समुद्र के पानी से रेगिस्तान में उगती फ़सल

रेगिस्तान में खेती

इमेज स्रोत, Amanda Ruggeri

    • Author, अमांडा रुग्गरी
    • पदनाम, जॉर्डन से, बीबीसी फ़्यूचर

विश्व खाद्य संगठन का कहना है कि 2050 में हमें आज के मुक़ाबले पचास फ़ीसदी ज़्यादा फ़सलें उगानी होंगी. तभी हम बढ़ती आबादी का पेट भर सकेंगे.

ये आसान काम तो है नहीं. चुनौती ये है कि हमें फ़सलों का उत्पादन इसी धरती के दायरे में बढ़ाना है. और हमारी धरती की अपनी सीमाएं हैं. कहीं समंदर हैं, तो कहीं पहाड़ और कहीं रेगिस्तान ने अपनी बांहें फैला रखी हैं.

नतीजा ये कि खेती लायक ज़मीन सीमित ही है. और ये भी लगातार खेती की वजह से आहिस्ता-आहिस्ता ख़राब हो रही है.

चुनौती इतनी ही नहीं है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की अधिकारी सिल्वी वैब्स-कैंडोटी कहती हैं कि धरती की बदलती आबो-हवा पैदावार बढ़ाने की राह में नई मुश्किलें खड़ी कर रही है. जलवायु परिवर्तन की वजह से कहीं सूखा पड़ रहा है, तो कहीं बाढ़ फ़सलों को तबाह कर रही है.

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पानी की कमी

ये मुश्किलों का 'चेन रिएक्शन' है. एक का असर दूसरे पर पड़ रहा है. आज की तारीख़ में दुनिया भर में मौजूद कुल ताज़े पानी का 70 फ़ीसदी फ़सलें पैदा करने में इस्तेमाल होता है. वहीं, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार ग्रीनहाउस गैसें पैदा करने में 25 प्रतिशत योगदान खेती का है.

तो, क़िस्सा यूं है कि अगर आप फ़सलों की पैदावार बढ़ाना चाहते हैं, तो आप मान कर चलिए कि पैदावार बढ़ाएंगे, तो प्रदूषण भी बढ़ेगा. फ़सलें उगाने का मौजूदा तरीक़ा दिनों-दिन पुराना पड़ रहा है. आज जैसे खेती हो रही है, उसमें फ़सलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए चाहिए होगा पानी.

अब दुनिया में तमाम ऐसे देश हैं, जहां पानी की भारी किल्लत है.

जॉर्डन को ही लीजिए. यहां पानी की भारी कमी है. देश का बड़ा हिस्सा रेगिस्तान है. ऐसे में जॉर्डन को बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए फ़सलें उगाने के नए तरीक़े आज़माने होंगे.

जॉर्डन ऐसा कर भी रहा है. लाल सागर से क़रीब 15 किलोमीटर जॉर्डन के भीतर और इज़राइल से लगी सीमा से महज़ एक किलोमीटर दूर ये तजुर्बा किया जा रहा है. यहां एक ग्रीनहाउस में तमाम तरह के फल और सब्ज़ियां उगाई जा रही हैं. टमाटर से लेकर खीरे तक की खेती की जा रही है.

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रेगिस्तान में खेती

रेगिस्तान में ये हरियाली लेकर आया है सहारा फ़ॉरेस्ट प्रोजेक्ट फाउंडेशन. जॉर्डन के रेतीले माहौल में हो रहे इस तजुर्बे का नाम है वादी अराबा प्रोजेक्ट.

फाउंडेशन के प्रमुख जोआकिम हेग कहते हैं, ''आप जलवायु परिवर्तन को अलग कर के नहीं देख सकते हैं. ये पानी के इस्तेमाल और खेती से जुड़ा हुआ है. अगर आप धरती की आबो-हवा में बदलाव को रोकना चाहते हैं, तो आप को आमूल-चूल बदलाव करना होगा. तो हम ने मौजूदा संसाधनों की मदद से खेती में इंक़लाब की ये चिंगारी जलाने की कोशिश की है.''

जॉर्डन को सबसे ज़्यादा ज़रूरत पानी की है. पानी के लिहाज़ से जॉर्डन दुनिया का दूसरा सब से ग़रीब देश है. यहां साल भर में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 150 क्यूबिक मीटर है.

वहीं अमरीका में हर नागरिक को साल भर में 9,000 क्यूबिक मीटर से भी ज़्यादा पानी मिलता है.

जॉर्डन के कुल क्षेत्रफल का दो तिहाई हिस्सा रेगिस्तान है. जॉर्डन में मौजूद कुल ताज़े पानी का आधा हिस्सा खेती में इस्तेमाल होता है. मगर खेती का जॉर्डन की जीडीपी में कुल योगदान महज़ 3 प्रतिशत है.

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सूर्य की रोशनी और सागर का पानी

जॉर्डन के पास जो एक चीज़ बड़ी तादाद में है, वो है सूरज की रोशनी. साल के 330 दिन जॉर्डन में सूरज की चटख़ रोशनी रहती है.

जॉर्डन क़ुदरत की जिस एक और नेमत से लबरेज़ है, वो है समुद्र का पानी. हालांकि जॉर्डन की ज़्यादातर सरहद ज़मीनी है, मगर एक हिस्सा भूमध्यसागर से जुड़ा है. और इसकी सीमा का 26 किलोमीटर लाल सागर से भी लगता है.

हालांकि ये बहुत बड़ा समुद्री किनारा नहीं है. मगर, सहारा फॉरेस्ट प्रोजेक्ट ने इस सीमित संसाधन को नेमत में बदलने की ठानी है.

वादी अराबा में चल रहा सहारा फॉरेस्ट प्रोजेक्ट कुछ इस तरह काम करता है. सूरज की रोशनी से पैदा हुई बिजली से समुद्री पानी को साफ़ करके खेती लायक़ बनाया जाता है.

इस पानी की मदद से ग्रीनहाउस को ठंडा किया जाता है. जो फ़सलें ग्रीनहाउस में उगाई जाती हैं, वो पर्यावरण से कार्बन सोख कर प्रदूषण कम करने में मदद करती हैं.

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98 फ़ीसदी खाना आयात

आज की तारीख़ में जॉर्डन अपनी कुल ज़रूरत का 98 फ़ीसद खाना आयात करता है. इस छोटे से प्रोजेक्ट को अगर बड़े पैमाने पर पूरे जॉर्डन में लागू किया जाता है, तो आने वाले वक़्त में इसकी अनाज और दूसरी फ़सलों की ज़रूरत घर की खेती से ही पूरी हो जाएगी.

विश्व खाद्य संगठन की अधिकारी सिल्वी कहती हैं, ''जॉर्डन अपने खाने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है. पानी की भारी किल्लत है. अगर आप बारिश के भरोसे नहीं रह सकते, तो समुद्र का पानी साफ़ करके इस्तेमाल करना एक वरदान साबित हो सकता है. इसके लिए पर्याप्त मात्रा में पैसा और तकनीक होनी चाहिए. अगर ये है तो आप अपने खाने का उत्पादन ख़ुद कर सकते हैं. बल्कि आप निर्यातक भी बन सकते हैं.''

वैसे ये बात कहनी जितनी आसान है, अमल में लानी उतनी ही पेचीदा. सहारा प्रोजेक्ट अभी एक साल का ही हुआ है. इसे पिछले साल सितंबर में शुरू किया गया था. ये फुटबॉल के चार मैदानों के बराबर इलाक़े में फैला है. कुल 200 हेक्टेयर ज़मीन पर खेती हो रही है. अगर ये साबित हो जाता है कि ये कॉन्सेप्ट काम कर रहा है, तो इसे आगे बढ़ाया जाएगा.

इस में कोई दो राय नहीं कि चुनौतियां बड़ी हैं. रेगिस्तान में समुद्र का पानी साफ़ कर के खेती करना आसान काम नहीं.

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गर्मी का क़हर

ग्रीनहाउस प्रोजेक्ट जिस इलाक़े में है, वो तपता रेगिस्तान है. अक्सर ग्रीनहाउस से बाहर भट्टी जैसी गर्मी होती है. ऐसे गर्म माहौल से घिरे ग्रीनहाउस में खीरा-ककड़ी उगाने के लिए सही तापमान बनाए रखना कोई आसान काम तो है नहीं. ग्रीनहाउस की दीवारों के क़रीब उगाई जाने वाली फ़सलें अक्सर भयंकर गर्मी से ख़राब हो जाती हैं.

इस प्रोजेक्ट को क़ामयाब बनाने के लिए कई बार तापमान को एसी चलाकर 15 डिग्री सेल्सियस तक कम किया जाता है. ठीक उसी वक़्त ग्रीनहाउस से बाहर जब तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आस-पास होता है, तो फ़सलों को बचाने के लिए एयर कंडीशनर का सहारा लिया जाता है.

इस प्रोजेक्ट के फ़ैसिलिटी मैनेजर फ्रैंक उत्सोला कहते हैं, ''समुद्र के पानी को पंप कर के ग्रीनहाउस की दीवारों पर से गुज़ारा जाता है. इस दीवार से लगी कंबल जैसी चीज़ पानी सोखती है. जब हवा चलती है, तो ये पानी सूख जाता है. इससे माहौल ठंडा हो जाता है. ठीक उसी तरह जैसे आप भयंकर गर्मी के दिन भीगा तौलिया लपेटकर ख़ुद को हवा करें. इसी दौरान समुद्री पानी में मौजूद नमक के कण भी छंट कर अलग हो जाते हैं.''

वैसे ग्रीनहाउस के भीतर पंखों को सोलर एनर्जी से भी चलाया जा सकता है. मगर इसकी ज़रूरत नहीं पड़ती. इस इलाक़े में अक्सर हवा चलती रहती है.

फ्रैंक उत्सोला कहते हैं कि उनका ये प्रयोग कोई नई बात नहीं. इलाक़े के बद्दू आदिवासी क़ालीन को भिगो कर सदियों से अपने तंबुओं को ठंडा करते आए हैं. इसी तरह सौर ऊर्जा और समुद्र के पानी को साफ़ करने की तकनीक भी कोई नई नहीं है.

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समुद्र का पानी रेगिस्तान तक लाना

रात के वक़्त रेगिस्तान में तापमान गिरकर 7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. उस वक़्त दिन में गर्म हुए पानी को पाइप से गुज़ारा जाता है, तो इससे ग्रीनहाउस की फ़सलों को गर्मी मिलती है.

ग्रीनहाउस के भीतर की फ़सलों को ज़रूरत से ज़्यादा पानी दिया जाता है. इनमें से काफ़ी पानी बाहर ज़मीन तक फैल जाता है. ग्रीनहाउस से बाहर भी कई फ़सलें लगाई गई हैं. ये एक अलग प्रयोग है. रेगिस्तान में उग सकने वाले सैकड़ों पौधे लगाए गए हैं. देखा ये जा रहा है कि ग्रीनहाउस प्रोजेक्ट से इसके बाहर के माहौल में उग रही फ़सलों पर क्या असर पड़ता है.

वैसे प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के लिए एक चुनौती और भी है. समुद्र तट यहां से 15 किलोमीटर दूर है. सवाल ये है कि इतनी दूर तक समुद्र का पानी लाया कैसे जाए?

फिलहाल तो टैंकरों से हर दो दिन में यहां पानी लाया जाता है. ये कोई प्रदूषण कम करने वाला तरीक़ा तो है नहीं.

अब अगर इस तजुर्बे का दायरा बढ़ाना है तो समुद्र तट से भीतरी रेगिस्तान तक पानी लाने के लिए पाइपलाइन बिछानी होगी. इस में अरबों डॉलर का ख़र्च आएगा.

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हालांकि तमाम चुनौतियों के बावजूद सहारा फॉरेस्ट प्रोजेक्ट के मैनेजर नाउम्मीद नहीं हैं. वो अभी ये समझने की कोशिश कर रहे हैं कि पाइपलाइन बिछाने के और क्या फ़ायदे हो सकते हैं. इससे रोज़गार और कारोबार की कितनी संभावनाएं निकल सकती हैं.

प्रोजेक्ट की टीम का मानना है कि इस रेगिस्तान में हरियाली के लिए जो तकनीक चाहिए, वो सटीक साबित हो चुकी है. ज़रूरत जॉर्डन के हुक्मरानों के मज़बूत इरादों और अधिकारियों के खड़े किए गए बैरियर से पार पाने की है.

शायद यहां उगे खीरे और दूसरी सब्ज़ियां खाने से उनका मन बदल जाए.

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