पेरिस ओलंपिक: इतिहास बनाने से चूके बैडमिंटन खिलाड़ी लक्ष्य सेन

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- Author, संजय किशोर
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
पेरिस ओलंपिक में भारतीय बैंडमिटन खिलाड़ी लक्ष्य सेन को कांस्य पदक के लिए हुए मैच में मलेशिया के ली ज़ी जिया ने हरा दिया है.
मेन्स सिंगल्स के मुक़ाबले में ली ज़ी जिया ने लक्ष्य को 13-21, 21-16, 21-11 से हरा दिया है.
अगर लक्ष्य सेन यह मुक़ाबला जीत जाते तो वो मेन्स सिंगल्स में मेडल जीतने वाले पहले भारतीय पुरुष बैडमिंटन खिलाड़ी बन जाते.
इस मैच से पहले सेमीफ़ाइनल में लक्ष्य सेन को डेनमार्क के मौजूदा ओलंपिक चैंपियन विक्टर एक्सेलसेन ने 22-20, 21-14 से हराया था.
भारत के कई खिलाड़ी ओलंपिक खेलों में बैडमिंटन मेंस सिंगल्स के क्वॉर्टर फाइनल तक पहुंचे, लेकिन वो सेमीफ़ाइनल तक नहीं पहुंच पाए थे.

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फीका रहा था साल 2023
2021 के विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक विजेता सेन के लिए साल 2023 के शुरुआती छह महीने अच्छे नहीं रहे. मलेशियाई ओपन में भारत के ही एचएस प्रणॉय से वे हार गए थे.
इंडियन ओपन में प्रणॉय को हराकर लक्ष्य सेन ने बदला तो ले लिया था लेकिन फिर दूसरे राउंड में डेनमार्क के डॉन रासमुस गेमके से वे हार कर टूर्नामेंट से बाहर हो गए थे.
जर्मन ओपन में फ़्रेंच खिलाड़ी क्रिस्टिव पोपोव से भी वे हार गए थे.
ऑल इंग्लैंड ओपन में राउंड ऑफ़ 16 में भी उनके हाथ निराशा लगी. इतना ही नहीं स्विस ओपन और एशियाई बैडमिंटन चैंपियनशिप में भी उन्हें नाकामी हाथ लगी.
इस बीच पुरुष एकल में उनकी बीडब्ल्यूएफ रैंक भी 25वें स्थान पर खिसक गई थी.
इसके पीछे उनका स्वास्थ्य भी बड़ी वजह रहा. यूरोप के दौरे पर वो ‘डेविएटेड नेजल सेप्टम’ की समस्या से जूझ रहे थे.
उन्हें इसके लिए सर्जरी भी करानी पड़ी. जून में थाईलैंड ओपन के सेमीफ़ाइनल तक पहुँचने के बाद से लक्ष्य सेन वापसी करते हुए नजर आ रहे हैं.
2022 का शानदार प्रदर्शन
साल 2023 भरोसा नहीं दिला पा रहा था लेकिन साल 2022 के उनके प्रदर्शन को देखें तो बड़ी उम्मीदें दिखाई देती हैं.
2022 उनके करियर के लिए शानदार था. जनवरी में इंडियन ओपन में वर्ल्ड चैंपियन लो किन यू को हराकर अपना पहला सुपर-500 ख़िताब जीता. यूरोपियन सर्किट में भी प्रदर्शन अच्छा रहा.
ऑल इंग्लैंड और जर्मन ओपन में उपविजेता रहे. थॉमस कप फ़ाइनल में वापसी का ज़बरदस्त प्रदर्शन किया.
पहले मैच में इंडोनेशिया के एंथनी सिनीसुका गिनतिंग के ख़िलाफ़ 8-21 से पिछड़ रहे थे मगर फिर भी जीत दिला दी. मिक्स स्पर्धा में भारत के रजत पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी.
बर्मिंघम में अपने पहले ही कॉमनवेल्थ में गोल्ड मेडल जीतने के बाद उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
लक्ष्य सेन अक्टूबर 2022 में पुरुष एकल में अपने करियर के सर्वश्रेष्ठ आठवें स्थान पर पहुंच गए.
लेकिन साल 2022 के आख़िर से लक्ष्य सेन परेशानियों से घिरते चले गए. नाक के ऑपरेशन से लेकर केस-मुक़दमे में फँस गए.
एक प्रतिद्वंद्वी बैडमिंटन अकादमी ने उन पर उम्र में घपले का आरोप लगाते हुए मुक़दमा दर्ज कर दिया था.
हालाँकि अदालत से उन्हें राहत मिल गई.

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फ़ास्ट-ट्रैक करियर
लक्ष्य सेन का करियर शुरुआत में किसी एक्सप्रेस ट्रेन की तरह दौड़ा. उनके डीएनए में ही बैडमिंटन है.
उनके पिता, डीके सेन, एक राष्ट्रीय कोच हैं, जबकि उनके भाई, चिराग सेन भी बैडमिंटन खिलाड़ी हैं.
जब लक्ष्य 10 साल के भी नहीं थे तब कोच विमल कुमार को प्रभावित करने में कामयाब रहे थे.
इस गंभीर युवा खिलाड़ी की जिस बात ने विमल और प्रकाश पदुकोण को प्रभावित किया, वह यह थी कि लक्ष्य उस समय भी जीत को बहुत गंभीरता से लेते थे.
एक भी हार के बाद रोने लगते थे. प्रकाश पदुकोण अकादमी से इस युवा खिलाड़ी की बैडमिंटन यात्रा फास्ट ट्रैक पर आ गई.
अगले 6 वर्षों में लक्ष्य सेन ने अंडर-13, अंडर-17 और अंडर-19 राष्ट्रीय टूर्नामेंट आसानी से जीते.
आश्चर्य की बात यह थी कि जब उन्होंने अंडर-19 राष्ट्रीय पदक हासिल किया तब उनकी उम्र महज 15 वर्ष थी.
लक्ष्य ने विश्व मंच पर जीत का पहला स्वाद 2014 में चखा जब वह स्विस जूनियर इंटरनेशनल में विजयी हुए. इस सफलता के बाद, उन्होंने जूनियर सर्किट में लगातार सुर्खियां बटोरना जारी रखा.
उनका करियर ग्राफ़ फरवरी 2017 में अपने चरम पर पहुंच गया जब उन्होंने जूनियर विश्व नंबर 1 रैंकिंग हासिल की.
वर्ष 2018 युवा शटलर के लिए ख़ास था जब उन्होंने जूनियर एशियाई ख़िताब और अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में युवा ओलंपिक खेलों में रजत पदक जीता.
महज 22 साल की उम्र में अपने शानदार रिकॉर्ड के बावजूद, उन्हें काफी असफलताओं का सामना करना पड़ा, पीठ की चोट के कारण टोक्यो ओलंपिक से चूक गए और महामारी से प्रभावित बैडमिंटन कैलेंडर में सीमित अवसर मिले.

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उतार-चढ़ाव भरे साल 2023 को दरकिनार करते हुए, किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि लक्ष्य ने बार-बार साबित किया है कि वह एक ताक़त हैं.
लक्ष्य सेन की प्रतिभा से उम्मीद बनती है कि वह प्रकाश पदुकोण और पुलेला गोपीचंद के बाद भारत के अगले विश्व नंबर 1 हो सकते हैं.
उनमें कई अनोखी खूबियाँ हैं. उनके पास एक अच्छी हिट है. वह अपनी प्रहार शक्ति से प्रतिद्वंद्वी को हैरान कर देते हैं.
अल्मोड़ा के हिमालय के कठिन पहाड़ी इलाकों में पले-बढ़े रहने के कारण लक्ष्य शारीरिक रूप से बेहद सक्षम हैं. बिना थके कई घंटों तक लगातार अभ्यास कर सकते हैं.
पिछले क़रीब एक दशक में विश्व मंच पर भारतीय बैडमिंटन की धमक देखी जा सकती है.
हालाँकि, एशियाई खेलों के 72 साल के इतिहास में भारत के 155 स्वर्ण पदकों की कुल प्रभावशाली संख्या में बैडमिंटन का स्वर्ण पदक शामिल नहीं है.
ना ही ओलंपिक में कोई ऐसा पुरुष खिलाड़ी हुआ है जिसने यह कारनामा कर दिखाया हो.
देश उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहा है जब भारतीय बैडमिंटन सितारे उस चमकती पीली धातु को हासिल करेंगे.
पिछले एशियाई खेलों में, भारत ने बैडमिंटन में दो पदक जीते थे. पीवी सिंधु ने रजत और साइना नेहवाल ने कांस्य पदक जीता था.
वहीं अगर ओलंपिक की बात करें तो टोक्यो ओलंपिक में पीवी सिंधु ने बिंग जियाओ का हराकर देश के लिए कांस्य पदक जीता था.
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