गॉर्डन ग्रीनिज: पीठ पर खाद का बोरा ढोने वाला जो बना दुनिया का सबसे विस्फ़ोटक ओपनर

गॉर्डन ग्रीनीज़

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    • Author, प्रदीप कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

क्रिकेट की दुनिया ने एक से बढ़कर एक विस्फ़ोटक बल्लेबाज़ देखे हैं और उन बल्लेबाज़ों के सामने दुनिया भर के गेंदबाज़ कंपकंपाते रहे.

लेकिन आज बीबीसी हिंदी पर हम आपको एक ऐसे क्रिकेटर की कहानी बता रहे हैं जिनके संन्यास लेने के तीन दशक बीतने के बाद भी उन्हें दुनिया के सबसे विस्फ़ोटक बल्लेबाज़ों में शुमार किया जाता है.

हालांकि उस बल्लेबाज़ का पूरा करियर विवियन रिचर्ड्स जैसे कहीं ज़्यादा नेचुरल समझे जाने वाले विस्फ़ोटक बल्लेबाज़ के साये में रहा लेकिन बावजूद इसके क्रिकेट की दुनिया में उनका अपना मुकाम रहा.

इस विस्फ़ोटक बल्लेबाज़ को दुनिया का सबसे विस्फ़ोटक ओपनर माना जाता रहा है, दुनिया इन्हें गॉर्डन ग्रीनिज के नाम से जानती है.

उनकी विस्फ़ोटक बल्लेबाज़ी के बारे में पूर्व इंग्लिश क्रिकेटर मार्क निकोलस ने द क्रिकेट मंथली में लिखा है, "जब वह क्रीज़ पर होते थे तो कोई सेफ़ नहीं था- ना बॉल, ना बॉलर, ना फ़ील्डर, ना आसपास के घरों के शीशे और ना ही रिकॉर्ड."

ग्रीनिज के बारे में इस आकलन को पढ़ने के साथ साथ आपके ज़ेहन में यह भी होना चाहिए कि वे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट टीम के आधार स्तंभ थे.

सत्तर और अस्सी के दशक में वेस्टइंडीज़ की क्रिकेट दुनिया में बादशाहत का जो दौर रहा उसमें उसके तेज़ गेंदबाज़ों की बैटरी के योगदान की चर्चा तो होती रही है लेकिन बल्लेबाज़ों को उतनी चर्चा नहीं मिली, जो चर्चा मिली भी अधिकांश तौर पर विवियन रिचर्ड्स के हिस्से में आयी.

लेकिन अगर आप उस दौर की वेस्टइंडीज़ की टीम को कप्तान क्लाइव लॉयड का किंगडम कहें, तो एंडी रॉबर्ट्स, माइकल होल्डिंग, मैल्कम मार्शल और जोएल गॉर्नर को किंगडम का पॉवर सप्लायर मानना होगा. उस टीम को ग्लोरीफ़ाइड करने का दारोमदार विवियन रिचर्ड्स के ज़िम्मे भले रहा हो लेकिन गॉर्डन ग्रीनिज और डेसमंड हेंस की सलामी जोड़ी उस टीम की शाश्वत आत्मा की तरह हमेशा मौजूद रही.

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बचपन का संघर्ष

गॉर्डन ग्रीनिज उन चुनिंदा क्रिकेटरों में शामिल रहे जिनके सामने दो देशों से क्रिकेट खेलने का मौका था. वे चाहते तो इंग्लैंड की क्रिकेट टीम में भी शामिल हो सकते थे क्योंकि इंटरनेशनल क्रिकेट में धमाल मचाने से पहले ग्रीनिज इंग्लिश काउंटी हैंपाशायर के लिए रनों का अंबार खड़ा कर चुके थे. लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था.

एक मई, 1951 को बारबेडॉस में जन्मे ग्रीनिज आठ साल की उम्र के थे तब उनकी मां लंदन चली आयीं थीं, बेकरी में काम करने के लिए. उन्होंने ख़ुद अपने बचपन के संघर्ष का मार्मिक विवरण लिखा है.

दरअसल, गॉर्डन ग्रीनिज अपने क्रिकेट करियर के सुनहरे दौर में थे, तभी उन्होंने अपनी आत्मकथा लिख डाली थी. 1980 में प्रकाशित इस आत्मकथा को आप प्रीमैच्योर ऑटोबायोग्राफ़ी कह सकते हैं.

'गॉर्डन ग्रीनिज द मैन इन मिडिल' में उन्होंने लिखा है, "आठ साल की उम्र में मेरी मां काम और बेहतर पगार की तलाश में लंदन चली गईं, मैं अपनी नानी के साथ रहता था. 12 साल की उम्र तक मेरा नाम कथबर्ट गॉर्डन लाविन था. मेरी मां ने तब तक शादी नहीं की थी. लंदन में काम करने के दौरान उन्हें बारबेडॉस के एक शख़्स से मोहब्बत हो गई और दोनों ने शादी कर ली. इस तरह मेरा नाम गॉर्डन ग्रीनिज हो गया. जब मैं 14 साल का हुआ तो रीडिंग शहर आया, जहां मेरी मां मेरे सौतेले पिता के साथ रहती थीं..''

गॉर्डन ग्रीनिज को हमेशा एक आक्रामक और तुनकमिजाजी से भरा क्रिकेटर माना गया, लेकिन यह उनमें कहां से आया होगा, इसे समझना मुश्किल नहीं है. एक मिश्रित संस्कृति से तालमेल बिठाने की कोशिशों ने उन्हें ऐसा गढ़ा होगा.

क्योंकि ग्रीनिज अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उन्हें स्कूल में 'ब्लैक बास्टर्ड' कहकर चिढ़ाया जाता था और यह हाल तब था जब रीडिंग शहर में काम धंधे की तलाश में आए वेस्टइंडीज़ के लोगों की भरमार थी. ग्रीनिज का स्कूल जाने का मन नहीं होता था लेकिन वे जाते रहे क्योंकि स्कूली शिक्षा पूरी करनी थी.

पैसा कमाने के लिए कोल्ड स्टोरेज़ में किया काम

लेकिन इसी ग्रीनिज ने क्रिकेट के मैदान पर ऐसी धमाकेदार पारियां खेलीं कि जब टेस्ट इतिहास की सौ सर्वश्रेष्ठ पारियों पर मास्टरली बैटिंग नाम से किताब प्रकाशित हुई तो इंग्लैंड के प्रतिष्ठित अख़बारों में शुमार गार्डियन ने टेस्ट क्रिकेट के सबसे बेहतरीन शतकों पर एक सिरीज़ चलाई और इस सिरीज़ में ग्रीनिज की एक बेहद उम्दा पारी का ज़िक्र जाने माने क्रिकेट विश्लेषक डैनियल हैरिस ने किया.

हैरिस ने ग्रीनिज के बारे में लिखा है, "ये मुमकिन नहीं है कि आप कथबर्ट गॉर्डन ग्रीनिज कहें और उन्हें ब्रिलियंट बास्टर्ड ना कहें. वे ब्रिलिएंट थे, ब्रिलियंट बास्टर्ड."

एक तरह से ब्लैक बास्टर्ड से ब्रिलियंट बास्टर्ड के अपने पूरे सफ़र में ग्रीनिज ने कई मुकाम देखे लेकिन गेंदबाज़ों के प्रति उनकी निर्मम आक्रामकता हमेशा एक जैसी रही और यही वो बात थी जिसने उन्हें हमेशा ख़ास बनाए रखा.

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हालांकि 15 साल की उम्र तक उनका क्रिकेट खेलने का कोई इरादा नहीं बन सका था.

उन्होंने अपनी आत्मकथा गॉर्डन ग्रीनिज द मैन इन मिडिल में लिखा है, "15 साल की उम्र में मुझे काम की तलाशना पड़ा और मैं कोल्ड स्टोरेज़ में पहुंच गया. वहां खाद के बोरे ढोने का काम था. पीठ पर बोरे लादकर एक इमारत से दूसरी इमारत में रखने का काम था. मुझे इस काम के 12 पाउंड प्रति सप्ताह मिलते थे. मैं ये तो नहीं कहूंगा कि मुझे इसमें मज़ा आता था लेकिन मेरे कंधे इसी दौरान मज़बूत हुए थे."

ग्रीनिज ने लिखा है, "मैं एकदम अकेला था, तो ओवर टाइम भी करता था. रात के आठ बजे तक काम करता था. लेकिन मुझे लगने लगा कि ये काम करके मैं कहीं नहीं पहुंच पाऊंगा. 1967 में ग्रेजुएट की पढा़ई पूरी की और फिर क्रिकेट को गंभीरता से लेने लगा. मुझे लगा कि क्रिकेटर बनकर देखना चाहिए. लेकिन उस दौर में क्लब स्तर पर मैंने कितने रन बनाए, ये सब मुझे याद नहीं है. एक ही पारी याद है जब मैंने 135 रन बनाए थे. लेकिन मेरा खेल धीरे धीरे बेहतर हो रहा था."

ग्रीनिज को भले याद नहीं हो लेकिन आस पड़ोस के क्रिकेट क्लब की नज़र उनपर जमने लगी थी. उन्हें हैंपाशयर के कोच आर्थर हॉल्ट ने सेकेंड डिविजन लीग में मौका दिया जहां शुरुआती नाकामी के बाद ग्रीनिज ने अपने पांव टिकाने जमाने शुरू किए. लेकिन इंग्लैंड की परिस्थितियों में काउंटी क्रिकेट में पांव जमाना आसान नहीं होता. कुछ पारियों को छोड़ कर ग्रीनिज लगातार नाकाम हो रहे थे और 1969 में उनका अनुबंध ख़त्म होने की कगार पर पहुंच गया था.

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जब शुरुआत हुई तो पीछे मुड़कर नहीं देखा

लेकिन टीम मैनेजमेंट और कोच का उन पर भरोसा बना हुआ था, इसकी एक वजह तो यही थी कि बारबेडॉस के क्रिकेटरों की बड़ी प्रतिष्ठा थी और लोगों को ग्रीनिज में उम्मीदें भी दिख रही थीं.

ग्रीनिज ने यहां से वापसी की और पहले हैंपाशायर के फर्स्ट इलेवन में जगह बनायी. 1970 में ससेक्स के ख़िलाफ़ उन्होंने अपने काउंटी करियर की शुरुआत की, वे बहुत बड़ी पारी तो नहीं खेल पाए लेकिन तेज़ गेंदबाज़ जॉन स्नो की गेंदों पर उन्होंने जिस तरह के हुक शाट्स खेले, उसने कईयों को प्रभावित किया.

उस साल के विज़डन ने गॉर्डन ग्रीनिज के बारे में लिखा था, "डेब्यू पर सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाला बल्लेबाज़. ख़ासकर हुक शाट्स पर उन्होंने जो छक्का लगाया उस गेंद को ढूंढने में पांच मिनट से ज़्यादा का समय लगा था."

ग्रीनिज ने यहां से पीछे मुड़कर नहीं देखा, अगले चार-पांच सालों के दौरान बैरी रिचर्ड्स के साथ मिलकर उन्होंने सलामी बल्लेबाज़ी में वह मुकाम बनाया कि आज भी ग्रीनिज और बैरी रिचर्ड्स की जोड़ी को दुनिया की सबसे ख़तरनाक आक्रामक जोड़ी कहा जाता है. दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज़ बैरी रिचर्ड्स को भी इंटरनेशनल क्रिकेट में वह मुकाम नहीं मिला जिसके वे हकदार थे. लेकिन ग्रीनिज को एक ख़तरनाक ओपनर बनाने में उनका बड़ा योगदान रहा है.

काउंटी क्रिकेट में मंजने के बाद जब उनकी चर्चा इंग्लैंड की क्रिकेट टीम के संभावितों में होने लगी थी. 1974 में उन्हें इंग्लैंड की ओर से खेलने का मौका भी मिलने वाला था लेकिन तब ग्रीनिज ने वेस्टइंडीज़ को चुना और वह भी तब, जब विंडीज़ टीम के लिए उनका दावा ख़ारिज कर दिया गया था लेकिन उन्होंने इंतज़ार करना उचित समझा और उनका इंतज़ार जल्द ही पूरा हुआ.

उन्हें भारत, श्रीलंका और पाकिस्तान का दौरान करने वाली टीम के लिए चुन लिया गया. भारत में भले ग्रीनिज को उतनी लोकप्रियता नहीं मिली हो लेकिन भारत के ख़िलाफ़ उनकी बल्लेबाज़ी हमेशा शानदार रही और उन्होंने अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत भी भारत से ही की थी.

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1974 में भारत के एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में गॉर्डन ग्रीनिज ने अपने करियर का पहला टेस्ट खेला. इस टेस्ट में वेस्टइंडीज़ की ओर से 23 साल के गॉर्डन ग्रीनिज के साथ साथ 22 साल के विवियन रिचर्ड्स ने भी अपना डेब्यू किया था.

यह जानना दिलचस्प है कि बेंगलुरू में खेले गए इस मुक़ाबले की पहली पारी में गॉर्डन ग्रीनिज ने 93 रन और दूसरी पारी में 107 रनों की पारी खेली थी. जबकि विवियन रिचर्ड्स ने पहली पारी में चार रन और दूसरी पारी में तीन रन बनाए थे.

गॉर्डन ग्रीनिज ने अपनी पहली पारी के बारे में आत्मकथा में लिखा है कि यह एक तरह से भारत के चार दिग्गज़ स्पिनरों के सामने बपतिस्मा हासिल करने जैसा था. क्योंकि तेज़ गेंदबाज़ की तुलना में वे स्पिनरों का सामना करने से पहले खासे नर्वस थे.

वे अपने पहले टेस्ट की दोनों पारियों में शतक नहीं बना पाए थे, इसका उन्हें लंबे समय तक मलाल भी रहा. लेकिन 93 रन की अपनी पारी के बाद वे रन आउट हुए थे, भारत का कोई गेंदबाज़ उन्हें आउट नहीं कर पाया था.

पहले टेस्ट की नाकामी के बाद विवियन रिचर्ड्स ने दूसरे टेस्ट में 192 रन की जोरदार पारी खेलकर भरपायी की जबकि बेहतरीन शुरुआत के बाद ग्रीनिज पूरी सिरीज़ में अपनी चमक ज़्यादा नहीं बिखेर पाए. लेकिन वेस्टइंडीज़ क्रिकेट को ऐसा ओपनर मिल गया था जो बेहतरीन डिफेंस के साथ गेंदबाज़ों पर करारा प्रहार करने की रणनीति पर बखूबी काम करने वाला था.

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क्या कहते हैं बल्लेबाज़ी के आंकड़े

यहां से शुरू हुआ सफ़र 1991 तक बखूबी चला जिस दौरान 108 टेस्ट मैचों में ग्रीनिज ने करीब 45 की औसत और 19 शतकों की मदद से 7558 रन बनाए. इतना ही नहीं 128 वनडे मैचों में भी करीब 45 की औसत और 11 शतकों की मदद से उन्होंने 5134 रन बनाए. ये आंकड़े उनके विस्फ़ोटक अंदाज़ की पूरी कहानी नहीं कहते.

हालांकि टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने जब जब शतक बनाया तब तक उनकी टीम को जीत हासिल हुई थी. और 128 वनडे मैचों में वे 20 बार मैन ऑफ़ द मैच आंके गए. इस दौरान डेसमंड हेंस के साथ उन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट की सबसे कामयाब सलामी जोड़ी भी बनायी.

1975 से लेकर 1991 तक के वनडे क्रिकेट में वेस्टइंडीज़ टीम के सुपर स्टारों को देखते हुए प्रति साढ़े पांच मैचों में एक बार मैन ऑफ़ द मैच का ख़िताब जीतना दर्शाता है कि ग्रीनिज की बल्लेबाज़ी टीम के लिए क्या मायने रखती थी. उनके 11 वनडे शतकों में नौ बार टीम को जीत हासिल हुई थी.

1975 और 1979 के वर्ल्ड चैंपियन टीम का वे हिस्सा रहे और 1983 में भारत के हाथों फ़ाइनल मुक़ाबले में वेस्टइंडीज़ की हार की एक वजह ग्रीनिज का सस्ते में आउट होना भी रहा.

बहरहाल, उनके विस्फ़ोटक अंदाज़ को दर्शाने वाली पारियों का ज़िक्र किए बिना ग्रीनिज की कहानी पूरी नहीं होगी. टेस्ट इतिहास की तूफ़ानी पारियों का जब जब जिक्र होगा तब तब तीन जुलाई, 1984 को लॉर्ड्स के मैदान में खेली गई उनकी पारी का जिक्र हमेशा होगा.

पांचवें दिन इंग्लैंड ने लंच से थोड़ा पहले वेस्टइंडीज़ को जीत के लिए 342 रनों का लक्ष्य दिया. यह एक असंभव सा लक्ष्य था, बॉब विलिस, इयन बॉथम और ज्योफ़ म्यूलर की तेज़ गेंदबाज़ी के सामने ग्रीनिज ने आते ही आक्रामण शुरू कर दिया.

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आख़िर में 242 गेंदों पर 214 रनों की नाबाद पारी खेल कर ग्रीनिज ने वेस्टइंडीज़ को ये टेस्ट नौ विकेट से जिता दिया. उनकी पारी के धमाल के चलते महज 66 ओवरों में वेस्टइंडीज़ ने जीत के लिए 344 रन जुटा लिए. इतने बड़े लक्ष्य का पीछा करते हुए इतनी प्रभावी जीत का दूसरा उदाहरण मुश्किल से मिलेगा.

ऐसी ही एक तूफ़ानी पारी उन्होंने क्रिकेट करियर के आख़िरी सिरीज़ में खेली जब वे आउट ऑफ़ फॉर्म में चल रहे थे. टीम के चयनकर्ता उनको टीम से निकालने के लिए दबाव बनाए हुए थे, लेकिन टीम के कप्तान विवियन रिचर्ड्स लगातार उनको टीम में बनाए रखने के पक्ष में थे.

यह खींचतान ऐसी थी कि बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि ग्रीनिज, मार्शल और जेफ़ डूजों को बाहर करने के बदले रिचर्ड्स ने अपना इस्तीफ़ा देते हुए क्रिकेट को ही अलविदा कहने का फ़ैसला ले लिया था. लेकिन उनकी कहानी फिर कभी.

ग्रीनिज पिछली 13 पारियों में वे कुछ ख़ास नहीं कर सके थे, ऐसे में ब्रिजटाउन टेस्ट को उन्होंने अपने आलोचकों का जवाब देने के लिए चुना. क्रेग मैकडरमॉट, ब्रूस रीड और मर्व ह्यूज़ जैसे तेज़ गेंदबाज़ों के सामने वेस्टइंडीज़ की पहली पारी महज 149 रनों पर सिमट गई. इसके जवाब में ऑस्ट्रेलिया 134 रन बना सकी.

लेकिन दूसरी पारी में ग्यारह घंटे तक विकेट पर टिक कर ग्रीनिज ने अपने कप्तान के भरोसे को सही साबित करते हुए करियर की सर्वश्रेष्ठ पारी यानी 226 रनों की पारी खेल दी. इस पारी के साथ उन्होंने अपने आलोचकों को क़रारा जवाब दे दिया था.

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रिटायर्ड नॉट आउट ग्रीनिज

बावजूद इसके अगले टेस्ट के बाद उन्होंने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया. हमेशा के लिए. फिर वनडे क्रिकेट से भी अलविदा ले लिया. तीन दशक बीतने के बाद भी बल्लेबाज़ी के कुछ रिकॉर्ड्स उनके नाम पर बने हुए हैं.

एक तो वे दुनिया के इकलौते ऐसे बल्लेबाज़ हैं जिन्होंने अपने सौवें टेस्ट और सौवें वनडे, दोनों में शतक बनाया है. टेस्ट क्रिकेट में पहले और सौवें टेस्ट, दोनों में शतक बनाने का करिश्मा भी उनके नाम है.

इसके अलावा वे टेस्ट क्रिकेट इतिहास के ऐसे इकलौते बल्लेबाज़ हैं जिनके नाम रिटायर्ड नॉट आउट का टैग जुड़ा हुआ है. अमूमन जब बल्लेबाज़ बैटिंग करते वक्त चोटिल हो जाता है तो रिटायर्ड हर्ट होता है और जब नाबाद पवेलियन लौटता है तो नॉटआउट होता है.

1983 के वर्ल्ड कप से ठीक पहले भारत के ख़िलाफ़ एंटीगा टेस्ट के तीसरे दिन जब वे पवेलियन लौटे तब वे 154 रन बनाकर खेल रहे थे. डेसमंड हेंस के साथ उन्होंने 296 रनों की भागीदारी की थी.

सबको उम्मीद थी कि वे चौथे दिन जब बल्लेबाज़ी करने उतरेंगे तो दोहरा शतक उनके नाम होगा, लेकिन उन्हें अस्पताल में भर्ती अपनी दो साल की बच्ची की तबीयत बिगड़ने की ख़बर मिली तो वे बारबेडॉस पहुंचे. अगली सुबह उनकी जगह विवियन रिचर्ड्स नाइट वाचमैन विंस्टन डेविस के साथ बल्लेबाज़ी करने आए.

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ज़्यादा लोग ग्रीनिज का नाम लेते

दो दिन बाद किडनी इंफेक्शन से ग्रीनिज की बेटी की मौत हो गई. क्रिकेट की दुनिया ने बिना किसी विरोध के उनकी उस पारी को रिटायर्ड नॉट आउट का टैग दिया. लेकिन करियर के आख़िरी दिनों में वेस्टइंडीज़ क्रिकेट बोर्ड से उनके संबंध मधुर नहीं रहे.

इस बारे में ग्रीनिज ने स्पोर्ट्स ऑस्ट्रेलिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि उन्हें नहीं मालूम कि इसकी क्या वजह रही होगी, ये तो बोर्ड के लोग ही बता पाएंगे.

लेकिन गॉर्डन ग्रीनिज ने बांग्लादेशी क्रिकेट को अपनी पहचान बनाने में बड़ा योगदान दिया और कोच के तौर पर उन्होंने बांग्लादेशी क्रिकेट टीम को एक टीम के तौर पर गढ़ा और उसे 2000 में टेस्ट दर्जा दिलाया. बांग्लादेश ने उन्हें 1997 में नागरिकता से सम्मानित किया था और इससे पहले 1993 में उनके नाम पर ढाका में एक स्कूल भी खोला गया. बारबेडॉस भी उनके नाम पर एक स्कूल है. दुनिया के दो छोरों को जोड़ने का काम ग्रीनिज और क्रिकेट ने कर दिखाया.

ग्रीनिज की बल्लेबाज़ी को लेकर पूर्व क्रिकेटर और जाने माने क्रिकेट लेखक मार्क निकोलस को एक बार इंग्लैंड के तेज़ गेंदबाज़ एलक बेडसर ने बताया था, "आधुनिक क्रिकेटरों में एक वही है जो मुझे डॉन ब्रैडमैन जैसा लगता है. वह अपने पांव उसी अंदाज़ में उठाकर पुल शाट्स खेलता है, फिर जब आप फुल लेंग्थ पर गेंदबाज़ी करते हैं तो शानदार ग्राउंडेड शाट्स खेलता है."

2009 में आईसीसी ने जब दुनिया भर के दिग्गजों को हॉल ऑफ़ फ़ेम में शामिल किया तो ग्रीनिज पहली सूची के 55 क्रिकेटरों में शामिल थे. इस मौके पर उनके साथ खेल चुके तेज़ गेंदबाज़ माइकल होल्डिंग ने कहा था, "अगर विवियन रिचर्ड्स नहीं होते तो दुनिया में ग्रीनिज का कहीं ज़्यादा नाम होता, ज़्यादा लोग नाम लेते."

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