उत्तर प्रदेश चुनाव: गेस्ट हाउस कांड जिसने बढ़ा दी थी मायावती और मुलायम सिंह यादव के बीच तल्ख़ी

मायावती, मुलायम

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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समाजवादी पार्टी के संस्थापक और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का निधन हो गया है. वे पिछले कई दिनों से बीमार थे और गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती थे. बहुजन समाज पार्टी की कद्दावर नेता मायावती और मुलायम सिंह यादव के सियासी रिश्तों पर पढ़िए बीबीसी हिंदी का ये विशेष लेख.

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मायावती और मुलायम सिंह यादव के बीच दूरियों की नींव वैसे तो 23 मई, 1995 को ही रख दी गई थी, जब गठबंधन के मुद्दों पर बात करने मुलायम सिंह लखनऊ आए और कांशी राम से मिलने गए, लेकिन कांशी राम ने ज़ोर दिया कि अब उनकी बातचीत पत्रकारों के सामने ही होगी.

उसी रात कांशी राम ने लालजी टंडन को फ़ोन कर मायावती को मुख्यमंत्री बनाने के लिए बीजेपी का समर्थन माँगा था. 1 जून को मायावती ने मुलायम सरकार में शामिल अपने 11 मंत्रियों के साथ राज्यपाल मोतीलाल वोरा से मुलाक़ात की और उत्तर प्रदेश में अगली सरकार बनाने का अपना दावा पेश किया.

मायावती ने वोरा के सामने तीन तरह के कागज़ात पेश किए थे. पहले काग़ज में उन्हें कांशी राम द्वारा सभी निर्णय लेने के लिए अधिकृत किया गया था. दूसरे काग़ज में मुलायम सिंह यादव सरकार से समर्थन वापस लेने के बारे में सूचना थी. इसमें समर्थन वापस लिए जाने के कारण भी बताए गए थे. तीसरे काग़ज़ में बीजेपी, कांग्रेस, जनता दल और कम्युनिस्ट पार्टी के उन 282 विधायकों की सूची थी, जो मायावती का समर्थन कर रहे थे.

मायावती, मुलायम

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इमेज कैप्शन, लखनऊ के इसी स्टेट गेस्ट हाउस में वो घटना घटी थी

स्टेट गेस्ट हाउस पर सपा कार्यकर्ताओं का हमला

राज्यपाल मोतीलाल वोरा ने मायावती के दावे पर फ़ैसला लेना एक दिन के लिए टाल दिया था. लेकिन 2 जून, 1995 तक हालात एकदम से बिगड़ गए, जब समाजवादी पार्टी के कुछ समर्थकों ने स्टेट गेस्ट हाउस के कॉन्फ़्रेंस रूम से कुछ बीएसपी विधायकों का कथित रूप से अपहरण करने की कोशिश की. हिंसा क़रीब 4 बजे शुरू हुई और दो घंटे तक चलती रही, जिसमें सपा और बसपा दोनों दलों के कई समर्थक घायल हो गए.

हिंदुस्तान टाइम्स के लखनऊ संस्करण की स्थानीय संपादक सुनीता एरन अपनी किताब 'अखिलेश यादव: विंड्स ऑफ़ चेंज' में लिखती हैं, ''मायावती उस समय गेस्ट हाउस में मौजूद नहीं थीं, जब सपा के कार्यकर्ताओं ने उनके 7 विधायकों के साथ मारपीट करने की कोशिश की थी. वो अपने विधायकों को कान्फ़्रेंस रूम में रहने का निर्देश दे कर एक गुप्त मिशन पर निकली हुई थीं.

वो कुछ देर बाद भारी सुरक्षा के बीच लौटीं और अपने आप को गेस्ट हाउस के कमरा नंबर 2 में लॉक कर लिया. सपा के कार्यकर्ताओं ने गेस्ट हाउस की बिजली और पानी काट दी, लेकिन इस बीच बीजेपी के कुछ समर्थक सपा कार्यकर्ताओं से मायावती को बचाने के लिए उनके कमरे के सामने खड़े हो गए.''

मायावती और कांशीराम

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इमेज कैप्शन, बसपा के संस्थापक कांशी राम ने 23 मई, 1995 की रात बीजेपी नेता लालजी टंडन को फ़ोन कर मायावती को मुख्यमंत्री बनाने के लिए समर्थन माँगा था, जो मिला भी

बसपा विधायकों का अपहरण

जैसे ही 1 जून, 1995 को बीएसपी ने गठबंधन सरकार से अपना समर्थन वापस लिया, मुलायम सरकार ने लखनऊ के कई प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का तबादला कर दिया. एक विवादास्पद अधिकारी ओपी सिंह को आनन-फ़ानन में लखनऊ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बना दिया गया. ओपी सिंह मायावती के खिलाफ़ थे क्योंकि पिछले दिनों दो बार उन्होंने उनका तबादला करवाया था.

अजय बोस मायावती की जीवनी 'बहनजी' में लिखते हैं, ''4 बजे के बाद सपा कार्यकर्ताओं की क़रीब 200 लोगों की भीड़ ने स्टेट गेस्ट हाउस पर हमला कर दिया. वो मायावती के ख़िलाफ़ न सिर्फ़ जातिवादी नारे लगा रहे थे, बल्कि उनकी बेइज़्ज़ती करने की अपनी मंशा खुलेआम ज़ाहिर कर रहे थे.

मायावती के विधायकों ने तुरंत कांन्फ़्रेस रूम के मुख्य द्वार को बंद कर दिया, लेकिन भीड़ उस दरवाज़े को तोड़ने में सफल हो गई. कम से कम 5 बीएसपी विधायकों को ज़बरदस्ती कॉन्फ़्रेंस रूम से निकालकर गाड़ियों में बैठा कर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के निवास पर ले जाया गया. उनसे बीएसपी के राज बहादुर के नेतृत्व वाले धड़े की सदस्यता लेने के लिए कहा गया. कुछ विधायक इतने डर गए कि उन्होंने तुरंत ही सदस्यता के काग़ज़ पर दस्तख़त कर दिए.''

मायावती, मुलायम

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बीएसपी विधायकों ने मायावती के कमरे में शरण ली

उधर बीएसपी के कुछ विधायक कॉन्फ़्रेंस रूम से बच निकलने में कामयाब हो गए और उन्होंने मायावती के कमरे में दौड़ कर शरण ले ली. सबसे आख़िर में विधायक आरके चौधरी मायावती के कमरे में पहुंचे. उन्हें वहाँ तक पहुंचाने में पुलिस कॉन्सटेबल रशीद अहमद और ख़ुद के निजी सुरक्षा गार्ड लाल चंद ने मदद की.

लाल चंद की ही सलाह पर मायावती के कमरे में इकट्ठा हुए विधायकों ने अपने कमरे को अंदर से लॉक कर लिया. उनके ऐसा करने के कुछ मिनटों के भीतर सपा कार्यकर्ता वहाँ पहुंचे और ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा पीटने लगे. दरवाज़ा पीटने के साथ-साथ वो अंदर क़ैद लोगों को भद्दी-भद्दी गालियाँ दे रहे थे और ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे थे कि मायावती के बाहर निकलते ही उनके साथ क्या सलूक किया जाएगा.

ज़िलाधिकारी राजीव खेर ने किया हालात पर क़ाबू

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उस दिन मायावती को सपा कार्यकर्ताओं से बचाने में दो जूनियर पुलिस अधिकारियों, हज़रतगंज पुलिस थाने के स्टेशन हाउस अफ़सर विजय भूषण और एसएचओ (वीआईपी) सुभाष सिंह बघेल की बहुत बड़ी भूमिका रही, जो बहुत मुश्किल से भीड़ को पीछे धकेलने में सफल रहे. उसके बाद वो गलियारे में एक दीवार के चारों ओर घेरा बना कर खड़े हो गए ताकि कोई आगे न बढ़ पाए.

अजय बोस लिखते हैं, ''इन अधिकारियों के अलावा वहाँ मौजूद दूसरे पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने क़रीब दो घंटे तक चले इस हंगामे को रोकने की कोई कोशिश नहीं की. वहाँ मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वहाँ वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ओपी सिंह मौजूद थे, जो हमले को रोकने के बजाए सिगरेट पीते रहे. हालात कुछ हद तक तब क़ाबू में आए जब ज़िलाधिकारी राजीव खेर वहां पहुंचे.

उन्होंने सबसे पहले पुलिस अधीक्षक राजीव रंजन वर्मा की मदद से उन लोगों को गेस्ट हाउस के प्रांगण से बाहर निकलवाया जो विधायक नहीं थे. बाद में जब पुलिस की कुमुक पहुंच गई तो वो समाजवादी पार्टी के विधायकों को भी गेस्ट हाउस के प्रांगण से बाहर निकलवाने में सफल हो गए. हालांकि इसके लिए उन्हें लाठीचार्ज भी करवाना पड़ा. दूसरी तरफ़ उनके पास मुख्यमंत्री कार्यालय से लगातार निर्देश आ रहे थे कि वो समाजवादी पार्टी के विधायकों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई न करें. लेकिन उन्होंने उसे नहीं माना. उसी रात 11 बजे मुलायम सिंह सरकार ने उनका तबादला कर दिया.''

मायावती

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मीडिया मायावती के पक्ष में आ

इस बीच मायावती लगातार अपने कमरे में बंद रहीं. ज़िलाधिकारी के बार-बार आश्वासन देने के बाद कि अब ख़तरा टल गया है, मायावती ने देर रात अपने कमरे का दरवाज़ा खोला. इस घटना की वजह से मुलायम अपने समर्थकों के बीच अलग-थलग पड़ गए. इसकी वजह से मीडिया में भी मायावती को सहानुभूति मिली.

ये वही मीडिया थी जो मायावती के अवसरवाद और मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेने के कारण उनके ख़िलाफ़ हो गई थी. उनकी नज़र में मायावती इतनी अनुभवी नहीं थीं कि उन्हें जनसंख्या के हिसाब से देश के सबसे बड़े राज्य की बागडोर सौंपी जाए.

लेकिन इस घटना ने मायावती के ख़िलाफ़ बन रहे माहौल को पूरी तरह से बदल दिया. बाद में कई सालों तक जब भी मायावती ने इस घटना का ज़िक्र किया उनके दाँत पिस जाते और उनकी आवाज़ काँपने लगती.

उन्होंने अपनी आत्मकथा 'मेरा संघर्षमय जीवन एवं बहुजन समाज मूवमेंट का सफ़रनामा' में लिखा, ''मुलायम सिंह का आपराधिक चरित्र उस समय सामने आया, जब उन्होंने स्टेट गेस्ट हाउस में मुझे मरवाने की कोशिश करवाई. उन्होंने अपने बाहुबल का इस्तेमाल करते हुए न सिर्फ़ हमारे विधायकों का अपहरण करने की कोशिश की, बल्कि मुझे मारने का भी प्रयास किया.''

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मुलायम और मायावती के बीच खाई और बढ़ गई

मुलायम सिंह यादव ने हमेशा इस घटना में अपनी भूमिका का बचाव करते हुए कहा कि उनके समर्थकों ने गेस्ट हाउस में सिर्फ़ नारे भर लगाए थे.

सुनीता एरन को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ''शोर सुनकर बीएसपी के विधायक बाहर निकल आए थे. मैं इस बात का ज़ोरदार खंडन करता हूँ कि हमारे कार्यकर्ताओं ने किसी भी बीएसपी विधायक का अपहरण किया था. बल्कि वास्तव में पिटाई हमारे विधायकों की हुई थी. उनमें से कई विधायक जब मेरे घर आए तो उनकी चोटों से ख़ून निकल रहा था.''

लेकिन इस घटना की जाँच के लिए बनाई गई रमेश चंद्र कमेटी ने अपनी 89 पेज की रिपोर्ट में गेस्ट हाउस कांड के आपराधिक षडयंत्र के लिए मुलायम सिंह यादव को ज़िम्मेदार ठहराया. रिपोर्ट में कहा गया कि इसकी योजना पहले ही बना ली गई थी और इसके तहत ही कुछ अधिकारियों का लखनऊ से पहले ही तबादला कर दिया गया था.

इस घटना का असर ये रहा कि मायावती समर्थकों को अपने इस अपमान की याद दिलाने का कोई मौक़ा नहीं चूकीं. कई राजनीतिक बाध्यताओं के बावजूद दोनों दलों के बीच जो खाई उत्पन्न हुई, उसे कभी पाटा नहीं जा सका. इस घटना के कारण ही दलित-मुस्लिम-पिछड़ों के गठबंधन की ताक़त हमेशा के लिए ख़त्म हो गई. 2019 के लोकसभा चुनाव में इसे ज़िंदा करने की एक कोशिश ज़रूर हुई, लेकिन वह प्रयोग सफल नहीं रहा.

(ये कहानी मूल रूप से फ़रवरी 2022 में पहली बार प्रकाशित हुई थी)

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