उत्तर प्रदेश में मदरसों के ये शिक्षक फिर रहे हैं मारे-मारे, कोई वेल्डिंग कर रहा है तो कोई सिलाई कढ़ाई

निगहत बानो
इमेज कैप्शन, निगहत बानो का कहना है कि आठ साल से केंद्र सरकार से उन्हें मानदेय नहीं मिल रहा है.
    • Author, सैयद मोज़िज इमाम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में आधुनिक शिक्षा के लिए मदरसों में रखे गए शिक्षकों का मानदेय पिछले कई सालों से रुका हुआ है. राज्य सरकार ने भी अपना हिस्सा देना बंद कर दिया है.

राज्य में ऐसे क़रीब 7442 मदरसे हैं, जिनमें 22,000 अध्यापक पढ़ा रहे थे.

इन शिक्षकों को अंग्रेज़ी, गणित, विज्ञान और हिन्दी पढ़ाने के लिए रखा गया था. ये स्कीम 1993-94 में शुरू की गई थी, जिसमें 60 फ़ीसदी ख़र्च भारत सरकार को और 40 फ़ीसदी राज्य सरकार को देना था.

यूपी के मदरसों में आधुनिक शिक्षा के लिए नियुक्त शिक्षकों के मानदेय में केंद्र सरकार का अंश 2017 से और राज्य का अंश 2022-2023 से नहीं मिल रहा है.

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अब इन शिक्षकों के साथ-साथ यहाँ पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य अधर में है. आधुनिक मदरसा शिक्षकों के सामने रोज़गार का भी संकट खड़ा हो गया है.

मदरसा शिक्षकों ने दावा किया है कि कई शिक्षकों ने पढ़ाना छोड़कर कोई दूसरा रोज़गार कर लिया है.

कुछ मदरसों की प्रबंधन समिति थोड़े पैसे देकर इन शिक्षकों का काम चला रही है ताकि बच्चों का भविष्य न ख़राब हो लेकिन ये पैसा इतना कम है कि कोई काम करने के लिए तैयार नहीं है.

कई शिक्षकों ने कहा है कि उनकी उम्र निकल गई है और अब वो और कुछ नहीं कर सकते हैं. योजना के मुताबिक़, अरबी उर्दू मदरसे में आधुनिक शिक्षा देने की बात थी ताकि बच्चे इससे महरूम ना रह जाएं.

प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बीबीसी से कहा कि सरकार इस मामले के समाधान के लिए लगातार केंद्र सरकार से बातचीत कर रही है.

क्या कहते हैं शिक्षक?

मोहम्मद उबैद ख़ान
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बीबीसी ने देवीपाटन मंडल के कई मदरसों में जाकर स्थिति जानने की की कोशिश की है. इस दौरान कई ऐसे भी शिक्षक मिले, जो पढ़ाई का काम छोड़कर दूसरे कामों में लग गए हैं.

निगहत बानो गोंडा ज़िले के वीरपुर में खुर्शीदुल इस्लामिया मदरसे में आधुनिक शिक्षक हैं. वे वर्ष 2011 से मदरसे में पढ़ा रही हैं.

इनकी ज़िम्मेदारी है कि ये बच्चों को अंग्रेज़ी, हिन्दी, गणित और विज्ञान की बुनियादी शिक्षा दें.

लेकिन इनका कहना है कि आठ साल से केंद्र सरकार से उन्हें मानदेय नहीं मिल रहा है. राज्य सरकार ने भी क़रीब डेढ़ साल से अपना हिस्सा देना बंद कर दिया है.

इस मदरसे में ग़ैर मुस्लिम छात्र भी हैं. निगहत का कहना है कि मदरसे में ग़ैर मुस्लिम छात्रों को अरबी उर्दू की क्लास के दौरान अंग्रेज़ी और हिन्दी की अतिरिक्त शिक्षा दी जाती है.

गोंडा के ही कटरा बाज़ार में मदरसा मक़बूल मुस्लिम आवामी स्कूल में राबिया बानो आधुनिक शिक्षक हैं. राबिया बानो एमए तक पढ़ी हैं और 12 साल से इस मदरसे में पढ़ा रही हैं.

राबिया बानो ने बताया, "मदरसे वाले चंदा करके हज़ार-दो हज़ार महीने में दे देते हैं, लेकिन इससे गुज़ारा नहीं होता है. इस कारण मदरसे से छुट्टी मिलने के बाद सिलाई-कढ़ाई का काम करती हूं."

मोहम्मद उबैद ख़ान भी एमए बीएड हैं और इत्तेहादुल मुस्लिमीन मदरसे में पढ़ा रहे हैं.

वो कहते हैं, "अब इस काम के अलावा कोई काम नहीं कर सकता. ख़ाली वक़्त में ट्यूशन पढ़ाता हूं, लेकिन सरकार को धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए."

उबैद का कहना है, "जिस तरह महाराष्ट्र सरकार ने मानदेय बढ़ाया है, यहाँ की सरकार कम से कम बकाया ही दे दे या कहीं समायोजित कर दे."

नाउम्मीद में शिक्षक

आफ़ताब अहमद अंसारी

आधुनिक मदरसा शिक्षक संघ के प्रदेश महासचिव आफ़ताब अहमद अंसारी का दावा है कि "कई शिक्षक अवसाद में चले गए हैं और कई कुछ और काम करने लगे क्योंकि मानदेय नहीं मिलने से उनकी माली हालत खस्ता हो गई थी."

बीबीसी को ऐसे कुछ शिक्षक मिले, जो दूसरा काम करने लगे हैं. इनमें से एक मोहम्मद मसूद हैं, जो रफ़ीकुल इस्लाम मदरसा कटरा बाज़ार में पढ़ाते थे. ये गोंडा ज़िले में है.

मानदेय ना मिलने से उन्हें दूसरी तरफ़ रुख़ करना पड़ा और अब वो अपने भाई की परचून की दुकान में मदद करते हैं.

मसूद का कहना है, "कब तक सरकार का इंतज़ार किया जाए. घर का ख़र्च चलाने के लिए दुकान पर बैठना मजबूरी है."

मोहम्मद आसिम अंसारी भी आधुनिक मदरसा शिक्षक थे लेकिन अब वो घर का ख़र्च चलाने के लिए वेल्डिंग का काम करते हैं.

जब बीबीसी की टीम उनसे मिली तो वो ग्रिल बना रहे थे. उनका कहना था, "बिना मानदेय काम करने से ये ज़्यादा अच्छा है कि अपना कोई काम किया जाए."

मदरसों में बिना फ़ीस के पढ़ाई होती है और ग़रीब तबके के बच्चे शिक्षा हासिल करते हैं.

कई मदरसों के संचालकों ने कहा कि वो किसी तरह पैसे जमा करके इन शिक्षकों को रोके हुए हैं ताकि बच्चों को आधुनिक शिक्षा मिलती रहे.

क़ैसर जहां के बच्चे रफीकुल इस्लाम मदरसे में पढ़ते हैं. उनका कहना है कि मदरसे में 'दीनी और उर्दू की तालीम के साथ आधुनिक शिक्षा बिना किसी फ़ीस' के मिल रही है.

उनके अनुसार, लेकिन अगर ये बंद हो जाए, तो ग़रीब लोगों के बच्चों के सामने संकट खड़ा हो जाएगा, क्योंकि सरकारी प्राइमरी स्कूल दूर हैं और वहाँ पर बच्चे उर्दू और अरबी नहीं पढ़ सकते हैं.

क्या कहना है मंत्री ओम प्रकाश राजभर का

ओम प्रकाश राजभर

प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने मदरसों पर धांधली और अवैध काम होने का आरोप लगाया है और स्कीम बंद होने के लिए उनको ही ज़िम्मेदार ठहराया है.

राजभर ने बीबीसी से कहा कि जब केंद्र सरकार ने जाँच कराई, तो कई मदरसों में गड़बड़ी पाई गई थी और क़रीब 500 से ज़्यादा मदरसों ने अपनी मान्यता ख़त्म करने का पत्र भी दिया है.

राजभर का कहना है कि मदरसा खोलने वालों ने ग़लती की, किसी ने किराए पर लिया, बच्चों की संख्या भी सही नहीं बताई और परिवार के लोगों को अध्यापक रख लिया.

उन्होंने कहा, "केंद्र सरकार जब पैसा देती है, तो जाँच भी कराती है. सरकार को लगा कि छात्रवृत्ति भी दे रही है और अध्यापक को मानदेय भी दे रही है और धांधली भी हो रही है. 513 मदरसों ने ख़ुद मान्यता रद्द करने के लिए कहा है."

राजभर के अनुसार मदरसों पर उंगली उठती रहती है. इस साल अगस्त में प्रयागराज में अतुरसुइया में एक मदरसे पर नकली नोट छापने के आरोप लगे थे.

इस मामले में कई लोग गिरफ़्तार भी किए गए थे. हालाँकि राजभर ने बताया कि राज्य सरकार प्रयास भी कर रही है कि इस बकाया मानदेय का समाधान निकल जाए.

उनका दावा किया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कई बार इस मामले को उठा चुके हैं.

विपक्ष का आरोप

मदरसा
इमेज कैप्शन, आधुनिक मदरसा शिक्षक रखने की शुरुआत 1993-94 में हुई थी.

राजभर के आरोपों पर समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता फखरूल हसन चांद का कहना है कि अगर कहीं अव्यवस्था है, तो उसके लिए बाबा साहब का संविधान है लेकिन मानदेय न देना सही नहीं है

उन्होंने कहा कि सरकार को चाहिए कि बकाया मानदेय दे. सपा नेता ने आरोप लगाया कि ओम प्रकाश राजभर जी बीजेपी के रंग में रंग गए हैं.

उन्होंने इस मामले को लेकर सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी इन शिक्षकों के साथ है.

प्रदेश कांग्रेस के संगठन महासचिव अनिल यादव का कहना है कि पिछले कई सालों से मदरसा आधुनिक शिक्षकों को वेतन नहीं मिल रहा है.

उन्होंने कहा, "यूपी सरकार तो मदरसा बोर्ड को अवैध करार करने की साज़िश में थी. बीजेपी सरकार की नीयत मुसलमानों और उनके इदारों के प्रति साफ़ नहीं रही है. अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ख़ुद मदरसों को बदनाम करने की कोशिश में लगे रहते हैं."

आधुनिक मदरसा शिक्षक रखने की शुरुआत 1993-94 में हुई थी. मानदेय बंद होने से पहले केंद्र सरकार शिक्षक की योग्यता के हिसाब से 6000-12000 रुपए तक और राज्य सरकार 2000-3000 तक देती थी.

केंद्र सरकार ने 2017 तक मानदेय दिया है, वहीं राज्य सरकार ने 2022-2023 तक अपना हिस्सा दिया है. उसके बाद इसे बंद कर दिया गया.

केंद्र पर 77,751 करोड़ का बकाया

मदरसा
इमेज कैप्शन, राज्य सरकार की ओर से केंद्र सरकार को कई पत्र लिखे गए.

राज्य सरकार का कहना है कि वो आधुनिक मदरसा शिक्षकों को पैसे दिलाने के लिए लगातार कोशिश कर रही है.

प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण राज्य मंत्री दानिश आज़ाद अंसारी ने 22 अक्तूबर को एक पत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखा है और इस योजना में आ रही कठिनाइयों का समाधान कराने की गुज़ारिश की है.

25 अप्रैल 2023 को तत्कालीन मंत्री धर्मपाल सिंह ने केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखी थी, जिसमें कहा गया था कि राज्य अपने बजट में प्रावधान कर रही है और केंद्र सरकार अगर पैसा रिलीज़ कर दे, तो इन शिक्षकों को पैसा मिल सकता है.

इससे पहले 2021 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक पत्र तत्कालीन अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी को लिखा था, जिसमें 77,751 करोड़ की बकाया धनराशि देने की मांग की गई थी और कहा गया था कि केंद्र के हिस्से का पैसा दिया जाए.

मुख्यमंत्री के पत्र से पहले 2020 में तत्कालीन प्रदेश के विभागीय मंत्री नंद गोपाल नंदी और प्रमुख सचिव ने भी इस संबध में पत्र लिखा था.

बीबीसी को तत्कालीन केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी ने बताया कि बकाया उनके मंत्री बनने से पहले का था, लेकिन उनके कार्यकाल में कुछ बकाया पैसा राज्य सरकार को दिया गया था.

यूपी में 25,522 मदरसे

प्रदेश के मदरसा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष इफ़्तिख़ार अहमद जावेद के मुताबिक़ राज्य में तकरीबन 25,522 मदरसे हैं

इनमें 16513 मदरसे मान्यता प्राप्त हैं,जबकि 8449 ग़ैर मान्यता प्राप्त हैं. इसमें 560 मदरसे सरकारी सहायता से चलते हैं जिनका पूरा ख़र्चा सरकार वहन करती है. जिनमें 10,500 स्टाफ़ को बराबर वेतन मिल रहा है.

जो मदरसे मान्यता प्राप्त या ग़ैर मान्यता प्राप्त हैं, वो दान या चंदे पर निर्भर हैं. मान्यता प्राप्त मदरसों में ही प्रति मदरसा तीन आधुनिक शिक्षक रखने का प्रावधान किया गया था.

जावेद के मुताबिक़, आधुनिक शिक्षक रखने की योजना को शायद सरकार ने समाप्त कर दिया है या नहीं किया है- इस पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है.

उन्होंने बताया कि मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने भी कई बार पत्र लिखा है, हालाँकि मदरसा बोर्ड का इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं है.जावेद का कार्यकाल इस साल सितंबर में ख़त्म हो गया है.

मदरसा शिक्षकों का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी है, लेकिन अभी फ़ैसला नहीं हो पाया है. आधुनिक मदरसा शिक्षक संघ के महासचिव आफ़ताब अहमद ने बताया कि वे सरकार से कई बार गुहार लगा चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है.

उनका कहना है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनके पक्ष में फ़ैसला किया था, लेकिन सरकार कोर्ट में चली गई.

आफ़ताब अहमद का कहना है कि ज़्यादातर शिक्षक इस आस में पढ़ा रहे हैं कि सरकार उनके लिए कोई रास्ता निकालेगी और मानदेय भी बढ़ाएगी.

उनका कहना है, "हाल में ही महाराष्ट्र सरकार ने मदरसा शिक्षकों का मानदेय तीन गुना कर दिया है, वहाँ भी एनडीए की सरकार है. कई राज्य सरकार अपने हिसाब से स्कीम को चला रही है. उत्तर प्रदेश में क़रीब 20 फ़ीसदी के आसपास मुस्लिम आबादी है, लेकिन सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है."

सुप्रीम कोर्ट ने मदरसों पर क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट

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इमेज कैप्शन, सुप्रीम कोर्ट ने पांच नवंबर को उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा क़ानून, 2004 की संवैधानिक वैधता बरक़रार रखी है.

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा क़ानून, 2004 की संवैधानिक वैधता बरक़रार रखी है. साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट का फ़ैसला ख़ारिज कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने इस क़ानून को असंवैधानिक ठहराकर ग़लती की थी. हाई कोर्ट ने इसी साल इस क़ानून को असंवैधानिक बताते हुए ख़ारिज कर दिया था.

कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया था कि मदरसों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को नियमित स्कूलों में दाख़िला दिलाया जाए. उच्चतम न्यायालय ने इस आदेश पर रोक लगा दी थी.

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता फुज़ैल अहमद अय्यूबी के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश सरकार और त्रिपुरा की सरकारों ने मदरसों को बंद कराने का प्रयास किया और बच्चों को दूसरे स्कूल में भेजने के लिए कहा था.

याचिकाकर्ता जमीअत उलमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को अंतरात्मा की स्वतंत्रता प्राप्त है. अनुच्छेद 25 के तहत और अनुच्छेद 26 के तहत अल्पसंख्यकों को उनके धार्मिक शैक्षणिक संस्थानों के प्रबंधन और नियंत्रण की पूर्ण स्वतंत्रता दी गई है.

मदनी ने कहा कि 2014 में सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यीय पीठ के फ़ैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों पर लागू नहीं होगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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