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शनिवार, 21 फ़रवरी, 2009 को 12:45 GMT तक के समाचार
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पाकिस्तान को ख़ुश करने की पहल

आईसीसी
भारत आईसीसी का सबसे धनी सदस्य है
क्रिकेट विश्व कप 2011 अभी काफ़ी दूर है. फिर भी अंतरराष्ट्रीय किक्रेट परिषद (आईसीसी) इस प्रतियोगिता के कार्यक्रम को अंतिम रूप देने में इतना उतावलापन क्यों दिखा रहा है?

पाकिस्तान का हाल जग ज़ाहिर है. दो साल बाद वहाँ की स्थिति के बारे में अंदाज़ा लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है.

आईसीसी पाकिस्तान में चैम्पियंस ट्रॉफ़ी आयोजित नहीं करने का फ़ैसला पहले ही कर चुकी है. दुनिया की अधिकांश क्रिकेट टीमें पाकिस्तान का दौरा करने से साफ़ इनकार कर चुकी हैं.

पाकिस्तान में आए दिन जिस तरह की घटनाएँ हो रही हैं, उससे स्थिति में ज़्यादा सुधार होने की उम्मीद दिखाई नहीं देती. क्या वज़ह है कि आईसीसी को 2011 विश्व कप की चिंता सता रही है.

इसका कारण यह है कि चैम्पियंस ट्रॉफ़ी किसी दूसरे देश में आयोजित किए जाने पर पाकिस्तान ने अपनी दावा ठोंक दिया है.

पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड की माँग है कि चैम्पियंस ट्रॉफ़ी की गारंटी की रक़म 2.6 करोड़ डॉलर उसे दिए जाएँ.

नफ़ा-नुकसान

लेकिन जिस प्रतियोगिता से चार करोड़ डॉलर की आमदनी की उम्मीद हो, उसमें से इतनी बड़ी राशि अलग करने के बाद कोई नया मेज़बान देश खोज पाना शायद संभव नहीं हो.

तभी तो बीते साल अगस्त में श्रीलंका का नाम विकल्प के रूप में घोषित किए जाने के बावजूद चैम्पियंस ट्रॉफ़ी के लिए आयोजन की ज़िम्मेदारी उन्हें नहीं दी गई.

यह बात तय है कि बिना मुनाफ़े के कोई भी देश प्रतियोगिता की मेज़बानी के लिए आगे नहीं आएगा.

इससे भी ज़्यादा बड़ा कारण यह है कि आईसीसी जून में इंग्लैंड में होने वाले ट्वेन्टी-20 विश्व कप में कोई ख़लल नहीं डालना चाहेगा.

उसे क्रिकेट खेलने वाले सभी प्रमुख देशों की भागीदारी सुनिश्चित करनी है. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इंग्लैंड हो या दुनिया को कोई भी देश, भारत-पाकिस्तान का आमना-सामना नहीं हुआ तो प्रतियोगिता खटाई में पड़ जाती है.

वर्ष 2007 के विश्व कप में जो हुआ था, आईसीसी अधिकारी उसे भूले नहीं होंगे.

बीसीसीआई का दबाव

चैम्पियंस ट्रॉफ़ी
आईसीसी ने सुरक्षा कारणों से प्रतियोगिता टाल दी थी

मुनाफ़े और घाटे की इस सीधी बात से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात आईसीसी पर बीसीसीआई का दबाव है. मुंबई पर हुए हमलों के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक संबंध काफ़ी बिगड़ चुके हैं.

यही वज़ह है कि भारतीय क्रिकेट टीम ने जनवरी में पाकिस्तान का दौरा रद्द कर दिया और इससे पीसीबी दिवालिया होने की क़गार पर आ गया.

लेकिन पाकिस्तान क्रिकेट अधिकारियों के हाथ बीसीसीआई पर दबाव डालने के लिए इंडियन क्रिकेट लीग का अचूक नुस्खा हाथ लग गया.

पाकिस्तान ने आईसीएल में भाग ले चुके खिलाड़ियों पर से घरेलू क्रिकेट में भाग लेने की पाबंदी हटा ली है. प्रतिबंध भले ही अदालत के फ़ैसले के कारण हटा हो, लेकिन पाकिस्तान के मीडिया में ख़बरें आ रही हैं कि पाँच-छह खिलाड़ियों के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के दरवाज़े फिर से खुल सकते हैं.

बीसीसीआई को यह बात कतई मंज़ूर नहीं है. आईसीएल के आयोजकों की तमाम कोशिशों के बावज़ूद भारतीय क्रिकेट अधिकारी उनके साथ बातचीत के लिए भी तैयार नहीं हैं.

दूसरी ओर पाकिस्तान ने अगर किसी आईसीएल प्रतियोगिता से जुड़े खिलाड़ियों को अपनी टीम में शामिल किया तो भारत के पास अपनी टीम को वापस बुलाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होगा.

इसके बाद ज़ुर्माना और साख़ बचाने की क़वायद शुरू होगी. अपनी मज़बूत आर्थिक स्थिति के बावज़ूद भारत इस पूरे झमेले से बचने की कोशिश कर रहा है. पाकिस्तान को ख़ुश करने के लिए बीसीसीआई भी कोई मौक़ा गँवाना नहीं चाहता.

पीसीबी की मज़बूरी

आईसीसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हारून लॉरगेट ने 2011 विश्वकप की साझा मेज़बानी को और पुख़्ता करने के लिए भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश की संयुक्त आयोजन समिति के बनाए संभावित कार्यक्रम की घोषणा की.

लेकिन लॉरगेट ने साथ ही यह चेतावनी भी दे डाली कि अगर सुरक्षा की स्थिति सही प्रतीत नहीं हुई तो मैच कहीं और खेले जाने के लिए तैयार रहना चाहिए. पाकिस्तान के हालात पर अभी कोई फ़ैसला करने की ज़रूरत नहीं है.

पीसीबी को मालूम है कि अगर भारत ने उसका साथ नहीं दिया तो विश्व कप की मेज़बानी उसके हाथ से निकलने में पलभर की देर भी नहीं लगेगी. वैसे भी पाकिस्तान बोर्ड की आर्थिक स्थिति गंभीर है.

भारतीय क्रिकेट बोर्ड हर क़ीमत पर आईसीएल को मान्यता मिलने पर रोक लगाएगा. उसे अपनी इंडियन प्रीमियर लीग़ यानी आईपीएल का प्रतिद्वंद्वी नहीं चाहिए.

यही मुख्य कारण है कि भारत ने आईसीसी में अपना भरपूर ज़ोर लगाकर पाकिस्तान को शांत रखने की कोशिश की है.

आईसीसी के पास भी अपने सबसे धनी सदस्य के सुझाव मानने के अलावा और चारा भी क्या है.

पर भारत और आईसीसी, दोनों को नहीं भूलना चाहिए कि मामलों पर पर्दा डालने से समस्या का समाधान नहीं निकलेगा. आईसीएल का हल पाकिस्तान नहीं बल्कि भारत से ही निकलेगा.

पाकिस्तान को अपनी मुश्किलों का हल ख़ुद तलाश करना होगा. भारत और आईसीसी इस बारे में कुछ करने की स्थिति में बिल्कुल नहीं है.

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