राजेंदर गोयल: रणजी का एक सफल स्पिनर जिसे भारतीय टीम में कभी जगह नहीं मिल पाई

राजेंदर गोयल

इमेज स्रोत, ArvindKejriwal/twitter

इमेज कैप्शन, राजेंदर गोयल (यह तस्वीर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने ट्विटर हैंडल से शेयर की है.)
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दुनिया में ऐसे बहुत कम क्रिकेटर होंगे जिन्हें जेल में सज़ा काट रहे एक डाकू से बधाई संदेश प्राप्त हुआ हो.

राजेंदर गोयल की लोकप्रियता और उपलब्धियों का सबसे बड़ा प्रमाण ये था कि जब उन्होंने रणजी ट्रॉफ़ी में 600 विकेट लिए तो उन्हें ग्वालियर जेल से डाकू भूखा सिंह यादव का बधाई पत्र मिला जिसमें लिखा था, 'रणजी ट्रॉफ़ी में 600 से अधिक विकेट लेने के लिए मेरी बधाई स्वीकार करिए. मैं आपका बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ. ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि आपको जीवन में और सफलता मिले.' बाद में गोयल ने बताया था, 'मेरे घर वाले वो पत्र पा कर बहुत डर गए थे. उनको डर था कि उसे अब हमारे घर का पता चल गया है तो वो हमसे पैसे की माँग भी कर सकता है. लेकिन मुझे इससे ज़रा भी डर नहीं लगा था. मैंने उसके पत्र का जवाब देते हुए उसका शुक्रिया अदा किया था और उसे अपनी तस्वीर भी भेजी थी. पता नहीं वो डाकू अभी भी जीवित है या नहीं.'

जी ट्रॉफ़ी में ज़बरदस्त प्रदर्शन

ये भारतीय क्रिकेट की बहुत बड़ी ट्रेजेडी थी कि प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 18.58 के औसत से 750 विकेट लेने के बाद भी राजेंदर गोयल को भारतीय क्रिकेट टीम में चुने जाने लायक नहीं पाया गया.

कई सालों बाद राजेंदर गोयल ने मुस्कराते हुए कहा था, 'भारतीय चयनकर्ताओं ने भले ही मुझे न पसंद किया हो, लेकिन एक डाकू ने ज़रूर मुझे पसंद किया.'

20 सिंतंबर, 1942 को एक असिस्टेंट स्टेशन मास्टर के घर जन्मे ने स्थानीय वैश हाई स्कूल में पढ़ाई की और फिर रोहतक के एक कॉलेज में दाखिला लिया.

गोयल ने 1958-59 में सर्विसेज़ के ख़िलाफ़ पटियाला से अपने रणजी करियर की शुरुआत की थी.

इस मैच में उन्हें सिर्फ़ 1 विकेट मिला लेकिन अगले ही मैच में उन्होंने दिल्ली के 9 विकेट लिए. राजेंदर गोयल का ध्यान खींचने योग्य प्रदर्शन अगले साल आया जब उन्होंने दक्षिणी पंजाब से उत्तरी पंजाब के खिलाफ़ खेलते हुए 4 ओवर में 6 रन दे कर 6 विकेट लिए और उत्तरी पंजाब की टीम को 54 रनों पर आउट कर दिया.

क्रिकेट

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर

भारतीय टीम में चयन लेकिन एकादश में नहीं मिली जगह

1973 में गोयल हरियाणा की तरफ़ से खेलने लगे और अपने पहले ही मैच में उन्होंने रेलवे के खिलाफ़ 55 रन दे कर 8 विकेट लिए. 1985 में अपने रिटायरमेंट तक वो हरियाणा के लिए ही खेले. 1974-75 में जब क्लाइव लॉयड की वेस्ट इंडीज़ की टीम भारत आई तो बेंगलौर टेस्ट में बिशन बेदी को अनुशास्नात्मक कार्रवाई के तहत भारटीय टीम से निकाल दिया गया और उनकी जगह राजेंदर गोयल को टीम में जगह दी गई.

गोयल को बताया गया कि वो अंतिम एकादश में होंगे लेकिन जब टॉस के समय टीम की स्लिप लॉयड को पकड़ाई गई तो उसमें उनका नाम नहीं था.

उस टीम में चंद्रशेखर, वैंकटराघवन और प्रसन्ना को खिलाया गया.

वेस्ट इंडीज़ ने वो मैच 267 रनों से जीता.

बाद में भारतीय टीम के एक और बड़े स्पिनर दिलीप दोशी ने अपनी आत्मकथा 'द स्पिन पंच' में लिखा. 'बेदी ने खुद स्वीकार किया कि अगर गोयल उस टेस्ट में खेले होते तो भारत शर्तिया वो मैच जीता होता. अगर वो उस मैच में खेले होते तो सीरीज़ की नतीजा दूसरा होता. मेरा मानना है कि प्रसन्ना और वैंकटराघवन की तरह बेदी को भारटीय टीम में जगह बनाने के लिए कभी संघर्ष नहीं करना पड़ा. उनकी यही छवि बनी रही कि उनके बिना भारतीय टीम का काम नहीं चल सकता, जिसकी वजह से बहुत ही प्रतिभावान गोयल को बाहर बैठना पड़ा.'

बिशन सिंह बेदी

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, बिशन सिंह बेदी

सुनील गावस्कर अपनी किताब 'आइडल्स' में लिखते हैं, 'मेरा मानना है कि चयनकर्ताओं ने राजेंदर गोयल को इसलिए नहीं खिलाया क्योंकि अगर उन्होंने कुछ विकेट ले लिए होते तो कम से कम कुछ समय के लिए बिशन बेदी की टीम में वापसी मुश्किल हो जाती और ये उनके लिए परेशानी का सबब होता.' बाद में राजेंदर गोयल ने खुद सवाल पूछा, 'अगर चयनकर्ता दो ऑफ़ स्पिनरों प्रसन्ना और वैंकट को टीम में खिला सकते थे तो उन्हें दो बाएं हाथ के स्पिनर खिलाने से क्यों परहेज़ था ? बाद में रवि शास्त्री और दिलीप दोशी दोनों जो कि बाएं हाथ के स्पिनर थे एक टीम में खेले, लेकिन मेरे समय में ऐसा सोचना भी गलत था.'

गावस्कर की नज़र में गोयल बेदी से अधिक ख़तरनाक

भारत में बाएं हाथ को दो स्पिनर हुए हैं जो दुनिया की किसी भी टीम के लिए खेल सकते थे लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय टीम में जगह नहीं बना पाए. एक थे मुंबई के पद्माकर शिवाल्कर और दूसरे हरियाणा के राजेंदर गोयल.

बिशन सिंह बेदी की वजह से इन्हें भारतीय टीम से बाहर रहना पड़ा.

बेदी से पहले बापू नादकर्णी, रूसी सूरती और सलीम दुर्रानी जैसे ऑलराउंडर्स की मौजूदगी की वजह से उन्हें भारतीय टीम में जगह नहीं मिल पाई थी. गावस्कर अपनी किताब 'आइडल्स' में लिखते हैं, 'अगर मुझे बेदी और गोयल के बीच किसी एक के खिलाफ़ खेलने का विकल्प दिया गया होता तो में हमेशा बेदी को चुनता, क्योंकि बेदी अपनी फ़्लाइट की वजह से आपको आगे बढ़ कर गेंद को ड्राइव करने की छूट देते थे, लेकिन गोयल को जो हमेशा फ़्लैटर ट्रेजेक्ट्री की गेंद करते थे मारना लगभग असंभव होता था.

ऐसा नहीं था कि वो फ़्लाइट कर नहीं सकते थे, लेकिन उन्हें हर पिच पर इतना टर्न मिलता था कि उन्हें फ़्लाइट की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी.'

सुनील गावस्कर

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, सुनील गावस्कर

बल्लेबाज़ों को बांध देते थे गोयल

गोयल के खेल की एक और ख़ास बात थी, वो था उनका स्टेमिना.

चालीस साल का होने के बावजूद वो बिना अपनी धार खोए दिन का खेल समाप्त होने तक गेंदबाज़ी कर सकते थे.

हालांकि वो नंबर 11 पर बल्लेबाज़ी करते थे लेकिन तब भी वो अपना पसंदीदा स्वीप शॉट लगाने से नहीं हिचकते थे.

गावस्कर लिखते हैं 'जब हम दिलीप ट्रॉफ़ी में उत्तरी क्षेत्र के खिलाफ़ खेलते थे तो हमें बेदी की अपेक्षा उनके खिलाफ़ खेलने में डर लगता था, क्योंकि वो एक तरह से बाँध देते थे. उनके खिलाफ़ मैं कभी भी अपना सहज खेल नहीं दिखा पाया. फ़्लैट गेंद करने वाले हमारे अधिक्तर गेंदबाज़ या तो शॉर्ट या फिर 'ओवरपिच्ड' गेंद डालने की गलती करते हैं, इसलिए उनपर आसानी से ड्राइव, कट या पुल शॉट लगाया जा सकता है. गोयल या तो ये गल्ती कभी नहीं करते थे और अगर करते भी थे तो उस समय वो अपना पच्चीसवाँ या छब्बीसवाँ ओवर फेंक रहे होते थे.'

सिर्फ़ 5 रुपए प्रतिदिन मिलते थे रणजीट्रॉफ़ी खेलने के

जब गोयल रणजी ट्रॉफ़ी खेलते थे तो उन्हें 5 रुपए प्रतिदिन मैच फ़ीस मिला करती थी. अगर मैच समय से पहले ख़त्म हो जाता था तो उन्हें बाकी दिनों के पैसे नहीं मिलते थे. बाद में ये मैच फ़ीस बढ़ा कर 10 रुपए प्रतिदिन कर दी गई थी.

मशहूर खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली बताते हैं, 'राजेंदर गोयल ने मुझे एक बार बताया था कि उन दिनों हम या तो बसों में खड़े हो कर या तीसरे दर्जे के डिब्बों में सफ़र किया करते थे और बहुत सस्ते होटलों में ठहरते थे. एक बार पटियाला में हमे एक बड़े हॉल में ठहराया गया जिसमें लाइन से 15 चारपाइएं बिछी हुई थीं. आपको यकीन नहीं होगा कि इन्हीं चारपाइयों में से एक पर सो रहे थे हमारे कप्तान टाइगर मंसूर अली ख़ाँ पटौदी जिन्होंने ज़ोर दे कर कहा था कि वो टीम के साथ ही सोना पसंद करंगे.'

बिशन सिंह बेदी

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, बिशन सिंह बेदी

बेदी ने की तारीफ़

1974 में भारतीय टीम में राजेंदर गोयल के न चुने जाने का ख़मियाज़ा घरेलू सत्र में खेलने वाले बल्लेबाज़ों को भुगतना पड़ा.

उस साल उन्होंने रणजी सीज़न में 21.56 के औसत से 32 विकेट लिए और अगले साल भी 17.95 के औसत से 43 बल्लेबाज़ों को पवेलियन भेजा.

दिलचस्प बात ये है कि जिस शख़्स की वजह से उन्होंने भारतीय टीम के बाहर रहना पड़ा, उसी ने उनकी तारीफ़ों के पुल बाँध दिये.

बिशन सिंह बेदी ने कहा, 'गोयल के पास तकनीक भी थी और टेंप्रामेंट भी. उनके पास ग़ज़ब का धैर्य भी था. उनके पास विनम्रता की भी कमी नहीं थी जो एक खिलाड़ी को महान बनाती है. मेरे लिए वो महान स्पिनर थे, हाँलाकि उनकी उतनी वाहवाही नहीं हुई जिसके कि वो हक़दार थे. मैंने उनको कभी प्रतिद्वंदी के तौर पर नहीं लिया. सारा खेल सही समय पर ब्रेक मिलने का था. मैं शायद इस मामले में उनसे ज़्यादा भाग्यशाली था.'

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)