पाकिस्तान के इतिहास की सबसे चर्चित रहस्यमय मौत की कहानी

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

यह उस दौर की बात है जब पाकिस्तान से टूटकर बांग्लादेश बना.

ऐसे वक़्त में भी क़रीब दो साल तक देश के अख़बारों की सुर्खियों में बना रहा शहनाज़ गुल का नाम.

अदालत ने शहनाज़ को हत्या के इल्ज़ाम से बरी कर दिया.

वो शहनाज़ गुल जो पाकिस्तान के अख़बारों के पहले पन्ने पर छाई रहीं, कुछ सालों बाद गुमनामी के अंधेरे में उनकी मौत हो गई.

आज तक पता नहीं चल सका कि मशहूर शायर जोश मलीहाबादी के शागिर्द और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के दोस्त मुस्तफ़ा हस्नैन ज़ैदी की मौत कैसे हुई.

फ़ोन जिसकी घंटी नहीं बजी

बात 13 अक्तूबर, 1970 की आधी रात की है. कराची के टेलीफ़ोन एक्सचेंज में एक शिकायत आई कि टेलीफ़ोन नंबर 417935 से संपर्क करने की कोशिश हो रही है लेकिन घंटी नहीं बज रही है.

लाइन चेक करने के बाद शिकायत करने वाले को बताया गया कि फ़ोन इंगेज्ड है. जिस शख़्स से लोग फ़ोन पर संपर्क करने की कोशिश कर रहे थे, उसका नाम सैयद मुस्तफ़ा हस्नैन ज़ैदी था.

ज़ैदी ने कुछ दिन पहले ही अपनी 40वीं सालगिरह मनाई थी. मुस्तफ़ा के एक दोस्त शाहिद आबिदी भी उनको फ़ोन लगा रहे थे क्योंकि उनके घर पर एक शख़्स आया था जिसका नाम सलीम था.

सलीम की परेशानी ये थी कि उसकी पत्नी पिछले कुछ घंटों से ग़ायब थी. उसकी उम्र 26 साल थी और उसका नाम शहनाज़ गुल था.

सलीम बदनामी के डर से पुलिस को शहनाज़ के ग़ायब होने की ख़बर नहीं देना चाहते थे, उनको लग रहा था कि शहनाज़ शायद मुस्तफ़ा के साथ होगी, इसलिए वे मुस्तफ़ा का पता पूछने शाहिद के घर गए थे.

सलीम रात को दो बजे मुस्तफ़ा के घर पहुँचे. उन्होंने चौकीदार से पूछा कि मुस्तफ़ा कहाँ है? चौकीदार ने उन्हें बताया कि वो अपने बेडरूम में सो रहे हैं. दरवाज़ा खटखटाया गया लेकिन अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई.

एयर कंडीशनर चलने की आवाज़ बाहर सुनाई दे रही थी. मुस्तफ़ा की कार गैरेज में खड़ी थी.

मुस्तफ़ा ज़ैदी की लाश मिली

सलीम ने वो रात बहुत बेचैनी में गुज़ारी. अगले दिन सुबह साढ़े सात बजे एक बार फिर मुस्तफ़ा को फ़ोन मिलाने की नाकाम कोशिश हुई. आख़िरकार पुलिस को इसकी इत्तला दी गई.

इस घटना पर हाल ही में प्रकाशित किताब ‘सोसाइटी गर्ल, अ टेल ऑफ़ सेक्स, लाइज़ एंड स्कैंडल’ की लेखिका तूबा मसूद ख़ान बताती हैं, “ उन दिनों मुस्तफ़ा ज़ैदी बहुत परेशान थे और वो शहनाज़ गुल से मिलना चाह रहे थे और शहनाज़ उन्हें टाल रही थीं. उनके बहुत ज़ोर देने पर शहनाज़ उनसे मिलने गईं थीं.”

जब पुलिस ने दरवाज़ा तोड़ा तो मुस्तफ़ा की लाश बिस्तर पर खून से लथपथ पड़ी थी, ख़ून उनकी नाक और मुँह से निकला था लेकिन शरीर पर कोई ज़ख्म नहीं था. उनके फ़ोन का रिसीवर क्रेडिल पर न होकर नीचे लटका हुआ था.

शहनाज़ उनके कमरे के बाहर एक कॉरिडोर में बेहोश पड़ी हुई थीं.

शहनाज़ गुल की ड्रामे में एंट्री

मौत किसी मामूली आदमी की नहीं थी, कुछ समय पहले तक मुस्तफ़ा लाहौर के ज़िला कमिश्नर हुआ करते थे. साथ ही, उनकी गिनती पाकिस्तान के युवा शायरों में होती थी और मशहूर शायर जोश मलीहाबादी उनके उस्ताद हुआ करते थे.

बेहोश शहनाज़ को तुरंत जिन्ना अस्पताल ले जाया गया. उनके पति सलीम उनके साथ थे. जब मुस्तफ़ा की लाश मिली तो वो नीले रंग की कमीज़ पहने हुए थे जो उनकी पतलून में खुसी हुई थी. उनका बायां हाथ उनके पेट पर था और उनकी कमीज़ के बटन खुले हुए थे.

मुस्तफ़ा के भतीजे शाहिद रज़ा ने अदालत में अपनी गवाही में बताया, “कमरे का फ़र्नीचर अस्त-व्यस्त था. सोफ़ा उल्टा पड़ा था और लैंप गिरा पड़ा था. करीब चार दर्जन नेफ़्थलीन की गोलियाँ बिस्तर और ज़मीन पर बिखरी पड़ी थीं. कुछ गंदे प्याले पड़े थे जिसमें कुछ कॉफ़ी बची हुई थी. फ़ोन के पास नीले रंग की तीन छोटी गोलियाँ थीं और कुछ कागज़ बिखरे पड़े थे जिन पर मुस्तफ़ा जर्मन भाषा के कुछ शब्द लिखने का अभ्यास कर रहे थे.”

एयर कंडीशनर के ऊपर मुस्तफ़ा की छोटी बेटी इस्मत की तस्वीर रखी हुई थी.

मुस्तफ़ा की मौत की ख़बर सुनकर जाने-माने शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ भी वहाँ पहुंच गए थे.

मुस्तफ़ा की लाश का मुआयना करने वाले डॉक्टर का कहना था कि उनकी मौत 18 से 24 घंटे पहले हुई.

दिलफेंक शायर और निलंबित अफ़सर

मुस्तफ़ा भारत के इलाहाबाद के रहने वाले थे और पाकिस्तान जाने से पहले तेग़ इलाहाबादी के नाम से शायरी करते थे.

‘सोसाइटी गर्ल’ की सह लेखिका सबा इम्तियाज़ बताती हैं, “उनका पहला काव्य संकलन ‘ज़ंज़ीरें’ 1947 में प्रकाशित हुआ था जिसकी भूमिका नामी शायर फ़िराक़ गोरखपुरी ने लिखी थी. वो छोटी उमर से ही काफ़ी मशहूर हो गए थे और प्रगतिवादी सोच रखते थे. मार्क्सवाद में उनका विश्वास था. इलाहाबाद के ज़माने में ही उन्होंने मुशायरों में जाना शुरू कर दिया था.”

विभाजन के बाद पाकिस्तान आकर पहले उन्होंने एक कॉलेज में पढ़ाया और फिर उनका चयन पाकिस्तान सिविल सेवा में हो गया. 1954 बैच के मुस्तफ़ा ज़ैदी को प्रतिभाशाली अधिकारी माना जाता था और उन्हें उनके काम के लिए ‘तमग़ा-ए-कायद-ए-आज़म’ से सम्मानित किया गया था.

उन्होंने साल 1957 में एक जर्मन महिला वेरा से शादी की थी जिनसे उनके दो बच्चे थे.

सबा इम्तियाज़ बताती हैं, “दिसंबर, 1969 में पाकिस्तान सरकार ने 303 सिविल सेवा अधिकारियों को निलंबित किया था. मुस्तफ़ा ज़ैदी उनमें से एक थे. उन पर भ्रष्टाचार का आरोप था लेकिन ये आरोप सिद्ध नहीं हो पाया था.”

शहनाज़ गुल

जब जिन्ना अस्पताल में शहनाज़ गुल का पेट साफ़ किया गया तो पता चला कि उन्होंने वेलियम से मिलती-जुलती लिब्रियम की गोलियाँ खाई हुईं थीं. उन्होंने पुलिस को बताया कि उन्हें कुछ भी याद नहीं है सिवाय इसके कि वो मुस्तफ़ा से मिलने गई थीं.

अस्पताल में भी उन्होंने वही काले कपड़े पहन रखे थे जिन कपड़ों में वो मुस्तफ़ा के घर पर पाईं गई थीं. उनके बाल बिखरे हुए थे और उनका मुँह सूजा हुआ था.

एक दिन बाद उनके पति सलीम उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज कराकर अपने घर ले आए थे.

सबा इम्तियाज़ बताती हैं, “शहनाज़ गुल अपने ज़माने में बहुत हसीन महिला हुआ करती थीं. इस घटना के 54 साल बाद भी लोग कहते हैं कि उन जैसी ख़ूबसूरत औरत किसी ने नहीं देखी है पाकिस्तान में. उनके पति सलीम उनसे कम-से-कम 30 साल बड़े थे. सलीम की पहली शादी एक अंग्रेज़ महिला से हुई थी. वो पहले भारतीय सेना में हुआ करते थे लेकिन विभाजन के बाद उन्होंने सेना से इस्तीफ़ा दे दिया था.”

शहनाज़ से शादी के समय उनकी उम्र 46 साल साल थी जबकि शहनाज़ सिर्फ़ 17 साल की थीं.

सबा बताती हैं, “ शहनाज़ को भी शायरी का कुछ हद तक शौक था. पार्टियों में जाना वो पसंद करती थीं. लोग उनके साथ उठना-बैठना पसंद करते थे. सन 1964 में शहनाज़ का पहला बच्चा हुआ था. लगभग उसी समय वो लाहौर से कराची रहने के लिए आ गई थीं.”

एक पार्टी में हुई मुस्तफ़ा और शहनाज़ की मुलाक़ात

मुस्तफ़ा ज़ैदी जब सिविल सर्वेंट थे तो उनका अक्सर कराची आना-जाना होता था. सिंध क्लब में शहनाज़ और सलीम की पहली मुलाक़ात सैयद मुस्तफ़ा हसनैन ज़ैदी से हुई.

सबा इम्तियाज़ आगे बताती हैं, “मुस्तफ़ा ज़ैदी ने अपने दोस्तों को बताया कि उन्हें शहनाज़ बहुत पसंद हैं. वो अपने दोस्तों के साथ जब पिकनिक पर जाते थे तो उनमें शहनाज़ गुल और उनके पति भी होते थे. कई लोगों ने मुस्तफ़ा से कहा भी कि शहनाज़ शादी-शुदा हैं. उनसे संबंध बढ़ाने से पहले ज़रा सोच लें लेकिन मुस्तफ़ा ने किसी की बात मानी नहीं.”

फिर जब मुस्तफ़ा लाहौर से कराची शिफ़्ट हो गए तो वहाँ पर इनका ताल्लुक़ बढ़ा.

सबा कहती हैं, “हमारी रिसर्च कहती है कि शहनाज़ गुल किसी स्टेज पर मुस्तफ़ा ज़ैदी के लिए अपने परिवार को छोड़ना नहीं चाहती थीं.”

पहली मुलाक़ात के बाद मुस्तफ़ा और शहनाज़ ने अकसर मिलना शुरू कर दिया. मुस्तफ़ा को जानने वाले बताते हैं कि वो औरतों के साथ फ़्लर्ट करने के शौकीन थे.

सबा बताती हैं, “मुस्तफ़ा शहनाज़ को प्यार से लाली बुलाते थे, इसकी वजह ये थी कि वे जब ब्लश करती थीं तो उनके गाल पूरी तरह लाल हो जाते थे.”

तूबा मसूद बताती हैं, “मुस्तफ़ा के दोस्त बताते हैं कि वो औरतों से संबंध बनाकर अपना ईगो बूस्ट करते थे. उनको शायद ये भी ख़ुशफ़हमी थी कि उनकी जर्मन पत्नी उनकी इस आदत का बुरा नहीं मानेंगी. अपने दोस्तों को अपने विवाहेतर संबंधों के लिए वो बौद्धिक कारण बताया करते थे.”

फ़ैज़ की बेटी सलीमा ने सबा को बताया कि मुस्तफ़ा फ़्रेंच उपन्यासकार फ़्राँसुआ सगान के उपन्यास ‘बॉनजो त्रिस्तेस’ और उनकी समानांतर नैतिकता के विचार से बहुत प्रभावित थे. उन्होंने एक बार अपनी पत्नी वेरा पर एक शेर कहा था-

‘मिरे सियाही दामन को देखने पर भी

तिरे सुफ़ैद दुपट्टों का दिल बुरा ना हुआ’

शहनाज़ के ऊपर मुस्तफ़ा ने पाँच नज़्में लिखी थीं. उसमें से एक ‘अपनी जान नज़र करूँ’ उनकी मौत के बाद अख़बार में छपी थी--

मैं अलग हो के लिखूँ तेरी कहानी कैसे

मेरा फ़न, मेरा सुख़न, मेरा क़लम तुझसे है

‘कराची की क्रिस्टीन कीलर’

इस मामले की जाँच कर रहे डीएसपी अब्दुल रशीद को मुस्तफ़ा की अलमारी में एक ब्रीफ़केस मिला था जिसमें एक पिस्टल और 25 गोलियाँ रखी हुई थीं.

इसके अलावा उसमें छपे हुए पैम्फ़लेट थे जिसका शीर्षक था ‘कराची की क्रिस्टीन कीलर शहनाज़.’ उस पैम्फ़लेट में शहनाज़ की तस्वीरें थीं जिसमें उन्हें कमर से ऊपर नग्न दिखाया गया था.

सबा इम्तियाज़ बताती हैं, “ उनकी मौत से कुछ महीने पहले शहनाज़ यूरोप चली गई थीं. इस दौरान मुस्तफा को लगा कि शहनाज़ का उनके प्रति रवैया बदल गया है. न वो फ़ोन पर बात करती थीं न उनके किसी ख़त का जवाब दे रही थीं. उनको लगा कि शहनाज़ का किसी और शख़्स के साथ संबंध हो गया है. उनका रवैयै ग़ुस्से और बदले की भावना में बदल गया.”

सबा आगे बताती हैं, ‘’उनके पास शहनाज़ की कुछ तस्वीरें थीं. उन्होंने कराची की एक प्रिटिंग प्रेस में उनके 4000 पैम्फ़लेट छपवाए. उसमें उन्होंने लिखा, ‘कराची की क्रिस्टीन कीलर.’ उन्होंने लिखा कि वो पाकिस्तान की हाई सोसाएटी और उसके किरदारों को एक्सपोज़ करेंगे. उन्होंने ये छपवाया ज़रूर लेकिन बाँटा नहीं. उन्होंने इन्हें अपने एक दोस्त को दिखाया ज़रूर था लेकिन उन्होंने कहा कि तुम छोड़ दो इन सब चीज़ों को.’’

क्रिस्टीन कीलर का संबंध 1963 में ब्रिटेन के युद्ध मंत्री जॉन प्रोफ़्यूमो से था जो उनसे इश्क फ़रमा रहे थे. बाद में पता चला कि कीलर लंदन में सोवियत नेवल अटैशे के साथ भी संबंध में थीं.

इस स्कैंडल की वजह से प्रोफ़्यूमो को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

कीलर पाकिस्तान के उस समय के राष्ट्रपति अयूब ख़ान की दोस्त भी थीं और दोनों एक ही स्वीमिंग पूल में तैरते हुए देख गए थे.

शहनाज़ गुल की गिरफ़्तारी

उन्हीं दिनों मॉर्निंग न्यूज़ के संवाददाता एसके पाशा ने शहनाज गुल का इंटरव्यू किया था.

पाशा ने लिखा था, “उनका सुंदर चेहरा पीला पड़ा हुआ था. उनकी बादामी आँखें नींद की गोलियों के बोझ से झुकी हुई थीं. वो मासूमियत की मूरत दिख रही थीं. वो साधारण अंग्रेज़ी में बात कर रही थीं. शहनाज़ ने बताया कि उनके और मुस्तफ़ा के बीच मामूली जान-पहचान थी. उन्होंने कभी भी शारीरिक संबंध नहीं बनाए थे.”

उन्होंने पुलिस को दिए अपने बयानों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

मुस्तफ़ा की मौत के दो हफ़्ते बाद पुलिस ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके बताया कि वो मुस्तफ़ा ज़ैदी की मौत की निष्पक्ष जाँच कर रही है लेकिन फिर भी कई सवाल उठ रहे थे.

कुछ लोगों का मानना था कि मामले में कुछ नहीं है जबकि दूसरे लोगों का मानना था कि मुस्तफ़ा की मौत के पीछे शहनाज़ का हाथ है.

पूरे पाकिस्तान में ये माहौल ऐसा हो गया कि पुलिस शहनाज़ को बचाने की कोशिश कर रही है.

मुस्तफ़ा के भाई इरतज़ा ज़ैदी ने सवाल उठाया, “मुस्तफ़ा ने मौत के वक़्त ऐसे कपड़े पहन रखे थे जैसे वो कहीं जा रहे हों. अगर ये आत्महत्या थी तो शहनाज़ और मुस्तफ़ा ने एक जैसा ही ज़हर क्यों नहीं खाया?”

इस बीच सिंध और बलूचिस्तान हाई कोर्ट के वरिष्ठ जज अब्दुल क़ादिर शेख़ ने अप्रत्याशित क़दम उठाते हुए सिंध पुलिस के प्रमुख को आदेश दिया कि वो उनके सामने इस मामले की अब तक हुई जाँच रिपोर्ट पेश करें.

नतीजा ये हुआ कि पाँच नवंबर, 1970 को मुस्तफ़ा की हत्या की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई और शहनाज़ के ख़िलाफ़ पाकिस्तान पीनल कोड की धारा 302 के तहत मुक़दमा दर्ज किया गया.

उसी रात क्राइम ब्रांच के अधिकारी शहनाज़ को गिरफ़्तार करने उनके घर पहुंच गए.

मॉर्निंग स्टार ने 7 नवंबर, 1970 के अंक में लिखा, ‘जब पुलिस शहनाज़ गुल के घर पहुंची तो वो सो रही थीं. जब उनको बताया गया कि उन्हें मुस्तफ़ा ज़ैदी की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया जा रहा है तो वो बेहोश हो गईं.’

इस बीच पुलिस ने मुस्तफ़ा के शव को उनकी क़ब्र से निकालकर उनका दोबारा पोस्टमॉर्टम कराने का फ़ैसला किया. पुलिस शहनाज़ को जमशेद क्वार्टर पुलिस स्टेशन ले गई. वहाँ महिला क़ैदियों के लिए अलग से रहने की व्यवस्था नहीं थी इसलिए उन्हें थाने के बरामदे में रखा गया और महिला पुलिस अधिकारी को उन पर नज़र रखने के लिए लगाया गया.

पाकिस्तानी अख़बारों में लगातार ख़बरें छपती रहीं, ‘शहनाज़ ने सूती प्रिंटेड सलवार कमीज़ पहन रखी थी. वो लकड़ी की बेंच पर सोने के बजाए ज़मीन पर सो रही थीं. उनको ओढ़ने के लिए दो कंबल दिए गए थे. वो पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ती थीं. हालांकि उस समय रमज़ान का पहला हफ़्ता चल रहा था लेकिन वो रोज़े नहीं रख रही थीं.’ (जंग, 14 नवंबर, 1970)

शहनाज़ गुल के ख़िलाफ़ आरोप सिद्ध नहीं हुए

मुक़दमे के दौरान शहनाज़ अपने बयान पर क़ायम रहीं कि उनका मुस्तफ़ा ज़ैदी से कोई अंतरंग रिश्ता नहीं था. उन्होंने कभी भी शारिरिक संबंध नहीं बनाए.

उन्होंने कहा कि मुस्तफ़ा की आलमारी में पाई गई तस्वीरें उनकी नहीं थीं. अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा कि मुस्तफ़ा की हत्या के कोई सबूत नहीं पाए गए.

सिर्फ़ इसलिए कि शहनाज़ वहाँ मौजूद थीं, ये फ़ैसला नहीं किया जा सकता कि वो हत्या उन्होंने की थी.

जज कुंवर इदरीस ने कहा, ''मैंने ये बात नोट की है कि अपनी मृत्यु से पहले मुस्तफ़ा अवसाद में थे. अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने जो शब्द कहे थे उससे लगता है कि वो अपनी जान ले सकते थे. मेरा विचार है कि सिर्फ़ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से ये सिद्ध नहीं होता कि उनकी मृत्यु में शहनाज़ का हाथ था. अभियोग पक्ष उनके ख़िलाफ़ आरोप सिद्ध नहीं कर सका.’'

तूबा मसूद बताती हैं, “फ़ैसले के बाद शहनाज़ ने अपने वकील एसएस शेख़ से बात की और तेज़ी से कमरे से बाहर चली गईं. एक फोटोग्राफ़र ने उनकी तस्वीर लेने की कोशिश की. इस बार उन्होंने शॉल में अपना मुँह नहीं छिपाया और न ही ज़मीन या शून्य की तरफ़ देखा. उन्होंने सीधे कैमरे में देखकर तस्वीर खिंचवाई.”

पाकिस्तानी अख़बारों में सिर्फ़ शहनाज़ गुल की ही ख़बरें

ये उस ज़माने का सबसे सनसनीख़ेज़ केस था. उस दौरान पाकिस्तान में बहुत कुछ हो रहा था लेकिन हर रोज़ शहनाज़ गुल की तस्वीरें अख़बारों में छपती थीं और उनसे जुड़ी कोई न कोई ख़बर रहती ही थी.

जंग अख़बार के एक रिपोर्टर ने पुलिस स्टेशन की दीवार तक फाँदी ताकि वो देख सकें कि शहनाज़ जेल के अंदर क्या कर रही हैं.

माहौल ऐसा था कि लोगों के घरों में अख़बार बैन कर दिए गए थे ताकि बच्चे उस ख़बर को न पढ़ सकें.

शहनाज़ गुल के लिए वो बहुत ही मुश्किल समय था. करीब दो साल तक वो अख़बारों के फ़्रंट पेज पर रहीं.

तूबा मसूद बताती हैं, “प्रेस ने बहुत सनसनीख़ेज़ तरीके से काम किया था. आप ये सोचें कि अक्तूबर 1970 से लेकर 1972 के बीच तक इनकी शक्ल अख़बारों के फ़्रंट पेज पर होती थी. इसी दौरान पूर्वी पाकिस्तान अलग हो गया मगर इसके बावजूद शहनाज़ हमेशा ख़बरों में बनी रहीं. डॉन और शाम के अख़बारों में उनकी सेक्स लाइफ़ के बारे में बातें होती थीं. उनकी हर चीज़ कवर होती थी. मैंने ऐसी कवरेज अपनी ज़िंदगी में नहीं देखी.”

बरी होने के कुछ दिनों बाद ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से बाहर निकलना शुरू कर दिया.

सबा इम्तियाज़ बताती हैं, “बहुत सारे लोगों की हमदर्दी थी उनके साथ. उनको लगता था कि शहनाज़ के साथ बहुत ग़लत हुआ है. इस घटना के बाद जब भी वो किसी पार्टी या रेस्तराँ में जाती थीं या सड़क पर फल ख़रीद रही होती थीं तो लोग रुक कर उन्हें देखते थे. बाद में उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से मुस्तफ़ा ज़ैदी का ज़िक्र नहीं किया.”

अब से तकरीबन बीस साल पहले गुमनामी में उनकी मौत हुई.

उनकी मौत का ज़िक्र तक अख़बारों में नहीं हुआ. ये वही अख़बार थे जो किसी दौर में उनके बारे में हर छोटी से छोटी चीज़ रोज़ पहले पन्ने पर छाप रहे थे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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