आग लगाकर आग पर काबू पाने के तरीकों की तलाश

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- Author, क्रिस बरानीक
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
मार्क फिने अमरीका के वन विभाग के अधिकारी हैं. कई बार वो जंगलों में जाकर आग लगाते हैं.
उनका मक़सद लोगों को परेशान करना या नुकसान करना नहीं होता. बल्कि वो आग लगाकर आने वाले वक़्त में लगने वाली आग की भविष्यवाणी का मॉडल विकसित कर रहे हैं.
जी हां, वो जंगल में आग लगने के पूर्वानुमान के लिए काम कर रहे हैं. जो आग मार्क और उनके साथी लगाते हैं, वो एक तयशुदा इलाक़े में ही फैल पाती है. इसका मक़सद ये तजुर्बा करना होता है कि किन हालात में आग लगती है और तेज़ी से फैलती है. किसी इलाक़े में अगर आग तेज़ी से फैल रही है, तो उसकी वजह क्या है.
मार्क कहते हैं कि, "हम आग लगाने के बाद ड्रोन से पूरे इलाक़े की निगरानी करते हैं. इसके अलावा जहां आग लगाई जाती है, उस इलाक़े में कैमरे फिट किए जाते हैं, ताकि आग के हालात और वजह के बारे में बारीक पड़ताल की जा सके."
आग की 'खोज' इंसान के विकास की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है. मगर, इंसान के धरती पर आने से करोड़ों साल पहले से ये ग्रह जल रहा था. आग लगती और बुझती रही थी. क़ुदरती प्रक्रिया के तहत ऐसा हो रहा था. आज भी हम आग पर क़ाबू नहीं पा सके हैं. अमरीका में जंगलों में लगने वाली आग की घटनाओं में से 80 फ़ीसद के पीछे इंसान का हाथ होता है.
हर साल की तरह इस साल भी धरती के तमाम हिस्सों में सूखा पड़ा और भयंकर गर्मी रही. ऐसे हालात जंगल की आग भड़कने के लिए मुफ़ीद होते हैं.

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आग का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल
यूनान से लेकर स्वीडन और साइबेरिया के सर्द इलाक़ों तक में भयंकर आग लगी. अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में तो इतिहास में दर्ज सबसे भयंकर जंगल की आग लगी.
जंगल की इस आग से भारी नुक़सान होता है. जान-माल के इस नुक़सान को रोका जा सकता है, अगर हम ये अंदाज़ा लगा सकें कि आग कहां लगने वाली है.
लेकिन, जैसे हम ज़लज़ले या भूकंप की भविष्यवाणी नहीं कर सकते, ठीक वैसे ही जंगल में कब आग भड़क उठेगी, इसका पूर्वानुमान लगाना कमोबेश नामुमकिन माना जाता है. हालात तब और मुश्किल हो जाते हैं, जब जंगलों में आग इंसान की ग़लती से भड़क उठती है.
फिर भी मार्क फिने जैसे बहुत से लोग हैं, जो जंगल में आग का पूर्वानुमान लगाने के मॉडल विकसित करने पर काम कर रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि जो आंकड़े वो आग लगाकर जुटा रहे हैं, वो आगे चलकर जंगल की आग की ठोस भविष्यवाणी करने में मदद करेंगे.
मार्क कहते हैं कि आग के पूर्वानुमान के कई मॉडल तो इतने बचकाने है कि उन्हें सिरे से ख़ारिज कर दिया जाना चाहिए. अब आग लगने के वक़्त हवा किस तरफ़ से और कितनी तेज़ी से बहेगी, इसका कोई मॉडल फ़िलहाल नहीं है.
हालांकि इस दिशा में तेज़ी से काम हो रहा है. इसी साल जुलाई में ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगने वाली भयंकर आग की समीक्षा की गई. इसके बाद आगे लगने वाली आग के पूर्वानुमान जारी किए गए. पाया गया कि ये पूर्वानुमान पहले के मुक़ाबले 50 फ़ीसद बेहतर थे.

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अच्छा तो तब हो, जब हम आग भड़कने के पहले ही इसके बारे में जान जाएं. लेकिन क्या ऐसा मुमकिन है?
इस सवाल का जवाब मैक्स जोसेफ़ के पास हो सकता है. मैक्स कोलोराडो की बोल्डर अर्थ लैब में काम करते हैं. उन्होंने जंगल की आग से जुड़े दिलचस्प आंकड़े जुटाए हैं.
मैक्स और उनकी टीम ने 1984 से अब तक के जंगल की आग के आंकड़ों की समीक्षा की. हवा में नमी, सूखे और तापमान को देखा. मैक्स ने पाया कि अगर बारिश नहीं हुई है. यानी हवा में नमी नहीं है और भयंकर गर्मी पड़़ रही है, तो जंगल में आग भड़कने की आशंका बहुत बढ़ जाती है.
मैक्स के जुटाए आंकड़ों के आधार पर अगले पांच साल के लिए अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में जंगल की आग भड़कने के पूर्वानुमान जारी किए गए. 99 प्रतिशत पूर्वानुमान सही साबित हुए.
हालांकि ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि आग कितने बड़े इलाक़े में फैलेगी. मगर मैक्स ने जो सिस्टम विकसित किया है, उससे उम्मीद बंधी है कि आगे चल कर जंगल की आग लगने के पूर्वानुमान और सटीक होंगे. इससे प्रशासन को हालात से निपटने में मदद मिलेगी. नुक़सान को कम किया जा सकेगा.
आग की ऐसी ही स्पेशलिस्ट हैं डोमिनिक बैशलेट. वो अमरीका की ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी में पर्यावरण वैज्ञानिक हैं. बैशलेट कहती हैं कि आग भड़कने पर कितना नुक़सान होगा, इसका अंदाज़ा उस इलाक़े की आबादी और रिहाइश से लगाया जा सकता है. पूरे इलाक़े में कितने जंगल हैं, ये आंकड़ा हो, तो पूरे नुक़सान के पारे में अंदाज़ा लगा सकते हैं.
बैशलेट ने जो मॉडल विकसित किया है, उसमें इलाक़े में हुई बारिश से जंगल की आग के पूर्वानुमान लगाए जा सकते हैं. कम बारिश का मतलब होगा किसी भी इलाक़े में कम नमी. यानी आग लगने की ज़्यादा आशंका.
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के पार्क विलियम्स कहते हैं कि गर्म और सूखा मौसम आग लगने का सीधा संकेत है. कैलिफ़ोर्निया में अक्सर ऐसा होता है. इस साल भयंकर गर्मी पड़ी थी. नतीजा ये कि कैलिफ़ोर्निया के जंगलों में अब तक की सबसे भयंकर आग लगी थी.

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कहां-कहां जल्दी भड़कती है आग?
आग लगने वाले इलाक़ों में रहने वालों के लिए सबसे अच्छी जानकारी तो ये होती है कि आग कितने बड़े इलाक़े में फैलेगी. उन्हें अपना घर-बार छोड़कर जाना होगा या नहीं. सटीक पूर्वानुमान हो, तो आग से निपटने की तैयारी करना भी आसान होता है.
लेकिन, ऐसे अंदाज़े लगाने की सब से बड़ी दिक़्क़त ये है कि मौसम किस करवट बैठेगा, कुछ कह नहीं सकते. फिर आग कितनी भयंकर होगी, ये उस इलाक़े में मौजूद पेड़-पौधों और झाड़ियों पर निर्भर करता है. इस बात के आंकड़े तो जुटाए जा रहे हैं. मगर अभी इसमें वक़्त लगेगा.
आग अक्सर इंसान की ग़लती से लगती है. वो ऐसी ग़लती से कब दावानल भड़का दे, ये कैसे पता लगा सकते हैं?
अब आग में दिलचस्पी लेने वाले वैज्ञानिक, आग के शिकार इलाक़ों के नक़्शे बना रहे हैं. उन इलाक़ों के पेड़-पौधों के आंकड़े जमा कर रहे हैं. इनकी मदद से आग भड़कने के पूर्वानुमान लगाकर लोगों को आग लगने से पहले ही सुरक्षित निकाला जा सकेगा.

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इस बारे में सही जानकारी रखने वालों में से एक हैं एली ग्रेडेन. एली, रेडज़ोन एनालिटिक्स नाम की कंपनी में काम करती हैं.
एली का काम होता है जंगल की आग को लेकर आंकड़े जमा करना. इन आंकड़ों को वो बीमा कंपनियों और दूसरे कारोबार करने वाली कंपनियों को देती हैं. बीमा कंपनियां इन आंकड़ों के आधार पर आग की आशंका वाले इलाक़ों में संपत्ति और जान का बीमा करती हैं. इसी आधार पर वो मुआवज़े की रक़म तय करती हैं. एली के जुटाए आंकड़े बीमा कंपनियों को आग से नुक़सान का अंदाज़ा लगाने में मदद करते हैं.
एली कहती हैं कि आग से जुड़े उनके मॉडल आग लगने के नतीजों का विश्लेषण करते हैं. इनके आधार पर भविष्य में आग लगने की आशंका के पूर्वानुमान जारी किए जाते हैं. पिछले साल रेडज़ोन के मॉडल के आधार पर आशंका ज़ाहिर की गई थी कि कैलिफ़ोर्निया के कॉफ़ी पार्क में आग लगेगी. ये आग कितनी भयंकर होगी, इसका अंदाज़ा भी एली की टीम ने लगाया था. ये पूर्वानुमान 90 प्रतिशत तक सटीक निकला.
एली कहती हैं कि वो अपने आंकड़े और पूर्वानुमान को और बेहतर बनाने पर काम कर रही है. किसी इलाक़े में लकड़ी के मकान हैं, तो वहां ज़्यादा नुक़सान होगा. ईंट-पत्थर और कंक्रीट के मकानों को आग से कम नुक़सान होता है.

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तो, जंगल की आग का भविष्य क्या है?
दुनिया भर के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो जंगल की आग भड़कने की घटनाएं कम हो रही है. इसकी बड़ी वजह ये है कि खेती के लिए ज़्यादा ज़मीन इस्तेमाल हो रही है.
लेकिन, जलवायु परिवर्तन की वजह से जंगल की आग भयानक होती जा रही हैं. ऐसी जगह ये घटनाएं हो रही हैं, जहां पहले नहीं हुआ करती थीं. यानी रिहाइशी बस्तियों के क़रीब.
डोमिनिक बैशलेट कहती हैं कि जिन जंगलों में हल्की-फुल्की आग भड़कती थी, वो आज जलवायु परिवर्तन की वजह से तेज़ी से जल रहे हैं. इसके बाद जो पेड़-पौधे उगेंगे, उनमे आग लगने की आशंका कम होगी. ऐसे इलाक़ों का इकोसिस्टम नए माहौल से अभी तालमेल बैठा रहा है.
कैलिफ़ोर्निया में बरसों-बरस की आग की वजह से जंगल और भी घने होते जा रहे हैं.
आग इकोसिस्टम का अभिन्न अंग है. लेकिन, इसका रंग-रूप और तेवर बदल रहा है. वजह है इंसान का बढ़ता दखल.
आज दुनिया गर्म हो रही है. नतीजा ये कि आग लगने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं. नुक़सान भी हो रहा है. मगर मैक्स, मार्क, डोमिनिक और एली जैसे लोगों की वजह से हम आग लगने का पूर्वानुमान भी लगा पा रहे हैं.
हम, आग लगने का सटीक पूर्वानुमान तो शायद न लगा पाएं, मगर नुक़सान से काफ़ी हद तक ख़ुद को बचा सकेंगे. इसके रास्ते में आने से बच निकलेंगे.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)


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