना बन रहा है, वह क्या है? इसमें कौन-कौन सी मिसाइल शामिल हैं और अमेरिका को इनसे क्या आशंकाएं हैं? इस लेख में हमने यह भी समझने की कोशिश की है कि अमेरिकी प्रतिबंध पाकिस्तान के मिसाइल प्रोग्राम को कैसे प्रभावित कर सकते हैं.

पाकिस्तान क्या भारत को देखकर हथियार बनाता है?

इस्लामाबाद में रहने वाले रक्षा मामलों के विशेषज्ञ सैयद मोहम्मद अली के अनुसार पाकिस्तान पर लगाया गया अमेरिकी प्रशासन का हाल का आरोप तकनीकी सच्चाइयों से परे है.

उनके अनुसार पहली वजह तकनीकी है, दूसरी रणनीतिक और तीसरी वजह आर्थिक या राजनीतिक है.

सैयद मोहम्मद अली का दावा है कि पाकिस्तान की बैलिस्टिक मिसाइलों में बदलाव लाने का मक़सद भारत के अलावा किसी दूर-दराज़ के देश को निशाना बनाना नहीं, बल्कि भारत के तेज़ी से बढ़ रहे मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम का मुक़ाबला करना या उसे नाकाम बनाना है.

इसका मतलब यह है कि दुश्मन जितना भी आधुनिक रक्षा प्रणाली बना ले, आपकी बैलिस्टिक या क्रूज़ मिसाइल उसे नाकाम बनाने की क्षमता रखती हो और उसका रेंज से कोई संबंध नहीं है.

वह इसराइल के पांच स्तरों पर आधारित डिफ़ेंस सिस्टम का उदाहरण देते हैं जिसमें एयरो और आयरन डोम से लेकर डेविड्स स्लिंग, इंटरसेप्टर और एंटी एयरक्राफ़्ट गन भी शामिल हैं.

"अगर कोई मिसाइल पांच स्तरों से निकलकर अपने लक्ष्य को निशाना बनाकर उसे नष्ट करने की क्षमता रखती है तो इसका एमआईआरवी (मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल) से लैस होना ज़रूरी होता है, जैसा कि पाकिस्तानी मिसाइल अबाबील है."

सैयद मोहम्मद अली के अनुसार एमआईआरवी का मतलब एक ऐसी मिसाइल है जो एक ही समय पर कई वॉरहेड्स ले जा सकती है और यह स्वतंत्र रूप से प्रोग्राम्ड होते हैं. इन वॉरहेड्स की संख्या तीन से आठ और उससे अधिक भी हो सकती है. रूस के मामले में यह 12 तक है.

यह मिसाइलें स्वतंत्र रूप से अपने-अपने लक्ष्य की ओर जाती हैं और हर एक का लक्ष्य की ओर जाने का रास्ता भी अलग होता है. एक मिसाइल के ज़रिए जब इसे लॉन्च किया जाता है और जब उसकी री-एंट्री व्हीकल दोबारा हवा में आती है तो वह री-एंट्री व्हीकल अलग दिशाओं में फैलकर अपने-अपने लक्ष्य को निशाना बनाती है.

वह इसका उदाहरण लड़ाकू विमान की फ़ॉर्मेशन से देते हैं जो लक्ष्य तक पहुंचने से पहले, वहां पहुंचकर हमले के दौरान और बाद में अलग होती है. फ़ाइटर प्लेन किसी टारगेट पर पहुंचकर सरफ़ेस टू एयर मिसाइल और एंटी एयरक्राफ़्ट गन से बचने के लिए इस अंदाज़ में इधर-उधर फैल जाती हैं कि वह सब दुश्मन की फ़ायरिंग की चपेट में आए बिना अलग-अलग दिशाओं से टारगेट पर हमला कर सकें.

सैयद मोहम्मद अली के अनुसार अमेरिका के पास ऐसी मिसाइल Minuteman III है और भारत ने हाल ही में इस टेक्नोलॉजी में सुधार लाना शुरू किया है.

सैयद मोहम्मद अली का दावा है कि पाकिस्तान अगर इसको बेहतर बना रहा है तो उसका मक़सद भारत के अलावा किसी और देश को लक्ष्य बनाना नहीं है मगर भारत के सिस्टम में आने वाले बदलाव (चाहे वह एस 400 के बारे में हो या किसी और के बारे में) को नाकाम बनाकर उनकी टारगेट तक पहुंचाने की क्षमता को कुंद करना है.

उनका कहना है, "पाकिस्तान किसी ऐसी टेक्नोलॉजी पर काम नहीं कर रहा जो पहले से भारत के पास नहीं है और भारत न केवल आईसीबीएम (इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल) बना रहा है बल्कि उन्हें टेस्ट भी कर चुका है जिनकी रेंज 5000 किलोमीटर से अधिक है. इसका मतलब है कि उनका टारगेट पाकिस्तान या चीन नहीं जबकि दूसरी ओर पाकिस्तान ने इस रेंज की किसी मिसाइल का आज तक परीक्षण नहीं किया."

उनका कहना है कि पाकिस्तान पर यह आरोप तकनीकी सच्चाई से परे हैं.

इसके बारे में ऑस्ट्रेलिया के शहर कैनबरा की नेशनल यूनिवर्सिटी में स्ट्रैटेजिक ऐंड डिफ़ेंस स्टडीज़ के शिक्षक डॉक्टर मंसूर अहमद कहते हैं, "जब तक एक सिस्टम (मिसाइल) एक रेंज पर टेस्ट नहीं हो जाता तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि इस देश ने यह क्षमता प्राप्त कर ली है और पाकिस्तान ने अब तक ऐसी कोई मिसाइल टेस्ट नहीं की है जिसकी रेंज भारत से बाहर हो."

सैयद मोहम्मद अली का कहना है कि भारत एसएसबीएन (शिप, सबमर्सिबल, बैलिस्टिक, न्यूक्लियर या न्यूक्लियर पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल) सबमरीन या बैलिस्टिक मिसाइल फ़ायर करने की क्षमता रखने वाली पनडुब्बियां भी बना रहा है.

वह कहते हैं, "मिसाइलों की बहस में ज़मीन से ज़मीन पर मार करने वाली मिसाइलों को तो बहुत महत्व दिया जाता है मगर समंदर की सतह के नीचे या परमाणु पनडुब्बियां रखने वाले देश के बारे में बात नहीं की जाती जिसमें रेंज का चक्कर ही नहीं होता क्योंकि किसी भी देश के पास पनडुब्बी ले जाकर वहां से यह मिसाइल फ़ायर की जा सकती है."

उनके अनुसार इसकी मिसाल भारत की 'अरिहंत' और 'अरिघात' परमाणु पनडुब्बियां हैं जो अब भारत की नौसेना का हिस्सा बन चुकी हैं.

याद रहे कि अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, रूस और चीन के पास भी परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियां हैं यानी यह पांच देश दुनिया के किसी भी देश पर परमाणु हमला करने की क्षमता रखते हैं.

सैयद मोहम्मद अली का कहना है कि दो परमाणु पनडुब्बियों को अपनी नौसेना के बेड़े में शामिल करने के बाद भारत ने भी यह क्षमता प्राप्त कर ली है यानी वह उन देशों की पंक्ति में शामिल हो गया है जो अमेरिका समेत दुनिया के किसी भी देश पर परमाणु हमला करने की क्षमता रखते हैं. उनका कहना है कि केवल ज़मीन की सतह से ज़मीन तक मार करने वाली मिसाइलों पर बहस महत्वपूर्ण रणनीतिक पहलुओं को नज़रअंदाज़ करती है.

सैयद मोहम्मद अली का मानना है कि पाकिस्तान अमेरिका को निशाना बनाने का सोचे, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से यह संभव नहीं क्योंकि पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार (लगभग 6 अरब डॉलर) अमेरिका है और वहां रह रहे पाकिस्तानियों की बहुत बड़ी संख्या उस देश से पैसे भेजती है. इसके अलावा पाकिस्तान अपनी आर्थिक समस्याओं के हल (आईएमएफ़) के लिए अमेरिका के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना अपनी विदेश नीति के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण लक्ष्य समझता है.

तो अमेरिकी आशंका की वजह क्या है?

डॉक्टर मंसूर अहमद का कहना है कि ऐसा मुमकिन है कि पाकिस्तान (एनडीसी) अबाबील मिसाइल सिस्टम का अधिक सुधरा हुआ वर्ज़न तैयार कर रहा हो जो किसी भी भारतीय बैलिस्टिक मिसाइल डिफ़ेंस शील्ड को तोड़ सकता है और एक से अधिक वॉरहेड्स का भारी पेलोड ले जा सकता है.

उनका यह भी कहना है कि इसके लिए अधिक शक्तिशाली रॉकेटों की ज़रूरत होगी. "अमेरिकी अधिकारी एनडीसी पर इसकी तैयारी का आरोप लगा रहे हैं लेकिन यह भारत के लिए बनाए गए विशेष मिसाइल सिस्टम को आईसीबीएम (इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल) सिस्टम में बदल नहीं सकता और इसके लिए बिल्कुल नए मिसाइल सिस्टम की ज़रूरत होगी."

अमेरिका की आशंका की टाइमिंग के बारे में सैयद मोहम्मद अली और डॉक्टर मंसूर दोनों ही इसका आरोप बाइडन प्रशासन पर लगाते हैं. उनका दावा है कि बाइडन प्रशासन बहुत अधिक भारत के प्रभाव में है.

सैयद मोहम्मद अली कहते हैं कि यह अमेरिका के नीति निर्धारक वर्गों में भारत के बढ़ते प्रभाव का परिणाम है और पाकिस्तान की रक्षा क्षमताओं में कमी लाने के लिए भारत अब अमेरिका का कंधा और दबाव इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है.

उनका कहना है कि पाकिस्तान की रक्षा क्षमताओं की आलोचना करना और इसे लेकर आशंकाएं जताना इस बात का सबूत है कि वॉशिंगटन में भारतीय लॉबी बाइडन के आख़िरी दिनों में उनकी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाना चाहती है.

सैयद मोहम्मद अली का मानना है कि भविष्य में भी ऐसा मुमकिन नहीं है कि पाकिस्तान अमेरिका पर हमला करने की क्षमता प्राप्त कर ले क्योंकि "पाकिस्तान का मिसाइल व एटॉमिक प्रोग्राम भारत के लिए ख़ास है और पाकिस्तान किसी तरह की हथियारों की दौड़ में शामिल नहीं है."

पाकिस्तान का मिसाइल प्रोग्राम और अमेरिकी प्रतिबंध

पाकिस्तान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम से संबंधित संस्थानों और सप्लायर्स पर अमेरिकी प्रतिबंधों का सिलसिला ख़त्म नहीं हो रहा है. 2024 में तीसरी बार बैलिस्टिक मिसाइल की तैयारी में सहायता के आरोप में चार और संस्थानों पर पाबंदी लगाई गई है.

अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यह पाबंदियां नेशनल डेवलपमेंट कॉम्प्लेक्स समेत तीन फ़र्मों पर लगाई जा रही हैं जो बड़े पैमाने पर तबाही फैलाने वाले हथियारों की तैयारी और उनके लिए पार्ट-पुर्ज़े उपलब्ध कराने में शामिल हैं.

जिन चार संस्थानों पर पाबंदियां लगाई गई हैं उनमें नेशनल डेवलपमेंट कॉम्प्लेक्स के अलावा अख़्तर ऐंड संस प्राइवेट लिमिटेड, एफ़िलिएट्स इंटरनेशनल और रॉक साइड इंटरप्राइज़ शामिल हैं.

इस बयान के अनुसार इनमें से इस्लामाबाद में स्थित नेशनल डेवलपमेंट कॉम्प्लेक्स (एनडीसी) ने पाकिस्तान के लंबी दूरी तक मार करने वाले बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम की तैयारी के लिए अलग-अलग पुर्ज़े प्राप्त किए हैं जिसमें ख़ास तरह के व्हीकल शैसी (चेसीस) शामिल हैं जो मिसाइल लॉन्चिंग और टेस्टिंग के लिए इस्तेमाल होते हैं.

अमेरिका का आरोप है के एनडीसी शाहीन सिरीज़ की मिसाइल समेत पाकिस्तान की दूसरी बैलिस्टिक मिसाइलों की तैयारी में लगा हुआ है.

बयान के अनुसार कराची स्थित अख़्तर ऐंड संस प्राइवेट लिमिटेड ने एनडीसी के लिए पाकिस्तान के लंबी दूरी तक मार करने वाले बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम के लिए कई पुर्ज़े उपलब्ध कराए हैं.

इसके अलावा कराची के ही एफ़िलिएट्स इंटरनेशनल पर आरोप है कि उसने बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम में मदद के लिए एनडीसी और दूसरे संस्थानों के लिए मिसाइल बनाने के ज़रूरी सामान की ख़रीदारी में भूमिका अदा की है.

याद रहे कि इससे पहले इस साल सितंबर में अमेरिका ने एक चीनी रिसर्च इंस्टीट्यूट और कई कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए थे जिनके बारे में उनका दावा था कि वह पाकिस्तान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम के लिए पुर्ज़े और टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराने में शामिल हैं.

इसके अलावा इसी साल अप्रैल में चीन की तीन और बेलारूस की एक कंपनी पर पाबंदी लगाई गई थी. अक्टूबर 2023 में पाकिस्तान को बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम के पुर्ज़े और सामान उपलब्ध कराने के आरोप में चीन की तीन और कंपनियों पर इसी तरह के प्रतिबंध लगाए गए थे.

लेकिन पाकिस्तान ने इस अमेरिकी कार्रवाई को 'निराशाजनक' बताते हुए कहा है कि हाल के अमेरिकी प्रतिबंधों का मक़सद क्षेत्र में सैन्य असंतुलन को बढ़ावा देना है.

पाकिस्तान का दुर्भावना का भी आरोप

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने अमेरिका की कार्रवाई को दुर्भाग्यपूर्ण और दुर्भावना पर आधारित बताया है.

विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि पाकिस्तान की रणनीतिक क्षमताओं का मक़सद देश की संप्रभुता की रक्षा और दक्षिण एशिया में शांति स्थापित करना है.

इस बयान में कहा गया है कि हाल के अमेरिकी प्रतिबंधों का मक़सद क्षेत्र में सैन्य असंतुलन को बढ़ावा देना है जिससे शांति और सुरक्षा की कोशिशों को नुक़सान पहुंचेगा.

विदेश मंत्रालय का कहना है कि प्राइवेट कारोबारी संस्थानों पर इस तरह की पाबंदियां निराशाजनक हैं.

विदेश मंत्रालय का कहना था कि अतीत में हथियारों के अप्रसार के दावों के बावजूद दूसरे देशों के लिए आधुनिक सैन्य टेक्नोलॉजी के लिए ज़रूरी लाइसेंस की शर्त ख़त्म की गई.

उसके अनुसार, "ऐसे दोहरे मापदंड और भेदभावपूर्ण रवैया न केवल अप्रसार के मक़सद को ठेस पहुंचाएगा बल्कि इससे क्षेत्र और विश्व की शांति को भी नुक़सान पहुंचने का ख़तरा है."

पाकिस्तान का मिसाइल प्रोग्राम क्या है?

पाकिस्तान का वह मिसाइल प्रोग्राम जिसका उल्लेख सितंबर 2024 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय की विज्ञप्ति में किया गया था उसमें मीडियम रेंज यानी मध्यम दूरी तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल शाहीन 3 (रेंज 2075 किलोमीटर) और अबाबील (रेंज 2200 किलोमीटर) शामिल हैं जो मल्टीपल री-एंटरी व्हीकल या एमआरवी कहलाते हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान के मिसाइल हथियारों में यह सबसे बेहतरीन क्षमता वाले मिसाइल सिस्टम हैं.

पाकिस्तान सेना के जनसंपर्क विभाग 'आईएसपीआर' के अनुसार पाकिस्तान ने 2017 में अबाबील मिसाइल का पहला परीक्षण करने के बाद पिछले साल 18 अक्टूबर 2023 को भी ज़मीन से ज़मीन पर मध्यम दूरी तक मार करने वाली अबाबील मिसाइल के एक नए वर्ज़न का परीक्षण किया था.

इसके बाद इस साल 23 मार्च को 'पाकिस्तान डे' परेड के अवसर पर पहली बार इसे सार्वजनिक तौर पर सामने लाया गया.

कैनबरा की नेशनल यूनिवर्सिटी में स्ट्रैटेजिक ऐंड डिफ़ेंस स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर डॉक्टर मंसूर अहमद के अनुसार यह दक्षिण एशिया में पहली ऐसी मिसाइल है जो 2200 किलोमीटर की दूरी तक कई वॉरहेड्स या परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता रखती है और विभिन्न लक्ष्यों को निशाना बना सकती है.

प्रोफ़ेसर डॉक्टर मंसूर अहमद के अनुसार रक्षा विशेषज्ञों का अंदाज़ा है कि अबाबील मिसाइल तीन या इससे अधिक वॉरहेड्स या परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता रखती है. उनके अनुसार यह एमआरवी मिसाइल सिस्टम है जो दुश्मन के बैलिस्टिक मिसाइल्स डिफ़ेंस शील्ड को तोड़ देने और निष्प्रभावी करने के लिए डिज़ाइन किया गया है.

अबाबील मिसाइल में मौजूद हर वॉरहेड एक से अधिक लक्ष्य को निशाना बना सकता है. लेकिन डॉक्टर मंसूर के अनुसार महत्वपूर्ण बात यह है कि अबाबील मिसाइल ऐसे हाई वैल्यू टारगेट, जो बैलिस्टिक मिसाइल डिफ़ेंस (बीएमडी) शील्ड से सुरक्षित बनाए गए हों, के ख़िलाफ़ पहली या दूसरी स्ट्राइक की भी क्षमता रखता है.

इस्लामाबाद में रह रहे रक्षा मामलों के विशेषज्ञ सैयद मोहम्मद अली बताते हैं कि एमआरवी मिसाइल टेक्नोलॉजी की ख़ास बात यह होती है कि अगर लक्ष्य के पास पहुंचने पर उनके ख़िलाफ़ दूसरी दिशा में मिसाइल डिफ़ेंस शील्ड या बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम मौजूद हो तो वह उन्हें कंफ्यूज़ कर सकती है.

इसका उदाहरण देते हुए वह कहते हैं, "बिल्कुल वैसे ही जैसे एक तेज़ गेंदबाज़ गेंद को स्विंग करता है जिसमें वह बैट्समैन के डिफ़ेंस को तोड़ने के लिए अपनी रफ़्तार के साथ-साथ स्विंग और सीम पर भी निर्भर करता है."

सैयद मोहम्मद अली बताते हैं, "एमआईआरवी मिसाइल में कई वॉरहेड्स होते हैं जो स्वतंत्र रूप से प्रोग्राम्ड होते हैं और स्वतंत्रत रूप से ही अपने-अपने लक्ष्यों की ओर जाते हैं और हर एक का 'फ़्लाइट पाथ' अलग होता है."

डॉक्टर मंसूर के अनुसार, "भारत लगभग एक दशक से भी अधिक समय से बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम पर काम कर रहा है और वह न केवल इसके परीक्षण करते रहता है बल्कि सार्वजनिक तौर पर इसके बारे में बात भी करता है."

भारत ने हाल ही में पहले एमआरवी अग्नि 5 का एक से अधिक वॉरहेड्स के साथ परीक्षण किया है. यह इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल है जिसकी रेंज कम से कम 5000 से 8000 किलोमीटर है और इसकी तुलना में अबाबील की रेंज केवल 2200 किलोमीटर है और यह पूरी दुनिया में सबसे कम रेंज तक मार करने वाला एमआरवी है.

डॉक्टर मंसूर बताते हैं कि ऐसी अपुष्ट सूचना है कि भारत का अग्नि-पी भी एमआरवी है जिसकी रेंज 2000 किलोमीटर तक है.

पाकिस्तान का शाहीन 3 मिसाइल क्या है?

डॉक्टर मंसूर कहते हैं, "अबाबील मिसाइल सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत का मुक़ाबला करने के लिए बनाई गई है लेकिन अमेरिका को 2021 से जिस मिसाइल से आशंका हो रही है वह शाहीन 3 मिसाइल है जिसकी रेंज 2740 किलोमीटर है."

डॉक्टर मंसूर बताते हैं कि शाहीन 3 के परीक्षण के समय नेशनल कमांड अथॉरिटी के सलाहकार लेफ़्टिनेंटन जनरल (रिटायर्ड) ख़ालिद अहमद किदवई ने एक बयान में कहा था, "यह मिसाइल सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत का मुक़ाबला करने के लिए बनाई गई है और उसका मक़सद भारत में महत्वपूर्ण रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाना है. (इन जगहों में ख़ासतौर पर अंडमान और निकोबार द्वीपों और पूर्व में वह स्थान जहां उनकी न्यूक्लियर सबमरीन बेस बनाई जा रही हैं.) ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि भारत को छिपने के लिए कोई जगह न मिल सके और यह ग़लतफ़हमी न रहे कि भारत में ऐसी जगह है जहां वह काउंटर या पहले स्ट्राइक के लिए अपने सिस्टम को छिपा सकते हैं और पाकिस्तान उन जगहों को निशाना नहीं बना सकता."

डॉक्टर मंसूर के अनुसार भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत भारतीय अधिकारी कई अवसरों पर ऐसे बयान देते आए हैं जिनमें यह संकेत दिया गया है कि भारत ने ऐसी क्षमता प्राप्त कर ली है जो उसे पाकिस्तान के ख़िलाफ़ समय से पहले हमला करने के योग्य बनाती है.

वह सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइल की मिसाल देते हैं जो पारंपरिक के साथ न्यूक्लियर हथियार भी है और इसके अलावा भारत बहुत से ऐसे सिस्टम बना रहा है जो पहली स्ट्राइक के लिए ज़मीन, हवा और समंदर से भी लॉन्च हो सकते हैं.

याद रहे कि सन 2022 में एक ब्रह्मोस मिसाइल पाकिस्तान में आ गई थी जिसके बारे में भारतीय रक्षा मंत्रालय की ओर से कहा गया था कि पाकिस्तान की सीमा में गिरने वाली ब्रह्मोस मिसाइल दुर्घटनावश भारत से फ़ायर हुई थी.

डॉक्टर मंसूर का कहना है, "भारत ब्रह्मोस को पाकिस्तानी स्ट्रैटेजिक फ़ोर्सेज़ और कमांड ऐंड कंट्रोल के ख़िलाफ़ पारंपरिक काउंटर फ़ोर्स या पहली स्ट्राइक के लिए इस्तेमाल कर सकता है और फिर यह दावा कर सकता है कि हमने तो केवल पारंपरिक हमला किया है लेकिन इस तरह की पारंपरिक स्ट्राइक को पाकिस्तान की ओर से पहले परमाणु हमला माना जाएगा."

उनका मानना है कि यह वह सारी स्थितियां हैं जिनमें किसी भी हमले को रोकने के लिए पाकिस्तान को तैयार रहना है और यह उसी स्थिति में मुमकिन है जब पाकिस्तान दुश्मन को अपनी क्षमताएं दिखाता रहे. इसी मक़सद से पाकिस्तान ने शाहीन 3 और अबाबील जैसे न्यूक्लियर वॉरहेड्स बनाए हैं और उनकी नुमाइश की है.

अमेरिका की आशंकाएं क्या हैं?

अब बात करते हैं कि अमेरिका को इन मिसाइलों से क्या आशंकाएं हैं.

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के बयान में आरोप लगाया गया है कि आरआईएएमबी (चीन की कंपनी) ने शाहीन 3 और अबाबील मिसाइल सिस्टम और संभावित तौर पर इससे भी बड़े सिस्टम के लिए डायमीटर रॉकेट मोटर्स के टेस्ट और पार्ट्स की ख़रीदारी के लिए पाकिस्तान के साथ काम किया है.

'संभावित तौर पर इससे भी बड़े सिस्टम्स' के बारे में डॉक्टर मंसूर का कहना है कि इसका मतलब यह हो सकता है कि इसी मिसाइल की अगली जेनरेशन पर काम हो रहा है.

अबाबील का पहला टेस्ट जनवरी 2017 में हुआ था और उसके बाद अबाबील का दूसरा परीक्षण छह साल बाद पिछले साल अक्टूबर 2023 में हुआ. और इन छह सालों के दौरान एनडीसी में इस टेक्नोलॉजी पर लगातार काम होता रहा है.

वह कहते हैं, "शाहीन 3 तो पहले से ऑपरेशनल था लेकिन अबाबील के दूसरे परीक्षण के बाद जब मार्च में उसे परेड में दिखाया गया तो उसके बाद शाहीन 3 और अबाबील ज़्यादा नज़रों में आईं क्योंकि इस नुमाइश का मतलब था कि पाकिस्तान इस चरण तक पहुंच चुका है जहां उस पर रिसर्च और डेवलपमेंट पूरी हो चुकी है और अबाबील अब ऑपरेशनल है."

डॉक्टर मंसूर कहते हैं, "यह अमेरिकी आशंका की असल वजह है. अमेरिका को आशंका है कि पाकिस्तान इसके अधिक से अधिक क्षमता वाले वर्ज़न पर काम कर रहा है."

उनके अनुसार, "अमेरिकी आशंका की एक और वजह यह है कि अबाबील थ्री स्टेज मिसाइल सिस्टम है और मोबाइल लॉन्चर वाला सिस्टम एक बहुत महत्वपूर्ण क्षमता है क्योंकि किसी भी सरप्राइज़ हमले की स्थिति में यह सिस्टम न केवल बड़ी आसानी से कई स्थानों पर कैमोफ़्लॉज़ किया जा सकते हैं बल्कि उन्हें आसानी से ऐसी जगह भी ले लिया जाता है जहां दुश्मन को उनका पता न चल सके."

विशेषज्ञों का मानना है कि कोई भी थ्री स्टेज मिसाइल सिस्टम अधिक रेंज वाले सिस्टम का आधार बन सकता है.

डॉक्टर मंसूर का कहना है, "अबाबील के पहले और दूसरे टेस्ट के बीच छह साल का समय लगना इस बात का सबूत है कि पाकिस्तान अब स्थानीय तौर पर उस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है." वह कहते हैं कि अगर चीन से ही सारी टेक्नोलॉजी ले रहे होते तो छह साल का इंतज़ार क्यों करते?

लेकिन उनका मानना है कि निश्चित तौर पर इस सिस्टम में कोई ऐसी नई डेवलपमेंट हुई है जिसने अमेरिकी आशंका को बढ़ा दिया है. अमेरिका को लग रहा है कि शायद पाकिस्तान और क्षमता हासिल कर रहा है और भविष्य में उन परमाणु क्षमता वाली मिसाइलों के बेहतर वर्ज़न अधिक बड़े वॉरहेड ले जा सकते हैं. इसके अलावा अबाबील शायद तीन से अधिक वॉरहेड्स ले जाने की क्षमता हासिल कर ले.

याद रहे कि अप्रैल में इन सिस्टम के मोबाइल लॉन्चर पर प्रतिबंध लगाए गए थे. अमेरिका की ओर से जारी फ़ैक्टशीट में कहा गया था कि बेलारूस में स्थित मिंस्क व्हील ट्रैक्टर प्लांट ने पाकिस्तान को बैलिस्टिक मिसाइल के लिए विशेष गाड़ियों के शैसी दिए हैं.

स्पेस प्रोग्राम की आशंका

अमेरिकी प्रतिबंधों में शक्तिशाली रॉकेट मोटर का भी उल्लेख है. डॉक्टर मंसूर कहते हैं कि अमेरिका को अबाबील की लंबी रेंज के अलावा पाकिस्तान के स्पेस प्रोग्राम से भी आशंका है.

याद रहे कि अप्रैल की फ़ैक्टशीट में चीन की ग्रानपैक्ट कंपनी लिमिटेड पर आरोप लगाया गया था कि यह कंपनी पाकिस्तान के अंतरिक्ष शोध के संस्थान 'स्पार्को' के साथ मिलकर रॉकेट मोटर की जांच पड़ताल में सहायक पुर्ज़े उपलब्ध कराने में शामिल पाई गई है. यह आरोप भी लगाया गया था कि यही कंपनी पाकिस्तान को बड़ी रॉकेट मोटर्स के परीक्षण के लिए पुर्ज़े देती रही है.

डॉक्टर मंसूर कहते हैं कि न्यूक्लियर डेटेरेन्स के लिए स्पेस प्रोग्राम में क्षमता हासिल करना बहुत महत्वपूर्ण है जो आपको लक्ष्य को सही निशाना बनाने और रक्षा निगरानी के योग्य बनाता है.

अमेरिका को आशंका है कि पाकिस्तान सैनिक और नागरिक मक़सद के के लिए अपना स्पेस व्हीकल लॉन्च कर सकता है जिससे उसके पास इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल फ़ायर करने की क्षमता आ जाएगी.

यह प्रतिबंध पाकिस्तान के मिसाइल प्रोग्राम को कैसे प्रभावित कर सकते हैं?

अमेरिकी प्रतिबंध कोई नई बात नहीं बल्कि इनकी शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी.

डॉक्टर मंसूर कहते हैं कि हाल के प्रतिबंध कोई नई बात नहीं बल्कि यह सिलसिला 1970 के दशक से जारी है. तब भारत के मिसाइल प्रोग्राम (इसके लिए वह रूस और कई दूसरे स्रोतों से मदद हासिल कर रहा था) के जवाब में पाकिस्तान ने अपना मिसाइल प्रोग्राम शुरू किया और हमेशा से चीन के साथ उसके नज़दीकी संबंध भी रहे.

वह कहते हैं चीन और पाकिस्तान की कंपनियों और लोगों पर लगाई गई इन पाबंदियों का दोनों देशों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. पाकिस्तानी संस्थान नेशनल डेवलपमेंट कॉम्प्लेक्स (एनडीसी) पर पाबंदियों के बारे में वह कहते हैं कि यह संस्थान मिसाइल टेक्नोलॉजी के लिए पश्चिम पर निर्भर नहीं करता, इसलिए इस पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.

वह उत्तर कोरिया का उदाहरण देते हैं जिस पर कितने प्रतिबंध लगे मगर उस पर कोई असर नहीं हुआ.

इसके बारे में रक्षा व मिसाइल टेक्नोलॉजी विश्लेषक सैयद मोहम्मद अली कहते हैं कि पाकिस्तान का मिसाइल प्रोग्राम पूरी तरह स्थानीय है और स्थानीय संसाधनों और महारत पर निर्भर करता है और यह अमेरिकी प्रतिबंधों से प्रभावित नहीं होगा.

उनका मानना है कि इस तरह की कार्रवाइयां अफ़सोसनाक हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह क्षेत्रीय रणनीतिक सच्चाइयों से अलग हैं. उनके अनुसार भारतीय मिसाइल की बढ़ती हुई अंतर महाद्वीपीय सीमा क्षेत्रीय और विश्व शांति व स्थिरता के लिए बढ़ते हुए ख़तरे हैं.

क्वॉड का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य है भारत

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के बयान में एमटीसीआर (मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजीम) का भी उल्लेख है.

यह मिसाइल टेक्नोलॉजी के निर्यात पर कंट्रोल रखने वाले देशों का समूह है. इसके बारे में डॉक्टर मंसूर का कहना है कि पाकिस्तान और चीन दोनों ने एमटीसी पर दस्तख़त नहीं किए हैं मगर इसके बिना भी चीन और पाकिस्तान दोनों इसका ध्यान रखते हैं.

याद रहे कि एमटीसीआर में 300 किलोमीटर से अधिक रेंज वाली मिसाइल के निर्यात पर प्रतिबंध है और 500 किलो से अधिक के वॉरहेड की भी इजाज़त नहीं है.

भारत के जवाब में तैयार की गई टेक्नोलॉजी से समस्या तो नहीं होनी चाहिए लेकिन डॉक्टर मंसूर कहते हैं कि असल बात यह है कि अमेरिका के नज़दीक भारत क्वॉड का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य है. इसके अलावा भारत की सॉफ़्ट पावर और आर्थिक शक्ति पाकिस्तान से बहुत अधिक है और पश्चिमी देशों के हर थिंक टैंक में भारतीयों का वर्चस्व है जो जनता और सरकारों की राय बनने पर बहुत असर रखते हैं.

ध्यान रहे कि क्वॉड चार देशों का ग्रुप है जिसमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका शामिल हैं.

डॉक्टर मंसूर कहते हैं कि चीन के साथ अमेरिका का तनाव भी पाकिस्तान के मिसाइल प्रोग्राम पर पाबंदी की एक वजह हो सकती है.

इसके बारे में सैयद मोहम्मद अली कहते हैं कि अमेरिकी पाबंदियों की वजह पाकिस्तान की बजाय चीनी कंपनियां हैं ताकि बीजिंग को मजबूर करके उस पर आर्थिक दबाव डाला जाए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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