ग़रीबी और तंगहाली से अंडर-17 फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप तक का सफ़र झारखंड की इन लड़कियों ने कैसे तय किया

भारतीय फ़ुटबॉल टीम

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    • Author, मोहम्मद सरताज आलम
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

11 अक्टूबर से भारत में पहली बार हो रहे अंडर-17 फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप के लिए भारतीय टीम का एलान हो गया है. टीम के मुख्य कोच थॉमस डेनेरबी ने 21 सदस्यीय भारतीय महिला अंडर-17 टीम की घोषणा की जिसमें झारखंड की छह खिलाड़ियों को शामिल किया गया है.

मेज़बान भारत को ग्रुप 'ए' में अमेरिका, मोरक्को और ब्राज़ील के साथ रखा गया है. भारतीय टीम 11 अक्टूबर को अमेरिका के ख़िलाफ़ अपने अभियान का आग़ाज़ करेगी. टीम इसके बाद 14 और 17 अक्टूबर को क्रमश: मोरक्को और ब्राज़ील के ख़िलाफ़ खेलगी.

भारतीय टीम में जगह बनाने वाली झारखंड की अस्तम उरांव, पूर्णिमा कुमारी, सुधा अंकिता तिर्की, अनिता कुमारी, नीतू लिंडा और अंजली मुंडा बेहद सामान्य परिवारों से आती हैं.

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विपरीत परिस्थितियों से लड़ कर भारतीय टीम का हिस्सा बनने वाली झारखंड की इन सभी खिलाड़ियों की अपनी अलग, लेकिन प्रेरक कहानी हैं.

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का कहना है कि झारखंड की छह खिलाड़ियों का भारतीय टीम में चयन ऐतिहासिक क्षण है.

टीम की कमान अस्तम उरांव

अस्तम उरांव
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भारतीय अंडर-17 टीम की कमान झारखंड की अस्तम उरांव को मिली है.

अस्तम उरांव गुमला ज़िले के 'बनारीगोरा टोली' गांव की रहने वाली हैं जो गुमला टाउन से 56 किलोमीटर दूर है. भारतीय टीम की कप्तान अस्तम उरांव का घर मिट्टी का है. बारिश के दौरान उठने वाली सोंधी ख़ुशबू के बीच अस्तम उरांव की बहनों के चेहरे खुशी से चमक रहे थे.

"अस्तम उरांव इंडिया टीम का हिस्सा बनेंगी, लेकिन भारतीय टीम की कप्तान बन जाएंगी, ये नहीं सोचा था." ये शब्द अंशु उरांव के हैं जो अस्तम उरांव की बड़ी बहन हैं.

अस्तम उरांव तीन बहनें व एक भाई हैं. भाई उम्र में सबसे छोटे हैं जो पढ़ाई कर रहे हैं. जबकि अस्तम उरांव की बड़ी बहन सुमिना उरांव राष्ट्रीय स्तर की डिस्कस थ्रो एथलीट हैं. सबसे छोटी बहन अलका इंदवार झारखंड अंडर 16 फुटबॉल टीम की प्लेयर हैं.

अस्तम के पिता पेशे से किसान हैं, लेकिन ज़मीन सिर्फ़ एक एकड़ है जिसमें साल में सिर्फ धान की एक फ़सल होती है. अंशु के अनुसार, पानी की सुविधा न होने के कारण वह सब्ज़ी की खेती नहीं कर सकतीं. इसलिए घर का ख़र्च पूरा करने के लिए उनके बाबा मज़दूरी करने के लिए गुमला से बाहर दूसरे ज़िले में जाते हैं.

कोच के साथ भारतीय महिला फुटबॉल टीम

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23 वर्षीय अंशु उरांव बताती हैं, "जब अस्तम, सुमिना व अलका खेल में तरक्की करने लगीं तो उनकी ज़रूरत पूरी करने के लिए मां ने महिला मंडल से दस बार छोटी-बड़ी रक़म कर्ज़ के तौर पर ली, जिसे अदा करने के लिए मैं गांव में मज़दूरी करती रही हूं."

अस्तम उरांव ने पहले तो ग्रामीण क्षेत्र में अपने खेल से सभी को प्रभावित किया, फिर फ़रवरी 2016 में हज़ारीबाग स्थित 25 सीटों वाले आवासीय बालिका फुटबॉल प्रशिक्षण केंद्र प्रतिभा खोज के लिए होने वाले ट्रायल में जाने का अवसर मिला. जहां डिफेंडर अस्तम उरांव का चयन हो गया.

सोनी कुमारी 'आवासीय बालिका फुटबॉल प्रशिक्षण केंद्र' हज़ारीबाग में फुटबॉल कोच हैं. वह कहती हैं, "नटखट स्वभाव की अस्तम खेल में इस क़दर गम्भीर हैं कि उनको मैच के दौरान फॉरवर्ड, डिफेंस या मिडफील्ड किसी भी पोज़िशन पर खिलाया जा सकता है. यही कारण है कि उनको भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया."

पूर्णिमा कुमारी
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पूर्णिमा कुमारी का संघर्ष

2016 में अस्तम के साथ पूर्णिमा कुमारी का चयन हुआ. पूर्णिमा कुमारी भी डिफेंडर हैं. अस्तम की तरह पूर्णिमा भी विपरीत परिस्थितियों से लड़ कर आगे आई हैं.

"पूर्णिमा के परिवार की आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि आज भी पूर्णिमा का घर मिट्टी का है." ये कहना है पूर्व कोच सोनी कुमारी का.

सिमडेगा से आठ किलोमीटर दूर जम्बहर गांव की रहने वाली ट्राइबल पूर्णिमा कुमारी पांच बहन व एक भाई हैं. उनकी माता का देहांत 13 वर्ष पहले हो गया.

परिवार की ज़िम्मेदारी पूर्णिमा की बड़ी बहन सनमित कुमारी के कंधों पर आ गई. सनमित ने खुद से छोटी दो बहन व भाई का विवाह किया. पूर्णिमा के भाई दक्षिण भारत में मज़दूरी करते हैं जिससे उनका परिवार चलता है.

पुर्णिमा कुमारी का परिवार
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सनमित कुमारी बताती हैं, "मैं 13 वर्ष की थी जब मां का देहांत हुआ, तब मैंने ही पूर्णिमा, अन्य बहनों व भाई को पाला. अब पूर्णिमा की ज़िम्मेदारी मेरे कंधे पर है, उसके सपने को हक़ीक़त में बदलने के लिए उसकी हर ज़रूरत को पूरा करूंगी."

पूर्णिमा के घर में एक एकड़ से कम खेत है जिससे होने वाली आय परिवार के भरण-पोषण के काम आती है. पूर्णिमा के 65 वर्षीय पिता का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता. इस कारण खेती करने की ज़िम्मेदारी भी सनमित कुमारी पिछले 12 वर्षों से निभा रही हैं.

सुधा तिर्की:पिता ने छोड़ दिया था परिवार

सुधा तिर्की
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फॉरवर्ड के तौर पर खेलने वाली सुधा और अंकिता तिर्की दो बहनें हैं. उनकी माता ललिता तिर्की गुमला स्थित चैनपुर गांव में रहती हैं. उनके पिता ने तीनों को छोड़ कर दूसरी शादी कर ली.

उस समय सुधा की उम्र लगभग एक वर्ष थी. परिवार को चलाने के लिए ललिता तिर्की ने मिशनरी स्कूल में खाना पकाने की ज़िम्मेदारी ले ली. जिसके एवज में उनको हर महीने तीन हज़ार रुपए का वेतन मिलता है. ललिता अपने इस वेतन से एक हज़ार रुपया घर का किराया देती हैं.

सुधा की उन्नीस वर्षीय बड़ी बहन सबिता तिर्की इंटर की छात्रा हैं. वह कहती हैं कि ''तीन हज़ार में कैसे घर चलेगा, इसलिए मैं गुमला में एक परिचित के परिवार के साथ रहती हूं, उनके घर का काम करती हूं, जिसके एवज में वह परिवार मेरे रहने-खाने और पढ़ने का ख़र्च उठाता है.''

ललिता बताती हैं, "पति के घर छोड़ कर जाने के बाद 15 वर्ष से मैं सुधा व सबिता का पालन पोषण स्वयं कर रही हूं. मैं लोगों के घर झाड़ू-पोछा, साफ-सफाई, कपड़ा धोने का काम करके जीविका चलाने के लिए दो पैसे अर्जित करती थी. अब गांव के मिशनरी स्कूल में खाना बनाती हूं."

"मूलभूत सुविधा व पैसे के अभाव के बावजूद सुधा ने सफलता हासिल की. लेकिन मैं चिंतित हूं कि आगे मेरी बेटी का भविष्य क्या होगा, न मेरे पास घर है, न खेत है, न ज़मीन है. दो बेटियां हैं उनकी शादी करनी है."

ललिता के अनुसार, ''ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल स्तर पर फुटबॉल प्रतियोगिता चलती रहती थीं. इसी प्रतियोगिता में सुधा तिर्की भी हिस्सा लेने पहुंचीं. उस टूर्नामेंट में जब वह खेल रही थीं तो उन पर बीना केरकेट्टा की नज़र पड़ी. बीना केरकेट्टा सेंट पैट्रिक स्कूल की फुटबॉल कोच हैं. उन्होंने स्कूल के प्रिंसिपल फादर रामू विंसेंट को सूचित किया.''

फ़ादर रामू बताते हैं, "मैं गुमला से 25 किलोमीटर दूर मांजा टोली सुधा का खेल देखने गया. उसके खेल को देखने के बाद मैंने सुधा के लोकल कोच से बात की कि सुधा तिर्की को बिना किसी शुल्क के मैं अपने आवासीय विद्यालय में पढ़ाने के साथ फुटबॉल की कोचिंग दिलाऊंगा. फिर मैंने सुधा की माता से मुलाकात की. उसके बाद 2017 में सुधा मेरे स्कूल में आ गई और अब अंडर -17 टीम तक पहुंच गई है."

नीतू लिंडा
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नीतू लिंडा:भाई ने ईंट भट्ठे पर मज़दूरी कर बहन को बनाया खिलाड़ी

भारतीय अंडर 17 टीम में चयनित नीतू लिंडा मिडफ़ील्डर हैं. नीतू रांची से 14 किलोमीटर दूर हलदमा गांव की रहने वाली हैं. उनकी माता का देहांत 2014 में हुआ. उनके पिता माली का काम करते थे. लेकिन 2009 में उनकी कमर में समस्या आ गई. तब से परिवार की ज़िम्मेदारी नीतू के 23 वर्षीय बड़े भाई धनेश्वर उरांव निभा रहे हैं.

मां के देहांत के बाद धनेश्वर उरांव ने दो भाई व दो बहनों के साथ ईट भट्ठे पर काम करना शुरू किया.

धनेश्वर ने ईट भट्ठे पर काम करते हुए एक भाई व बहन का विवाह भी किया, जबकि परिवार के लिए जीविका भी अर्जित कर रहे हैं. धनेश्वर कहते हैं, "हम भाई-बहनों ने सोचा कि हम सब पढ़ाई नहीं कर सके, लेकिन छोटी बहन नीतू लिंडा को ज़रूर पढ़ाएंगे."

नीतू गांव के सरकारी विद्यालय में पढ़ने लगीं. लेकिन उनकी रूचि फुटबॉल में बहुत अधिक थी. नीतू की रुचि देखकर धनेश्वर ने उनको सहयोग करना आरंभ किया. वह गांव के मैदान में खेलते-खेलते रांची के ग्रामीण क्षेत्रों में नाम कमाने लगीं.

जनवरी 2017 के दौरान रांची के कांके क्षेत्र में हो रहे ग्रामीण स्तर के टूर्नामेंट में नीतू लिंडा पर 'स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया, रांची के कोच सुनील कुमार की नज़र पड़ी.

सुनील कुमार कहते हैं कि "खेल के दौरान नीतू के दोनों पैर बराबर सक्रिय थे. इस खूबी को देखने के बाद मैंने सोचा कि काश ये लड़की 'स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया' आ जाए. इत्तिफ़ाक से वह मार्च 2017 में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया, रांची सेंटर में ट्रायल देने पहुंचीं. उनके चयन के साथ भगवान ने हमारी सुन ली."

अंजलि मुंडा
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अंजलि मुंडा: पिता सहते रहे नुक़सान

2017 में 'स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया' में नीतू लिंडा के साथ अंजलि मुंडा का चयन हुआ. अंजलि की हाइट अच्छी होने के कारण उनको भारतीय टीम में बतौर गोलकीपर स्थान मिला. अंजलि खेलने में बहुत अच्छी थीं, लेकिन शारीरिक तौर पर कमज़ोर थीं, इसलिए वह अक्सर खेल के मैदान में बेहोश हो जाती थीं.

पूर्व कोच सुनील कुमार कहते हैं, "मैदान में अंजली के बेहोश होने पर हम चिंतित हो जाते थे. यदि कुछ हो गया तो बहुत बदनामी होगी. लेकिन अंजलि का इलाज मैंने रिम्स अस्पताल में कराना आरंभ किया. उनके डाइट पर ख़ास ध्यान दिया गया. अब वह स्वस्थ होकर भारतीय टीम का हिस्सा हैं."

अंजलि मुंडा रांची से छह किलोमीटर दूर नवासुसो गांव की रहने वाली हैं. उनके पिता मंटू मुंडा गांव के बाज़ार में चिकेन बेचते हैं. उनका ये काम हफ्ते में दो दिन ही चलता है. लेकिन बेटी को फुटबॉल में सफलता दिलाने के लिए मंटू ने कुर्बानी दी.

अंजलि को जहां भी खेलने के लिए जाना होता वह खुद ले कर जाते थे. इस दौरान उनको अक्सर चिकेन शॉप बंद करनी पड़ती थी. मंटू मुंडा के अनुसार, उन्हें और बेटी अंजलि को गांव वालों के द्वारा तरह-तरह के ताने सुनने पड़ते थे.

मंटू मुंडा कहते हैं, "जब तक अंजलि का चयन 'स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया' रांची में नहीं हुआ था, गांव वाले अंजलि को हाफपैंट में खेलते हुए देख कर आपत्ति जताते थे."

अनिता कुमारी: परिवार से अलग रहने लगे पिता

बतौर फॉरवर्ड भारतीय टीम में स्थान पाने वाली अनीता 'चारी हुजीर' गांव की रहने वाली हैं. उनके पिता पूरन महतो के पास न तो खेत हैं और न ही कोई रोज़गार. पांच बेटियां होने के कारण वह परिवार से अलग भी रहने लगे.

अनीता की मां आशा देवी कहती हैं, "बेटियों के जन्म के बाद नाराज़गी में मेरे पति अपनी मां के साथ रहने लगे.". वह आगे कहती हैं कि ''बेटा-बेटी सब बराबर होते हैं. आज अनीता भारतीय टीम का हिस्सा हैं जो मेरे लिए बेटे से कम नहीं हैं.''

पति द्वारा घर छोड़ कर जाने के बाद पांच बेटियों के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी आशा देवी के कंधों पर आ गई. उन्होंने आरंभ में ईंट-भट्ठे पर काम किया. लेकिन कम आय होने के कारण वह मज़दूर बन गईं.

इस वर्ष मई के महीने से उनका स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था. अत: उन्होंने मज़दूरी छोड़ दी. जबकि अनीता को मिली सफलता की वजह से लोग आशा देवी को सम्मान देने लगे. इस कारण उनको एक छोटे से ऑफिस में साफ-सफाई करने का काम मिल गया.

अनिता कुमारी
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आशा देवी के अनुसार, मुखिया से अनुरोध करने के बाद आज भी उनका राशन कार्ड नहीं बना. जबकि घर में पानी की कोई सुविधा नहीं है. सरकारी आवास व पेयजल की सुविधा मिलने का इंतज़ार आज भी कर रही हैं.

अनीता के घर की दीवारें मिट्टी की हैं, जबकि आधी छत खपरैल तो आधी एस्बेस्टस से बनी है, जिससे बारिश में पानी आता है. इसी घर में रहते हुए अपने दम पर पांच बेटियों को आशा देवी ने लायक बनाया. हाल ही में एक बेटी की शादी के कारण उनके ऊपर चार लाख रुपए का क़र्ज़ हो गया. लेकिन अनीता का चयन टीम में होने के बाद आशा देवी का मनोबल बढ़ गया है.

आशादेवी का कहना है कि उनकी बेटी ने झारखंड का नाम रोशन किया है, अत: सरकार उनको नौकरी दे. साथ ही घर, पेयजल व राशनकार्ड की सुविधा प्रदान करे.

आशा देवी के अनुसार, अनीता जब गांव में हाफपैंट पहन कर फुटबॉल खेला करती थी तो गांव के लोगों ने एतराज़ किया. वे कहते थे कि 'आपकी बेटी मर्द की तरह हाफ पैंट पहन कर फुटबॉल खेलती है.'

"जब से गांव के लोगों ने सुना है कि अनीता भारत के लिए वर्ल्ड कप खेलेंगी, तो सभी लोग गांव में खुशियां मना रहे हैं. वर्ल्डकप के बाद जब वो गांव वापस आएंगी तो उनका स्वागत करने गांव के लोग रांची एयरपोर्ट जाएंगे." ये कहना है अनीता की छोटी बहन विनीता कुमारी का जो खुद भी फुटबॉल खेलती हैं और अपनी बहन की तरह सफल होना चाहती हैं.

सूर्यमन प्रधान झारखंड फुटबॉल एसोसिएशन के हेड कोच हैं. उन्होंने कहा, "भारतीय टीम में एक साथ छह खिलाड़ियों का चयन कोई इत्तिफ़ाक नहीं है. ये सात आठ वर्षों से की जा रही टैलेंट हंट प्रक्रिया का सुखद परिणाम है."

लेकिन झारखंड की इन छह बेटियों की सफलता पर कोच बीना केरकेट्टा का सवाल है, "झारखंड से छह लड़कियों को भारतीय टीम में स्थान तो मिल गया, लेकिन आगे क्या होगा?"

वह कहती हैं कि सरकार को चाहिए कि इन खिलाड़ियों को फौरन नौकरी दे.

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