वो साइबर हमला जिसने अलास्का की 'आंखें खोल दीं'

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- Author, क्रिस बारान्युक
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
डिजिटल दुनिया के इस दौर में हर काम ऑनलाइन होता है. सरकारें लोगों को डिजिटल लेन-देन के लिए प्रोत्साहित करती हैं. मेट्रो में सफ़र करें या हवाई जहाज़ से उड़ान भरें, ऑनलाइन टिकट ख़रीदने का चलन बढ़ता जा रहा है. नौकरियों से लेकर शादियां तक ऑनलाइन ढूंढी जा रही हैं.
ऐसे में एक दिन ऐसा हो, जब सारे कंप्यूटर बंद हो जाएं, तो क्या होगा?
ठीक वैसा ही होगा, जैसा अमरीका के अलास्का राज्य के एक शहर मटानुस्का-सुसित्ना में हुआ था.
वहां के बाशिदों को अब तक पता नहीं कि क्या हुआ था. लेकिन, जब ऐसी घटना हुई, तो मैट्सू की सारी व्यवस्था चरमरा गई थी, बल्कि ढेर हो गई थी.
असल में एक वायरस ने मटानुस्का-सुसित्ना के कंप्यूटर नेटवर्क पर हमला किया था. इससे शहर की पूरी व्यवस्था चौपट हो गई थी. डिजिटल होती दुनिया जब पटरी से उतरती है, तो क्या होता है, ये बात मटानुस्का-सुसित्ना पर हुए साइबर हमले से साफ़ हो गई थी.
जब एक वायरस ने मटानुस्का-सुसित्ना के कंप्यूटरों को ठप किया, तो सैकड़ों सरकारी कर्मचारियों के सिस्टम अचानक बंद हो गए.
स्थानीय पुस्तकालयों में लगातार फोन आने लगे कि वो अपने कंप्यूटर फौरन बंद कर दें. यहां तक कि जानवरों को रखने के ठिकानों में दर्ज दवाओं के आंकड़े कंप्यूटर वायरस के ऐसे क़ैदी बने कि वहां के कर्मचारियों को समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो बीमार जानवरों को कौन सी दवां दे.
बात सिर्फ़ यहीं तक नहीं रुकी. तैराकी सीखने के ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था ठप हो गई. नतीजा ये हुआ कि तैराकी सीखने की चाहत रखने वालों को बुकिंग के लिए क़तार में खड़े होना पड़ा. शहर के एक सरकारी दफ़्तर को तो काम चलाने के लिए पुराने टाइपराइटर निकालने पड़े, ताकि सरकारी अर्ज़ियां निपटाई जा सकें.
हेलेन मुनोज़ नाम की 87 बरस की बुज़ुर्ग महिला, जो सीवेज सिस्टम को बेहतर बनाने की मुहिम चला रही हैं, उन्हें एक दफ़्तर में फ़ोन करने पर जवाब मिला कि उनके कंप्यूटर ठप हो गए हैं.
हेलेन मुनोज़ कहती हैं कि, "इस साइबर हमले ने मटानुस्का-सुसित्ना शहर में सब-कुछ ठप कर दिया था. हक़ीक़त तो ये है कि हमारा शहर अब तक उसके झटके से पूरी तरह नहीं उबर सका है."

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गंभीर मुद्दा बन गया साइबर हमला
मटानुस्का-सुसित्ना शहर को मैट-सू के नाम से ज़्यादा जाना जाता है. अमरीका के उत्तरी राज्य अलास्का का ये शहर आज भी उस साइबर हमले से उबरने की कोशिश कर रहा है. जबकि साइबर अटैक को हुए महीनों बीत चुके हैं. मैट-सू के कंप्यूटरों पर वायरस का हमला जुलाई 2018 में हुआ था.
जब इस साइबर हमले के पहले संकेत मिले, तो किसी को भी ये अंदाज़ा नहीं था कि बात इतनी गंभीर हो जाएगी. शहर के आईटी कर्मचारियों को इस हमले से हुए नुक़सान की सफ़ाई के लिए 20-20 घंटे काम करना पड़ा था, ताकि क़रीब 150 सर्वरों से खुरच-खुरच कर वायरस हमले के अवशेष निकाले जा सकें.
मैट-सू एक ग्रामीण बस्ती है. यहां की आबादी केवल एक लाख है. ऐसे में इस शहर पर साइबर हमला होना अचरज की बात है.
आप को बताते हैं कि पिछले साल जुलाई में आख़िर हुआ क्या था.
23 जुलाई 2018 को मैट-सू के छोटे से मुहल्ले पामर के कर्मचारी रोज़ाना की तरह काम के लिए दफ़्तर पहुंचे. कुछ ही घंटों में वहां के एंटी वायरस ने लोगों को आगाह किया कि सिस्टम में कोई वायरस घुस आया है.
शहर के आईटी निदेशक एरिक वाइट ने अपनी टीम को इस मामले की पड़ताल के लिए कहा. उन्होंने वायरस से जुड़ी कुछ फ़ाइलें पाईं, तो उन्हें डिलीट कर दिया. और सभी कर्मचारियों को अपना लॉग इन और पासवर्ड बदलने को कहा. साथ ही सिस्टम की सफ़ाई का भी काम शुरू कर दिया गया.
लेकिन, जैसे ही कंप्यूटर सिस्टम की हिफ़ाज़त की ये व्यवस्था लागू की गई, तो इसके उल्टे ही नतीजे देखने को मिले.


एरिक वाइट बताते हैं कि एक के बाद एक कंप्यूटर ठप होने लगे. ऐसा लगा कि इस साइबर हमले का दूसरा स्टेज एक्टिव हो गया था. शायद किसी की निगाह, मैट-सू के आईटी विभाग की साइबर सुरक्षा के क़दमों पर थी. कई कंप्यूटरों पर तो बहुत अहम फ़ाइलें, इस हमले की शिकार हो गईं. हमलावर हैकरों ने सिस्टम से वायरस हटाने के लिए फ़िरौती मांगनी शुरू कर दी.
ऐसे वायरस को रैनसमवेयर कहते हैं, जिसके ज़रिए लोगों के सिस्टम पर हमला किया जाता है. फिर उनके डेटा को रिस्टोर करने के फ़िरौती वसूली जाती है.

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कंप्यूटर बंद हुआ और काम हुआ ठप
हाल के बरसों में रैनसमवेयर के हमले की वजह से कई शहरों में अस्पतालों, बंदरगाहों और दफ़्तरों में काम-काज ठप हो चुका है. इन हमलों की वजह से कुछ देर के लिए पूरी तरह से अराजकता का माहौल हो जाता है.
डिजिटल तरीक़े से काम निपटाने के हम इतने आदी हो चुके हैं कि आज हम समझ ही नहीं पाते कि अचानक डिजिटल दुनिया के पहिए ठहर गए, तो क्या होगा?
जानकार कहते हैं कि रैनसमवेयर के हमले से हर साल अरबों डॉलर का नुक़सान होता है.
लेकिन, एरिक वाइट के लिए अपने शहर के सिस्टम पर हुआ ये वायरस अटैक चौंकाने वाला था. उन्होंने इतना बड़ा साइबर हमला, अपने फौजी दिनों में देखा था. एरिक वाइट अमरीकी एय़रफ़ोर्स में आईटी अफ़सर थे. वो रक्षा क्षेत्र के सरकारी ठेकेदारों के साथ काम कर रहे थे.
एरिक बताते हैं कि, "मेरे पास आईटी सेक्टर में काम करने का 35 साल का तजुर्बा है. मैंने ऐसे कई हमले देखे हैं. लेकिन मैट-सू पर हुआ साइबर अटैक मेरी नज़र में सबसे बड़ा हमला है."
जब एरिक को लगा कि इस साइबर हमले से भारी नुक़सान होगा, तो उन्होंने शहर के प्रमुख मैनेजर जॉन मूसी को इसकी ख़बर की
दोनों ने बातचीत के बाद ये तय किया कि इससे निपटने में एफबीआई की मदद ली जानी चाहिए.
इसके बाद मैट-सू के सारे कंप्यूटर ऑफलाइन कर दिए गए. आईटी विशेषज्ञ, कंप्यूटरों में सेव डेटा को फिर से रिस्टोर करने में जुट गए. शहर के सरकारी दफ़्तरों के क़रीब 700 कंप्यूटरों को एक-एक कर के बारीक़ी से चेक करना था. यानी जांच पूरी होने तक वहां के किसी कंप्टूटर में काम करना ख़तरे से ख़ाली नहीं था.

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कंप्यूटर छोड़ कागज़ कलम पर लौटे
शहर के ख़रीदारी विभाग के कर्मचारियों को पर्चे काग़ज़ क़लम से भरने पड़े. उन्होंने दफ़्तर में पड़े पुराने टाइपराइटर निकालकर अपना काम चलाया. उनका ऐसा करना पूरी दुनिया में सुर्ख़ियां बना था.
जब सारे सिस्टम ऑफ़लाइन हो गए, तो कर्मचारियों को फ़ोन और वेबमेल से काम चलाना पड़ा. नतीजा ये हुआ कि काम होने की प्रक्रिया एकदम धीमी हो गई. क्रेडिट कार्ड पेमेंट से लेकर कचरा उठाने तक का काम धीमा हो गया था.
मैट-सू के सार्वजनिक पुस्तकालय की लाइब्रेरियन पेगी ओबर्ग ने कहा कि ये साइबर हमला बेहद डरावना था.
मैट-सू की बिग लेक लाइब्रेरी में एक हफ़्ते में 1200 से 1500 लोग आते हैं. इनमें से ज़्यादातर को इंटरनेट और कंप्यूटर सेवाओं की ज़रूरत होती है.
पेगी ओबर्ग कहती हैं कि आईटी डिपार्टमेंट ने सभी कंप्यूटरों को ऑफ़लाइन करा दिया था. उनके प्लग तक निकलवा दिए गए थे. सार्वजनिक वाई-फ़ाई सिस्टम से लोगों को लॉग आउट करने को कह दिया गया था.
पेगी ओबर्ग कहती हैं कि उन्होंने अपने बीस साल के करियर में ऐसा साइबर हमला कभी नहीं देखा था.


शहर की दूसरी लाइब्रेरी में भी किताबों का लेन-देन रोक दिया गया था. पुस्तकालय आने वालों से कहा गया कि वो चैटिंग के बजाय संवाद के दूसरे माध्यमों का इस्तेमाल करें. कई हफ़्तों तक मैट-सू की सभी लाइब्रेरी ठप रही थीं. क़रीब दो महीने तक पेगी ओबर्ग को इस बात की फ़िक्र रही कि सेवाओं से जुड़े उनके सारे आंकड़े उड़ गए तो वो क्या करेंगी.
पेगी उस हमले को याद कर के कहती हैं कि, "मुझे ये सोचकर ही सिहरन हो रही थी कि हम अपने डेटा को रिकवर नहीं कर पाएंगे. लेकिन, शुक्र है कि आईटी विभाग ने डेटा रेस्टोर कर दिया."
मैट-सू में आवारा और लावारिस जानवरों के ठिकाने में हर महीने 200-300 जानवर आते हैं. इनमें घर से भटक गए पालतू जानवरों से लेकर आवारा पशु तक शामिल होते हैं. लेकिन, इन एनिमल शेल्टर के कंप्यूटरों को भी ऑफ़लाइन कर दिया गया था. बिना रिकॉर्ड और दवाओं की जानकारी के, यहां के कर्मचारियों के लिए जानवरों की देखभाल करना मुश्किल हो गया था.
जो अपने लापता जानवर तलाशते हुए आते थे, उन्हें भी कर्मचारी माकूल जवाब नहीं दे पाते थे. यहां से जानवरों को पालने के लिए ले जाने की अर्ज़ियों का निपटारा भी साइबर अटैक की वजह से नहीं हो पा रहा था.
स्थानीय नागरिकों को मैट-सू पर हुए साइबर हमले से काफ़ी परेशानी हुई. एक बाशिंदे ने फ़ेसबुक पर लिखा कि, 'मैं कचरा उठाने के लिए जिस तरह से पेमेंट करता था, वो तरीक़ा तो बंद हो गया. अब मेरे पास इस बात का ई-मेल भी नहीं था कि मेरे पालतू कुत्ते को रेबीज़ का इंजेक्शन लग चुका है. और जब मैं अपने टैक्स भरता हूं, तो भी उसका तरीक़ा अजीब लगता है.'
वहीं, मैट-सू में रियल एस्टेट का धंधा करने वालों के पास मकानों और ज़मीन के आंकड़े ही नहीं बचे थे. बच्चों की स्विमिंग क्लास का रजिस्ट्रेशन तक इस साइबर हमले की वजह से नहीं हो पा रहा था.

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माना जा रहा है कि हमला चीन से हुआ था
एक स्थानीय वक़ील नैंसी ने बताया कि, "सब को लाइन में लगना पड़ रहा था. हमारा काम पुराने तरीक़े से हो रहा था."
कहा जाता है कि इस साइबर हमले से मैट-सू को क़रीब बीस लाख डॉलर का नुक़सान हुआ था.
साइबर हमला होने के बाद जांच करने वालों को इस बात के सबूत मिले कि वायरस उनके सिस्टम में मई महीने से ही था. इससे नए सवाल खड़े हो गए. पता चला कि मई महीने में ही मैट-सू का एक प्रतिनिधिमंडल चीन गया था. शायद ये वायरस वहीं से आया था. हालांकि इस साइबर हमले में चीन के हैकर शामिल थे, इसके पक्के सबूत नहीं मिले.
लेकिन, माना यही जा रहा है कि मैट-सू पर ये साइबर हमला चीन से ही हुआ था. जांच में आगे पता चला कि हर कंप्यूटर की फ़ाइनल नंबर 210 को निशाना बनाया गया था. यानी इससे पहले जहां भी इस वायरस से हमला किया गया था, वो 209वां साइबर अटैक रहा होगा. मैट-सू पर हुआ साइबर हमला, इस वायरस का 210वां शिकार था.
एरिक वाइट कहते हैं कि ये साइबर हमला एक संदिग्ध मेल के ज़रिए किया गया था, जिसे मैट-सू के एक कर्मचारी के पास भेजा गया था.
इस अनजान से अहितकर मैसेज पर जब उस कर्मचारी ने क्लिक किया, तो ये वायरस कंप्यूटर सिस्टम में घुस गया. वहां से वो तमाम सरकारी विभागों के कंप्यूटरों में फैलता गया.


एरिक वाइट कहते हैं कि इस हमले की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन हैकरों की है, जिन्होंने ये वायरस भेजा था.
साइबर हमले के बाद के 10 हफ़्तों तक आईटी विभाग शहर के तमाम सरकारी सर्वरों की सफ़ाई का काम करता रहा, ताकि पूरी व्यवस्था को फिर से ऑनलाइन किया जा सके.
अगस्त 2018 में एरिक वाइट ने एक वीडियो संदेश के ज़रिए दुनिया को बताया कि साइबर हमले के बाद उन्होंने कंप्यूटरों का कितना बड़ा सफ़ाई अभियान चलाया. इस में एफबीआई के साइबर एक्सपर्ट भी शामिल थे. वो मैट-सू के कर्मचारियों की मुस्तैदी से काफ़ी प्रभावित हुए.
लेकिन, शहर का हर नागरिक मैट-सू के आईटी विभाग के काम से संतुष्ट नहीं था, कई लोगों ने सवाल उठाया कि क्या वाक़ई साइबर हमला हुआ? किसी ने पूछा कि हमारे छोटे से शहर पर कोई साइबर हमला क्यों करेगा भला?

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एफबीआई को लगता है कि इस साइबर हमले के पीछे जो लोग थे, उनका इरादा वसूली का था. लेकिन, एफबीआई ने मैट-सू के अधिकारियों को साफ़ तौर पर सलाह दी थी कि पैसे मांगे जाने पर वो हैकरों को पैसे तो बिल्कुल न दें.
इस साइबर हमले की जांच की निगरानी करने वाले एफबीआई के एजेंट विलियम वाल्टन कहते हैं कि मैट-सू पर हुआ साइबर हमला बेहद गंभीर था. ये किसी बड़े शहर में होता तो हाहाकार मच जाता. ये तो बहुत छोटी सी आबादी थी, सो इतना शोर-शराबा नहीं हुआ. वरना शहर का सिस्टम ठप होने पर दंगे तक हो सकते थे.
वाल्टन कहते हैं कि, 'मैट-सू के पास ऐसे हमलों से निपटने के लिए ठोस इंतज़ाम नहीं थे. लेकिन, अब ऐसे साइबर हमले बहुत आम हो गए हैं. अब जबकि तमाम काम ऑनलाइन हो रहा है, तो लोगों को ऐसे हमलों के नतीजे भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.'
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
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