निमिषा प्रिया: यमन में सज़ा-ए-मौत का सामना कर रही भारतीय नर्स, बचने का सिर्फ़ एक रास्ता

निमिषा नर्स के तौर पर काम करने यमन गई थीं
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    • Author, गीता पांडे
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, कोच्चि

निमिषा प्रिया एक बड़े सपने के साथ 2008 में केरल से यमन के लिए रवाना होती हैं, उनकी उम्र उस समय महज़ 19 साल थी.

निमिषा को यमन की राजधानी सना के एक सरकारी अस्पताल में नर्स का काम भी मिल जाता है. वो हज़ारों किलोमीटर दूर केरल में मां को फ़ोन कर ये खुशखबरी देती हैं और कहती हैं कि जल्द ही दुख भरे दिन बीतने वाले हैं क्योंकि वो पैसे कमाना शुरू कर चुकी हैं.

निमिषा और उनके परिवार के लिए 15 साल बाद ये सपना किसी दु: स्वपन में बदल गया है. निमिषा अभी युद्धग्रस्त देश यमन में एक स्थानीय व्यक्ति तलाल अब्दो महदी की हत्या के मामले में मौत की सज़ा का सामना कर रही हैं.

13 नवंबर को यमन की सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल ने उनकी याचिका ख़ारिज कर दी. यमन में शरिया क़ानून है और अदालत ने उन्हें आखिरी एक मौका दिया है. अगर पीड़ित का परिवार उन्हें माफ कर दे तो वो सज़ा से बच सकती हैं.

अब भारत में उनका परिवार और उनके लिए अभियान चलाने वाले लोगों के लिए समय कम पड़ता जा रहा है और उन्हें जैसे किसी चमत्कार की उम्मीद है.

'आप मेरी जान ले लें'

यमन एक युद्धग्रस्त देश है और वहां की यात्रा करना आसान काम नहीं है.

2017 में भारत सरकार ने अपने नागरिकों के यमन जाने पर प्रतिबंध लगा दिया और विषम परिस्थितियों में ऐसा करने के लिए इसकी विशेष अनुमति की ज़रूरत होती है.

निमिषा के लिए अभियान चला रहे एक समूह 'सेव निमिषा प्रिया इंटरनेशनल एक्शन काउंसिल' ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की है. इसमें अपील की गई है कि निमिषा की मां और उनकी 11 साल की बेटी मिशाल को सना जाने की अनुमति दी जाए.

समूह का कहना है कि काउंसिल के दो सदस्य उनके साथ जाएंगे. लेकिन पिछले हफ़्ते भारतीय अधिकारियों ने उनका आग्रह ठुकरा दिया और उनका ये कहना है कि जब यमन में राजनयिक पहुंच नहीं है तो ऐसे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती है.

सरकार का ये आकलन यमन में राजनीतिक हालात पर आधारित है. सना में हूती विद्रोहियों का कब्ज़ा है और यमन की आधिकारिक सरकार के साथ वो वर्षों से संघर्ष में हैं. यमन की सरकार सऊदी अरब में निर्वासित है.

भारत हूती विद्रोहियों को मान्यता नहीं देता है तो ऐसे में भारतीय नागरिकों के लिए यमन की यात्रा ख़तरों से भरी हुई है.

निमिषा की मां प्रेमा कुमारी ने अदालत में याचिका दायर की है. उनकी अपील है कि उन्हें यमन जाने की अनुमति दी जाए.
इमेज कैप्शन, निमिषा की मां प्रेमा कुमारी ने अदालत में याचिका दायर की है. उनकी अपील है कि उन्हें यमन जाने की अनुमति दी जाए.

निमिषा को बचाने की मुहिम

सेव निमिषा काउंसिल ने एक बार फिर दिल्ली हाई कोर्ट से अपील की है और अब उनका कहना है कि वो निमिषा की मां और उनकी बेटी को यमन जाने दें.

इस सब के बीच निमिषा की मां की बेचैनी बढ़ती जा रही है और उन पर तरह-तरह का डर हावी होता जा रहा है. वो इस बात से ही डर जाती हैं कि उनकी बेटी किसी पराए मुल्क में मौत का सामना कर रही हैं.

सेव निमिषा काउंसिल के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता बाबू जॉन कहते हैं, "निमिषा के साथ जो भी हुआ वो दुर्भाग्यपूर्ण है."

उन्होंने कहा कि एक अच्छे भविष्य के सपने के साथ निमिषा यमन गईं थीं और आज वो वहां मौत का सामना कर रही हैं. उनके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए.

निमिषा की मां कहती हैं कि उनकी बेटी पढ़ाई में अच्छी थी और स्थानीय चर्च ने उनकी पढ़ाई में मदद भी की और डिप्लोमा कोर्स के लिए पैसे भी दिए लेकिन केरल में उन्हें नर्स की नौकरी नहीं मिली क्योंकि डिप्लोमा करने से पहले उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी नहीं की थी.

ऐसे में यमन में नौकरी का मिलना उनके लिए ग़रीबी के चंगुल से निकलने का अच्छा मौका था.

निमिषा और टॉमी थॉमस की 2011 में शादी हुई
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2011 में निमिषा टॉमी थॉमस से शादी करने के लिए घर आईं और फिर वो दोनों यमन चले गए, जहां उन्हें इलेक्ट्रिशियन के असिस्टेंट के तौर पर नौकरी मिल गई लेकिन उन्हें मामूली वेतन ही मिल रहा था. दिसंबर 2012 में उनकी बेटी का जन्म हुआ और इसके बाद दंपति के लिए घर का खर्च निकाल पाना मुश्किल होता गया. 2014 में थॉमस कोच्चि लौट गए जहां वो टुक-टुक चलाते हैं.

2014 में निमिषा ने कम वेतन वाली अपनी नौकरी छोड़ने और एक क्लिनिक खोलने का फैसला कर लिया. यमन के कानून के तहत ऐसा करने के लिए स्थानीय पार्टनर होना ज़रूरी है और यही वो वक्त था जब महदी की इस कहानी में एंट्री होती है.

महदी एक कपड़े की दुकान चलाते थे और उनकी पत्नी ने उस क्लिनिक में बच्ची को जन्म दिया था जहां निमिषा काम करती थीं. जनवरी, 2015 में निमिषा जब भारत आईं तो महदी उनके साथ आए थे.

निमिषा और उनके पति ने अपने दोस्तों और परिवार से पैसे लेकर करीब 50 लाख रुपये की राशि जुटाई और एक महीने बाद निमिषा अपना क्लिनिक खोलने यमन लौट गईं. उन्होंने पेपरवर्क भी शुरू कर दिया ताकि उनके पति और बच्ची यमन लौट सकें लेकिन इसी बीच यमन में गृह युद्ध शुरू हो गया और ऐसे में वो यात्रा नहीं कर सकते थे.

टोमी थॉमस अपनी शादी की तस्वीरें दिखाते हुए
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यमन में गृहयुद्ध की शुरुआत

इसके अगले दो महीने में भारत ने यमन से अपने 4,600 नागरिकों और 1,000 विदेशी नागरिकों को बाहर निकाला. निमिषा उन कुछ लोगों में शामिल थीं जो नहीं लौटीं. थॉमस ने कहा, "हमने वहां इतने पैसे लगाए थे कि वो ये सब छोड़कर लौट नहीं सकी."

थॉमस ने फ़ोन पर 14 बेड वाला वो क्लिनिक भी दिखाया और वो साइनबोर्ड भी, जिस पर लिखा था- अल अमान मेडिकल क्लिनिक.

थॉमस ने बताया कि क्लिनिक अच्छा चलने लगा था लेकिन यही वो समय था जब निमिषा ने महदी के बारे में शिकायतें करना भी शुरू किया.

बीबीसी ने दिल्ली हाई कोर्ट में डाली गई याचिका की कॉपी देखी है. इसमें कहा गया है, "महदी ने निमिषा के घर से उसकी शादी की तस्वीरें चुरा ली थीं और बाद में इससे छेड़छाड़ कर ये दावा किया कि उसने निमिषा से शादी कर ली है. "

इसमें ये भी कहा गया कि महदी ने कई मौकों पर निमिषा को धमकियां दीं और "उसका पासपोर्ट भी रख लिया और निमिषा ने जब इसकी शिकायत पुलिस में की तो पुलिस ने उन्हें ही छह दिन तक जेल में बंद कर दिया."

महदी की हत्या और निमिषा की गिरफ़्तारी

थॉमस को टीवी न्यूज़ चैनल के ज़रिए पहली बार 2017 में हत्या की जानकारी मिली.

उन्होंने बताया कि ख़बर की हेडलाइन ऐसी थी- "मलयाली नर्स निमिषा को पति की हत्या के लिए किया गया गिरफ़्तार, शव के टुकड़े किए."

महदी का क्षत-विक्षत शव वॉटर टैंक से मिला था और उसके एक महीने बाद निमिषा को यमन की सऊदी अरब से लगती सीमा से गिरफ़्तार किया गया.

बीबीसी रिपोर्टर को थॉमस ने शादी की तस्वीरें दिखाते हुए कहा, "ये आदमी उसका पति कैसे हो सकता है जब उसकी शादी मुझसे हुई थी?"

थॉमस ने बताया कि गिरफ़्तार होने के कुछ दिन बाद निमिषा ने उन्हें कॉल किया था. वो उस दौरान बुरी तरह रो रही थीं. उसने कहा, "ये सब उसने मेरे लिए और बच्ची के लिए किया. वो आसान रास्ता चुन सकती थी और महदी के साथ आराम की ज़िंदगी जी सकती थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया."

प्रवासियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले और सुप्रीम कोर्ट के वकील केआर सुभाष चंद्रन ने कहा, " निमिषा का इरादा महदी की हत्या का नहीं था. वो तो इस कहानी में खुद ही पीड़ित है. महदी ने उसका पासपोर्ट रख लिया था और वो उसके चंगुल से मुक्त होना चाहती थी. उसने महदी को बेहोश करने की कोशिश की लेकिन डोज़ ज़्यादा हो गया."

रोज़गार के लिए खाड़ी देश जाने वाले भारतीय

खाड़ी देशों में सेमी स्किल और अनस्किल्ड श्रमिकों को प्रताड़ित करने की कहानी नई नहीं है. सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस क्षेत्र के कई देशों में ऐसा चलन है कि जो श्रमिकों को काम करने के लिए ले जाते हैं, वो उनके पासपोर्ट रख लेते हैं. इसे वहां कफ़ाला कहा जाता है.

चंद्रन ही निमिषा की मां के वकील भी हैं. उनका कहना है कि कफ़ाला के जो ज़्यादातर पीड़ित हैं, उनमें से ज़्यादातर भारतीय महिलाएं हैं जो घरेलू सहायक के रूप में मध्य पूर्व जाती हैं.

उन्होंने कहा, "निमिषा को निष्पक्ष कानूनी ट्रायल भी नहीं मिला. अदालत ने एक जूनियर वकील दिया था लेकिन वो भी निमिषा की मदद नहीं कर सका क्योंकि निमिषा को अरबी नहीं आती है. उन्हें कोई अनुवादक नहीं दिया गया."

इस मामले को लेकर यमन के अधिकारियों ने टिप्पणी नहीं की है .

टॉमी थॉमस ने सजा के बाद निमिषा से कहा कि वो उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे हैं.
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'ब्लड मनी ही है विकल्प'

सेव निमिषा काउंसिल की वाइस चांसलर और सामाजिक कार्यकर्ता दीपा जोसेफ़ ने कहा, "महदी के परिवार से माफी मांगना और ब्लड मनी देना ही एकमात्र विकल्प है."

ब्लड मनी उस धन को कहा जाता हो जो माफी के बदले पीड़ित परिवार को देना होता है.

केरल के एक विख्यात कारोबारी ने इसके लिए एक करोड़ की राशि देने की बात कही है. काउंसिल का मानना है कि केरल के लोग और बाहर रहने वाले लोग भी इसके लिए मदद करेंगे.

यमन के सुप्रीम काउंसिल ने जब निमिषा की याचिका ठुकराई थी तो थॉमस ने उनसे (पत्नी) बात की थी. वो परेशान थीं.

थॉमस ने कहा, "मैंने उसे साहस देने की कोशिश की और कहा कि वो उनकी जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन इस पर उसने पूछा कि मैं कैसे इसकी उम्मीद करूं."

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