इस विषय के अंतर्गत रखें जुलाई 2010

साफ़गोई और बड़बोलेपन के बीच कैमरन

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|शनिवार, 31 जुलाई 2010, 21:19

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ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कपिल देव की गेंद पर छक्का जड़कर अपने बचपन की दबी इच्छा को तो पूरा किया ही, वो पाकिस्तान पर भी छक्का जड़ने से बाज़ नहीं आए. मेज़बान के सामने भी वो वही बोले जो वो सुनना चाहते थे....शायद कोहिनूर को छोड़कर.

कंज़रवेटिव कैमरन के उदगार पाकिस्तान और ब्रिटेन में उनके 'लेबर' प्रतिद्वंदियों को ज़रूर नागवार गुज़रे लेकिन भारत में उनको सरल और स्पष्टवादी कहकर हाथों हाथ लिया गया. राजनैतिक टीकाकारों में ये बहस छिड़ी कि कैमरन के इन विचारों को उनकी 'अनुभवहीनता' का तकाज़ा माना जाए (वो सिर्फ़ 43 साल के हैं) या कूटनीति के प्रति उनके निर्भीक रवैये का.

मज़े की बात ये है कि कैमरन ने अपने वक्तव्यों से फिरने की कोशिश नहीं की बल्कि मनमोहन सिंह की उपस्थिति में उन्हें बार-बार दोहराया. कोहिनूर के मुद्दे पर भी कैमरन ने किसी लाग-लपेट से काम नहीं लिया. जब उनसे पूछा गया कि भारत उनसे कब इस हीरे को पाने की कोशिश कर सकता है, कैमरन ने कहा कि अगर वो इस मांग को हां भी कर दें, तो ऐसा सिलसिला शुरू हो जाएगा कि कुछ दिनों में पूरा का पूरा ब्रिटिश म्यूज़ियम खाली हो जाएगा. इसलिए कोहिनूर को वहीं रहने दीजिए, जहां वो इस समय मौजूद है.

कैमरन की ये साफ़गोई लेबर नेता डेविड मिलिबैंड के भी गले नहीं उतरी. उन्होंने कहा कि स्पष्टवादिता एक चीज़ है और बड़बोला होना दूसरी चीज़. वो इस हद तक गए कि बोले कि कैमरन को ये पता होना चाहिए कि हमारे पास एक मुंह और दो कान हैं और हमें उसी अनुपात में उनका इस्तेमाल करना चाहिए.

मिलिबैंड जो कुछ भी कहें, लेकिन कैमरन के शब्द उनके मेज़बानों के कानों को बहुत सुरीले लगे. उन्होंने कश्मीर में मध्यस्थता की बात नहीं की, दिल्ली के नेशनल स्टेडियम को विश्व स्तर का स्टेडियम बताया और भारत की ज़बर्दस्त विकास दर की तारीफ़ की.....बदले में भारत ने 57 हॉक्स ख़रीदने के समझौते पर दस्तख़त किए और ये वादा भी किया कि पांच सालों में वो भारत-ब्रिटेन व्यापार को दोगुना कर देंगे.

हां, कैमरन को सोनिया गांधी और राहुल गांधी से न मिल पाने का अफ़सोस ज़रूर रहा क्योंकि दोनों को अचानक सोनिया की मां पाओलो मेनो को देखने न्यूयॉर्क जाना पड़ा जोकि वहां अपना इलाज करा रही हैं.

बेड़ा ग़र्क़ होने का सुख

विनोद वर्माविनोद वर्मा|शुक्रवार, 30 जुलाई 2010, 12:32

टिप्पणियाँ (29)

मणिशंकर अय्यर भारत के खेल मंत्री रह चुके हैं. राज्यसभा के सदस्य हैं लेकिन कांग्रेस की ओर से नहीं. राष्ट्रपति ने उन्हें लेखक और बुद्धिजीवी के रुप में मनोनीत किया है. इस पर भी विवाद हुआ लेकिन वह ख़त्म हो गया.

लेकिन नया विवाद उनके बयान को लेकर है जो ख़त्म ही नहीं हो रहा है. इस बार उन्होंने कह दिया कि वे चाहते हैं कि राष्ट्रमंडल का बेड़ा ग़र्क़ हो जाए.

पहले सरकार सोच रही थी कि कुछ चरमपंथी संगठन ऐसा सोच रहे हैं लेकिन मणिशंकर अय्यर के बयान ने उसे सदमा दे दिया.

इसी सरकार की सिफ़ारिश से उन्हें 'मैन ऑफ़ लेटर्स' कोटे से राज्यसभा में मनोनीत किया गया है इसके लिए सरकार उनकी बातों की गुणवत्ता पर टिप्पणी नहीं कर पा रही है.

शायद सरकार ने उनकी पहले कही गई बातों से प्रभावित होकर उन्हें मनोनीत किया था. मंत्री रहते हुए एक बार उन्होंने कह दिया था कि 'यह सरकार आम आदमी की सरकार नहीं'. वे पहले भी कह चुके हैं कि 'खेलों का आयोजन पैसों की बर्बादी है'.

लेकिन इस बार तो हद हो गई. उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि राष्ट्रमंडल यानी कॉमनवेल्थ गेम्स विफल हो जाएँ क्योंकि यदि ये सफल हो गए तो सरकार एशियाड और ओलंपिक करवाने की बात करेगी.

इतनी बात सुनकर किसी को ग़ुस्सा आ सकता है कि ये आदमी कितना राष्ट्रविरोधी है, जैसा कि ओलंपिक एसोसिएशन के प्रमुख सुरेश कलमाड़ी को आया.

लेकिन जब मणि कहते हैं कि इस आयोजन पर जितना ख़र्च हो रहा है उतने से कितने स्कूल बनवाए जा सकते थे, तो लगता है कि बात ग़लत नहीं है.

जब वे पूछते हैं कि उदघाटन और समापन समारोह में 'ऐश्वर्या राय को ठुमके लगवाने' में तीन सौ करोड़ रुपए ख़र्च करने की क्या ज़रुरत है, तो लगता है कि इस सवाल में थोड़ा तो दम है.

खेलों के आयोजन से देश की शान बढ़ती होगी पर यह पता नहीं कि इस बढ़ी हुई शान में आम लोगों को कितना हिस्सा मिलता है.

लेकिन देश में ग़रीबों की बढ़ती संख्या, कुपोषित बच्चों की बढ़ती संख्या पर संयुक्त राष्ट्र की चिंता, लोगों को पीने का साफ़ पानी न मिलने की वास्तविकता और बच्चों के लिए स्कूलों का अभाव देशवासियों को शर्मिंदा करता है यह सबको पता है.

जब शान बढ़ती है तो सरकारों और उसके कर्णधारों की शान बढ़ती है. लेकिन जब शर्मिंदगी की बारी आती है तो वह देशवासियों के हिस्से आती है. 1947 से अब तक का इतिहास गवाह है कि सरकारें इस शर्मिंदगी को अनदेखा कर देती हैं.

खेल मंत्री स्वीकार कर रहे हैं कि खेलों के आयोजन का ख़र्च अनुमान से दोगुना हो चुका है और अभी ख़र्च जारी है.

ऐसे में मणिशंकर की बातें यदि बहुत से लोगों को अपने दिल की बात की तरह महसूस होती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं.

शायद दिल्ली से बाहर रहने वाले लोगों को बहुत अंदाज़ा न हो लेकिन जो दिल्ली में रह रहे हैं वो जानते हैं कि मणिशंकर अय्यर तो सिर्फ़ चाह रहे हैं कि राष्ट्रमंडल खेलों का बेड़ा ग़र्क़ हो जाए लेकिन देश के बहुत से हुक्मरान दिलोजान से कोशिश कर रहे हैं कि सच में इसका बेड़ा ग़र्क़ हो जाए.

कुछ तो सीखिए

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|मंगलवार, 27 जुलाई 2010, 14:13

टिप्पणियाँ (51)

मुझे दुख होता है कि जब किसी देश में यह ख़बर आती है कि फ़लां सेनाध्यक्ष को नौकरी से निकाल दिया गया या फ़लां जनरल का कोर्ट मॉर्शल हो गया.

अब बांगलादेश को ही लीजिए. आज़ादी के 39 बरस में 15 जरनलों को सेनाध्यक्ष का पद दिया गया. सेनाध्यक्ष रहते हुए उन में से तीन के कान पकड़ कर राजनैतिक सरकार ने नौकरी से निकाल दिया और दो सेनापतियों की हत्या हो गई. उस का नुक़सान यह हुआ कि शेख़ हसीना और ख़ालिदा ज़िया आपस में लड़ती रहती हैं और कोई बीच बचाव कराने वाला नहीं होता.

भारत में भी वर्तमान कुछ अच्छा नहीं है. 63 साल में मजाल है किसी एक चीफ़ को भी इस क़ाबिल समझा गया हो कि उन्हें फुल एक्सटेन्शन दे दी जाए. केवल एक ऐसा उदारहण है कि जब उदारता का सुबूत देते हुए श्रीमती गाँधी ने फ़ील्ड मॉर्शल मानेक शाह को छह महीने की एक्सटेन्शन दी थी. वह भी इसलिए कि उन्होंने बांगलादेश बनवा कर दिया था.

बाद में आने वाली सरकारों ने तो इतनी मुर्रवत भी न दिखाई. 1998 में वाजपेयी सरकार ने चेयरमैन ज्वाइंट चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ कमेटी चीफ ऑफ़ नेवल स्टाफ़ को केवल इस बात पर घर भिजवा दिया कि उन्होंने सरकारी फ़ैसले पर अमल न करते हुए एक एडमिरल को अपना डिप्टी बनाने से इंकार कर दिया था.

मनमोहन सरकार तो इस मामले में वाजपेयी सरकार से भी दो हाथ आगे निकल गई. 2008 में एक मेजर जनरल की नौकरी इस बात पर तेल हो गई कि वे एक महिला कैप्टेन को योगा सिखाते सिखाते गोया कुछ ज़्यादा ही सिखा गए.

फिर 2009 में दार्जिलिंग में फौजी ज़मीन के तीन एकड़ अपने दोस्त को अलॉट करने के आरोप में एक लेफ़्टिनेंट जनरल और एक मेजर जनरल का कोर्ट मॉर्शल कर उन्हें निकाल दिया गया.

एक लेफ़्टिनेंट जनरल के ख़िलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई और एक अन्य की बतौर डिप्टी चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ की नियुक्ति रोक दी गई.

भला यह कैसा लोकतंत्र है जहाँ नेता जो चाहे कर गुज़ारें और बच निकलें. और एक बेचारे जनरल से ज़रा भी ग़ल्ती हो जाए या कोई ऊंधी सीधी बात मूँह से निकल जाए तो उसे घर भेज दिया जाए.

इस से पाकिस्तान अच्छा है जहाँ कई चीफ़्स ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ ने सिविलयन सरकार की नीतियों की आलोचना की लेकिन सरकारों ने उफ़ न ही. क्योंकि उन का मानना था कि जनरल और नेता एक ही सिक्के के दो रुख़ हैं और दोनों ही जनता के विकास और रक्षा को प्रीय रखते हैं.

इसलिए एक दूसरे के साथ साथ बराबरी से चलना चाहिए. इस सफर में कभी कोई आगे पीछे भी हो जाए तो बुरा नहीं मानना चाहिए.

इसलिए पाकिस्तान में चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ से कभी ज़बरदस्ती नहीं की जाती. उन से तीन साल बाद पूछा जाता है कि हुज़ूर रिटायर होना पसंद करेंगे या जनता की ओर सेवा करने के लिए पदे पर रहेंगे. यही रवैया है असल में लोकतंत्र का.

इसी मिसाली तालमेल के कराण पाकिस्तान में 63 सालों के भीतर केवल 14 चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ आए और भारत को 63 सालों में 26 चीफ़्स ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ लाने पड़े.

अगर भारतीय सरकारें भी अपने चीफ़्स को नेताओं के बराबर सम्मान देतीं और उन्हें अपने बराबर बिठातीं तो आज उसे यह दिन न देखना पड़ता कि यही फैसला नहीं हो पा रहा कि माओवादियों से कैसे निपटा जाए. राजैनिक तरीक़े या बमबारी करके....

खेलों का आयोजन और जवाबदेही

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|शुक्रवार, 23 जुलाई 2010, 15:00

टिप्पणियाँ (13)

गु़स्सा, लालच और ज़िम्मेदारी दूसरे पर डालना. ये सब राष्ट्रमंडल खेलों में इन दिनों दिखाई पड़ रहा है.

दिल्ली में ये खेल आयोजित होने में अब ढाई महीने से कम का समय बचा है मगर हर रोज़ इससे जुड़ी परेशानियों की ख़बरें मीडिया में चर्चा हैं.

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अब खेलों से जुड़े निर्माण कार्य में लगे इंजीनियरों को लॉलीपॉप थमाया है कि अगर समय से काम पूरा हो जाए तो उन्हें एक महीने का वेतन अलग से दिया जाएगा.

वहीं दूसरी ओर दिल्ली के सार्वजनिक निर्माण कार्य मंत्री राजकुमार चौहान सड़क पर लगे पत्थर हाथ से निकालने में क़ामयाब रहे. काम का स्तर कैसा है ये इसी से पता चलता है.

दिल्ली की सड़कों पर फ़ुटपाथ कई जगह खुदे पड़े हैं और कई जगह तो आपको उसके इर्द-गिर्द कोई काम होता भी नहीं दिखता जिससे लगे कि चलो कुछ दिन में सब सही हो जाएगा.

काम पूरा हो जाए तो इंजीनियरों को एक महीने का वेतन अतिरिक्त मिलेगा मगर उस काम का स्तर कैसा होगा इस पर पता नहीं कैसे नज़र रखी जाएगी.

कदरपुर शूटिंग रेंज और यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में परेशानियों की ख़बरें पहले ही अख़बारों में आ चुकी हैं.

कहाँ तक तो इसे लेकर अधिकारियों को चिंतित होना चाहिए तो उस पर प्रतिक्रिया ये है कि चलिए अभी परेशानियाँ सामने आ गईं, हम उन्हें ठीक कर लेंगे और खेलों के समय सब सही हो जाएगा.

खेलों का बजट सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता ही चला जा रहा है. पैसा 'देश की प्रतिष्ठा' के नाम पर पानी की तरह बहता दिख रहा है और उसकी जवाबदेही कब तय होगी इसका कोई अंदाज़ा भी नहीं.

पैसा वापसी का एक ज़रिया था कि बड़ी संख्या में खेलों के प्रायोजक मिलें. मगर प्रायोजक पाने की स्थिति ये है कि सरकारी उपक्रमों से कहा जा रहा है कि वे प्रायोजन करने आगे आएँ.

ये बात मेरी समझ से अब भी बाहर है कि ये सारी तैयारी कुछ और पहले क्यों नहीं शुरू की जा सकती थी.

मैं मानता हूँ कि अब इस पर बहस करके काम को रोका नहीं जा सकता मगर इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों की ज़िम्मेदारी तय करके कम से कम आगे के लिए एक सही संकेत तो दिया ही जा सकता है.

भाषा का ध्यान रखें श्रीमान!

विनोद वर्माविनोद वर्मा|मंगलवार, 20 जुलाई 2010, 13:01

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एक पुराना क़िस्सा है. अकबर और बीरबल का.

एक बहुत बड़ा विद्वान अकबर के दरबार में पहुँचा. उसे बहुत सी भाषाएँ आती थीं. उसने चुनौती रखी कि अकबर के दरबार में कोई बताए कि उसकी मातृभाषा क्या है. किसी को कुछ नहीं सूझा. बीरबल की बारी आई तो उन्होंने कहा कि वे अगली सुबह इसका जवाब देंगे.

ठिठुराने वाली ठंड की रात में बीरबल ने सोते हुए विद्वान पर ठंडा पानी फेंक दिया और वह विद्वान उठ कर अपनी मातृभाषा में गालियाँ बकने लगा.

अकबर को जवाब मिल गया था.

कहने का अर्थ यह कि खीझ और ग़ुस्से में, बेचारगी और लाचारगी में आदमी अपनी सारी विद्वत्ता भूल कर अपनी मातृभाषा बोलने लगता है.

अब कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह को ही लीजिए. वे बड़े ज़हीन से लगते हैं. लेकिन इन दिनों आम सभाओं में अपनी वल्दियत बताते फिर रहे हैं, "मैं बलभद्र सिंह की औलाद हूँ."

इतने पर ही चुप हो जाते तो क्या था. वे भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी से उनकी वल्दियत पूछ रहे हैं, "वो शिवाजी की औलाद हैं या महाराणा प्रताप की?"

ग़लती दिग्विजय सिंह अकेले की नहीं है. उनको ग़ुस्सा ख़ुद गडकरी जी ने दिलाया था. उन्होंने ही पहले पूछा था, "उन्हें बताना चाहिए कि वे शिवाजी और महाराणा प्रताप की औलाद हैं या फिर औरंगज़ेब की?"

अब यह पता नहीं चल रहा है कि गडकरी जी को ग़ुस्सा किसने दिलवाया और किस बात पर दिलवाया.

इससे पहले वे कांग्रेस से पूछ चुके हैं कि 'अफज़ल गुरू कांग्रेस का दामाद तो नहीं?' उससे और पहले वे लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव को अपने 'वाकचातुर्य' का निशाना बना चुके हैं.

उन्होंने दोनों नेताओं के बारे में टिप्पणी की थी, "वे पहले शेर बनते थे फिर वे सोनिया गांधी के तलवे चाटने लगे." उन्होंने शायद एकाध शब्द कुछ और कहा था.

मोहल्ले के नल पर होने वाली लड़ाइयाँ अक्सर इसी तरह के वाक-युद्ध तक पहुँच जाती हैं. सीमाएँ टूट जाती हैं.

लेकिन ये नितिन गडकरी जी को क्या हुआ?

इससे पहले ऐसे कुछ लक्षण नरेंद्र मोदी के भीतर दिखाई दिए थे जब वे सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर टिप्पणियाँ करते थे. लेकिन इन दिनों वे संयम के साथ बोलते हैं.

लालू प्रसाद यादव को लठ्ठमार भाषा का ज्ञाता कहा जाता है. उन्होंने अपने मुहावरे कुछ इस तरह से गढ़े कि भाषा के खुरदुरेपन की वजह से वे कम पढ़े लिखे मसखरे की तरह नज़र आते रहे. लेकिन उनकी ज़ुबान का इस तरह से फिसलना याद नहीं पड़ता. वे मज़ाक में कह सकते हैं, "हम बिहार की सड़कों को हेमामालिनी के गालों की तरह चिकना बनवा देंगे." लेकिन अपमानजनक टिप्पणियाँ करते उन्हें देखा नहीं.

भाषा के मामले में अपने तमाम खुरदुरेपन के बावजूद पहले पहलवान रहे मुलायम सिंह यादव भी संयत ही दिखे.

मुलायम सिंह के चेले रहे अमर सिंह भी अपनी टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने अपने बयानों में सड़क छाप शेरों का लाख उपयोग किया हो, भाषा को अपने क़ाबू में ही रखा.

कई लोगों को मायावती की भाषा गड़ती है. लेकिन वे भी अपनी बात 'माननीय' से ही शुरु करती हैं. ख़त्म चाहे जैसी होती हो. याद नहीं पड़ता कि मायावती ने बेहद नाराज़गी में भी अपना आपा खोकर कुछ ऐसा कहा हो, जिससे लगा हो कि यह मर्यादित नहीं.

निजी तौर पर, दोस्तों और अपनों के बीच नेता जिस भाषा में बात करते हैं उसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता. न लिखा जा सकता है और न मंच से दोहराया जा सकता है.

इसलिए नितिन गडकरी को निजी और सार्वजनिक का फ़र्क समझना होगा. उनका जवाब देते हुए दिग्विजय सिंह को भी संयम बरतना होगा.

लोकतंत्र में अपने नेताओं से गरिमा की उम्मीद करना आम जनता का हक़ है.

कृष्णा क़ुरैशी बैठक

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|शुक्रवार, 16 जुलाई 2010, 18:43

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कौन माई का लाल कहता है कि एसएम कृष्णा और शाह महमूद क़ुरैशी का वार्तालाप सफल नहीं रहा. पहली बार ऐसा हुआ कि एसएम कृष्णा इस्लामाबाद के बेनज़ीर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरे तो उन के स्वागत के लिए नया क़ालीन बिछाया गया.

दोनों विदेश मंत्रियों ने इस बात पर सहमति जताई कि डिनर में जो खाने परोसे गए वह स्वादिष्ट थे और इसी तरह से खानों से दोनों देशों के बीच विश्वास और बढ़ेगा.

जिस गाड़ी में शाह महमूद क़ुरैशी और एसएम कृष्णा राष्ट्रपति ज़रदारी और प्रधानमंत्री गिलानी से मिलने गए उस गाड़ी के एसी की ठंडक की मेहमान विदेश मंत्री ने प्रशंसा की और प्रस्ताव दिया कि इस तरह से एसी बनाने वाली फैकट्री में साझा निवेश में भारत और पाकिस्तान के बीच आर्थिक संबंधों को बढ़ावा मिल सकता है.

शाह महमूद क़ुरैशी ने श्री कृष्णा की भावनाओं की प्रशंसा करते हुए प्रस्ताव दिया कि इस परियोजना के लिए एमओयू की स्क्रिप्ट को अगली मुलाक़ात में डिस्कस किया जा सकता है.

जब दोनों विदेश मंत्री संयुक्त प्रेस कांफ़्रेस करने के लिए पाँच घंटे पत्रकारों को इंतिज़ार कराने के बाद मुस्कराते हुए हॉल में पहुँचे तो एक कर्मचारी ने मुझे एक कोने में ले जा कर बताया कि कृष्णा-क़ुरैशी बातचीत इसलिए लंबी हो गई क्योंकि इस में बहुत सा एजेंडा कवर किया गया.

मसलन जिस मेज़ के इर्द गिर्द दोनों प्रतिनिधिमंडल बैठे उस की बनावट विस्तार से डिस्कस की गई. कृष्णा जी यह भी जानना चाहते थे कि क़ुरैशी साहब चाय में दो चम्मच चीनी किस लिए डालते हैं.

उस अवसर पर क़ुरैशी साहब ने यह प्रस्ताव दिया कि अगली बार जब भी भारत और पाकिस्तान के डेलीगेशन मिलेंगे तो दोनों डेलीगेशन के लोग बग़ैर चीनी के चाय पिएँगे ताकि दक्षिण एशिया से ग़रीबी के ख़ात्मे के लिए ग़ैर-ज़रूरी ख़र्चों में कमी की शुरुआत हो सके.

मैंने उस कर्मचारी से कहा कि मगर हम तो समझ रहे थे कि मुंबई, कश्मीर, आतंकवाद, अफग़ानिस्तान, सियाचिन, सर क्रीक, न्यूक्लियर...... उस कर्मचारी ने मेरी बात काटते हुए कहा, ओहो... आप पत्रकार लोग जब भी सोचेंगे बुरा ही सोचेंगे... अरे भाई यह कोई डिस्कस करने की बातें हैं. हज़ार बार तो इन विषयों पर बात हो चुकी है. इंडिया को इस बारे में पाकिस्तान का पक्ष मालूम है और पाकिस्तान को इंडिया का. तो फिर समय बरबाद करने का क्या मतलब? भला डेडलॉक तोड़ने का इस से अच्छा एजेंडा और क्या हो सकता था जो कृष्णा क़ुरैशी ने डिस्कस किया.....

हाँ, तो मैं आप को बता रहा था कि दोनों शिष्टमंडलों ने इस बात पर भी सहमति जताई कि सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए अगली समग्र वार्ता में रवि शंकर और मेंहदी हसन को भी शामिल किया जाए.... और राग बागेश्वरी और झंजोटी को आम करने के लिए दोनों देशों.....

(माफी चाहता हूँ मैं उस कर्मचारी की पूरी बात नहीं सुन सका क्योंकि प्रेस कॉंफ़्रेंस ख़त्म होने से पहले ही मीडिया चाय की मेज़ की तरफ लपक चुका था. और दोनों विदेश मंत्रियों के चेहरे फ्लैश गनों की लपक झपक में टिमटिमा रहे थे.)..

विश्व कप का असली हीरो...

सुशील झासुशील झा|सोमवार, 12 जुलाई 2010, 13:38

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विश्व कप समाप्त हो गया.....और ऑक्टोपस की डिश खाने की इच्छा रखने वालों को संतरे के जूस से संतोष करना पडा है..

कप ले गए पहली बार जीतने वाले स्पेन के खिलाड़ी लेकिन असली हीरो कौन है इस पर बहस की पूरी गुंजाइश है.

आप समझ गए होंगे मैं पॉल द ऑक्टोपस की बात कर रहा हूं. विश्व कप की ऐसी कोई ख़बर नहीं जिसमें पॉल का ज़िक्र न हो.

ट्विटर पर अमिताभ बच्चन से लेकर शशि थरुर, युवराज सिंह, करण जौहर और शेखर कपूर भी पॉल से प्रभावित हैं.

अमिताभ लिखते हैं जय पॉली बाबा की और युवराज सिंह कहते हैं पॉली तुसी ग्रेट हो. शेखर कपूर ट्विट करते हैं कि पॉल को अब हेज़ फंड मैनेजर की नौकरी ज़रुर मिल जाएगी...

वैसे फुटबॉल और खिलाड़ियों के अलावा विश्व कप के दौरान पॉल, वुवुजेला, पराग्वे की मॉडल (जो टीम जीतने पर बिना कपड़ों के दौड़ने वाली थीं) और माराडोना अधिक चर्चा में रहे.

मैचों की स्तर पर जाएं तो कुछेक मैचों को छोड़कर स्तर पर भी बहस हो सकती है.....लेकिन फिलहाल पॉल द ऑक्टोपस..

ऑक्टोपस अष्टावक्र की भांति विद्वान हैं और मात्र दो वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपने ज्ञान का पूरी दुनिया से (केवल भारतीय मीडिया नहीं) लोहा मनवाया है.

महान पॉल ने साबित कर दिया है कि पश्चिमी देशों में भी भविष्य जानने को लेकर उतनी की उत्कंठा है जितनी भारत या कथित रुप से पिछड़े देशों में. स्पेन को ही नहीं हम सभी को पॉल पर गर्व होना चाहिए.

कम से कम अब विकसित देश हमारी तरफ़ ऊंगली उठाकर नहीं कहेंगे कि भारत में लोग बड़े अंधविश्वासी होते हैं.

ये पॉल की बड़ी उपलब्धि है और कम से कम इस उपलब्धि के लिए ही सही उन्हें गोल्डन बूट दिए जाने चाहिए..हां वैसे सोने के आठ बूट देना मंहगा पड़ेगा मंदी के दौर में..

वैसे पॉल के लिए बहुत सारे कामों की सूची बन चुकी है. अगले चुनावों में बराक ओबामा जीतेंगे या नहीं...यूरोप मंदी से निकल पाएगा या नहीं...ओसामा बिन लादेन पकड़े जाएंगे या नहीं....अफ़गानिस्तान से विदेशी सेनाएं कब तक वापस आएंगी... भारत को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता मिलेगी या नहीं...

इन सारे सवालों का जवाब महान पॉल दे सकते हैं और हम सभी को आभारी होना चाहिए उस रेस्तरां का जिसने महान पॉल को शरण दी ताकि लोग आज फुटबॉल की बजाय उन पर अधिक चर्चा करने में लगे हुए हैं.

हां एक बात और.. पता चला है कि जानवरों के अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठन इस बात से नाराज़ हैं कि पॉल को उनकी सेवाओं का सही मुआवज़ा नहीं दिया जा रहा है.

अतीत की काली छाया बरक़रार है

इतिहास कभी-कभी सहेज कर रखने की चीज़ होती है, तो कभी-कभी इतिहास के काले अध्याय से लोग पल्ला झाड़ने की कोशिश करते है. ऐसा लगता है मानों नई सुबह, नई आशा और नई पहचान के बीच इतिहास के काले पन्ने की क्या आवश्यकता.

लेकिन दक्षिण अफ़्रीका में आकर कुछ अलग ही अहसास होता है. सोने की खान के कारण बसा जोहानेसबर्ग शहर रंगभेद काल में ख़ूनी संघर्ष और प्रताड़ना का गवाह रहा है. रंगभेदी सरकार के बर्बर कृत्य इस शहर से गहरे से जुड़े हुए हैं.

पिछले दिनों सोएटो जाने का मौक़ा मिला. सोएटो यानी साउथ वेस्ट टाउनशिप. ये नाम किसी महापुरुष या इतिहास की धरोहर नहीं, बल्कि उस काल की कड़वी सच्चाइयों को बयां करती है. जोहानेसबर्ग से आधे घंटे की ड्राइव और आप पहुँच जाते हैं इस टाउनशिप में.

रंगभेद काल में ये बस्ती उन लोगों के लिए बसाई गई थी, जिन्हें सरकार इस लायक़ भी नहीं समझती थी कि उन्हें किसी शहर में बसने हक़ है. काले, भारतीय और खान मज़दूरों की बस्ती. जो सिर्फ़ सेवा करने के लिए होते थे.

अब ये बस्ती बहुत बड़ी हो गई है और सोएटो भी बदल गया है. लेकिन इस शहर में जाकर छोटी-छोटी गलियों से गुज़रते आपको उस समय का अहसास होता है. कई इलाक़ों में अब भी आधारभूत सुविधाओं की कमी है और ये इलाक़े कभी दिल्ली में यमुना पुल के नीचे बसी झुग्गियों से कम नहीं.

इसी बस्ती में नेल्सन मंडेला का भी पुराना घर है, जो अब संग्रहालय बन गया है. सोएटो अब बदल गया है, लेकिन इस बस्ती ने रंगभेद काल की तमाम सच्चाइयों को सहेज कर रखी हुई है. मंडेला का पुराना घर, तो हेक्टर पीटरसन चौक, जहाँ पुलिस ने युवकों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाई थी.

सोएटो की जीती-जागती सच्चाइयों के अलावा जोहानेसबर्ग में 'रंगभेद शासनकाल' को समर्पित बड़ा संग्रहालय है. इस संग्रहालय में जाकर रुह काँप जाती है. उस समय के सच को जीवंत करने के लिए आपको ऐसे रास्तों से गुज़रने के लिए कहा जाता है, जो सिर्फ़ कालों के लिए था. बड़े-बड़े अक्षरों में कई जगह ये लिखा हुआ था कि ये रास्ता सिर्फ़ यूरोपीय लोगों के लिए है.

जोहानेसबर्ग ने इन सब यादों को सहेज कर रखा है. यादें अच्छी नहीं, यादें पीड़ा भी पहुँचाती हैं और यादें अच्छा अहसास नहीं करातीं. लेकिन इन कड़वी सच्चाइयों को जीने वाला दक्षिण अफ़्रीका इसके सहारे अब नई सुबह की तलाश में है.

अब भी सूरज पूरा नहीं निकला है....लेकिन यहाँ के लोग ऐसी चमकीली और खुली धूप में सांस लेने के लिए उतावले हैं, जिसमें उन्हें ये लगे कि इस देश की सारी धरती उनकी अपनी है....लोग अपने है.

हरियाणा की बबली और सिंध की शहज़ादी

हफ़ीज़ चाचड़हफ़ीज़ चाचड़|शुक्रवार, 02 जुलाई 2010, 12:11

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शहज़ादी से मेरी मुलाक़ात दो साल पहले सिंध प्रांत के उत्तरी शहर कश्मोर के एक सरकारी स्कूल में हुई थी जहाँ वे बच्चों को पढ़ा रही थीं. उस दिन वे काफी ख़ुश थीं क्योंकि उन की सरकारी नौकरी का वह पहला दिन था. मुझे याद है कि उन्हों ने कहा था कि स्कूल में पढ़ाते हुए उन्हें बहुत अच्छा लग रहा है और यह उन के जीवन का सब से यादगार दिन है.

वे शिक्षक बनना चाहती थीं और उन का यह सपना साकार हो गया. भविष्य की ओर एक और क़दम बढ़ाते हुए वे अब किसी विश्वविद्यालय में पढ़ाना चाहती हैं. 23 वर्षीय शहज़ादी का संबंध एक ग़रीब परिवार से है और वे अपने परिवार की पहली लड़की हैं जिन्हों ने स्नातक की उपाधि प्राप्त की है. उन्हों ने यहाँ तक पहुँचने में कठोर परंपराओँ का सामना किया और काफी संघर्ष किया है. उन के किसान पिता यदि उन का साथ ने देते तो शायद वह कभी भी अपने लक्ष्य पर नहीं पहुँच पातीं.

गुरुवार की सुबह एक सिंधी समाचार पत्र में उन की हत्या की दुःखद ख़बर सुनी. उन के छोटे भाई ने उन्हें मंगलवार को उस समय गोली मार दी जब वे स्कूल से वापस आ कर दोपहर का खाना खा रही थीं. उन के भाई के अनुसार स्कूल के उस्ताद से उन के यौन संबंध थे इसलिए उन को जीने का कोई अधिकार नहीं है. ख़बर में बताया गया है कि उस जुनूनी लड़के ने गाँव के सरपंच के कहने पर निर्दोष लड़की की हत्या कर दी.

शहज़ादी ऐसी परंपरा की भेंट चढ़ी हैं जिस की रक्षा केलिए पाकिस्तान में हिंसा का रास्ता लिया जाता है और इज़्ज़त के नाम पर हत्या उन की किस्मत में लिखी हुई थी. इस तथाकथित परंपरा की रक्षा के लिए सिंध में न जाने कितनी निर्दोष लड़कियों का बलिदान दिया जाता है.

ग़ैर-सरकारी संस्थाओं की ओर से जुटाए गए आँकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल 1404 महिलाओं की हत्या कर दी गई थी जिस में करीब 700 इज़्ज़त के नाम पर थीं. औरत फाऊँडेशन ने आँकड़े दिए हैं कि पिछले महीने सिंध में इज़्ज़त के नाम पर 53 महिलाओं की जान ली गई. सिंध में इज़्ज़त के नाम पर हत्याओँ को 'कारो-कारी' कहा जाता है जो प्रांत के उत्तरी ज़िलों में सब से ज़्यादा होती हैं.

शहज़ादी को 'कारी' घोषित कर उन की हत्या कर दी गई क्योंकि वे समाज के लिए कलंक बन गई थी. विश्वविद्यालय में पढ़ाने का उन का सपना टूट गया और मेरे एक दोस्त कहते हैं कि ऐसे समाज में रहने वाली शहज़ादी को इस प्रकार के सपने देखने का कोई अधिकार नहीं है.

क्या सिंध की शहज़ादी और हरियाणा की बबली इस समाज के मूँह पर कलंक हैं? क्या सपने देखना उन केलिए पाप है? और क्या वे हमेशा 'कारी' कर मारी जाएँगी?

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