'ब्लैक पर्ल के बारे में कुछ बताइए' फ़िल्म 'गोलमाल' का ये डायलॉग और पेले की भारत में लोकप्रियता

पेले

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    • Author, मोहम्मद अमीन
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

फुटबॉल की दुनिया में पेले का क़द वही था जो क्रिकेट की दुनिया में डोनाल्ड ब्रैडमैन और मुक्केबाज़ी की दुनिया में मोहम्मद अली का था.

इस सप्ताह (गुरुवार को) भले पेले का निधन हो गया हो लेकिन वे फुटबॉल के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी के तौर पर हमेशा याद किए जाएंगे.

ब्राज़ील को फुटबॉल की दुनिया में सबसे ताक़तवर देश के तौर पर स्थापित करने में उनका अमिट योगदान रहा. उन्होंने तीन बार ब्राज़ील को वर्ल्ड कप दिलाने में योगदान दिया. पूरे करियर में ब्राज़ील की ओर से 92 मुक़ाबलों में उन्होंने कुल 77 गोल दागे थे.

पेले दुनिया भर में लोकप्रिय थे और ख़ास बात ये है कि वे भारत में भी बेहद लोकप्रिय रहे.

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हिंदी फ़िल्म में पेले का ज़िक्र

भारतीय फुटबॉल प्रेमियों के दिलों में जितना प्यार माराडोना के लिए रहा,लगभग उतना ही पेले के लिए. पेले का भी भारत से लंबा जुड़ाव रहा. वे पहली बार 1977 में भारत आए थे.

पेले तब न्यूयार्क कॉसमॉस टीम की ओर से फुटबॉल मैच में हिस्सा लेने के लिए कोलकाता आए थे. उनके आने का उस वक्त भारत में कितना असर हुआ था, इसका पता एक उदाहरण से लगाया जा सकता है.

साल 1979 की बॉलीवुड कॉमेडी फ़िल्म 'गोलमाल' में राही मासूम रज़ा ने पेले के बारे में एक संवाद तक लिखा था. फ़िल्म के एक सीन में खेल प्रेमी उत्पल दत्त, फ़िल्म के हीरो अमोल पालेकर से नौकरी के इंटरव्यू में पेले के बारे में सवाल पूछते हैं, "ब्लैक पर्ल के बारे में कुछ बताइए."

और अमोल पालेकर बताते हैं, "जी मुझे नहीं मालूम है कि मोती काले भी होते हैं."

तब उत्पल दत्त कहते हैं, "मैं फुटबॉलर पेले के बारे में पूछ रहा हूं." खेल में एकदम दिलचस्पी नहीं होने का नाटक करते हुए, पालेकर तब भी पेले को नहीं जानने की बात कहते हैं लेकिन थोड़ा ज़ोर देने पर कहते हैं, "हां मैंने अख़बार में पढ़ा था कि उन्हें देखने के लिए दमदम एयरपोर्ट पर 30 से 40 हज़ार पागल आधी रात को ही जमा हो गए थे."

पेले एयर इंडिया के विमान से 22 सितंबर 1977 की रात कोलकाता पहुंचे और एयरपोर्ट के बाहर कुछ ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो गयी थी जिसको आधार बनाकर राही मासूम रज़ा ने यह पूरा सीन लिखा था.

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'विजेता सम्राट की तरह स्वागत'

23 सितंबर, 1977 को कोलकाता के प्रमुख अख़बार 'आनंद बाज़ार पत्रिका' ने लिखा, "पेले का स्वागत किंग की तरह नहीं बल्कि विजेता सम्राट की तरह किया गया था. उनकी एक झलक पाने के लिए हज़ारों लोग जमा हो गए थे. इससे पहले मध्यरात्रि में किसी विदेशी के स्वागत के लिए इतनी भीड़ कभी नहीं जुटी."

इससे पेले की भारत या कहें पश्चिम बंगाल में लोकप्रियता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. न्यूयार्क कॉसमॉस की टीम, भारत के सबसे लोकप्रिय क्लब मोहन बगान के ख़िलाफ़ दोस्ताना मैच खेलने आयी थी और यह मुक़ाबला 2-2 से बराबरी पर ख़त्म हुआ था.

यह दरअसल मोहन बगान के लिए बहुत बड़ी राहत लेकर आया था. दरअसल कोलकाता के तीन फुटबॉल क्लबों के बीच आपस में होड़ रहा करती थी. ये क्लब थे मोहन बगान, ईस्ट बंगाल और मोहम्मडन स्पोर्टिंग. इन तीनों क्लबों का असर आपको सत्यजीत रॉय और ऋत्विक घटक की फ़िल्मों में भी दिखता है.

भारतीय फुटबॉल में मोहन बगान बनाम ईस्ट बंगाल का मुक़ाबला सबसे बड़ा मुक़ाबला होता था. यह एक तरह से दो भिन्न संस्कृतियों का भी मुक़ाबला था.

एक ओर मोहन बगान की टीम थी जो पश्चिम बंगाल के बाबू मोशाय लोगों की टीम थी तो दूसरी ओर कामकाजी मजदूर शरणार्थियों की टीम ईस्ट बंगाल थी, जो बांग्लादेश या पूर्वी पाकिस्तान से आए लोगों से बनी थी. 1975 के आईएफ शील्ड फ़ाइनल में मोहन बगान को 0-5 से हार का सामना करना पड़ा था. ऐसे में मोहन बगान की टीम न्यूयार्क कॉस्मॉस के सामने खोयी हुई प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए लड़ रही थी.

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'मैच ने बदली मोहन बगान की किस्मत'

मोहन बगान की ओर से न्यूयार्क कॉसमॉस के ख़िलाफ़ मैच का पहला गोल दागने वाले श्याम थापा याद करते हैं, "उस मुक़ाबले से मोहन बगान की किस्मत बदली थी."

74 साल के थापा, उस दौर में भारतीय फुटबॉल टीम का चेहरा थे. 1970 के एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतने वाली टीम में भी वे शामिल थे. उनके मुताबिक मोहन बगान की टीम ने पेले की टीम को 2-2 पर रोककर खोयी हुई प्रतिष्ठा हासिल कर ली थी.

उस टीम में मोहन बगान की कप्तानी करने वाले सुब्रत भट्टाचार्या कहते हैं, "पेले की टीम के सामने हमलोग एकजुट हो कर खेलना चाहते थे क्योंकि चार दिन बाद ही आईएफए शील्ड के फ़ाइनल में फिर से हमारी टक्कर ईस्ट बंगाल से होनी थी."

इन खिलाड़ियों को मालूम था कि पेले अपना सर्वश्रेष्ठ फुटबॉल खेल चुके हैं और बीते छह सालों से इंटरनेशनल फुटबॉल से दूर हैं लेकिन उनके नाम का असर ऐसा था कि ये मुक़ाबला केवल उनकी मौजूदगी के लिए याद किया जाता है.

इस मैच के टिकटों की भारी मांग थी. भारत में तब दूरदर्शन नया नया ही था लेकिन इस मैच का लाइव प्रसारण किया गया था. उन दिनों में कोलकाता के अधिकांश घरों में टीवी सेट नहीं थे लिहाजा स्कूलों में टीवी सेट लगाए गए और अभिभावकों से कहा गया कि पेले को देखने के लिए अपने बच्चे के साथ आएं.

हैदराबाद में जन्मे और अपने बड़े भाई मोहम्मद हबीब के साथ इस मैच में खेलने वाले मोहम्मद अकबर कहते हैं, "हमलोग उस मैच में इतना अच्छा खेले थे कि हम सब की पीठ खुद पेले ने थपथपाई थी."

इस मुक़ाबले में पेले को मार्क करने की ज़िम्मेदारी गौतम सरकार पर थी. वे याद करते हैं, "हमलोगों पर पेले की मौजूदगी का असर था लेकिन हमारे कोच प्रदीप दा ने हमलोगों से कहा कि घबराना नहीं है, अपने आप पर भरोसा रखते हुए खेलना है."

उस मुक़ाबले में शामिल 67 साल के प्रसून बनर्जी की मानें तो पेले के ख़िलाफ़ खेलने भर से पूरी टीम एकजुट नज़र आयी और उससे आगे चलकर टीम को काफ़ी मदद मिली.

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कोलकाता पर पेले का असर

पेले को कोलकाता में आज भी लोग सम्मान से याद करते हैं और हर वर्ल्ड कप में ब्राज़ील झंडे कोलकाता की सड़कों पर नज़र आते हैं.

इस फैन फॉलोइंग के बारे में दोहा स्थित भारतीय मनोचिकित्सक इनाब शुजात कहती हैं, "ब्राज़ील में कामकाजी वर्ग के लोगों का खेल है फुटबॉल. कोलकाता के लोग इसलिए ब्राज़ीली फुटबॉल से जुड़ाव महसूस करते हैं. वे यूरोपीय फुटबॉल से खुद को नहीं जोड़ते हैं क्योंकि यूरोप में फुटबॉल एक पूरी इंडस्ट्री है."

बहरहाल, पेले 2015 में भारत आए थे. इस दौरान वे कोलकाता के साथ नई दिल्ली भी गए. कोलकाता में इंडियन सुपर लीग के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बाद पेले दिल्ली में अंडर-17 सुब्रतो कप के फ़ाइनल में अतिथि थे.

इसके बाद 2018 में एक बार फिर दिल्ली आए, वो मौका हिंदुस्तान टाइम्स के लीडरशिप समिट में शामिल होने का था.

बीते 45 सालों में महज तीन बार भारत आने के बाद भी पेले की लोकप्रियता किसी भी इंटरनेशनल खिलाड़ी से कम नहीं थी और ना ही आने वाले दिनों में कम होने वाली है.

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