इस विषय के अंतर्गत रखें सितम्बर 2009

सत्ता की वंशवादी सूबेदारी

संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|बुधवार, 30 सितम्बर 2009, 13:20

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महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में प्रत्याशियों की सूची पर नज़र डालें तो जिस तरह राज्य के बड़े नेताओं ने अपने सगे-संबंधियों को टिकट देने की बंदरबांट मचाई है, उसे देखकर तो यही लगता है कि भारतीय लोकतंत्र का भविष्य जैसे इन नेताओं के परिजनों के लिए आरक्षित है.

सबसे ज़्यादा अति तो तब हो गई जब राष्ट्रपति के बेटे को विधानसभा चुनाव का टिकट दे दिया गया.

कुल मिलाकर लगने यह लगा है कि एक अरब से भी ज़्यादा जनसंख्या वाले, विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में क्या चुनावी राजनीति सिर्फ़ 400-500 परिवारों की बपौती बनकर रह जाएगी. बाकी का पूरा देश क्या इन अलग अलग वंशों के ताज़ातरीन उत्तराधिकारियों का मात्र झंडाबरदार, वफादार सैनिक या कभी भी बराबरी का स्थान चाहने की हिमाक़त न कर सकने वाला समर्थक बनकर रह जाएगा.

बात इन प्रत्याशियों के अच्छे या बुरे होने की नहीं है, न ही यह है कि अगर इनके पिता राजनीति में थे तो इसका ख़ामियाजा ये क्यों भुगतें.

वैसे यह ख़ामियाजा वाला तर्क है बड़ा दिलचस्प. किसी भी पायलट, प्रसाद, देवड़ा, यादव या अन्य किसी भी अति प्रतिभावान और सर्वगुण संपन्न राजनीतिक वंश के चमकते हुए मौजूदा सितारे से जैसे ही राजनीति में परिवारवाद की चर्चा आप शुरू करेंगे, वो फ़ौरन पलटवार कर दो बातें कहते हैं.

पहली, कि अगर उनके पूर्वज राजनीति में थे तो इसमें उनकी क्या ग़लती. दूसरी यह कि वे अपने दमखम पर चुनाव जीतकर आए हैं. कोई पीछे के दरवाज़े से चुपचाप आकर सत्ता पर काबिज नहीं हो गए हैं. सही है कि वे चुनाव जीतकर आते हैं. पर वे यह बताना भूल जाते हैं कि पार्टी टिकट तो जैसे उन्हें वसीयत में मिला था.

भारतीय चुनावी प्रणाली में असली मोर्चा तो पार्टी का टिकट हासिल करना है.

फिर इन सूरमाओं ने अपने पूर्वजों की सीट को दशकों तक सींचा-संजोया है, वफादारों को आगे बढ़ाया है. पनपाया है, स्थानीय रकीबों को तरह तरह से निपटाया है, मनपसंद स्कीमें लागू करवाई हैं. पसंद के अधिकारी नियुक्त करवाए हैं. कुल मिलाकर अपनी सीट को खानदानी सूबेदारी की तरह से दशकों चलाया है तो फिर पार्टी का टिकट हासिल करने के बाद तो कोई बहुत बड़ा सूरमा सामने आ जाए, तभी इन वर्तमान के सूर्यवंशियों और चंद्रवंशियों को चुनावी समर में निपटा सकता है.

महाराष्ट्र की ही बात पर लौटें तो शरद पवार के एक हाल के बयान पर ध्यान जाता है और हंसी भी आती है और रोना भी. उन्होंने कहा कि समय आ गया है कि अब युवा पीढ़ी आगे आए. उनकी पार्टी में इस युवा पीढ़ी का नेतृत्व कौन करेगा, यह पहले से तय है. केंद्र में एनसीपी की नेता होंगी उनकी बेटी सुप्रिया और राज्य में उनके भतीजे अजीत पवार.

वंशवाद के लिए सिर्फ़ नेहरू-गांधी परिवार या कांग्रेस को कोसते रहें, यह सही नहीं होगा. वामदलों के अलावा कोई भी इस बीमारी से अछूता नहीं. भाजपा में कुछ कम है वंशवाद का ज़हर पर अब वहाँ भी बढ़ रहा है.

क्षेत्रीय दल तो हैं ही कुछ परिवारों की बपौती. मुलायम का परिवार और भाई सरीखे अमर सिंह समाजवादी पार्टी हैं, अजीत सिंह जी की विरासत आरएलडी है, करुणानिधि और उनका कुनबा डीएमके है, लालू एवं परिवार का मतलब आरजेडी है, बीएसपी, एआईएडीएमके और बीजेडी तो सिर्फ़ एक ही व्यक्ति की पार्टियां हैं कि इन दलों के नेताओं ने शादी न करके सारी शक्ति का केंद्र बिंदु सिर्फ और सिर्फ स्वयं को ही बनाकर रखा हुआ है.


आखिर में एक बात और... जब अमरीका में बराक ओबामा राष्ट्रपति बने तो भारत में भी रोमांटिक्स की एक बड़ी टोली खड़ी हो गई और लगी तलाशने देसी ओबामा को. पर परिवार और वंश के चक्रव्युह में फंसे भारतीय लोकतंत्र में शायद ही कभी किसी ओबामा का उदय हो पाए.

लंदन में दुर्गा पूजा

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|रविवार, 27 सितम्बर 2009, 08:36

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ऊँची छत वाले हॉल में ढोल और घंटियों की गूँजती आवाज़, तेज़ पीली रोशनी में दमकती मूर्तियाँ, अगरबत्ती-धूप की पावन गंध, सिल्क की चमकदार साड़ियों और गहनों से सजी महिलाएँ, दौड़ते-भागते खिलखिलाते बच्चे. भीड़ थी, लेकिन इतनी नहीं कि धक्का-मुक्की हो.

पहली बार लड़कियों को बड़े-बड़े ढोल बजाते देखा, पास जाने पर लगा कि ये पूरी मंडली थोड़ी अलग है. 'कादिर भाई, की आनंदो...' पता चला, बांग्लादेशी मुसलमानों की टोली पूजा में ढोल बजाने आई है. आयोजकों ने बताया कि इससे पहले नाइजीरिया वाले आए थे, अपने ड्रम लेकर.

चार-छह नाइजीरियाई जवान काफ़ी उत्सुकता से उत्सव का आनंद ले रहे थे, ओलेगु ने कहा, 'गुड फ़न, मैन.' कई गोरे चेहरे दिख रहे थे, दो-एक गोरी महिलाएँ सलवार-सूट पहने घूम रही थीं, बंगाली परिवारों में विवाहित होंगी शायद.

एल्युमिनयम फॉएल के डिब्बे में लोग प्लास्टिक के चम्मच से 'खिचड़ी प्रसाद' खा रहे थे, हर कोने रखे कूड़ेदान डिब्बों, चम्मचों और नैपकिन से भरे हुए थे.

ज्यादातर लोग मूर्ति को बैकग्राउंड में रखकर फोटो खिंचवाने में लगे हुए थे, कैमरे इक्का-दुक्का ही थे, स्मार्टफ़ोन ज्यादा नज़र आ रहे थे.

कोलकाता से आए एक महाशय ने कहा, 'हियाँ शिस्टम बहुत आच्छा है, कोई धोक्का नेई, शोब लाइन में जाता है, कोलकाता जैशा बड़ा पूजो नेई है लेकिन बहुत शिस्टम है, कोलकाता में हम कोबी प्रशाद लेने नहीं सका. उहाँ का अलोग है, हियाँ का अलोग है.'

मिठाईवाले 'गु्प्ता जी' ने अपना स्टॉल लगाया था, माइक्रोवेव अवन में गर्म किए हुए समोसे से खुशबू उड़ रही थी. दीवार पर शादी डॉट कॉम के बड़े-बड़े पोस्टर लगे थे, विवाह योग्य संभावित वर-वधू पोस्टर की तरफ़ नहीं, एक-दूसरे को देख रहे थे.

और भी कई पोस्टर थे. एक में मिथुन दा कोलकाता के सॉल्ट लेक के पास बनने वाली किसी नई टाउनशिप की ओर बहुत उत्साह से उंगली दिखा रहे थे, दूसरे में फटाफट कम कमीशन पर इंडिया पैसा भेजने का इश्तिहार था, अपने प्रियजनों से दो पेंस प्रति मिनट बात करने वाली टेली़फ़ोन सर्विस ने भी इस मौक़े को नहीं गँवाया.

कुछ सदस्य दरवाज़े पर स्टॉल लगाकर बैठे थे, 'पूजा चंदा, प्लीज़.' एक पाउंड के सिक्के से लेकर पचास पाउंड तक के नोट थाली में थे. कुछ लोगों ने पूजा समिति के नीले बैज लगा रखे थे जो कोलकाता से मँगवाए गए थे. चंदा वसूल करने की कोई तत्परता नहीं थी, शायद पोस्टरों और कुछ दिलदार 'फीर भी दिल हाय हिंदुश्तानी' लोगों की बदौलत.

मूर्तियाँ भी कोलकाता से मँगवाई गईं थी जिनके नीचे अँगरेज़ी में लिखा था--शिल्पी, प्रशांत पाल, हाबड़ा, मोबाइल नंबर...आयोजकों ने बताया कि ये मूर्तियाँ दस साल पहले आई थीं. दुर्गा माता के लिए कस्टम का फार्म तो भरा गया था लेकिन वीज़ा नहीं लेना पड़ा था.

विसर्जन की रस्म मूर्ति के पैरों को पानी में डूबोकर पूरी की जाती है, अगले साल पूजा तक उन्हें कहीं कपड़े से ढँककर रख दिया जाता है. यहाँ मूर्तियाँ बन नहीं सकतीं, हर बार कोलकाता से मँगवाई नहीं जा सकतीं, टेम्स नदी में पॉल्युशन फैलाया नहीं जा सकता...

कोलकाता वाले महाशय ने कहा, 'ईधर शिस्टम फरक है, उहाँ ओलोग है, हियाँ ओलोग है, लेकिन मोजा बहुत आया.

ख़रबूज़ा सिंड्रॉम

महबूब ख़ानमहबूब ख़ान|बुधवार, 23 सितम्बर 2009, 17:03

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क़रीब आठ वर्ष पहले जब हम भारत से बीबीसी लंदन में काम करने आए थे उसके बाद से वैसे तो कई बार छुट्टियाँ बिताने भारत जाना हुआ लेकिन इस बार ये मौक़ा जुलाई-अगस्त में मिला. बारिश के मौसम में बारिश को ना देखना बेहद दुखदाई अनुभव रहा लेकिन उससे भी ज़्यादा टीस ये देखकर हुई कि लोग सादा जीवन - उच्च विचार के मूल्यों को किस तरह से दिखावे और गला काट प्रतियोगिता की भेंट चढ़ाने में लगे हुए हैं.

एक दिन मैंने बड़े शौक से पीले-पके हुए दिखने वाले केले ख़रीदे लेकिन जब उनका छिलका उतारा तो छिलका ज़्यादा मोटा और छिलके के भीतर खाने वाला हिस्सा पतला भी और कच्चा भी. मेरी समझ में नहीं आया कि केला ऐसा क्यों निकला. बिल्कुल सुर्ख़ पका हुआ दिखने वाला पपीता काटा तो अंदर से कच्चा.

मैंने अपने परिजनों और मित्रों के बीच चर्चा छेड़ी तो जैसे भानुमति का पिटारा ही खुल गया. एक मित्र ने कहा कि मेरठ से लखनऊ जाते समय कभी हापुड़ की चाय या कॉफ़ी मत पीजिएगा. मेरे क्यों कहने से पहले ही वो विवरण बताते चले गए कि दरअसल सिंथेटिक दूध का चलन बहुत बढ़ गया है. ये दूध गरमी में ख़राब नहीं होता और चाय में इलायची वग़ैरा डाल देने से इसका स्वाद भी प्राकृतिक ही लगता है.

बात यहीं नहीं रुकी. चर्चा चल पड़ी कि खीरे को इंजेक्शन लगाकर पकाया जाता है और छोटा सा खीरा रात को इंजेक्शन खाकर सुबह तक बाज़ार में पहुँचाने लायक़ बन जाता है. तब पता चला कि केले और पपीते को भी इसी नुस्ख़े से पकाया जाता है. ऊपर से दिखने में तो वो बिल्कुल तैयार लेकिन अंदर से बेकार.

कुछ ने कहा कि सेब को भी इंजेक्शन के ज़रिए सुर्ख़ पकाया जाता है. सड़क किनारे बेचे जाने वाले अनार के जूस में तो रंग मिलने की बात सुनी ही नहीं बल्कि देखा भी था लेकिन साबुत फलों और सब्ज़ियों में अंदर तक मिलावट पहुँचाने की बातें ज़रूर चौंका देने वाली थीं.

अख़बारों में भी पढ़ने को मिला कि खाने-पीने के डिब्बाबंद सामान में किस हुनर के साथ मिलावट की जा रही है. सुनने में आया कि सूखी हुई रोटी जो कूड़े में फेंक दी जाती है, कुछ चक्की वाले उसे भी गेहूँ में मिलाकर पीस देते हैं.

चाय पीने का तो मुझे ज़्यादा शौक़ नहीं है, हाँ मैं जब भी कोई फल, सब्ज़ी या दूध की बनी हुई चीज़ खाता तो मन में ये शंका ज़रूर उठती कि पता नहीं, असल में मैं क्या खा रहा हूँ. मेरी समझ में अभी तक ये नहीं आ सका है कि इन धाँधलियों के लिए कौन ज़िम्मेदार है, धाँधलियाँ करने वाले, या वो अधिकारी जिन पर इस तरह की धाँधलिया रोकने की ज़िम्मेदारी है या फिर वो आम लोग जो चुपचाप इस स्थिति को नियति मानकर स्वीकार कर लेते हैं.

भारत से लौटकर इन मुद्दों पर विचार मंथन चल ही रहा था कि ब्रिटेन के एक अख़बार में छपी एक ख़बर पर नज़र पड़ी जिसमें ज़िक्र था एक ऐसे सर्वे का जो ईमानदारी के बारे में लोगों की राय जानने के लिए किया गया. इस सर्वेक्षण का मक़सद ये जानना था कि क्या समाज में ऐसे लोग अब भी मौजूद हैं जिनके लिए Honesty is the best policy है.
ब्रिटेन का तो जो भी हाल है, भारत में तो ऐसा लगने लगा है जैसेकि ईमानदारी शब्द ही कुछ दिन में ग़ायब हो जाएगा क्योंकि बेईमानी अब बुरी चीज़ नहीं बची है और बहुत से लोग 'ख़रबूज़े को देखकर ख़रबूज़ा रंग बदलता' सिंड्रॉम की चपेट में आने लगे हैं. ईमानदारी को बेवकूफ़ी समझा जाने लगा है और झूठ, छल-कपट, धोखाधड़ी, बेईमानी सभी स्मार्टनैस की निशानियाँ बन गए हैं. कहीं ऐसा ना हो कि ये ख़रबूज़ा सिंड्रॉम हमें ना घर का छोड़े, ना घाट का.

भ्रष्टाचार का दर्द

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|रविवार, 20 सितम्बर 2009, 12:28

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भारत के भ्रष्टाचार पर जलवायु परिवर्तन की ही तरह अकादमिक चर्चा होती है. कोई अति-उत्साही सुझाव देता है- 'चीन की तरह मौत की सज़ा होनी चाहिए'...फिर अति-व्यावहारिक सुझाव- 'रिश्वत का रेट फ़िक्स होना चाहिए...'

अकादमिक यानी हमारा कोई 'लेना-देना' नहीं है, 'हम तो देश भविष्य के लिए चिंतित हैं'. भ्रष्टाचार पर चर्चा में हमारा अपना आचरण कितना 'भ्रष्ट' है इसका एहसास न होना एक बड़ी समस्या है.

संयोगवश 'लेने' लायक़ हालत मेरी कभी नहीं रही, लेकिन 'देने' का दर्द भूला नहीं हूँ, इसमें 'देने' से मना न कर पाने की ग्लानि भी शामिल है, यानी मैं नहीं कह सकता कि मेरा कोई 'लेना-देना' नहीं है.

भ्रष्टाचार लोकाचार है, ये एहसास पहली बार 21 साल की उम्र में हुआ जब नए बने मकान में पानी का कनेक्शन जुड़वाने के लिए अपने हाथों से घूस दी, अपने उबलते ख़ून से ज्यादा परवाह पीने के पानी की थी. उसूलों की लड़ाई में नया घर करबला बन सकता था.

देशभक्त लोगों को यह जानकर थोड़ा एक्स्ट्रा दुख होगा कि वह तारीख़ थी--पंद्रह अगस्त.

अक्सर सोचता हूँ कि भ्रष्टाचार को लेकर भारतीय लोग इतने सहनशील क्यों हैं? क्यों ऐसा होता है कि टेलीफ़ोन घोटाले में पकड़ा गया नेता टेलीफ़ोन चुनाव चिन्ह के साथ चुनाव लड़कर भारी बहुमत से जीत जाता है.

बचपन में हमें सिखाया जाता था-- 'जो मिल-बाँट खाए, गंगा नहाए'... कहीं ये उसका असर तो नहीं? रोटी के आटे में से कुछ मछलियों के लिए, एक रोटी गाय के लिए, एक रोटी कुत्ते के लिए, एक कौव्वे के लिए...यानी सबका थोड़ा-थोड़ा हिस्सा.

कहीं भ्रष्टाचार को 'सर्वजन सुखाय' की तरह देखने की हमारी आदत तो नहीं. थोड़ी-सी तकलीफ़ सिर्फ़ तब होती है जब 'देना' पड़ता है (बिल्कुल दहेज की तरह) वर्ना यह भी एक व्यवस्था है जिसे कोई अकेले नहीं बदल सकता, और यहाँ आकर महान लोकतंत्र के सभी नागरिक अकेले हो जाते हैं.

भ्रष्टाचार ख़त्म करने के नारे कभी-कभी लगते हैं लेकिन कोई नहीं सोचता कि अगर सदाचार आ गया तो क्या होगा, इसलिए नहीं सोचता क्योंकि ऐसा होने का यक़ीन किसी को नहीं है, लेते हुए पकड़े जाएँगे तो देके छूट जाएँगे, इस बात का पूरा यक़ीन है.

मेरे ही न जाने कितने दोस्त-रिश्तेदार उसी के सहारे अपना घर चला रहे हैं. सरकारी और प्राइवेट की तरह यह रोज़गार देने वाला तीसरा बड़ा सेक्टर है, हर दफ़्तर में जितने कर्मचारी नियुक्त होते हैं वे अपने तीन-चार एजेंट तैनात करते हैं, ये एजेंट कभी एप्लायमेंट एक्सचेंज नहीं जाते, बेरोज़गारी के आंकड़े में वे शामिल नहीं हैं, उनका घर भी चलता रहता है, आपका काम भी हो ही जाता है.

भ्रष्टाचार से बहुत दुखी होकर एक बार मैं अपने एक अनुभवी और व्यावहारिक मित्र के पास गया. उन्होंने कहा, "तो दे दो न, इतना परेशान क्यों हो रहे हो, दोगे भी और ऊपर से परेशान भी हो".

मेरा मन नहीं माना तो उन्होंने मुझे शांत करने के लिए वही कहा जो गौतम बुद्ध ने पुत्रशोक में विह्वल महिला से कहा था. 'ऐसे घर से एक मुट्ठी चावल ले आ आओ जहाँ कभी कोई न मरा हो...' वे बोले, "मुझे एक ऐसे आदमी से मिलवा दो जिसने घूस न ली हो, न दी हो."

मैंने अपना बता दिया, आप अपने दिल पर हाथ रखकर बताइए. वैसे विश्वास करना ज़रा मुश्किल है.
भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के बारे में सुझाव देते रहिए, उनका हमेशा स्वागत है.

अरे बापू यह क्या किया?

रेणु अगालरेणु अगाल|गुरुवार, 17 सितम्बर 2009, 19:14

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गांधीजी के नाम का आजकल भारत में कुछ ज़्यादा धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है. और तो और बेचारी गांधी की बकरी की भी याद सफेदपोश नेताओं को आने लगी है.

वाह किस्मत हो तो ऐसी. रस्मी तौर पर गांधी का इस्तेमाल भारत में आम है. पर अब जब मंदी का दौर है तो एक कपड़े में लिपटे, थर्ड क्लास में पूरा भारत दर्शन करने वाले और आश्रम में बकरी का दूध का सेवन करने वाले गांधी के आम आदमी को समझने के इसी हुनर को उनकी पार्टी, कांग्रेस के नेता आत्मसात करने में लगे है. पर बहुत बेमन से.

वित्त मंत्री के चाबुक के बाद कुछ मंत्रियों को पांच सितारा होटलों से निकल किसी मध्यवर्गीय की तरह एक आम राज्य गेस्ट हाउस में रहना पड़ रहा है.

बेचारे नेताओं को पुराने कारपेट, खटर पटर करने वाले एयरकंडीश्ननर से काम चलाना पड़ रहा है. न इटेलियन मार्बल, न बिज़नेज़ क्लास की सीटों का सुख..और तो और गाएं भैसों की तरह रेल के सफ़र की सोच से ही इन जनप्रतिनिधियों के पसीने छूट रहे हैं.

चुनावी समर में ही पसीना क्या होता है इन्होंने जाना था. और माना था कि उस मेहनत के बाद उन्हें न केवल एक बंगला मिलेगा न्यारा बल्कि पसीने की गंध को वो पांच साल तक भूल जाएंगे. पर ऐसा हुआ नहीं.

वे सब जानना चाहते है कि आखिर किस खुराफाती दिमाग़ की उपज थी कि आम आदमी के नाम पर चुनाव लड़े जाएँगे और उसे भुलाया भी नहीं जाएगा.

इस में भी ज़रुर हर चीज़ की तरह अमरीकी साजिश होगी. न मंदी होती न कमर कसने की मजबूरी और न ये गाय भैंस की सी ज़िंदगी. कुछ ग़लती अपनों की भी थी.

आखिर क्या ज़रुरत थी गांधीजी को बकरी पाल कर खुश होने की, जनता को जनार्दन का दर्जा देने की. उनको तो कम से कम देश के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए था, नेताओं की दिक्कतों को समझना चाहिए था. वो तो अपने ही थे. बापू ने क्यों महात्मा बनने की सोची..क्यों, क्यों, आखिर क्यों.

किस्मत और करिश्मे का खेल

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|रविवार, 13 सितम्बर 2009, 20:49

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इन दिनों ब्रिटेन में सब लोग नेशनल लॉटरी की बातें कर रहे हैं क्योंकि एक टीवी शो में लॉटरी का इनामी नंबर बताकर एक चमत्कारी व्यक्ति ने सबको हैरत में डाल दिया है.

मैं भी कभी-कभार ब्रिटेन की नेशनल लॉटरी का एक टिकट ख़रीद लेता हूँ, एक पाउंड में यह सपनों की दुनिया की सैर का टिकट है.

मैं तो यही सोचकर टिकट ख़रीदता हूँ कि लॉटरी निकलने का चांस फ़िफ़्टी-फ़िफ्टी है, या तो लॉटरी निकल आएगी या नहीं निकलेगी, दोनों बातों की बराबर-बराबर संभावना है. दोस्तों के साथ पाँच मिनट की परिचर्चा होती है कि अगर जैकपॉट निकल आया तो क्या-क्या करेंगे, एक पाउंड वसूल हो जाता है.

लंदन में मेरे एक बुज़ुर्ग सहकर्मी कहा करते थे कि "एक टिकट ले लिया करो, दरवाज़ा बंद नहीं रखना चाहिए, ये भी कोई बात हुई कि ऊपरवाला तुम्हारा भला करना चाहे और तुम उसे मौका ही न दो."

ब्रितानी लॉटरी पर शोध करने वाले गणितज्ञ बताते हैं कि अगर आप हर सप्ताह एक पाउंड का टिकट ख़रीदते रहें तो 2 लाख 70 हज़ार साल बाद आपका नंबर आ सकता है.

किसी के लॉटरी का जैकपॉट जीतने का चांस डेढ़ करोड़ में एक है यानी अगर आप डेढ़ करोड़ पाउंड के टिकट ख़रीद लें तो शायद एक करोड़ पाउंड का ईनाम निकल आए. अगर ऐसा न हो तो लॉटरी चलाने वाली कंपनी दिवालिया न हो जाए.

ब्रिटेन में लॉटरी का जैकपॉट जीतने के लिए एक से लेकर 49 के बीच छह नंबर चुनने होते हैं. बीबीसी टीवी पर नेशनल लॉटरी ड्रॉ का सीधा प्रसारण होता है, सब कुछ बहुत पारदर्शी होता है.

इन छह नंबरों का सही अंदाज़ा लगाने पर ही जीतने की संभावनाएँ टिकी हैं, कोई अपने प्रिय लोगों के जन्मदिन की तारीख़ें चुनता है तो कहीं छह लोग मिलकर एक-एक नंबर चुनते हैं, कहीं लोग हर सप्ताह नंबर बदलते हैं, कई ऐसे हैं जो बरसों से एक ही नंबर पर दाँव लगा रहे हैं...

मैं अक्सर कहा करता था कि जितने बाबा-सिद्धपुरुष-तांत्रिक-मांत्रिक टाइप लोग हैं उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे नेशनल लॉटरी के इनामी छह नंबर पहले से बता दें. जिसने ब्रिटेन के राष्ट्रीय टेलीविज़न नेटवर्क पर दावे के साथ ये कारनामा कर दिखाया है वह ख़ुद को इल्यूज़निस्ट-माइंडरीडर-माइंड कंट्रोलर बताता है.

जादूगर हैरी हुडिनी के प्रशंसक 37 वर्षीय डैरेन ब्राउन ने चैनल फ़ोर के एक टीवी कार्यक्रम में लॉटरी ड्रॉ से पहले कागज़ पर छह नंबर लिखकर रख दिए, लॉटरी ड्रॉ का प्रसारण बीबीसी पर उसके बाद हुआ, पता चला कि उन्होंने छहों नंबर सही लिखे थे, इसके बाद भारी हंगामा मच गया. ब्राउन के इस कारनामे को लगभग 30 लाख लोगों को टीवी पर देखा.

ब्राउन अपने कारनामे को एक 'ट्रिक' बताते हैं, अगले दिन फिर एक कार्यक्रम हुआ जिसमें उन्होंने बताया कि 24 लोगों के एक समूह को नंबर का अंदाज़ा लगाने का काम देकर उसमें गुना-भाग करके इनामी नंबर तक पहुँचे लेकिन अनेक गणितज्ञों ने उनकी थ्योरी को सरासर बकवास और गणित के सिद्धांतों के प्रतिकूल बताकर खारिज कर दिया.

वेबसाइट्स, ब्लॉग्स, ट्विटर, यूट्यूब, अख़बार, टीवी...हर जगह 'ब्राउन बाबा' के 'परावैज्ञानिक' चमत्कार की चर्चा हो रही है. वैज्ञानिक, गणितज्ञ, पत्रकार, लॉटरी चलाने वाले-ख़रीदने वाले, टीवी ट्रिक्स के विशेषज्ञ, यहाँ तक कि जादूगर भी सर खपा रहे हैं कि यह कमाल कैसे हुआ.

लोग ये भी पूछ रहे हैं कि अगर वे लॉटरी नंबर पहले से बता सकते हैं तो ख़ुद क्यों नहीं ईनाम जीतते? डैरेन ब्राउन ने ब्रितानी ही नहीं, पुरी दुनिया के अक्लमंद लोगों को चुनौती दे डाली है कि वे उनके 'ट्रिक' का राज़ बताएँ. इतने वैज्ञानिकों-गणितज्ञों और प्रबुद्ध लोगों को चक्कर में डालकर पहले से ही करोड़पति ब्राउन को जो सुख मिल रहा होगा वह लॉटरी जीतने से कहीं बड़ा नहीं है?

अपने हीरे को संभाल कर रखिए

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|शुक्रवार, 11 सितम्बर 2009, 23:51

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बुज़ुर्गों के साथ ज़्यादती या उनकी हत्या की ख़बरें मुझे जितना उद्वेलित करती हैं, उतनी ही, या उससे भी अधिक तकलीफ़ मुझे किसी मासूम बच्चे पर अत्याचार या बलात्कार की ख़बरों से पहुँचती है.

विश्वास कीजिए, मेरी कई रातों की नींद उड़ जाती है. बलात्कार और फिर हत्या की शिकार हुई बच्ची की पीड़ा और उसकी माँ की व्यथा का अंदाज़ा कर मैं सिहर जाती हूँ.

ऐसी ही एक ख़बर अभी दो दिन पहले पढ़ने में आई. तब से ही मन दुखी है.

कई साल पहले जब इस तरह के समाचार इतने आम नहीं थे जितने आज हो गए हैं, मैंने नौ साल की एक बच्ची के साथ ऐसे ही कुकर्म की ख़बर पढ़ी.

संयोग से उस समय मेरी बेटी की उम्र भी उतनी ही थी. मैं इतनी व्याकुल हुई कि अपनी व्यथा को मैंने एक कविता की शक्ल दे दी.

उस काग़ज़ पर किसी की नज़र नहीं पड़ी लेकिन पता नहीं क्यों आज बरसों बाद, मेज़ की दराज़ में रखे हुए उस काग़ज़ की पंक्तियाँ आपके साथ बांटने का मन हो रहा है.

मेरी नौ वर्षीया बेटी अपनी घुटनों से ऊँची फूलदार फ़्रॉक में उछलती फिर रही है,
सामने की झुग्गी में रहने वाली नौ वर्षीया रधिया अपनी फूलदार कमीज़ को खींच-खींच कर
अपने पैर तक ढंकने का प्रयास कर रही है,

मेरी बेटी के होठों पर मुस्कराहट है और आँखों में हैं आने वाले कल के सपने,
रधिया के होंठ पपड़ियाएँ हैं, आँखें सूनी हैं और बीते हुए कल के भय से आक्रांत हैं,

मेरी बेटी खेल-खेल में दुल्हन बनती है, साड़ी पहनती है, लिप्स्टिक लगाती है,
रधिया दुल्हन बनने के विचार मात्र से कांप-कांप जाती है,

मेरी बेटी भोली है, संसार के मायाजाल से अंजान है,
रधिया संसार को बहुत निकट से देख चुकी है,
उसका बलात्कार हो चुका है.

आज भी सुबह दफ़्तर जाते समय रास्ते में पड़ने वाली झुग्गिी-झोंपड़ियों के बाहर छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियों को बेसहारा घूमते या खेलते देखती हूँ तो उनके माता-पिता से एक ही सवाल करने का मन होता है.

आपके पास यदि कोई बेशक़ीमती जवाहरात हों तो आप उनकी सुरक्षा में रात-दिन एक कर देते हैं. आपका मासूम बच्चा तो ऐसा अनमोल हीरा है जिसकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती.

तो उसे संभाल कर रखिए. कहीं ऐसा न हो कोई भेड़िया उसे अपनी हवस का शिकार बना ले और कल को हाथ मलने के अलावा और कोई चारा न रहे.

प्याले में तूफ़ान या...

संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|बुधवार, 09 सितम्बर 2009, 14:46

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दो केंद्रीय मंत्रियों के पांच सितारा होटल मे रहने और फिर बेदख़ल होने के मामले ने जिस तरह से सुर्खियों, मध्यमवर्गीय और इंटलेक्चुअल चर्चाओं मे अपनी जगह बनाई है, वो अपने आप मे एक दिलचस्प वाकया है.

न सिर्फ़ किस्सा मज़ेदार है बल्कि यह हमारे लिए, हमारी स्वंय की मानसिकता के लिए कुछ चिंतन और मंथन का विषय भी हो सकता है.

पहले कहानी के दोनों पक्ष जान लेते हैं.

सरलता, सादगी और कमख़र्च का दंभ भरनेवाली सरकार के दो मंत्रियों के क़रीब तीन माह तक दिल्ली के सबसे महंगे पांच सितारा होटल में रहने की कहानी जब एक अख़बार ने छापी तो सरकार ने आनन-फ़ानन में डैमेज कंट्रोल की कार्रवाई की और वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने दोनों मंत्रियों को होटल खाली करने के आदेश दे दिए.

मंत्रियों का रुख, आहत और नाराज़गी (कि हम अपनी जेब से पैसा दे रहे हैं, किसी को क्या मतलब) से पूरा मामला चाय के प्याले में तूफ़ान से अधिक कुछ नहीं... कहकर डिसमिस करने का था.

कुछ इस हद तक मैं मंत्रियों कि बात से सहमत भी हूं. आख़िर दोनों मंत्रियों की घोषित आय करोड़ों की है. कुछ लाख होटल बिल के भुगतान में लग भी गए तो क्या हुआ. जैसा मेरे एक साथी का कहना था कि ऐसा तो नहीं था कि अगर ये मंत्री होटल में नहीं रहते तो यह राशि वो दान कर देते.

मतलब यह कि हमें क्या ज़रुरत है आवश्यकता से अधिक तांक-झांक करने की. उनका पैसा, जैसे चाहें, ख़र्च करें.

लेकिन बात इतनी सरल और सीधी सादी नहीं है. दोनों मंत्री उस सरकार का हिस्सा हैं जो आम आदमी और ग़रीब के नाम की हर मौक़े और बे-मौक़े कसम खाने से नहीं हिचकती. तो कहीं न कहीं अपने भी पैसे खर्च करते वक़्त उन्हें ज़्यादा संवेदनशीलता, सादगी और सरलता बरतनी चाहिए.

मंत्रियों ने निजी अधिकारों और प्राइवेसी की भी दुहाई दी. वे भूल गए कि सार्वजनिक पद और उसके तमाम फ़ायदों के साथ यह प्राइवेसी वाला तर्क गले नहीं उतरता. जब तक वे मंत्री हैं, उनका हर कदम, फ़ैसला और आचरण सार्वजनिकता के कटघरे मे तौला, परखा और जांचा जाएगा.

एक बड़ा मुद्दा और भी है जिसपर अब तक किसी ने चुप्पी नहीं तोड़ी है. न मंत्रियों ने, न उन होटल के प्रबंधनों ने, जहां वे ठहरे थे. भई, कोई वो बिल और भुगतान की रसीद तो पेश करे जो इन मंत्रियों ने बड़ी खु़दगर्ज़ी से अपनी जेब से चुकाया है.

उसके बाद ही हमें इस बात की जानकारी मिलेगी कि जिन होटलों को विदेश मंत्रालय हर साल दसियों करोड़ का बिजनेस देता है, उन होटलों ने उनके कुबेर समान विभाग के मंत्रियों से बिल स्वरुप कितनी राशि वसूल की है.

क्या सोचते हैं आप? पूरा किस्सा चाय के प्याले में तूफ़ान है या फिर दाल में कुछ काले का एक और नमूना है.

वर्चुअल दुनिया में रियली अकेला

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|शनिवार, 05 सितम्बर 2009, 02:59

टिप्पणियाँ (22)

लंदन के अख़बारों में ख़बर छपी है कि पति ने पत्नी को मार डाला क्योंकि वह फेसबुक जैसी वेबसाइटों पर बहुत ज्यादा समय बिताती थी.

शायद असली वजह कुछ और रही होगी. अगर कंप्यूटर पर अधिक समय बिताना क़त्ल किए जाने की असली वजह होता तो मेरे जैसे कितने ही लोग अपनी जान गँवा चुके होते.

मेरे घर में एक लैपटॉप और एक ही टॉयलेट है, अक्सर दूसरे लैपटॉप और दूसरे टॉयलेट की ज़रूरत महसूस होती रहती है, पत्नी से झगड़े भी हो जाते हैं, शुक्र है कि बात क़त्ल तक नहीं पहुँचती.

ज़रूरत के वक़्त टॉयलेट का दरवाज़ा बंद पाकर या लैपटॉप पर पत्नी को चैट करते देखकर एक ख़ास तरह की बेचैनी होती है. लगता है, कब फ्लश की आवाज़ आए या कब वो लॉग आउट करे.

सिर्फ़ रात को सोने के बाद और सुबह उठने से पहले इंटरनेट की ज़रूरत नहीं रहती. दिन भर दफ़्तर में, सुबह-शाम घर में, और रास्ते में मोबाइल फ़ोन पर...

इंटरनेट जब से ख़ुद तारों के बंधन से मुक्त हुआ है तबसे उसने हमें और कसकर जकड़ लिया है. वाईफ़ाई यानी वायरलेस इंटरनेट और मोबाइल इंटरनेट के आने के बाद तो ब्लैकबेरी और आईफ़ोन ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी है.

मेरे फ़ेसबुक वाले दोस्तों की संख्या 146 है, असली वालों का पता नहीं.

फ़ेसबुक वाले दोस्तों का हाल जानने के बाद ख़्याल आता है कि पत्नी का हाल तो पूछा ही नहीं, बच्चा स्कूल की किसी कारस्तानी के बारे में बताना चाहता था उसकी बात सुन ही नहीं पाया, अब तो वह सो गया.

आपमें से बहुत लोग बिछड़े दोस्तों को मिलने की बात कहेंगे, इंटरनेट को वरदान बताएँगे, मैं कब इनकार कर रहा हूँ. आप कहेंगे कि हर चीज़ की अति बुरी होती है, मुझे रियल वर्ल्ड और वर्चुअल वर्ल्ड में संतुलन बनाने की ज़रूरत है.

मैंने संतुलन बनाने की कोशिश की लेकिन अभी यही तय नहीं हो पा रहा है रियल वर्ल्ड कहाँ ख़त्म होता है और वर्चुअल वर्ल्ड कहाँ से शुरू होता है, संतुलन कैसे बनाऊँ, आप कैसे बनाते हैं? कई बार तो लगता है कि इंटरनेट कनेक्शन ड्रॉप होना और बिजली का जाना उतनी बुरी चीज़ नहीं है जितनी लगती है.

हम अकेले पड़ते जा रहे हैं इसलिए हमें सोशल नेटवर्किंग साइट्स की ज़रूरत है या सोशल नेटवर्किंग साइट्स ही हमें अकेला बना रही हैं? अकेलेपन के मर्ज़ की दवा हम इंटरनेट से माँग रहे हैं, यह अपनी ही परछाईं को पकड़ने की नाकाम सी कोशिश नहीं लगती?

असली रोग, बाहरी लक्षण और इलाज सब इस जाल के एक सिरे से शुरु होते हैं थोड़ी दूर जाकर उलझ जाते हैं, दुसरा सिरा कभी नहीं मिलता.

अपने कमरे में बैठकर आप पूरी दुनिया से जुड़ जाते हैं और अपने ही घर से कट जाते हैं.

वर्चुअल दोस्त, वर्चुअल खेल, वर्चुअल बर्थडे केक, वर्चुअल गिफ्ट्स, रियल अकेलापन, रियल बेचैनी.

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